धर्म बेजुबान नन्हें बच्चों के हित ऊपर रखे, और संन्यास को नीचे

संपादकीय
16 सितंबर 2017


मध्यप्रदेश के नीमच के एक जैन पति-पत्नी की खबर पिछले दो-तीन दिनों से अखबारों में है कि वे तीन बरस की बेटी और सैकड़ों करोड़ की संपत्ति छोड़कर साधु-साध्वी जीवन अपनाने जा रहे हैं। जैन समाज में कम उम्र में संन्यास ले लेना अनोखी बात नहीं है, और किसी भी दूसरे धर्म के मुकाबले इस धर्म में ऐसी घटनाएं अधिक होती हैं। कुछ मामलों में तो समाज के भीतर, और समाज के बाहर से भी इस बात का विरोध हुआ कि किस तरह नाबालिग बच्चे संन्यास ले लेते हैं। कई बरस पहले नौ बरस की एक बच्ची जब जैन साध्वी बनी, तो लोग उसके खिलाफ अदालत तक गए थे, और इस प्रथा को अमानवीय बताया था।
लेकिन इस ताजा समाचार में एक दूसरी बात सोचने की है क्योंकि ये पति-पत्नी तो बालिग हैं, और उन्होंने सोच-समझकर पिछले कुछ बरसों से लगातार इस सन्यास की तरफ कदम बढ़ाना शुरू कर दिया था। अब सवाल यह उठता है कि तीन बरस की बेटी को उसके नाना के हवाले करके संन्यास लेने से क्या उस बच्ची के कुछ अधिकारों का भी हनन होता है? अभी हमें जितना याद पड़ता है, ऐसा कोई मामला कानून की अदालत में बहस में आया नहीं है जिसमें मां-बाप को कटघरे में खड़ा किया जाए कि वे बच्ची को छोड़कर कैसे जा सकते हैं? दूसरा यह भी है कि संन्यास की इन खबरों की वजह से तो यह सार्वजनिक रूप से घोषित और स्थापित हो गया है कि वे बच्ची को नाना के हवाले कर रहे हैं, वरना दूसरे बहुत से ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें मां-बाप बच्चों को बेच भी देते हैं, या कि उन्हें अनाथाश्रम में छोड़ देते हैं, या कि सड़कों पर ही छोड़कर चले जाते हैं, ट्रेन में बिठाकर चले जाते हैं। बच्चों की बिक्री से परे, बच्चों को छोड़ देने का कोई और तरीका अब तक सामने आया नहीं है जिसमें मां-बाप के खिलाफ कोई जुर्म बना हो। लेकिन बहुत सी बातें जो कि कल तक जुर्म नहीं रहती थीं, वे अब जुर्म के दायरे में आती हैं, और लोगों को याद होगा कि एक समय सतीप्रथा को पूरी तरह से सामाजिक मान्यता प्राप्त थी, लेकिन बाद में उसे जुर्म करार दिया गया।
इस नौजवान शादीशुदा जोड़े के संन्यास को लेकर यह सवाल उठता है कि क्या किसी धर्म या सम्प्रदाय में इतनी कम उम्र के बच्चों को दूसरों के भरोसे छोड़कर औपचारिक और घोषित संन्यास लेने को पंथ की मान्यता होनी चाहिए? मां-बाप में से कोई एक संन्यास ले तो दूसरे के भरोसे बच्चे की जिम्मेदारी हो सकती है, लेकिन दोनों ही एक साथ चले जाएं, तो उससे बच्चे पर, उसके रख-रखाव पर कैसा फर्क पड़ेगा यह सोचने की जरूरत है। हमारा यह मानना है कि धार्मिक रीति-रिवाज भी समय के साथ-साथ बदलते हैं, और देश और दुनिया में बदलती हुई सोच को देखते हुए भी कई धार्मिक प्रथाओं में बदलाव लाया जाता है। मुस्लिमों में हज पर जाने के लिए नियमों की एक लंबी लिस्ट है जिसे पूरा करने पर ही लोग हज जा सकते हैं। इसमें पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूरा करना, परिवार की आर्थिक स्थिति इस तीर्थयात्रा के लायक रहना, और इस तरह की बहुत सी और बातें हैं जो कि पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूरा करने के बाद ही धार्मिक मान्यता को पूरा करने की इजाजत देती हैं। हमारा ख्याल है कि नाबालिग बच्चों के संन्यास लेने पर पूरी रोक रहनी चाहिए, और बच्चों को इतनी कम उम्र में छोड़कर मां-बाप के संन्यासी बनने पर भी रोक रहनी चाहिए। आज किसी भी धर्म का काम किसी एक जोड़े के बिना चल सकता है, लेकिन किसी बच्चे का काम उसके मां-बाप के बिना नहीं चल सकता। इसलिए जब किसी धर्म पर यह जिम्मेदारी रहती है कि वह किन लोगों को संन्यास दिलाए, तो उसे जिम्मेदारी से यह सोचना-विचारना चाहिए कि किन लोगों को किन जिम्मेदारियों के पूरे हो जाने के बाद ही संन्यास की इजाजत दी जाए।
हम इस एक मामले को महज मिसाल के तौर पर लेकर यह चर्चा कर रहे हैं, और हमें इस परिवार के भीतर इस बच्ची के रख-रखाव को लेकर अलग से कोई जानकारी नहीं है। इस बच्ची के दोनों तरफ परिवार हैं, और संपन्न परिवार हैंं, इसलिए यह मामला उसे बेसहारा छोड़ देने जैसा नहीं है, लेकिन मां-बाप के जिंदा रहते मां-बाप के साए से एकदम इस तरह से अलग कर देना हमारे हिसाब से उस बच्ची के बुनियादी अधिकारों को छीनने सरीखा है, और किसी भी धर्म को ऐसा नहीं करना चाहिए। ऐसे लोगों को धर्म यह कह सकता है कि वे अपनी बच्ची के बालिग होने का इंतजार करें, और उसके बाद संन्यास के बारे में सोचें। संन्यासियों की कमी से किसी धर्म का काम ऐसा नहीं रूकता है कि एक जोड़ा पति-पत्नी संन्यासी न बनें तो धर्म का नुकसान हो जाएगा। इसलिए धर्म को सबसे पहले उस छोटी बच्ची के भले के बारे में सोचना चाहिए जो कि न अपनी मर्जी से इस दुनिया में आई है, और न ही मां-बाप को रोकने की उसकी कोई क्षमता है। जैन धर्म बड़ा अहिंसक माना जाता है, और हवा में न दिखने वाले कीटाणुओं तक को तकलीफ न देने की कोशिश करता है। ऐसे धर्म को अपने समुदाय के बेजुबान नन्हें बच्चों के हित को सबसे ऊपर रखना चाहिए, और संन्यास को उसके बहुत नीचे।

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