विधानसभाएं हों या संसद, विपक्ष एक-एक पल का इस्तेमाल करे

संपादकीय
3 अगस्त 2017


संसद और कई राज्यों की विधानसभाओं के सत्र साथ-साथ चल रहे हैं, और विपक्ष कई मुद्दों को लेकर काम ठप्प कर रहा है, इधर छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार के कुछ मुद्दों को लेकर विधानसभा के चल रहे सत्र में काम रूकना शुरू हो गया है, और इस छोटे से सत्र में कोई काम हो पाना मुश्किल दिख रहा है। छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार ने बहुत सी ऐसी नौबतें विपक्ष को मुहैया कराई हैं, जिनको अगर विपक्ष न उठाए, तो वह गैरजिम्मेदार कहलाएगा। इसलिए विधानसभा सत्र शुरू होते ही विपक्ष का विरोध जायज था, लेकिन हम विधानसभा की कार्रवाई को बहिष्कार करने, या बार-बार बहिर्गमन करने का विरोध करते हैं, और उसी तरह संसद की कार्रवाई ठप्प करने का भी विरोध करते हैं। और यह बात हम तब भी लिखते आए थे जब छत्तीसगढ़ में भाजपा विपक्ष में थी, और संसद में एनडीए विपक्षी थी।
चाहे देश की कुछ विधानसभाओं के चुनाव हों, या फिर छत्तीसगढ़ के म्युनिसिपल के चुनाव हों, राजनीतिक विरोध के मुद्दों को अगर संसद और विधानसभा पर ऐसे हावी होने दिया जाता है कि उससे संसदीय काम ठप्प हो जाए, तो उससे राजनीतिक दल चुनावी फायदा पाने की कोशिश चाहे कर लें, उससे राज्य और देश का एक बहुत बड़ा नुकसान होता है। जितने संसदीय कार्य रहते हैं, उन विधेयकों पर, उन संशोधनों पर, उन प्रस्तावों पर चर्चा का वक्त हंगामे में खत्म हो जाता है, और जब नए कानून बनते हैं, या मौजूदा कानूनों में फेरबदल होता है, तो उन पर जो चर्चा होनी चाहिए, वह नहीं हो पाती। आज ही छत्तीसगढ़ विधानसभा में नारेबाजी और बहिर्गमन के बीच अनुपूरक बजट और सात विधेयकों को पारित कर दिया गया। जाहिर है कि उन पर जितनी चर्चा होनी चाहिए थी, वह नहीं हो पाई।
हमारा हमेशा से यह मानना रहा है कि सदन के समय का एक-एक पल का इस्तेमाल होना चाहिए, क्योंकि वह मौका रहता है जिसमें जनता के प्रतिनिधि के रूप में विपक्ष सरकार को घेर सकता है, और हर मुद्दों पर जवाब मांग सकता है। जहां तक विरोध-प्रदर्शन की बात है, तो हम यह सुझाएंगे कि विपक्ष को सदन के समय को और बढ़वाने की कोशिश करनी चाहिए, रोज शाम देर तक सदन की कार्रवाई चलाने पर सरकार को मजबूर करना चाहिए, हर मुद्दे पर सवाल पूछने चाहिए, और घेरना चाहिए। ऐसा करके ही विपक्ष अपनी जिम्मेदारी पूरी कर सकता है और सरकार के लिए परेशानी भी खड़ी कर सकता है। आज जिस तरह से संसद और विधानसभा में कार्रवाई ठप्प है, उससे सत्र के आखिर में जाकर सरकार के तमाम किस्म के प्रस्ताव, तमाम किस्म के संशोधन रफ्तार से आगे बढ़ा दिए जाएंगे, और बिना अक्ल के इस्तेमाल के नए कानून बन जाएंगे, कानून में फेरबदल हो जाएगा।
संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष को यह समझने की जरूरत है कि सदन का उपयोग बहिष्कार और बहिर्गमन में बर्बाद करना सरकार के हाथ मजबूत करने जैसा है। इससे मीडिया में कुछ घंटों के लिए एक सुर्खी तो हासिल हो जाती है, लेकिन देश की जनता लुटी हुई सब देखते रह जाती है। सरकार को घेरने का यह तरीका संसदीय उत्पादकता को खत्म करने का है। हमारा मानना है कि सदन के समय का पल-पल इस्तेमाल करके, प्रदर्शन के लिए बाहर मौका ढूंढना चाहिए। संसद और विधानसभाओं में सब जगह गांधी की प्रतिमाएं लगी हुई हैं, और वहां बैठकर अनशन और उपवास करके सांसद और विधायक मीडिया से सीधे बात भी कर सकते हैं, जो कि सदन के भीतर नहीं कर सकते। सांसदों और विधायकों के ऐसे ही रूख के चलते जनता के मन में इन निर्वाचित और मनोनीत प्रतिनिधियों के लिए इज्जत घटती चली गई है, और हिकारत बढ़ती चली गई है। प्रदर्शन के लिए सड़क का इस्तेमाल हो सकता है, आमसभाओं के मैदान का इस्तेमाल हो सकता है, लेकिन सदन को सड़क बना देना पूरी तरह नाजायज है, और दिल्ली से लेकर रायपुर तक जनता के बीच ऐसे रूख के खिलाफ एक जागरूकता खड़ी होनी चाहिए। 

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