चीनी सामानों के बहिष्कार का फतवा तो ठीक है लेकिन क्या बिना बिजली, बिना फोन रहेंगे?

संपादकीय
5 सितंबर 2017


भारत के एक तबके में पड़ोस के देशों के खिलाफ नफरत पर आधारित जंग छेड़ देने का बड़ा उत्साह रहता है। कोई भी बात हो और एक के बदले दस सिर काटकर लाने के नारे लगने लगते हैं, और चीन से सरहद पर तनातनी हो, तो देश भर में जगह-जगह कुछ राष्ट्रवादी संगठन चीनी सामान जलाते दिखते हैं, हालांकि तस्वीरों में जलते हुए केवल खाली बक्से दिखते हैं, क्योंकि सामान जलाने के हौसले वाले कम ही रहते होंगे। लेकिन आज जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चीन में पाकिस्तान के आतंकी संगठनों के खिलाफ आवाज उठाने में कामयाब रहे हैं, और वे ब्रिक्स देशों के संयुक्त घोषणा पत्र में आतंक की इस बात को जुड़वाने में भी कामयाब रहे हैं, तो यह सरहद पर जंग के चलते नहीं हो पाया है, यह दोनों देशों के बीच बैठकर ठंडे दिल से बातचीत करने से हो पाया है। डोकलाम सरहद की तनातनी बातचीत से ही खत्म हुई, न कि फौजी कार्रवाई से। इसी तरह हिन्दुस्तान के युद्धोन्मादी-राष्ट्रवादी लोगों को यह भी समझना चाहिए कि चीनी सामानों का बहिष्कार एक फतवा हो सकता है, हकीकत नहीं हो सकता। क्योंकि जब यह नारा लगा रहे हैं, तब उनके पसंदीदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चीन में उस ब्रिक्स सम्मेलन में बात कर रहे हैं, और चीन के साथ अलग से सीधी बात भी कर रहे हैं, और इन चर्चाओं में कारोबार एक बड़ा मुद्दा है। ब्रिक्स देशों के बीच कारोबार बढ़ाने की बात है, और इनमें से कोई भी देश एक-दूसरे का कारोबारी बहिष्कार नहीं कर सकता।
चीन के सामान को जलाने का नाटक फिजूल का है। आज भारत में जितने बिजलीघर चल रहे हैं, उनमें से बहुत से चीन में बने हुए हैं, चीनी टेक्नालॉजी से खड़े किए गए हैं, और चीन के इंजीनियर आकर उन पर काम भी करते हैं। आज भारत में जितने मोबाइल फोन काम कर रहे हैं, उनमें शायद नब्बे फीसदी चीन से बनकर आए हुए हैं, उनमें चीनी कलपुर्जे लगे हैं, मोबाइल कंपनियों के भीतर के उपकरण चीन के हैं, डेस्कटॉप और लैपटॉप चीन के हैं, प्रिंटर और उनकी स्याही चीन की है, और नोट गिनने की मशीनों से लेकर पिन लगाने की मशीनें तक चीन की हैं। भारत और चीन के बीच कारोबार इतना जुड़ा हुआ है कि चीनी सामानों का बहिष्कार एक बहुत ही पाखंडी नारा है, क्या हिन्दुस्तान के लोग अगले दस-बीस बरस बिना बिजली अंधेरे में जीने तैयार हैं? क्या वे अगले पांच-दस बरस बिना मोबाइल फोन जीने तैयार हैं? बिना कम्प्यूटर उनका घर-कारोबार चल जाएगा? क्या बिना टीवी देखे उनका परिवार चल जाएगा?
आज जब दुनिया में देशों के बीच सरहदों को नीचा किया जा रहा है, और लोगों की आवाजाही और कारोबार को बढ़ावा दिया जा रहा है, तो पड़ोस में बसे हुए चीन से सस्ते में और कम दूरी से आने वाले सामान को रोकने की बात करना बेकार है। या तो हिन्दुस्तानी कारखाने और कामगार चीनियों जैसे हुनर से काम करना सीख लें, अपनी उत्पादकता बढ़ा लें, तो फिर न सिर्फ चीन से आयात घट सकता है, बल्कि दुनिया के बाकी देशों में हिन्दुस्तान का सामान जा भी सकता है। लेकिन अपने घर को सुधारने के बजाय दूसरे के घर से आना-जाना रोकने की बात किसी की काम की नहीं है। पड़ोसियों से दुश्मनी रखने और निकालने के नारों के बिना अपना घरेलू राष्ट्रवाद जिंदा नहीं सकता, उसमें हिंसक धार नहीं आ सकती। इसलिए हर देश में ऐसे कुछ संगठन रहते हैं जो पड़ोसी को दुश्मन बताते हुए रात-दिन जंग और नफरत की बात करते हैं। लोगों को याद होगा कि प्रधानमंत्री बनने के पहले नरेन्द्र मोदी ने अपनी चुनावी सभाओं में पाकिस्तान के खिलाफ जितने किस्म की भड़काऊ बातें कही थीं, और एक के बदले दस सिर काटकर लाने का वायदा किया था, और यूपीए के प्रधानमंत्री का मखौल उड़ाया था, बिरयानी खिलाने के लतीफे सुनाए थे, वे सब प्रधानमंत्री बनने के बाद शांत हो गए। उसके बाद वे ही पाकिस्तान के साथ परंपरा के खिलाफ जाकर भी घरोबा दिखाते रहे, और बिन बुलाए भी वहां जाते रहे हैं। आज देश के भीतर चीनी सामान या पड़ोसी देशों को लेकर एक निहायत नाजायज और गैरजरूरी फतवा दिया जा रहा है, और इस बारे में हकीकत बताने का जिम्मा भी प्रधानमंत्री का है ताकि देश के लोग बिना उन्माद चैन से जी सकें।

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