देश के बाहर राहुल की कही बातों को गलत कैसे कहा जाए...

संपादकीय
20 सितंबर 2017


कांग्रेस उपाध्यक्ष और भावी अध्यक्ष राहुल गांधी पर यह तोहमत लग रही है कि वे अमरीकी विश्वविद्यालयों में मंच और माईक से भारत के घरेलू मुद्दों के बारे में बोल रहे हैं, और देश को बदनाम कर रहे हैं। लेकिन ऐसा कहने वालों की याददाश्त कुछ कमजोर है और वे यह भूल रहे हैं कि प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी ने जब पहली बार अमरीका जैसे देशों का वीजा पाया, तो वहां के बहुत बड़े-बड़े सभागृहों में प्रवासी भारतीयों के बीच उन्होंने भारत की पिछले साठ-सत्तर बरस की सभी सरकारों के कामकाज को खारिज कर दिया था, जिसमें छह बरस की अटल सरकार का काम भी शामिल था, और उस जनता पार्टी सरकार का काम भी शामिल था जिसमें जनसंघ एक सबसे बड़ा घटक दल था, और जिसमें अटल-अडवानी जैसे दिग्गज जनसंघी मंत्री थे। आजादी के बाद से भारत सरकार के सारे कामकाज को मोदी ने इतनी बार खारिज किया, इतने देशों में जाकर खारिज किया कि इस बारे में उसी वक्त उनकी भारत में बड़ी आलोचना भी हुई थी। आज तो राहुल गांधी किसी सरकारी कुर्सी पर नहीं हैं, और उनका कहा हुआ तो महज विपक्ष के एक नेता का कहा हुआ है, और वे मोदी सरकार के पिछले तीन बरस के काजकाज को लेकर ही बोल रहे हैं, देश में आजादी के बाद से आई कई कांगे्रस-विरोधी केंद्र सरकारों को खारिज नहीं कर रहे हैं।
इसलिए हम राहुल को आज किसी तोहमत का हकदार नहीं पाते क्योंकि किसी विदेश का लोकतंत्र परंपराओं को न तो रातोंरात बनाता है, और न ही रातोंरात पाता है। भारतीय लोकतंत्र की परंपराएं लंबे समय में जाकर बनी थीं, और उनको पिछले तीन बरस में बड़ी रफ्तार से तबाह किया गया है। राहुल गांधी ने भारत में असहिष्णुता बढऩे जैसे कुछ मामलों को उठाया है, जो कि कोई भांडाफोड़ नहीं है, देश के अलावा दुनिया में जगह-जगह अमनपसंद लोग लगातार इस मुद्दे को उठाते रहे हैं, और लोकतंत्र में इसे सरकार विरोधी या देश विरोधी काम मानना गलत है। यह मुद्दा देश की अदालतों में भी बार-बार उठ रहा है और सुप्रीम कोर्ट के अलावा बहुत से हाईकोर्ट देश के हाल पर फिक्र जाहिर कर चुके हैं। गायों को लेकर केंद्र सरकार ने जैसे कानून बनाए और जिस तरह भाजपा के राज वाले कई राज्यों में गाय के नाम पर गुंडागर्दी करने वाले लोगों ने अभूतपूर्व हिंसा की, उसे लेकर सुप्रीम कोर्ट को अभी पूरे देश में हर जिले में अफसरों पर जिम्मेदारी तय करने का हुक्म देना पड़ा।
हमारा ख्याल है कि लोकतंत्र में अच्छी परंपराओं को स्थापित करना चाहिए जिनमें यह भी शामिल होना चाहिए कि अपने से पहले की सरकारों के कामकाज को उस तरह खारिज न किया जाए जिस तरह आज केंद्र सरकार के बहुत से लोग कर रहे हैं। भारत अपने बहुत से लोकतांत्रिक मूल्यों को खो रहा है, और पिछले आम चुनाव में मतदाताओं के बहुमत से मिले समर्थन को ऐसा करने की एक मंजूरी मानकर चल रहा है। जबकि चुनाव में मिली हुई जीत लोकतंत्र को खत्म करने के लिए, देश से सद्भाव को खत्म करने के लिए मंजूरी नहीं होती है। राहुल गांधी को देश के बाहर देश के मुद्दे न उठाने की सलाह देने का हक उन्हीं को हो सकता है जिन्होंने देश के बाहर देश की पिछली सरकारों के खिलाफ कुछ न कहा हो।

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन विश्व अल्जाइमर दिवस : एल्जाइमर्स डिमेंशिया और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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