राजनीतिक बदले के आरोपों से बचने चोरों को क्यों बख्शें?

संपादकीय
7 जुलाई 2017


बिहार के भूतपूर्व मुख्यमंत्री, एक भूतपूर्व मुख्यमंत्री के पति, और एक वर्तमान उपमुख्यमंत्री के पिता लालू यादव के ठिकानों पर सीबीआई के छापे पड़े हैं, और उन पर आरोप है कि रेलमंत्री रहते हुए उन्होंने यूपीए सरकार के वक्त ठेके देने में गड़बड़ी की थी, और ठेके पाने वाली कंपनी से इसके एवज में बड़ी महंगी जमीनों के तोहफे एक बेनामी रास्ते से हासिल किए। जैसा कि आमतौर पर होता है लालू यादव और उनकी पार्टी ने इसे केन्द्र सरकार की मनमानी और बदनीयत कहा है, और दावा किया है कि लालू यादव ऐसी कार्रवाई से और अधिक ताकतवर होकर उभरेंगे। लालू यादव का सीबीआई से यह वास्ता नया नहीं है, और भ्रष्टाचार के आरोपों के दाग उन पर नए नहीं हैं। उनका पूरा कुनबा आज तरह-तरह की जांच से घिरा हुआ है, और ऐसी कार्रवाईयां उनके खिलाफ दशकों से चल रही हैं, एक अदालत से वे सजा भी पा चुके हैं, और बड़ी अदालत में अपील करके अभी जेल के बाहर हैं।
यह पूरा सिलसिला बड़ा निराश करने वाला है। जो लालू यादव साम्प्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई की बड़ी मुनादी करके सिर्फ साम्प्रदायिकता के मुद्दे पर देश के तमाम गैरभाजपाई विपक्ष को एक करने का झंडा लेकर चलते हैं, उनके झंडे का डंडा ही बेईमानी से हासिल किया हुआ दिखता है। चारा घोटाले से लेकर परले दर्जे की कुनबापरस्ती तक, और अब उनकी सांसद बेटी के अपने पति सहित सैकड़ों करोड़ की अघोषित संपत्ति की जांच में घिरने तक, कौन सी ऐसी बात है जो लालू यादव की साख को चोट न पहुंचाती हो? लेकिन महज साम्प्रदायिकता-विरोध के नाम पर लालू यादव वामपंथियों से लेकर कांग्रेस तक के बीच एक स्वीकार्य नेता बने हुए हैं, और धर्मनिरपेक्षता को बचाने की मुहिम में लालू की बाकी तमाम खामियों को अनदेखा कर दिया जाता है। लेकिन लालू ने अपने कुनबे के साथ बिहार पर राज करते हुए बिहार को जिस बदहाल में पहुंचाया, उसे कोई भुला नहीं है, और आज नीतीश की बिहार सरकार लालू के साथ ही जिस तरह की मोहताज है, उसके चलते लालू के कुनबे का भ्रष्टाचार बिहार में जारी दिखता है।
कई बार यह हैरानी होती है कि किसी एक नेता, या किसी एक पार्टी, या नेता के कुनबे को आखिर कितनी दौलत की जरूरत होती है? और एक तरफ ममता बैनर्जी भी हैं जिन पर भ्रष्टाचार के इस तरह के आरोप नहीं लगते, और जो सादगी के साथ सरकार चलाती हैं। खुद लालू के भागीदार नीतीश कुमार पर ऐसे कोई आरोप नहीं लगे, और दूसरी तरफ जयललिता, बादल परिवार, मुलायम परिवार, ऐसी कई मिसालें हैं कि एक कुनबे की पार्टी किस कदर भ्रष्ट हो जाती है, और एक राजनीतिक विचारधारा का पाखंड दिखाते हुए किस तरह प्रदेश को लूटती है। इसी सिलसिले में हरियाणा का नाम गिनाना जरूरी है जहां के मुख्यमंत्री रह चुके देवीलाल के मुख्यमंत्री रह चुके बेटे ओमप्रकाश चौटाला भ्रष्टाचार के आरोप में लंबी कैद काट रहे हैं। मायावती के कुनबे पर सैकड़ों-हजारों करोड़ की काली कमाई के आरोप लगे हुए हैं, और झारखंड में एक विधायक वाली पार्टी के मुख्यमंत्री रहे मधु कोड़ा जेल काटकर अभी बाहर हैं।
दरअसल भारत में धर्मनिरपेक्षता को जितना नुकसान भाजपा या उसके साथियों ने नहीं पहुंचाया, उतना नुकसान साम्प्रदायिकता-विरोधी होने का दावा करने वाले भ्रष्ट नेताओं ने पहुंचाया है जिन्होंने यह जनधारणा बनाई कि साम्प्रदायिकता-विरोध तो नाम है, और महज भ्रष्टाचार काम है। भारतीय लोकतंत्र में यह एक बहुत ही निराशाजनक और तकलीफदेह तस्वीर है कि साम्प्रदायिकता के खिलाफ, या कि समाजवाद के नाम पर राजनीति करने वाले लोग परले दर्जे के भ्रष्ट हैं, परले दर्जे के कुनबापरस्त हैं, और वे लोकतंत्र की साख भी चौपट कर रहे हैं।
जहां तक विपक्षी नेताओं पर सीबीआई की कार्रवाई की बात है, तो हम इसके खिलाफ नहीं हैं। मोदी दस से अधिक बरस तक गुजरात में मुख्यमंत्री रहे, और उस पूरे दौर में दिल्ली में यूपीए की सरकार थी। सीबीआई भी यूपीए के पास थी, आयकर भी, और ईडी भी। लेकिन अगर उस पूरे दौर में मोदी को कटघरे तक ले जाने जैसा कोई भ्रष्टाचार, कोई जुर्म यूपीए नहीं पकड़ पाया, तो आज मोदी को उसकी रियायत तो मिलनी ही चाहिए। मोदी पर कोई कुनबापरस्ती की तोहमत नहीं लगा सकते, जाहिर तौर पर उनके कोई निजी भ्रष्टाचार नहीं दिखते, और यही वजह है कि उनके मुकाबले जब दागी और भ्रष्ट नेता अभियान चलाते हैं, तो वैसे अभियान की साख बहुत ही कमजोर रहती है। भारत के भाजपा-विरोधी विपक्ष को यह तय करना होगा कि या तो वह भ्रष्टाचार के साथ अपनी राजनीति करे, और मोदी को अधिक साख बनाने दे, या फिर मोदी का मुकाबला करने के लिए कुनबे और कालेधन को छोड़े। लेकिन कुनबे और कालेधन की बात को छोडऩे की बात अगर करें, तो कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, लालू यादव, और ऐसे बहुत से लोग तो बाहर ही हो जाएंगे। लालू यादव पर अभी सीबीआई की जो कार्रवाई हुई है, चाहे वह बदले की भावना से हुई हो, लेकिन लालू की बेईमानी और उनके भ्रष्टाचार के बारे में देश की जनता को जरा भी शक नहीं है। और ऐसी कार्रवाई जारी रहना चाहिए। राजनीतिक बदले के आरोपों से बचने के लिए चोरों को क्यों बख्शा जाए?

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