म्यांमार के शरणार्थियों के लिए दरवाजे बंद करके भारत इतिहास में जगह खो रहा है...

संपादकीय
19 सितंबर 2017


सुप्रीम कोर्ट में केन्द्र सरकार ने कहा है कि म्यांमार से आ रहे रोहिंग्या शरणार्थी देश की सुरक्षा के लिए खतरा हैं, और सरकार उन्हें बाहर निकालने जा रही है। सरकार ने अदालत से यह भी अनुरोध किया है कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है, और अदालत इसमें दखल न दे। आज पूरी दुनिया के सामने रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थियों की जो हालत है, उसे लेकर सबके दिल दहले हुए हैं। म्यांमार में सत्तारूढ़, नोबल शांति पुरस्कार से सम्मानित, आंग-सान-सू-ची की सरकार जिस तरह इन मुस्लिमों के खिलाफ फौज और बौद्ध समुदाय की हिंसा को बढ़ावा दे रही है, उसे पूरी दुनिया शर्मनाक मान रही है, यह एक अलग बात है कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अभी म्यांमार हो आए, लेकिन उन्होंने वहां के इस अमानवीय पहलू पर सू-ची से मुलाकात में चर्चा भी नहीं की। अब सरकार का अदालत में हलफनामा और भी निराश करता है क्योंकि अभी पिछले बरसों में लगातार योरप के दर्जन भर देशों ने, और कनाडा ने जिस तरह सीरिया और इराक, लीबिया और दूसरे युद्धग्रस्त देशों से आ रहे शरणार्थियों के लिए अपने दरवाजे खोले हैं, उससे दुनिया मेें सभ्य लोकतंत्र की परिपक्वता स्थापित होती है। ये शरणार्थी तो ऐसे देशों से पहुंचे थे, पहुंच रहे हैं, जहां पर आईएसआईएस और अलकायदा जैसे खतरनाक आतंकी संगठन राज कर रहे हैं, और इनके आतंकी घुसपैठिये शरणार्थियों के बीच योरप के देशों में पहुंचने का एक बहुत बड़ा खतरा है। दूसरी तरफ भारत से म्यांमार की सरहद लगी हुई है, और वहां बड़े पैमाने पर चल रहे सरकारी और बौद्ध हिंसा के कत्लेआम से बचकर जो मुस्लिम आ रहे हैं, उनके लिए दरवाजे बंद करना एक अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी से कतराना है।
भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को कहा है कि इन शरणार्थियों में पाकिस्तान के आतंकी संगठनों के एजेंट भी शामिल हैं, इसलिए देश की सुरक्षा के लिए इनको रोकना भी जरूरी है और आ चुके शरणाथियों को निकालना भी जरूरी है। हमारा मानना है कि अंतरराष्ट्रीय कानून और समझौतों के तहत भी भारत को उदारता दिखानी चाहिए, और पड़ोसी होने के नाते यह इंसानियत भी दिखानी चाहिए कि बड़े पैमाने पर मारे जा रहे लोगों को अपने देश में जगह दे, और फिर चाहे तो इन्हें एक अलग हिफाजत और निगरानी में रखे। पाक आतंकी संगठनों के भारत में एजेंट इन्हीं शरणार्थियों के बीच नहीं घुसेंगे, वे तो कश्मीर और दूसरे इलाकों में वैसे भी लगातार काम करते हैं, और उनकी की हुई आतंकी घटनाएं सामने आती रहती हैं।
भारत का शरणार्थियों के मामले में बहुत लंबा और गौरवशाली इतिहास रहा है। चीन के तिब्बत इलाके के शरणार्थियों और उनके मुखिया दलाई लामा को भारत ने पूरा सम्मान देकर केन्द्र सरकार के खर्च पर जगह दी, और देश में कई जगहों पर तिब्बती शरणार्थियों को रखा गया, जिनमें छत्तीसगढ़ भी शामिल है। इसके बाद म्यांमार के शरणार्थी भी बरसों से भारत मेें रहते आ रहे हैं जो कि रोहिंग्या मुस्लिम नहीं थे, और बौद्ध धर्म के भी थे। फिर 1971 की याद सबको है जब पाकिस्तान की सरकार पूर्वी पाकिस्तान के इलाके में जुल्म ढा रही थी, और वहां से लाखों शरणार्थी भारत में आ रहे थे, तब भारत ने न सिर्फ उन्हें जगह दी, उन्हें बसाया, बल्कि एक फौजी दखल देकर पूर्वी पाकिस्तान के इलाके में पाकिस्तानी फौज को टक्कर दी, उसका आत्मसमर्पण करवाया, और बांग्लादेश बनवाया। भारत में दूसरे और कई देशों के शरणार्थियों को जगह दी गई जिनमें फिलीस्तीन से आने वाले छात्र-छात्राओं को कॉलेजों में दाखिला भी दिलवाया गया।
आज भारत की सरकार अगर महज एक कारोबारी की तरह नफा-नुकसान देखते हुए, हिसाब करके इंसानियत को भूल जाएगी, तो यह बात भी इतिहास में दर्ज होते चल रही है। भारत को एक बड़े देश की जिम्मेदारी निभाते हुए, और अपने गौरवशाली इतिहास का ध्यान रखते हुए म्यांमार के शरणार्थियों को जगह देनी चाहिए। ऐसा न करके भारत इतिहास में अपनी जगह खोने जा रहा है। 

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