चाहे जिसे नफा-नुकसान हो कुनबापरस्ती पर चर्चा हो...

संपादकीय
17 सितंबर 2017


अभी अमरीका के एक बड़़े प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में राहुल गांधी ने अपने भाषण के बीच भारत के वंशवाद को लेकर कुछ बातें कहीं, जो कि उनकी अपनी वंशवादी विरासत की वकालत करने वाली भी थीं, और भारतीय राजनीति से लेकर भारतीय फिल्मों तक अलग-अलग तरह के वंशवाद का जिक्र करने वाली भी थीं। नतीजा यह निकला कि इन दिनों ट्विटर पर मुखर ऋषि कपूर ने तुरंत ही जवाबी हमला किया, और उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने राहुल के बयान का जिक्र किए बिना वंशवाद पर कहा- मैं पहले भी यह बात कहते आया हूं, लेकिन अब यह बात कहने में हिचकिचा रहा हूं क्योंकि अब मैं राजनीति से बाहर हूं। भारतीय लोकतंत्र में डायनेस्टी (वंशवाद) नेस्टी (शरारती, बुरा, अप्रिय, बदमजा) है लेकिन यह कुछ लोगों को टेस्टी (मजेदार) लगता है, और यह हमारे लोकतंत्र की कमजोरी है। उनके इस बयान को लेकर कांग्रेस पार्टी के कुछ नेताओं ने उन पर हमला करना शुरू कर दिया है और उन्हें याद दिलाया है कि उपराष्ट्रपति बनने के बाद उन्हें दलगत राजनीति में इस तरह की अवांछित बातें नहीं करनी चाहिए, वरना दूसरे लोग भी उनके प्रति एक संवैधानिक शिष्टाचार और सम्मान भूल जाएंगे।
वेंकैया नायडू के बयान में ऐसी कोई बुरी बात नहीं है जो कि उपराष्ट्रपति के ओहदे के खिलाफ जाती हो। कुनबापरस्ती की तोहमत अकेली कांग्रेस पार्टी पर नहीं लगती है, यह देश के दर्जनों नेताओं की दर्जन भर से अधिक पार्टियों पर माकूल बैठने वाली तोहमत है, और लोकतंत्र के भीतर इसकी चर्चा करना नाजायज नहीं है। कांग्रेस तो देश की सबसे बड़ी कुनबापरस्त पार्टी होने के नाते वंशवाद की तोहमत सबसे अधिक झेलने की सबसे अधिक हकदार पार्टी है ही, लेकिन वह अकेली नहीं है, और कुनबापरस्ती के मामले में सबसे बुरी भी नहीं है। इसका एक लंबा इतिहास है, जिसे या तो कैलेंडर के मुताबिक देखा जा सकता है, या कि देश के नक्शे के मुताबिक देखा जा सकता है जो कि शायद अधिक आसान होगा। बात कश्मीर से शुरू करें, तो वहां अभी दूसरी पीढ़ी की मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने तीसरी पीढ़ी के मुख्यमंत्री से सत्ता हासिल की है। वहां से जरा नीचे उतरें, तो पंजाब की कुख्यात कुनबापरस्ती है जिसमें प्रदेश के हितों पर लंबे अरसे से काले बादल छाए हुए हैं, और उनके दामाद तक छाए हुए हैं जो कि हर तरह की तोहमतों से घिरा हुआ कुनबा रहा है। इसी पंजाब से जो हरियाणा अलग राज्य बना है, उस हरियाणा में कुनबापरस्ती न सिर्फ कांग्रेस की रही है, बल्कि उसका दूसरा सबसे बड़ा कुनबा, चौधरी देवीलाल, उनकी औलादें अभी जेल में हैं, मुख्यमंत्री रहते हुए किए गए अपने बड़े भयानक भ्रष्टाचार की वजह से, और बाहर लोगों का अंदाज है कि हजारों करोड़ की दौलत मालिक के बरी होकर आने की राह देख रही है। बगल के उत्तराखंड में जाएं तो कांग्रेस की कुनबापरस्ती भाजपा तक फैली हुई दिखती है, इंदिरा के मंत्री रहे हेमवतीनंदन बहुगुणा के बेटा-बेटी कांग्रेस को खून निकलने तक दुहकर अब उसे डुबाकर दोनों ही भाजपा में चले गए हैं।
