विश्व आदिवासी दिवस पर दो तकलीफदेह मामले

संपादकीय
8 अगस्त 2017


कल नौ अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस मनाया जा रहा है, और दुनिया के तमाम देशों में मूल निवासियों के मुद्दों पर चर्चा होगी। लेकिन यह छत्तीसगढ़ के लिए एक बुरा संयोग है, या कि दुर्याेग है कि राज्य के दो आदिवासी-मामलों पर मीडिया में अप्रिय चर्चा चल रही है। इनमें से एक तो अभी कल की ही है जब आदिवासी बस्तर के नक्सलग्रस्त दंतेवाड़ा जिले के एक गांव में कन्या छात्रावास में प्रशासन और पुलिस के लोग सीआरपीएफ के जवानों को ले गए ताकि छात्राएं उनको राखी बांध सकें, और उन्हें यह भरोसा हो कि सुरक्षा बल उनकी रक्षा करते हैं। लेकिन हुआ इसका ठीक उल्टा, और छात्राओं ने यह शिकायत दर्ज कराई है कि उनके पीछे-पीछे सीआरपीएफ जवान शौचालय में पहुंच गए, और उनका यौन शोषण किया। यह बहुत ही गंभीर मामला इसलिए है कि राखी का यह पाखंड अफसरों द्वारा प्रायोजित था, और उनकी निगरानी में हो रहा था। ऐसे में यह जाहिर है कि अकेले में मिलने वाली लड़कियों या महिलाओं के साथ सुरक्षा बलों द्वारा शारीरिक बदसलूकी करने की शिकायतों में से कुछ तो सही होती ही होंगी। बस्तर में नक्सलग्रस्त इलाकों में मुसाफिर बसों में चलने वाली महिलाओं की भी यह शिकायत रहती है कि सुरक्षा बल बसों में घुस जाते हैं और तलाशी लेने के नाम पर उनके बदन टटोलते हैं। यह बहुत ही अप्रिय मौका है जब प्रदेश को आदिवासी मुद्दों पर कोई सकारात्मक चर्चा करनी थी, और ऐसी नकारात्मक खबरों से मीडिया पटा हुआ है।
दूसरी घटना जेल के एक मंझले दर्जे के आदिवासी अफसर की है जिसे विभाग ने अभी चार दिन पहले निलंबित कर दिया है। इस पर यह तोहमत है कि उसने अपने फेसबुक पेज पर यह पोस्ट किया था कि हर आदिवासी नक्सली नहीं होते। इस बात को राज्य सरकार की आलोचना मानते हुए इसे नोटिस दिया गया, और जवाब न मिलने की बात कहते हुए इसे निलंबित कर दिया गया। उल्लेखनीय है कि कुछ महीने पहले जेल की एक और नई-नई अफसर को भी निलंबित किया गया था जिसने जेलों में लाकर बंद की जाने वाली और नक्सल होने के आरोप वाली महिलाओं के साथ सुरक्षा बलों के बलात्कार की आपबीती घटनाओं को लिखा था। इसे भी सरकार की कड़ी आलोचना मानते हुए इसे निलंबित किया गया था। हमने इस निलंबन के मौके पर भी लिखा था कि इस महिला अधिकारी को उसे पता लगी बातें सरकार की जानकारी लानी चाहिए थीं, बजाय उन्हें पहले सोशल मीडिया पर लिखने के।
अब उस महिला अधिकारी का निलंबन तो हो गया, लेकिन उसकी कही बातों पर कोई जांच राज्य सरकार ने शुरू नहीं की, जो कि उसकी बुनियादी जिम्मेदारी बनती है। जब भी कोई ऐसे गंभीर आरोप सामने आते हैं, और खासकर एक सरकारी अफसर ने उसे बताई हुई बातों को लिखा था, तो यह सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी बनती थी कि उन बातों की जांच करवाई जाती। लेकिन उस अफसर को निलंबित करने के साथ मानो वह पूरा मामला खत्म हो गया था, और उसके उठाए मुद्दे भी दफन हो गए।
राज्य सरकार ने आदिवासी मुद्दों को लेकर संवेदनशीलता की जरूरत है। अपने अफसरों को निलंबित करना तो ठीक है, लेकिन सरकार को इस हकीकत को मानना होगा कि जुल्म और ज्यादती के, हत्या और बलात्कार के आरोपों को अनसुना करके सरकार आदिवासियों को नक्सलियों की तरफ धकेलने के अलावा और कुछ नहीं कर रही। बस्तर में सीआरपीएफ या बाकी सुरक्षा बलों की जनता में साख खराब है, और उन्हें कन्या छात्रावास में ले जाने का अफसरों का फैसला ही गलत था। इसके बाद जब वहां पर सुरक्षा कर्मचारी छात्राओं का यौन शोषण करने लगे, तो भी शुरू में बड़े अफसरों ने इस मामले को दबाने की कोशिश की। कल आदिवासी दिवस पर अगर कोई सार्थक चर्चा इस प्रदेश में होनी है, तो वह आदिवासियों पर ऐसे जुल्म को रोकने केे बारे में होनी चाहिए। दिक्कत यह है कि छत्तीसगढ़ की संवैधानिक संस्थाओं से लेकर बस्तर के आदिवासी मंत्री-सांसद और विधायकों तक ने गजब की चुप्पी साध रखी है, और ऐसा लगता है कि मानो मीडिया ही लोकतंत्र की जिम्मेदारी पूरी कर रहा है।

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