रक्षाबंधन, गैरबराबरी के रिवाज से निकली परंपरा

संपादकीय
7 अगस्त 2017


आज देश भर में जगह-जगह लोग धर्म और जाति से परे, और पारिवारिक रिश्तों से भी परे राखी का त्यौहार मना रहे हैं। राखी का शायद किसी धर्म में कोई उल्लेख नहीं है, और यह मोटे तौर पर एक सामाजिक परंपरा के रूप में चले आ रहा त्यौहार है। राखी, या रक्षाबंधन, यह भाई-बहन के बीच का रिश्ता पुख्ता करने का एक मौका रहता है जिस दिन कोर्ट-कचहरी में आपस में मुकदमा लड़ रहे भाई-बहन भी एक साथ जुट जाते हैं, और बहन इस उम्मीद के साथ भाई को राखी बांधती है कि वह मुसीबत में उसकी रक्षा करेगा। भारत की सामाजिक व्यवस्था में आमतौर पर यह भी चले आता है कि बूढ़े मां-बाप बेटे के पास रहते हैं क्योंकि अधिकतर समाजों में बेटियां शादी के बाद ससुराल चली जाती हैं। ऐसे में मां-बाप से लेकर बहन तक से रिश्ता रखना भाई के जिम्मे ही आता है। यह एक अलग बात है कि बहुत से बूढ़े मां-बाप ऐसे रहते हैं जिनका ख्याल रखने के लिए केवल बेटियां ही रह जाती हैं, और बेटे जिम्मेदारी से हाथ धो लेते हैं। ऐसे बेटों से उनकी बहनों को भी किस तरह की हिफाजत या मद मिल सकती है, यह सोचना अधिक मुश्किल नहीं है। आज ही इसी वक्त मुंबई की एक खबर आ रही है कि अमरीका से आया एक बेटा जब अपनी बूढ़ी और अकेली रह गई मां से मिलने के लिए घर पहुंचा तो पता लगा कि मां तो कई दिनों की मरी पड़ी है। दरवाजा तोड़कर मां को ऐसे हाल में देखने वाले बेटे ने पिछले डेढ़ बरस से मां से फोन पर भी बात नहीं की थी। यह एक अलग बात है कि अब मां का करोड़ों का मकान बेटे का ही होगा।
दरअसल राखी को लेकर सदियों से चली आ रही यह सोच आज सामाजिक समानता के पैमाने पर अटपटी लगती है कि भाई ही बहन की हिफाजत करेगा। इस रिवाज की एक बड़ी खामी यह है कि महिला को कमजोर माना जाता है, और यह माना जाता है कि उसकी हिफाजत के लिए बाप-भाई, या पति जैसे किसी एक पुरूष की जरूरत होती है। रक्षाबंधन अगर दोनों के बीच एक-दूसरे की बराबरी से हिफाजत का बंधन होता, तो शायद यह एक बेहतर रिवाज होता। लेकिन जिस तरह भारत में महिला को सुहाग की निशानी के नाम पर सिंदूर से लेकर मंगलसूत्र तक, और तरह-तरह की चूडिय़ों से लेकर बिंदी तक सबको ढोना पड़ता है, उसी तरह उसे भाई या किसी और पुरूष से हिफाजत की गारंटी भी लेकर चलना पड़ता है। इस रिवाज में यह फेरबदल करने की जरूरत है क्योंकि आज बहुत सी बहनें भी अपने बेरोजगार, या बीमार भाई की जिम्मेदारी ढोती हैं, और उस भाई की सामाजिक जिम्मेदारी, माता-पिता को भी ढोती हैं।
भारत के अधिकतर रीति-रिवाज महिलाओं को कमजोर या आश्रित बनाने वाले रहते हैं। उनकी बुनियाद इस बात पर रखी जाती है कि वे पुरूषों से कमजोर रहती हैं, और उन्हें लगातार पुरूष की हिफाजत चाहिए ही चाहिए। लोगों को याद होगा कि जिस हरियाणा में दो दिन पहले प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के बेटे ने एक युवती से छेडख़ानी करके खतरनाक अंदाज में उसका पीछा किया, उसी हरियाणा में मुख्यमंत्री बने मनोहर लाल खट्टर ने अपने चुनाव प्रचार में यह कहा था कि जिन महिलाओं को रात में बाहर निकलने का शौक है, वे नंगी क्यों नहीं निकल जातीं? ऐसी सोच वाले हरियाणा में जाहिर है कि सत्तारूढ़ भाजपा के बड़े-बड़े नेता, प्रदेशाध्यक्ष, का बेटा यह मानकर चल रहा होगा कि रात में अगर कोई लड़की कार से भी अकेले जा रही है, तो उसे नंगा करना उसका बुनियादी हक है। आज वही मुख्यमंत्री वहां की बच्चियों से राखी बंधवा रहे हैं, और उन्हें एक तरह से उनकी रक्षा की जिम्मेदारी ले रहे हैं। संस्कृति के ऐसे ठेकेदार पूरे राज्य के संवैधानिक जिम्मे को उठाने का हक तो रखते नहीं, आज वे राखी जरूर बंधवा रहे हैं। इस तरह जब निजी संबंधों के एक धागे का सार्वजनिककरण कर दिया गया है, तो उसका महत्व भी खत्म कर दिया गया है। रक्षाबंधन को आज के हालात देखते हुए दुबारा परिभाषित करने की जरूरत है।

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