मुंबई स्टेशन पर भगदड़-मौतें, लोगों की सोच से लेकर रेलवे की क्षमता तक सुधार जरूरी

संपादकीय
29 सितंबर 2017


भारत के सबसे बड़े महानगर और देश की कारोबारी राजधानी मुंबई के एक लोकल ट्रेन स्टेशन पर किसी अफवाह के चलते एक पुल पर भगदड़ हुई और कुचलकर 22 लोगों की मौत हो चुकी है, दर्जनों घायल हैं। आज ही नए रेलमंत्री पीयूष गोयल मुंबई पहुंचे थे, और वे इसी लोकल ट्रेन से सफर करने वाले थे। देश के सबसे अनुशासित माने जाने वाले मुंबई के लोगों के बीच ऐसी भगदड़ हैरान करने वाली है क्योंकि वहां हर दिन 75 लाख से अधिक लोग लोकल ट्रेन में सफर करते हैं, और बहुत बुरी भीड़ के बीच भी डिब्बों के बाहर टंगे हुए रोज का सफर एक आम बात है, लेकिन ऐसी भगदड़ की बात कभी सुनी नहीं गई। लोग व्यस्त घंटों में बहुत ही धक्का-मुक्की के साथ ट्रेन में चढ़ पाते हैं, और हर कुछ मिनट में हर रास्ते पर चलने वाली लोकल ट्रेन भी मुंबई की जरूरत के मुताबिक कम पड़ती है, लेकिन ऐसा हादसा वहां कभी नहीं हुआ था।
देश में रेलवे स्टेशनों पर, या किसी मेले के दौरान नदी के घाट पर, नदी के पुल पर पहले भी ऐसे हादसे हुए हैं। उनमें से अधिकतर हादसे किसी अफवाह के चलते हुए जिन्हें सुनकर लोग जान बचाकर भागने लगे, और इसी चक्कर में मौतें हुईं। भारत की आबादी जितनी अधिक है, और लोगों की भीड़ कुछ खास दिनों पर जिस तरह कुछ जगहों पर जुटती है, उससे भी भगदड़ की नौबत आती है। लेकिन मुंबई के लोग जो कि बहुत तेज और स्ट्रीट-स्मार्ट माने जाते हैं, वे भी एक अफवाह का शिकार हो गए, यह बात कुछ हैरान करने वाली है। यहां पर इस बात की चर्चा इसलिए जरूरी है कि अफवाहें उन्हीं जगहों पर अधिक फैलती हैं, जिन जगहों पर लोगों में वैज्ञानिक सोच और तर्कशक्ति कम होने लगती हैं। आज पूरे देश में ऐसा माहौल है कि लोग अपनी सामान्य समझबूझ भी खो रहे हैं, और वे अंधभक्ति से लेकर धर्मान्धता तक अलग-अलग किसी न किसी बात के शिकार हो रहे हैं। इंसान का मिजाज टुकड़े-टुकड़े में समझदार और नासमझ नहीं बनता। लोग अगर समझदार रहते हैं तो हर बात में समझदार रहते हैं, और लोग अफवाहों पर भरोसा करने लगते हैं तो वे किसी भी तरह की प्रतिमा को दूध पिलाने भी पहुंच सकते हैं, और चोटी काटने के शक में लोगों की हत्या भी कर सकते हैं।
किसी देश को अपने लोगों के बीच जो खूबियां बढ़ानी चाहिए उनमें तर्कशक्ति, और वैज्ञानिक सोच-समझ बहुत अहमियत रखती हैं। इसके अलावा लोगों के बीच में अपनी जिम्मेदारी का एहसास बढऩा चाहिए, और दूसरों के अधिकारों के लिए सम्मान भी बढऩा चाहिए। जब हमारी राष्ट्रीय सोच-समझ न्यायप्रिय होने लगेगी, तो हम किसी भी तरह की अफवाह और भगदड़ से भी बचेंगे। दुनिया के बहुत से देश ऐसे हैं जहां लोग पहले दूसरों के अधिकार की फिक्र करते हैं, और जब उनका सम्मान हो जाता है, तब फिर वे अपने अधिकारों के बारे में सोचते हैं। हिन्दुस्तान में हाल इससे ठीक उल्टा है, यहां पर लोग पूरे वक्त अपने अधिकारों की न केवल फिक्र करते हैं, बल्कि अपने अधिकारों का दावा भी ठोंकते रहते हैं, और अपनी जिम्मेदारी की बात भी नहीं सोचते हैं। ऐसी सोच ही किसी भगदड़ में लोगों को औरों की जान बचाने के बजाय अपनी जान बचाने के लिए बाकी लोगों को कुचलने का हौसला देती है। भारत में त्याग और जिम्मेदारी की एक समझ विकसित करने की बहुत जरूरत है क्योंकि धर्म और आध्यात्मिक गुरूओं की अंधश्रद्धा में फंसे हुए लोगों के बीच कभी कोई साम्प्रदायिक अफवाह फैलाई गई, तो उसे झूठा साबित करने के पहले बड़ी संख्या में मौतें हो जाएंगी।
मुंबई का यह हादसा रेलवे स्टेशनों की क्षमता की तरफ भी ध्यान खींचता है। देश को सबसे अधिक टैक्स और रोजगार देने वाला यह महानगर बुरी तरह से लदा हुआ है, और अपनी क्षमता खो चुका है। मुंबई को जीने लायक बनाने के लिए बहुत कुछ सोचने और करने की जरूरत है। यहां पर लाखों लोग रोज लोकल ट्रेन के दरवाजों पर लटककर सफर करने को मजबूर हैं, और सरकारें इसे लोगों की नियति मानकर जरूरतों को अनदेखा करते आई हैं। हो सकता है कि इस हादसे के बाद सुधार हो सके। अभी तो एलफिंस्टन रोड नाम के इस स्टेशन का नाम बदलकर प्रभादेवी रखा गया था, जब जरूरत क्षमता को बढ़ाने की थी, तब बरसों से चली आ रही मांग को अनदेखा करते हुए सरकार ने केवल स्टेशन के नाम को बदलकर प्रभादेवी कर दिया था। देवी का नाम तब तक किसी काम का नहीं है जब तक इंसान अपने खुद के इंतजाम को न सुधारे। रेलवे को इस हादसे से एक बड़ा सबक लेने की जरूरत है, और देश के ऐसे तमाम स्टेशनों पर नजर डालने की जरूरत है जहां क्षमता चुक चुकी है।

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन हास्य अभिनेता महमूद अली और विश्व हृदय दिवस - ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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