देश में वीआईपी अदालतों की तुरंत जरूरत है इंसाफ के लिए

संपादकीय
18 सितंबर 2017


जिस तरह हिंदुस्तान की राजनीति में होता है, ठीक उसी तरह पड़ोस के पाकिस्तान में भ्रष्टाचार की वजह से हटाए गए प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की पत्नी ने उनकी सीट से उपचुनाव जीतने के बाद कहा। उन्होंने कहा कि जनता की अदालत में सुप्रीम कोर्ट का फैसला खारिज हो गया है, और जनता की नजर में आज भी नवाज शरीफ प्रधानमंत्री है। भारत में अधिकतर नेता भ्रष्टाचार के मामलों में, या दूसरे खूंखार अपराधों में फंसने पर भी यही तर्क देते हैं कि वे अदालती फैसले के खिलाफ जनता की अदालत में जाएंगे। दूसरी तरफ जब जनता की अदालत उन्हें खारिज कर देती है, तो वे कानून या चुनाव आयोग की अदालत में जाने की बात करने लगते हैं। कुल मिलाकर बात यह है कि धरती पर उपलब्ध किसी भी तरह की अदालत से अपनी मनमर्जी का फैसला मिलने तक वे अपनी लड़ाई जारी ही बताते हैं।
हमारा यह मानना है कि जिस तरह पाकिस्तान की अदालत ने भ्रष्टाचार के मामले में प्रधानमंत्री को हटाने की हिम्मत दिखाई है, भारत की अदालतों को भी ताकतवर तबकों के मामलों में हिम्मत दिखाने की जरूरत है। आज तो हालत यह है कि नेताओं की कुछ बरसों में ही आसमान पर पहुंच गई दौलत का हिसाब मांगने पर भी सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग या सरकार नजरें चुरा रहे हैं। लोग इस बात की खुलकर चर्चा भी नहीं करना चाहते कि नेताओं के पास अनुपातहीन दौलत आई कहां से है? ऐसे में न तो भ्रष्टाचार कम होने का कोई आसार है और न ही चुनावों में कालाधन कम हो सकता, सत्ता पर बैठे हुए लोगों के अपराध भी कम नहीं हो सकते।
पहली बार भारतीय सुप्रीम कोर्ट में यह सोच सामने आई है कि नेताओं की अनुपातहीन संपत्ति के मामले 3 या 6 महीने में निपटाए जाएं। हम बरसों से यह मांग कर रहे हैं कि देश में ऐसी वीआईपी अदालतें बनाई जानी चाहिए, जहां पर सांसद- विधायक, या उनके और उनके ऊपर के निर्धारित दर्जों के लोगों के भ्रष्टाचार के मामलों की सुनवाई तेजी से हो। ऐसा न होने पर किसी भी तरह के अपराध के मामले निपट ही नहीं पाते हैं, अगर उनमें किसी ताकतवर नेता या अफसर को सजा का खतरा दिख रहा हो। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, क्योंकि ताकतवर लोग अगर मुजरिम हैं, और वे सत्ता पर भी हैं, तो वे आम नागरिकों के मुकाबले हजारों गुना अधिक बड़े जुर्म करने की ताकत रखते हैं। इसलिए देश में आम और खास का फर्क अगर करना हो, तो अदालती सुनवाई में सबसे पहले करना चाहिए। ऐसी फास्टट्रैक अदालतें तुरंत बनानी चाहिए, जो कि बड़े अफसर, बड़े नेता, बड़े जज और एक सीमा से अधिक सम्पन्नता वाले लोगों के मामलों को सुने। 

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