आजादी के पहले की गांधी, भारत की फिलीस्तीन नीति मोदी ने पूरी तरह छोड़ दी

संपादकीय
6 जुलाई 2017


पिछले दो दिनों से भारतीय मीडिया प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इजराइल प्रवास की खबरों को लेकर कुछ इस तरह उतावला दिख रहा है कि भारत को कुंभ के मेले में खोया हुआ उसका भाई मिल गया है, और अब दोनों भाई मिलकर बाकी दुनिया को ठीक कर लेंगे। इजराइल के लिए भारत के इस ताजा और अभूतपूर्व दर्जे के प्रेम को कुछ मिनटों की जिंदगी वाला इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तो बावलेपन के साथ देख सकता है, लेकिन गांधी के वक्त से छपे हुए अखबारों की जो परंपरा रही है, वह गंभीरता इस बात को अनदेखा नहीं कर रही है कि हिन्दुस्तान की विदेश नीति और उसकी अंतरराष्ट्रीय सोच ने कभी भी इजराइल के साथ रिश्तों को फिलीस्तीन के साथ अपने रिश्तों से अलग करके नहीं देखा था जो कि आज हो रहा है। आज भारतीय प्रधानमंत्री महज इजराइल की खातिरदारी के बाद लौट जा रहे हैं, और बगल में उन फिलीस्तीनियों से उन्होंने बात भी नहीं की है जो कि एक ऐतिहासिक बेइंसाफी के शिकार होकर इजराइल की हिंसा और गुंडागर्दी के सामने रोज मर रहे हैं, और रोज हौसले से उठकर खड़े भी हो रहे हैं। मोदी के इजराइल दौरे को अगर देखें तो ऐसा लगता है कि फिलीस्तीन को इतना अनदेखा तो अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप भी नहीं किया है, जबकि अमरीका की शह पर इजराइल दुनिया का सबसे बड़ा आतंकी और हमलावर देश बना हुआ है।
दरअसल एक विश्व-सोच के दिन अब औसत दर्जे के अदूरदर्शी नेताओं के चलते हुए लग रहे हैं। अब एक हिंसक और उग्र राष्ट्रवाद की लहरों पर सवार नेता अपने देश के तात्कालिक और संकुचित फायदों से परे न इंसानियत की सोच पा रहे हैं, न ही इंसाफ की। ऐसे में भारत के इजराइल से रिश्ते कुछ अलग किस्म की बुनियाद पर अब पनप रहे हैं, इनमें से एक तो यह है कि दोनों देशों की सरकारों का धार्मिक नजरिया एक किस्म का है, दूसरी बात यह कि इजराइल निर्यात पर जिंदा देश है, और उसके कुल निर्यात का आधे से अधिक भारत में आयात हो रहा है। अभी इजराइल में मोदी के लिए जो कालीन बिछा है, और इजराइली प्रधानमंत्री जिस तरह मोदी का साया बनकर तीन दिन बिना कुछ और किए मोदी के साथ रहे हैं, वह सबसे बड़े कारोबारी का सबसे बड़े ग्राहक के साथ बर्ताव भी है। इजराइली दुनिया में जहां भी बसे हैं, वे सबसे चतुर कारोबारी हैं, सबसे कामयाब भी, और मोदी तो जाहिर है कि कारोबारियों के प्रदेश गुजरात से आए हैं, और कारोबार के लिए उनके मन में बड़ा सम्मान और महत्व है।
आज हिन्दुस्तान मोदी की अगुवाई में दुनिया का ऐसा अकेला देश नहीं है जो कि अपनी विश्व-जिम्मेदारियों को पूरी तरह अनदेखा करके महज अपने देश के तात्कालिक हितों के लिए काम कर रहा है। अमरीका में ट्रंप ठीक यही काम कर रहे हैं। और ऐसे में जुल्म के दुनिया के सबसे बड़े शिकार फिलीस्तीनियों की मदद से किसी देश की अर्थव्यवस्था, उसके कारोबार, उसकी फौजी ताकत में कोई इजाफा होने वाला नहीं है। नतीजा यह है कि फिलीस्तीनियों को आज हिन्दुस्तान में पूरी तरह इजराइली रहमो-करम पर छोड़ दिया है, और अगर पिछले तीन दिनों के भारतीय प्रधानमंत्री के बयान और भाषण देखें, तो ऐसा लगेगा कि हिन्दुस्तान को यह पता ही नहीं है कि फिलीस्तीन नाम का कोई लहूलुहान देश भी धरती के नक्शे पर है। कुछ लोगों का यह भी मानना रहता है कि किसी देश को नैतिकता और महानता की बातें अपने राष्ट्रीय हित की कीमत पर नहीं करनी चाहिए, तो फिर ऐसी बातें तो देश के भीतर, अपने शहर में, अपने मुहल्ले भी की जा सकती हैं कि सड़क किनारे के किसी जख्मी को अस्पताल पहुंचाने से अगर हमारा कोई भला नहीं होता, तो फिर हमें यह जहमत क्यों उठानी चाहिए। भारतीय प्रधानमंत्री का इजराइली दौरा भारत की आजादी के पहले से चली आ रही गांधी और नेहरू की नीति, और अभी तक की भारत सरकार की स्थाई और निरंतर विदेश नीति से बिल्कुल परे का दौरा रहा है, और यह आज की कारोबारी दुनिया के मतलबपरस्त तौर-तरीकों के मुताबिक दो कारोबारी देशों के बीच का प्रेम है, और शायद राष्ट्रवाद को ऐसा ही तात्कालिक फायदा काफी लगता है। लेकिन इतिहास भारतीय विदेश नीति के इस फेरबदल को उदारता से दर्ज नहीं करेगा।

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