आत्मगौरव का भारतीय पाखंड छोड़े बिना निजी हिंसा न घटेगी

संपादकीय
8 जुलाई 2017


हिन्दुस्तान से लेकर दुनिया के बाकी बहुत से देशों तक निजी और पारिवारिक हिंसा की दिल दहलाने वाली खबरें आती हैं। हमारे आसपास भी कोई ऐसा दिन नहीं गुजरता जब परिवार के भीतर हत्या और आत्महत्या जैसे मामले सामने न आते हों। हिन्दुस्तान में जहां पर कि लोगों को मानसिक परामर्शदाता या मानसिक चिकित्सक उपलब्ध नहीं है, वहां से लेकर दुनिया के विकसित या संपन्न देशों में जहां पर मानसिक चिकित्सा आसानी से हासिल है, सभी जगहों पर निजी हिंसा होती है, और लोग या तो खुद को मार डालते हैं, या कि अपने प्रेमी-प्रेमिका को, परिवार के लोगों को, या सहकर्मियों को। ऐसे बहुत से मामलों में जब हिंसा हो चुकी रहती है, तब अगर आसपास के लोगों से पूछा जाता है तो पता लगता है कि मुजरिम के ऐसे हिंसक मिजाज का उन्हें अंदाज ही नहीं था।
ऐसे में दुनिया के कुछ ऐसे देश हैं जहां पर ऐसी हिंसा बहुत कम है, न के बराबर है। योरप में स्कैंडेनेवियाई कहे जाने वाले देश बहुत से सर्वे में सबसे सुखी देशों में पाए गए हैं, और वहां के लोग अपने जीवन से, अपने कामकाज से, और परिवार के अपने किस्म के ढांचे से संतुष्ट हैं, सुखी हैं, और खुश हैं। वहां पर शादी का रिवाज है भी,  और लोग उसके बिना भी रह लेते हैं। परिवार के लोगों के लिए, और समाज के लिए यह बात मायने ही नहीं रखती कि वहां शादी के पहले बच्चे हो रहे हैं, या कि लोग अपने ही सेक्स के लोगों से समलैंगिक विवाह कर रहे हैं। न शादी का महत्व, और न तलाक का, लेकिन लोग खुश हैं। दूसरी तरफ हम हिन्दुस्तान में देखते हैं तो यहां के लोग एक झूठे आत्मगौरव में जीने का मजा लेते हैं कि पश्चिम बहुत ही तनाव और कुंठा में जीता है, और मानसिक शांति के लिए वह भारत की तरफ देखता है। ऐसा धोखा शायद इसलिए भी होता है कि पश्चिम से आए कुछ गोरे या काले लोग भारत के कुछ शहरों में योग करते, या बाबा लोगों की चिलम से गांजा पीते दिख जाते हैं, और आम हिन्दुस्तानी यह मान लेते हैं कि ये लोग वहां अपने देश में मानसिक अशांति के शिकार हैं, और शांति के लिए भारत आए हैं।
यह धोखा लोगों को अपने रीति-रिवाजों से, अपने पाखंडों से चिपके रहने में मजा देता है, और लोगों को लगता है कि भारतीय संस्कृति में कोई ऐसी चीज है, या कि सारी की सारी संस्कृति ऐसी है कि लोग यहां आते हैं, और वे लोग अपने खुद के जीवन में बड़े दुखी हैं। ऐसा झूठा गौरव लोगों को भारत में प्रेम के खिलाफ हिंसा, दूसरी जाति में शादी के खिलाफ हिंसा, दूसरे धर्म में शादी के खिलाफ हिंसा के लिए उतारू करता है। फिर यहां नालों और घूरों पर जो नवजात शिशु मिलते हैं वे तमाम हिन्दुस्तानी किसी मानसिक शांत देश की संतानें नहीं रहते, वे एक पाखंडी देश की औलाद रहते हैं जो कि अविवाहित या अकेली महिला को मां बनने का हक नहीं देता। इस झूठे आत्मगौरव और दंभ से मुक्त हुए बिना भारत में हिंसक तौर-तरीके खत्म होने वाले नहीं हैं। यहां की पारिवारिक हिंसा दुनिया के कुछ दूसरे देशों की हिंसा से अलग इस तरह है कि यहां प्रेम के खिलाफ खूब हत्याएं होती हैं, जो कि दुनिया के सभ्य और विकसित देशों में नहीं होतीं। हम पहले भी कई बार इसी जगह लिख चुके हैं कि हत्या और आत्महत्या तो खबरों में आ जाती है, लेकिन इनके पहले तक की कुंठा और निराशा खबरों में नहीं आतीं। भारत में जो लोग निजी पसंद और प्रेम की आजादी नहीं पाते हैं, उनका समाज के लिए योगदान भी कम रहता है, ऐसे लोग हिंसक भी अधिक हो सकते हैं, चाहे दूसरों के प्रति, चाहे अपनों के प्रति। भारत को यह मानना होगा कि यह एक बेहद हिंसक समाज है, और यहां कोई शांति की तलाश में नहीं आते, यहां पर धर्म और आध्यात्म का जो तिलस्म दिखता है, उस फेर में सैलानी आते हैं, और वे अपनी जिंदगी में यहां के मुकाबले अधिक खुश हैं, अधिक प्रेम से जीते हैं, और कम हिंसा करते हैं।

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