गुजरात की राज्यसभा सीट, एक अनैतिक और अवांछित लड़ाई में भाजपा की शिकस्त

संपादकीय
9 अगस्त 2017


गुजरात की एक राज्यसभा सीट के लिए भाजपा ने अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की अगुवाई में, और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रदेश में इतना बड़ा दांव लगाया था कि उस बाजी की शिकस्त पार्टी के मुंह में कड़वाहट छोड़ गई है। विधानसभा के भीतर विधायकों की गिनती के मुताबिक भाजपा से दो लोगों को राज्यसभा के लिए चुना जाना था, और वे अमित शाह और स्मृति ईरानी रहे। लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दशकों के राजनीतिक सचिव रहे और लंबे समय से राज्यसभा में बने आ रहे अमहद पटेल को राज्यसभा में आने से रोकने के लिए भाजपा ने मानो अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था। यह पार्टी के लिए एक बहुत ही खोखला कदम था कि कांग्रेस से बगावत करके बाहर आने वाले एक विधायक को भाजपा ने आनन-फानन अपना राज्यसभा उम्मीदवार बना दिया। यह एक वैचारिक और सैद्धांतिक दीवालियापन भी था, और आज अपने को दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी कहने वाली भाजपा की एक बहुत ही सतही और सस्ती अवसरवादिता भी थी। देश की संसद के जिस उच्च सदन को देश के सबसे अच्छे लोगों की सेवाएं पाने के लिए बनाया गया था, उसकी दुर्गति तो कोई नई बात नहीं है, लेकिन कल के कांग्रेस विधायक और आज के भाजपा राज्यसभा प्रत्याशी, चौबीस घंटे के भीतर बदले ये राजनीतिक रंग बहुत ही स्तरहीन थे, और इन्हें भाजपा ने सोच-समझकर एक बड़े दांव की तरह खेला था। इसके बाद की विधायकों की खरीद-फरोख्त को हम अधिक वजन नहीं देते क्योंकि वामपंथियों के अलावा देश की अधिकतर पार्टियां ऐसी खरीदी करती रही हैं, और अधिकतर पार्टियों के सांसद और विधायक अंतरात्मा की ऐसी बिक्री करते आए हैं। ऐसे में भाजपा की इस मंडी में अगर आज के सबसे बड़े खरीददार की तरह थैली लिए खड़ी थी, तो वह ऐसा करने वाली न तो पहली पार्टी थी, और न ही आखिरी पार्टी रहेगी। लेकिन ऐसा लगता है कि भाजपा के संदर्भ में सैद्धांतिक शुचिता की बात अडवानी-युग के साथ चल बसी है, और प्रतिद्वंद्वी को नीचा दिखाने के लिए भाजपा अपने ही दिग्गजों को छोड़कर कल के दलबदलू को आज सिर पर बिठाने को बेताब है, अगर इससे उसे कोई तात्कालिक फायदा होता है। और भाजपा ने यह रूख जगह-जगह अलग-अलग राज्यों के चुनावों में दिखाया है, और म्युनिसिपल चुनावों तक उसने अपनी पार्टी के पुराने निष्ठावानों को कचरे की टोकरी में डालकर नवजात दलबदलू को सिर पर बिठाया है। यह बात भाजपा को आनन-फानन सीटें तो दिला पाई है, लेकिन इससे एक राष्ट्रीय पार्टी की नैतिकता की इज्जत मिट्टी में मिल गई है। लेकिन अब गुजरात में नैतिकता भी गई, और दांव भी डूब गया। यह एक अलग बात है कि यह पूरे का पूरा दांव दूसरी पार्टी के बेईमानों और दगाबाजों के भरोसे पर लगाया गया था।
गुजरात में जिस अंदाज में भाजपा ने कांग्रेस में तोडफ़ोड़ करवाई, या कि उसमें हुई बगावत को दुहने की कोशिश की, उसमें उसे एक बड़ी मात हुई है। अगर वह अपनी सारी ताकत के साथ अहमद पटेल को हरा भी देती, तो भी सोनिया गांधी, कांग्रेस, और अमहद पटेल की उतनी बेइज्जती न हुई होती, जितनी आज एक पूरी तरह अवांछित लड़ाई को छेड़कर भाजपा ने हासिल की है। और देश में कांग्रेस के बहुत से शुभचिंतकों का यह मानना है कि अगर अहमद पटेल हार गए होते, तो कांग्रेस जीत जाती, और सोनिया गांधी को शायद कोई ऐसा दूसरा सलाहकार बनाना सूझता जो कि पार्टी को और गर्त में डूबने से बचा पाता। लेकिन अहमद पटेल की वापिसी से कांग्रेस की पुनर्जीवन की संभावनाएं भी खत्म हो गई है।
लोकतंत्र में एक राजनीतिक दल की इज्जत महज जीत नहीं होती है, ईमानदारी और सिद्धांतवाद की जीत उसके लिए जरूरी भी होती है। ऐसे में तमाम अनैतिक तरीकों के इस्तेमाल से इस देश की राजनीति में एक वक्त कांग्रेस जो करती थी, भाजपा अब उससे सौ कदम आगे बढ़कर कर रही है। यह सिलसिला गुजरात की इस एक राज्यसभा सीट से कहीं आगे की शर्मिंदगी भाजपा को दिला चुका है, और इस पार्टी को गंभीरता से अपनी साख सुधारने की कोशिश करनी चाहिए। कांग्रेस की राजनीति में सोनिया गांधी के इर्द-गिर्द अहमद पटेल को सत्ता का एक सबसे बड़ा सौदेबाज माना जाता रहा है, और राजनेता के रूप में उनकी साख फूटी कौड़ी की नहीं रही। जब कांग्रेस की अगुवाई की सरकार रही तो उसके सबसे बड़े आर्थिक फैसलों की राह अहमद पटेल से होकर ही गुजरती थी, और कांग्रेस के कोषाध्यक्ष को भी लोग महज गिनने वाला मानते थे, बड़े लेन-देन के लिए अहमद पटेल का ही नाम रहता था। इन बातों की हकीकत सोनिया और पटेल ही बता सकते हैं, लेकिन वामपंथियों को छोड़कर देश की तमाम पार्टियों में कोई न कोई अहमद पटेल तो रहते ही हैं। इसलिए ऐसा काम करने वाले को हराने के लिए भाजपा का इतना बड़ा दांव बेकार गया, यह पूरी तरह अवांछित था, और इसमें जीत से भी भाजपा की बदनामी ही होती कि उसने खरीद-बिक्री करके या धमकाकर विधायकों को मोड़ा, और इस बाजी में हारकर तो भाजपा की बड़ी ही किरकिरी हुई है। यह बात बाकी राजनीतिक दलों के सामने भी एक सबक की तरह खड़ी है कि लोगों को अनैतिक और अवांछित लड़ाई नहीं छेडऩी चाहिए, जीतने के लिए भी नहीं। आज नौबत यह है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, और केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी दोनों राज्यसभा सीट जीतकर भी खुशी मनाने की हालत में नहीं हैं।

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन काकोरी कांड की 92वीं वर्षगांठ तथा अगस्त क्रांति की 75वीं वर्षगांठ - ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  3. @राजनीतिक दलों के सामने भी एक सबक की तरह खड़ी है कि लोगों को अनैतिक और अवांछित लड़ाई नहीं छेडऩी चाहिए, जीतने के लिए भी नहीं ????? कहने, सुनने में ही ठीक लगता है !!

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