आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के खतरों को समझे बिना उसे आगे बढ़ाने पर रोक लगे...

संपादकीय
2 अगस्त 2017


कम्प्यूटरों की दुनिया में आज एक सबसे बड़ी चुनौती आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को माना जाता है। कृत्रिम बुद्धि के विकास में दुनिया के कई कम्प्यूटर वैज्ञानिक लगे हुए हैं, और फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग ने इस रिसर्च में बहुत बड़ा पूंजीनिवेश किया हुआ है। लेकिन अभी पिछले हफ्ते दुनिया के कुछ सबसे बड़े कम्प्यूटर-दिमागों के बीच यह बहस छिड़ गई है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को विकसित करना कितना खतरनाक होगा, और यह कि इसके लिए क्या पहले कड़े नियम बनाना बेहतर नहीं होगा? अमरीका के एक दूसरे बड़े कारोबारी ने मार्क जुकरबर्ग की कोशिशों को गैरजिम्मेदार और खतरनाक बताया। यह बहस तब शुरू हुई जब फेसबुक को अपने ही आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस प्रोजेक्ट में एक कोशिश को खारिज कर देना पड़ा। उसने ऐसी दो कृत्रिम बुद्धियां बनाकर उन्हें विकसित करने का काम किया था, लेकिन वे कुछ इस तरह बेकाबू विकसित हुईं कि वे आपस में बात करने के लिए एक नई जुबान बना बैठीं, और वे दोनों बुद्धियां अंग्रेजी छोड़ इस नई भाषा में आपसी बातचीत करने लगीं जो कि इन वैज्ञानिकों की समझ से भी परे की थी। इसके बाद लाख कोशिश करके भी ये वैज्ञानिक इन कृत्रिम बुद्धियों को वापिस अंग्रेजी तक नहीं ला पाए, तो फिर उन्होंने इन्हें खत्म कर दिया। यही तजुर्बा ऐसे बहुत सारे मामलों में हुआ जहां पर कृत्रिम दिमागों ने अपनी एक अलग भाषा बना ली, और अंग्रेजी को पूरी तरह छोड़ ही दिया।
यह तो महज भाषा की बात है, और अभी ये कृत्रिम दिमाग इंसानी काबू के बाहर के नहीं थे, इसलिए इन्हें खत्म किया जा सका। लेकिन अधिकतर लोगों ने हॉलीवुड की ऐसी फिल्में देखी होंगी जिनमें इंसानों के बनाए हुए मशीनी मानव इंसानों के काबू से बाहर हो जाते हैं, और तबाही फैलाने में लग जाते हैं। दरअसल ऑर्टिफिशियल इंटेंलीजेंस के साथ एक दिक्कत यह है कि इंसान ऐसी बुद्धियों को बनाकर उन्हें विकसित तो करते चलता है, लेकिन एक सीमा के बाद जाकर ऐसे दिमाग अपने आपको खुद ही विकसित करने लगते हैं, और इंसान महज देखते रह सकता है। लोगों को हिन्दुस्तान में प्रचलित एक बहुत पुरानी कहानी याद होगी कि किस तरह कुछ लोग हड्डी, मांस, और चमड़ा जोड़कर एक शेर तैयार करते हैं, और फिर आखिर में उसमें प्राण भी फूंक देते हैं। प्राण मिलते ही वह शेर अपने को बनाने वाले लोगों को ही खा जाता है। कुछ ऐसा ही खतरा आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को लेकर बहुत से लोग देखते हैं जिनमें माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स भी हैं। लेकिन फेसबुक के मार्क जुकरबर्ग फेसबुक पर लोगों की पसंद के मुद्दों से जुड़े हुए इश्तहार ढूंढने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का इस्तेमाल करते हैं। अब कल के दिन अगर ये दिमाग बेकाबू हो जाएं, तो हो सकता है कि लोगों की निजी और गोपनीय बात खुद होकर बाजार में बेचने लगें। कृत्रिम बुद्धि के विकास को शुरू तो किया जा सकता है, लेकिन बहुत से लोगों का यह मानना है कि वह इंसान की समझने की सीमा को बहुत रफ्तार से पार कर लेगी, और फिर हो सकता है कि बेकाबू होकर अपना खुद का एक एजेंडा तय कर ले।
दुनिया की कहानियों और फिल्मों में ऐसे ही मानव निर्मित दानव, फ्रैंकस्टीन की कहानी है जिसे एक वैज्ञानिक ने बनाया, और फिर जो बेकाबू होकर तबाही करने लगा। हम ऐसे नाजुक और खतरनाक मामले में संकीर्णतावादी होना बेहतर समझते हैं, और विज्ञान-टेक्नालॉजी का ऐसा इस्तेमाल नहीं होना चाहिए जिस पर इंसान का किसी दिन काबू ही न रह जाए। ऐसा ही जेनेटिक्स के साथ हो रहा है, इंसानों से लेकर फल-सब्जी और अनाज की फसलों तक जेनेटिक मॉडिफिकेशन का काम चल रहा है, और लोग इसके खतरों की तरफ दुनिया को आगाह भी कर रहे हैं। इंसानों का बनाया हुआ आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस किसी दिन एक तानाशाह बनकर इंसानी बिरादरी को, या धरती को खत्म करने पर आमादा हो जाए, तो क्या होगा? उस दिमाग से इंसान मुकाबला भी नहीं कर पाएंगे, और शतरंज की बिसात पर प्यादों की तरह मारे जाएंगे।

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन भारतीय तिरंगे के डिजाइनर - पिंगली वैंकैया और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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