अभिव्यक्ति की कोई स्वतंत्रता जिम्मेदारी बिना नहीं हो सकती

संपादकीय
5 जुलाई 2017


बंगाल में एक फेसबुक पोस्ट को लेकर बड़ा तनाव खड़ा हो गया है और वहां पर केन्द्रीय सुरक्षा बलों को तैनात करना पड़ा है। सोशल मीडिया की बातों को लेकर ऐसा तनाव नया नहीं है, और करीब-करीब हर प्रदेश में इस तरह के तनाव सामने आ चुके हैं। भारत में लोगों की सहनशीलता धर्म के मामले में बहुत ही कम हो चुकी है, और इससे चाहे किसी धर्म या जाति के लोगों का राजनीतिक ध्रुवीकरण आसानी से हो जाए, इससे देश का माहौल जितना बिगड़ता है, जितनी जल्दी बिगड़ता है, उसके सुधरने की कोई संभावना उतनी रफ्तार से नहीं बनाई जा सकती।
अब सवाल यह है कि जिस देश में अब हर बच्चे के हाथ में मोबाइल फोन हो, और अधिकतर आबादी किसी न किसी धर्म या जाति को लेकर उत्तेजना से भरी हुई है, उस देश में सोशल मीडिया जैसे आसान औजार के चलते आग लगने से कब तक बचा जा सकेगा? और यह देश पढ़ाई-लिखाई के दौर से गुजरने के बाद, अपने आपको समझदार समझने की खुशफहमी में डूबा हुआ एक बार फिर कट्टर-अज्ञान के गड्ढे में गिरा जा रहा है। और मजे की बात यह है कि गड्ढे में इस गिरने को देशप्रेम, राष्ट्रवाद, और अपनी संस्कृति की जड़ों से जुडऩा भी समझा जा रहा है। बारूद के ढेर पर बैठे हुए ऐसे देश में सोशल मीडिया की एक पोस्ट से कोई शहर जल सकता है, किसी प्रदेश में बवाल खड़ा हो सकता है, और न तो सोशल मीडिया तक लोगों की पहुंच आसानी से रोकी जा सकती है, और न ही इस नए औजार के बेजा इस्तेमाल को रोकने का कोई जरिया किसी सरकार के पास है।
दरअसल यह समझने की जरूरत है कि लोकतंत्र में सोशल मीडिया जैसे अधिकार एक जिम्मेदारी के साथ ही हासिल किए जा सकते हैं, और यह जिम्मेदारी लोगों की दूसरों के प्रति संवेदनशील होने की जिम्मेदारी भी है, और लोगों के अपने बर्दाश्त की जिम्मेदारी भी है। सहिष्णुता लोगों में अगर दो किस्म से न हो, तो लोकतंत्र नहीं चल सकता, पहली तो यह कि दूसरों की भावनाओं का सम्मान करने की सहिष्णुता, और दूसरी यह कि अपनी भावनाओं पर किसी के कुछ कहने को बर्दाश्त करने की सहिष्णुता। दुनिया के जो देश अधिक सभ्य हैं, जहां पर लोगों को कहने की अधिक आजादी है, जहां पर लोगों का बर्दाश्त अधिक है, वहां पर सोशल मीडिया हो, या कि फ्रांस की विख्यात या कुख्यात, जो भी कहें, कार्टून-पत्रिका हो, उन सबका हक लोगों को रहता है। हिन्दुस्तान में हक ही हक हैं, जिम्मेदारियां नहीं हैं।
हमने कुछ दिन पहले इसी जगह सोशल मीडिया के झूठ और उसकी भड़काऊ अफवाहों को लेकर, उस पर लिखी जा रही अश्लील और हिंसक बातों को लेकर यह सुझाव दिया था कि केन्द्र और राज्य सरकारों को तुरंत ही ऐसी बातों पर कार्रवाई करनी चाहिए, और रोज देश में दो-चार लोग जब तक ऐसी हिंसक बातों पर जेल जाना शुरू न होंगे, बाकी जनता को उसकी जिम्मेदारी समझ नहीं आएगी। आज सरकार ने इंटरनेट की सुविधा तो जनता को दे दी है, लेकिन उसके इस्तेमाल की जिम्मेदारी न खुद होकर लोगों में आई है, और न ही कानून आज असरदार तरीके से यह जिम्मेदारी सिखा पा रहा है। ऐसे में किसी दिन संगठित रूप से देश में अफवाहों के रास्ते बहुत बड़ा तनाव खड़ा किया जा सकता है, पूरे देश को खेमों में बांटा जा सकता है, ऐसे में जनता तो ठीक है, लेकिन बुनियादी जिम्मेदारी सरकार की है, और उसे कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। अभिव्यक्ति की कोई स्वतंत्रता जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकती।

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