न चीन की तरह सस्ता, न ही एप्पल की तरह बढिय़ा...

संपादकीय
6 अगस्त 2017


अमरीका की एक खबर है कि वहां एप्पल कंपनी का मुनाफा बढऩे से किस तरह उसके शेयर रखने वाले दुनिया के एक सबसे बड़े पूंजीनिवेशक वारेन बफे को रातों-रात दसियों अरब की कमाई हो गई। एप्पल न सिर्फ अमरीका बल्कि दुनिया की उन कंपनियों में से है जो बिना किसी एकाधिकार के, खुले बाजार के मुकाबले में एक के बाद एक बेहतरीन सामान लाकर बड़ा मुनाफा कमाती है, और उसके सामानों के प्रति निष्ठावान बने रहने वाले ग्राहक उसके हर सामान के अगले मॉडल का इंतजार भी करते हैं।
दूसरी तरफ इससे ठीक उल्टा हाल चीन की कुछ कंपनियों का है जो कि सामान इतना सस्ता बनाती हैं कि वह सामान कमजोर और अविश्वसनीय रहता है, और जाने कब तक चले, कब खराब हो जाए। चीनी सामानों की घटिया क्वालिटी को लेकर तरह-तरह के मजाक चलते रहते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि वहां से भारत आने वाले बहुत से सस्ते सामानों ने भारत के उसी किस्म के सामानों के कारखाने बंद करवा दिए हैं। चीन में सामान अच्छे भी बनते हैं, और घटिया भी। लेकिन वहां के सस्ते सामान इतने सस्ते रहते हैं कि वे दुनिया के अधिकतर देशों में जाकर वहां के स्थानीय सामानों को पीटकर रख देते हैं। इसकी एक वजह यह है कि वहां पर लागत इतनी कम आती है, उत्पादन इतना अधिक होता है कि सामान सस्ते बनते हैं। दूसरी तरफ भारत में बनने वाले बहुत से सामान घटिया चीनी सामानों जितने ही घटिया रहते हैं, लेकिन वे महंगे बनते हैं, क्योंकि कामगार हुनरमंद नहीं हैं, मशीनें अच्छी नहीं है, बिजली का ठिकाना नहीं है, और कंपनियां उत्पादन ठीक से नहीं कर पातीं।
अब ऐसे में जब भारत की सरकार लगातार यह ताकत लगा रही है कि मेक इन इंडिया को कामयाब बनाया जाए, तो उसके कुछ रास्ते हैं। पहली बात तो यह कि भारत में सामानों का उत्पादन बेहतर क्वालिटी का हो, और इसके लिए कामगारों का हुनर बेहतर हो। चीन में यह नौबत रातों-रात बेहतर कर ली जाती है, और भारत में कौशल विकास के नाम पर राज्यों में अंधाधुंध लूटपाट और धांधली चलती रहती है। ऐसे में दुनिया के दूसरे देश तो दूर रहे, भारत के भीतर भी सस्ते चीनी सामानों का कोई विकल्प नहीं है। दूसरी तरफ भारत में अधिक कमाई वाला एक तबका ऐसा है जो कि दुनिया का सबसे महंगा एप्पल कम्प्यूटर या फोन लगातार इस्तेमाल करता है, और वह क्वालिटी के लिए अधिक से अधिक दाम देने को भी तैयार रहता है। भारत में ही सॉफ्टवेयर का काम करने वाली कुछ ऐसी कंपनियां हैं जो कि दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों से खुला मुकाबला करती हैं, वे क्वालिटी में भी अच्छी हैं, और उनके दाम भी बाजार के मुकाबले के हैं। लेकिन भारत का भविष्य बेहतर मानने वाले लोगों को यह भी समझ लेना चाहिए कि इस देश में आज कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा खदानों और खनिजों से जुड़े हुए ऐसे उद्योगों का है जो कि भारी प्रदूषण फैलाते हैं, और जिन्हें दुनिया के विकसित देश अपने घर पर चलाना नहीं चाहते। ऐसे उद्योगों पर टिकी हुई भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर यह भावनात्मक सोच तो ठीक है कि भारत सब कुछ खुद बनाने लगेगा, और दुनिया में अव्वल हो जाएगा, लेकिन यह समझ लेना चाहिए कि यह देश न तो चीन की तरह का सस्ता बना पा रहा, न ही दुनिया के बहुत से देशों की नामी कंपनियों जैसा अच्छा बना पा रहा है। इन दोनों मामलों में आगे बढऩे की कोशिश के बिना भारत का कोई भविष्य नहीं है। 

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