यहां से कुछ आगे बढ़ें तो बिहार में लालू यादव की भयानक अश्लील कुनबापरस्ती है जिसमें परिवार से बाहर किसी लोकतंत्र की कोई गुंजाइश नहीं है। बगल के उत्तरप्रदेश में मुलायम सिंह का कुनबा इस तरह सत्ता पर काबिज रहा और उसे इस तरह जकड़कर बैठा रहा कि कुनबे के भीतर ही विपक्ष भी खड़ा होने लगा, और कई रगों का एक ही खून बिखरने लगा। लेकिन एक दूसरी कुनबापरस्ती को भी देखने की जरूरत है जो कि उत्तरप्रदेश में सत्ता पर काबिज रह चुकीं मायावती की है। बहुजन समाज पार्टी में अपने नेता कांशीराम की सबसे करीबी रहते हुए मायावती ने एक नए राजनीतिक कुनबे की विरासत पाई, ठीक उसी तरह की जिस तरह कि दूर दक्षिण में एमजीआर से उनकी सबसे करीबी जयललिता ने पाई थी। यहां पर कुनबे का रक्त संबंध धरा रहा, और उससे परे सबसे करीबी को विरासत मिली जिससे कि पार्टी उसी एक कमरे में जारी रही।
पूरब की तरफ आगे बढ़ते हुए पहले अगर मध्यप्रदेश को देखें तो बड़े लंबे समय तक रविशंकर शुक्ल और उनके दो बेटे, अर्जुन सिंह और उनका बेटा, दिग्विजय सिंह और उनके भाई, ऐसे ढेरों परिवार सत्ता पर काबिज रहे। कुछ नीचे ओडिशा में पटनायक परिवार की दूसरी पीढ़ी चल रही है, उधर पश्चिम में जाएं तो महाराष्ट्र में  पवार से लेकर दूसरे अनगिनत कुनबे दूसरी और तीसरी पीढ़ी की राजनीति कर रहे हैं। आन्ध्र में कांग्रेस विरोधी राजनीति करने वाले एन.टी. रामाराव का दामादवाद आज राज कर रहा है, और उसका बेटावाद सत्ता में दाखिल हो चुका है। यह लिस्ट पूरी नहीं बन सकती क्योंकि यहां जगह सीमित है, और नेताजी की अंतिम इच्छा, मेरे बाद मेरा बच्चा, यह हसरत भारतीय लोकतंत्र में असीमित है।
भारतीय जनता पार्टी के भीतर गिनाने के लिए सिंधिया जैसे दो-चार परिवार हो सकते हैं जिनकी दूसरी पीढ़ी राजनीति में है, लेकिन पूरी की पूरी पार्टी कभी भी किसी एक परिवार की गुलाम नहीं रही, और वंशवाद से मोटे तौर पर आजाद रही। इसलिए भाजपा से आए हुए वेंकैया नायडू किसी पार्टी पर हमला न करते हुए भी पूरी ईमानदारी से वंशवाद के खिलाफ सोच सकते हैं, और बोल सकते हैं, उसमें न कुछ नाजायज है, न कुछ अटपटा है, और न ही कुछ कांग्रेस पार्टी के अकेले के खिलाफ है। उपराष्ट्रपति बनने का यह मतलब नहीं है कि भारतीय लोकतंत्र को जो बातें खाए जा रही हैं, उनके बारे में चर्चा न की जाए। ऊपर हमने कुनबापरस्ती की जो लंबी लिस्ट गिनाई है, उसमें से बहुत से लोग वेंकैया नायडू की पिछली पार्टी, भाजपा के सहयोगी दलों की है। अगर किसी बहाने से ही सही, भारत की राजनीति में कुनबापरस्ती के खिलाफ एक चर्चा छिड़ सकती है, जिससे कि एक जनमत तैयार हो, तो उससे चाहे जिसे नफा हो, चाहे जिसे नुकसान हो, वह होना चाहिए। 

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