गंदा लिखने वाले लेखकों का पूरी तरह बहिष्कार जरूरी

संपादकीय
5 अगस्त 2017


पाकिस्तान से अभी एक खबर आई थी कि कल के क्रिकेटर और आज के राजनेता इमरान खान ने अपनी पार्टी की एक महिला नेता को कोई अश्लील संदेश फोन पर भेजा, और उसने सार्वजनिक रूप से इसका विरोध किया। इसके बाद इमरान समर्थक उस महिला के खिलाफ लाठियां लेकर टूट पड़े हैं, और उसके चाल-चलन पर भद्दी बातें कहते जा रहे हैं। लेकिन यह बात महज पाकिस्तान तक सीमित नहीं है, और न ही महज राजनीति तक। अमरीका में मौजूदा राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप लगातार महिलाओं के बारे में बहुत ही घटिया और अश्लील बातें कहते आए हैं। और इन दिनों भारत में सोशल मीडिया पर हिन्दी साहित्य से जुड़े हुए लोगों के बीच एक बहस चल रही है कि साहित्यकार अपने बीच की महिलाओं के खिलाफ जितनी घटिया और अश्लील बातें लिख रहे हैं, तो उनका क्या किया जाए?
लिखने-पढऩे वाले और चर्चित नामों को जब सोशल मीडिया पर बहुत ही गंदी बातें लिखते देखा जाता है, तो फिर उनके लिखे हुए से भी नफरत होने लगती है। ऐसा लगता है कि साहित्य की सारी समझ, और उसमें गुजारी हुई जिंदगी भी न तो उन्हें सामाजिक न्याय सिखा पाई, और न ही महिला का सम्मान उन्हें समझ आया है। वैसे तो साहित्य में राजनीतिक विचारधारा के आधार पर कई तरह की खेमेबाजी चलती है। और ऐसे खेमों के बीच बहस कई बार बड़ी फूहड़ भी हो जाती है। लेकिन किसी महिला के चाल-चलन की तरफ गंदा इशारा करके कोई साहित्यकार किस तरह से लोगों के बीच बने रहने का हौसला दिखा सकता है, यह देखना हो तो इन दिनों फेसबुक पर चल रही ऐसी बहस को देखना काफी होगा। महिलाओं को लेकर पुरूषों के मन में सदियों से चले आ रहा एक अनादर वहां चीख-चीखकर सामने आ रहा है, और इस ज्यादती के खिलाफ भी बहुत से लोग लिख रहे हैं।
फेसबुक जैसे सोशल मीडिया ने लोगों के भीतर छुपे हुए एक हिंसक और खूंखार हैवान को उजागर करने का काम बखूबी किया है। अपने लेखन में जो लोग महानता और सिद्धांत की बातें करते नहीं थकते, वे लोग भी यहां पर नंगे हुए जा रहे हैं। सोशल मीडिया ने लोगों के मिजाज की कमजोरियों को उजागर करने का एक बहुत बड़ा काम किया है, और लोग आत्मघाती अंदाज में अपनी हिंसा को अपने नाम और चेहरे के साथ लिखते चले जा रहे हैं। हमारा ख्याल है कि साहित्य में चल रही खेमेबाजी से परे भी यह महिला के खिलाफ पुरूष के मन की एक आम हिकारत है, जो कि उसके किसी भी फैसले को उसके चाल-चलन से जोडऩे के लिए उतारू बैठे रहती है। यह तो अच्छा है कि सोशल मीडिया पर और बहुत से लोग ऐसे ओछे हमलों का जवाब देने के लिए मौजूद हैं, लेकिन इससे अधिक भी कुछ करने की जरूरत है। ऐसे लेखकों की किताबों का एक सामाजिक बहिष्कार हो, ऐसे लेखकों को छापने वाली पत्रिकाओं में लिखने का भी बहिष्कार हो, और उनको खरीदने का भी बहिष्कार हो। जब किसी लेखक के पेट पर इस तरह की लात पड़ेगी, तभी जाकर उन्हें यह समझ में आएगा कि हिंसक बकवास करना कितना महंगा पड़ सकता है।

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