सोशल मीडिया पर भड़काना और सरकारों की चुप्पी जारी

संपादकीय
9 जुलाई 2017


एक भोजपुरी फिल्म में एक महिला से बदसलूकी के एक दृश्य को हरियाणा की एक बड़ी भाजपा नेता ने बंगाल में हिंदू महिलाओं के साथ किए जा रहे जुल्म का नजारा बताते हुए बंगाल की तृणमूल सरकार के खिलाफ बहुत कुछ लिखा। लेकिन यह झूठ तुरंत पकड़ आ गया और लगातार इसे सोशल मीडिया पर उजागर भी किया गया। दूसरी तरफ बांग्लादेश की कुछ तस्वीरों को लेकर, दुनिया के किसी और हिस्से के वीडियो को लेकर उन्हें बंगाल में हिंदुओं पर अत्याचार बताते हुए एक बड़ा अभियान छेड़ा गया है। और जाने-पहचाने चेहरों ने अपने नाम के असली सोशल मीडिया खातों पर यह अभियान चला रखा है। अब सवाल यह उठता है कि लोकतंत्र के तहत मिली हुई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का और कितना बेजा इस्तेमाल केंद्र और राज्य सरकारें बर्दाश्त करेंगी? अभी इसी पल यह खबर भी आ रही है कि दिल्ली के करीब उत्तरप्रदेश में ट्रेन में मुस्लिम नौजवान की हत्या के एक और आरोपी को पुलिस ने महाराष्ट्र में गिरफ्तार किया है। देश में अल्पसंख्यक को, दलित को, और आदिवासी को अलग-अलग फर्जी वजहें बताकर जिस तरह नफरत का शिकार बनाया जा रहा है, उस अभियान की आग में घी डालने के लिए सोशल मीडिया पर लोग पूरे हौसले के साथ और खुले मकसद के साथ जो भड़काऊ अभियान चला रहे हैं, उसे देखते हुए लगता है कि अगर कार्रवाई में देर होगी, तो आग जंगल की आग की तरह फैलती चली जाएगी।
हमारा ख्याल है कि आज देश में कई अलग-अलग कोनों से ऐसी साजिशों के खिलाफ कार्रवाई की जरूरत है। सबसे पहली बात तो यह कि राजनीतिक दल और धार्मिक-सामाजिक संगठन अपने लोगों की ऐसी हरकतों पर उनको तुरंत बाहर का रास्ता दिखा सकते हैं, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है, और आग लगाऊ लोगों को अधिक महत्व मिल रहा है। दूसरी तरफ केंद्र और राज्य सरकारों को तुरंत ऐसे भड़कावे पर कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए, और उसके लिए देश में बहुत कड़ा कानून भी बना हुआ है, लेकिन उसका इस्तेमाल छांट-छांटकर होता है। तीसरी बात यह कि देश की बड़ी अदालतें खुद होकर भी बहुत से मामलों में पहल करती हैं, कार्रवाई करती हैं, और सोशल मीडिया पर भड़कावे के ये मामले ऐसे हैं कि जिन पर अगर सरकारें तुरंत कार्रवाई नहीं करें तो अदालतों को खुद होकर कार्रवाई करनी चाहिए। भारत के हाईकोर्ट और यहां की सुप्रीम कोर्ट बहुत से ऐसे मामलों में अपनी सक्रियता दिखाते रहते हैं, और यह एक मामला ऐसा है कि लोकतंत्र को जलने से बचाने के लिए अदालतों को खुद होकर यह पहल करनी होगी।
आज समझदार लोग सोशल मीडिया और मीडिया में भी चाहे कम संख्या में हों, मौजूद तो हैं। उन्हें यह पहल करनी चाहिए कि ऐसी हर साजिश का भांडाफोड़ करते चलें, और सोशल मीडिया चलाने वाली कंपनियों को लगातार शिकायतें भेजें ताकि दंगाईयों के अकाउंट ब्लॉक होते रहें।

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