दानवाकार बुलेट ट्रेन योजना गरीब देश की प्राथमिकता?

संपादकीय
14 सितंबर 2017


मुंबई से अहमदाबाद के बीच चलने के लिए देश की पहली बुलेट ट्रेन का भूमिपूजन आज जापान और भारत के प्रधानमंत्रियों ने मिलकर अहमदाबाद में किया। बुलेट ट्रेन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की शुरुआती घोषणाओं में से एक थी और इसे भारत के बहुत से अर्थशास्त्री और जानकार लोग एक दैत्याकार और बिना जरूरत का अहंकार भी बताते हैं। कई लोगों ने विश्लेषण करके यह बताया है कि मुंबई और अहमदाबाद के बीच अनगिनत उड़ानें हैं, और रेलगाडिय़ां हैं। पांच बरस बाद जब बुलेट ट्रेन एक लाख दस हजार करोड़ की लागत से शुरू होगी, तब उसकी रफ्तार आज की ट्रेन और आज की प्लेन के बीच की होगी, और ऐसा ही उसका भाड़ा होगा, हवाई किराए से थोड़ा कम। लोग इस बात पर हैरान हैं कि इतनी बड़ी लागत केवल समय को कम करने के लिए लगाना क्या ठीक है? लेकिन दूसरी तरफ प्रधानमंत्री सहित कुछ दूसरे समर्थकों का यह कहना है कि बुलेट ट्रेन से इन दो महानगरों के बीच के दस और शहर भी जुड़ेंगे, और इन दर्जन भर शहरों की जिंदगी, उनके रोजगार, और उनके कारोबार पर बहुत बड़ा असर पड़ेगा। मोदी का यह भी कहना है कि जितने कम ब्याज पर, लगभग बिना ब्याज के यह पूरा प्रोजेक्ट जापान से बहुत रियायती किश्तों पर मिल रहा है, और भारत को मानो यह मुफ्त ही मिल रही है। उनका यह भी अंदाज है कि इससे सीधे-सीधे और आर्थिक गतिविधियां बढऩे से दसियों हजार रोजगार बढ़ेंगे, और देश में एक नई टेक्नॉलॉजी भी आ जाएगी।
हमारा ख्याल है कि ऐसे दानवाकार प्रोजेक्ट लोगों की जिंदगी में कोई अभूतपूर्व और नई सहूलियत लाने वाले हों, तो उनका एक महत्व हो सकता है। लेकिन महज समय घटाना अभूतपूर्व नहीं कहा जा सकता। आज देश में निजी विमान कंपनियां आने वाले बरसों में सैकड़ों विमान अपने बेड़े में जोडऩे जा रही हैं। आज भी हवाई सफर का मुकाबला बहुत से लोगों के फायदे का साबित हो रहा है, और विमानतलों पर मध्यम वर्ग के लोगों की भीड़ दिखती है। दूसरी तरफ रेलगाडिय़ों के भाड़े को इस तरह से बढ़ाया गया है कि बहुत सी गाडिय़ों में भाड़ा विमान से भी अधिक पडऩे लगा है, और वे खाली चलने लगी हैं। इसलिए ट्रेन और प्लेन का यह मुकाबला पांच बरस में खुले बाजार के मुकाबले के चलते कहां पहुंचेगा इसका कोई ठिकाना नहीं है। फिर मोदी की यह बात सही नहीं है कि यह ट्रेन भारत को मुफ्त में मिल रही है। यह ट्रेन भारत को कुल एक फीसदी ब्याज पर मिल रही है, इतना ही ठीक है, बाकी तो सच यह है कि जापान अगले पचास बरस तक भारत से इस कर्ज को वसूलता रहेगा, और इस पूरी बुलेट ट्रेन योजना को जापान ही बनाने जा रहा है जिससे वहां की कंपनियों को सीधे कारोबार मिलेगा, वहां के हजारों लोगों को रोजगार मिलेगा, और यह एक कारोबारी-साहूकार की लुभावनी योजना सरीखी है।
अब जब यह साफ है कि भारत अगले पचास बरस तक इस एक लाख दस हजार करोड़ के कर्ज को पटाते रहेगा, तो यह पैसा मोदी के बाकी कार्यकाल के बाद भी सैंतालीस बरस तक पटाया जाता रहेगा। और इतनी बड़ी लागत से देश में और कौन-कौन सी उत्पादक योजनाएं बन सकती थीं जिनसे करोड़ों लोगों को रोजगार मिलता, और हजारों करोड़ का मुनाफा भी हुआ रहता। भाजपा और मोदी सरकार बार-बार यह कहते हैं कि सरकार को कोई भी कारोबार नहीं करना चाहिए, और सारे कारोबार का निजीकरण होना चाहिए, ऐसे में सरकार देश का यह सबसे बड़ा अकेला कारोबार शुरू करने जा रही है जिससे मुंबई-अहमदाबाद के बीच महज कुछ हजार मुसाफिर ही तेज सफर का फायदा रोज पाएंगे, बाकी लोगों के लिए तो इससे धीमी ट्रेन भी बनी रहेगी, और इससे तेज प्लेन भी बने रहेंगे, और इन दोनों की गिनती भी 2022 तक बढ़ती भी रहेगी। यह लागत देश में सिर्फ रफ्तार बढ़ाने के लिए बहुत अधिक लग रही है, और सरकार का इससे रोजगार-कारोबार बढऩे का अंदाज कहीं वैसा ही साबित न हो जैसा कि नोटबंदी से कालेधन के सामने आने और देश की कमाई होने का अंदाज पूरी तरह, और बुरी तरह गलत साबित हुआ। किसी नेता या सरकार की निजी प्रतिष्ठा के लिए तो ऐसी दानवाकार योजना ठीक हो सकती है कि इतिहास में वह उनके नाम से दर्ज होगी, लेकिन देश की आम जनता के लिए इतनी बड़ी रकम की कोई योजना जब तक ठोस फायदे साबित करने वाली न हो, वह देश की प्राथमिकता नहीं हो सकती है। 

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