नफरत से असहमति की हत्या कर, एक लाश टांग करोड़ों को धमकी

संपादकीय
6 सितंबर 2017


कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू में कल शाम एक साहसी पत्रकार, गौरी लंकेश की हत्या कर दी गई। उन्हें उनके दरवाजे पर ही पेशेवर अंदाज में गोलियों से भून दिया गया। उन्हें हिन्दुत्ववादी संगठनों से पहले से धमकियां मिल रही थीं, और वे अपनी वामपंथी विचारधारा से अखबारनवीसी करते हुए लगातार साम्प्रदायिकता के खिलाफ जूझ रही थीं, और अपने अखबार के अलावा वे सड़कों पर भी धर्मनिरपेक्षता के मुद्दों को लेकर आंदोलनों में शरीक रहती थीं। सोशल मीडिया पर वे लगातार दुनिया के अमन-पसंद मुद्दों पर लिखती थीं, और भारत में कट्टरता और नफरत के खिलाफ वे लगातार मुखर रहती थीं। उनकी मौत के बाद देश की साम्प्रदायिकता-विरोधी ताकतों को यह भी याद पड़ रहा है कि किस तरह देश के धर्मान्धता-कट्टरता विरोधियों को पिछले बरसों में इसी अंदाज में एक-एक कर मारा गया है, और उनमें से एक के भी कातिल को पकड़ा नहीं जा सका है। यह अलग बात है कि पुणे में हुई नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या के पीछे उग्रवादी हिन्दू संगठनों से जुड़े लोगों का नाम आया था, लेकिन अभी तक कोई कातिल पकड़े नहीं जा सके हैं। देश में साम्प्रदायिक-राजनीति और नफरत के खिलाफ मुखर ऐसे चार पत्रकारों-सामाजिक कार्यकर्ताओं की पिछले तीन बरस में एक ही अंदाज में हत्या हुई है, और यह ताजा हत्या भी पुलिस के मुताबिक बिल्कुल उसी तरह से हुई है।
आज भारत में जिस रफ्तार से वैज्ञानिक सोच के खिलाफ, धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ, सामुदायिक सद्भाव के खिलाफ माहौल बनाया जा रहा है, ये हत्याएं पहली नजर में उसी सिलसिले की एक कड़ी दिखती हैं। दूसरी बात यह भी है कि आज सोशल मीडिया पर देश की धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ एक बहुत बड़ी फौज सक्रिय है जो कि देश के अमन-पसंद लोगों की रोजाना ही चरित्र-हत्या करने में लगी हुई है। कल शाम इस हौसलामंद अखबारनवीस के कत्ल के बाद भी यह धर्मान्ध फौज सोशल मीडिया पर खुशियां मनाने में जुट गई थी, और यह बात देश के बाकी धर्मनिरपेक्ष लोगों के लिए एक चेतावनी अधिक है कि चरित्र-हत्या के साथ-साथ उनकी शरीर-हत्या भी किस तरह हो सकती है। ऐसे बहुत से मामलों में मकसद महज एक को चुप करने का नहीं रहता है, बल्कि लाखों और लोगों को भी चुप्पी के लिए यह एक समझाईश रहती है और यह बात तय है कि हर किसी का हौसला गोली खाने का नहीं रहता है, इसलिए ऐसी हत्या से लोगों की चुप्पी की गारंटी भी रहती है। आज पूरे हिन्दुस्तान में मीडिया के लोग जगह-जगह एकजुट होकर इस हत्या का विरोध कर रहे हैं। इसके बाद दो-चार दिनों में यह समाचार विचार के पेज पर चले जाएगा, और फिर अगली ऐसी किसी हत्या के वक्त या हत्या की बरसी के समय एक बार फिर इसे याद कर लिया जाएगा। लेकिन कत्ल तो खबरों और इतिहास में दर्ज हो जाता है। डरी-सहमी चुप्पी न दिखती है, न इतनी आसानी से दर्ज हो सकती है। और ऐसे कत्ल के पीछे वही एक मकसद दिखता है। हिन्दुस्तान आज आर्थिक आंकड़ों और नारों पर तैरता दिख रहा है, लेकिन देश में असहमति के खिलाफ हिंसा का एक अभूतपूर्व माहौल दिखाई पड़ता है जिसने अब तक के सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। आज हिंसक-नफरत फैलाने वाले सोशल मीडिया-आतंकियों के पीछे देश की सबसे बड़ी निर्वाचित ताकतों की सहमति बताई जाती है, और दिखती है। यह नौबत सभ्य और लोकतांत्रिक दुनिया में भारत की साख चौपट कर चुकी है, और भारत में सांस्कृतिक-धार्मिक विविधता की जो एक सबसे बड़ी ताकत रही है, उसे भी तबाह कर चुकी है। देश में अंधविश्वास, अवैज्ञानिकता, धर्मान्धता, और नफरत की फसल लगातार बोई जा रही है, और उन फसलों को कोई लोकतांत्रिक पंछी नुकसान न पहुंचा दें, इसलिए डराने के लिए हर बरस ऐसी कोई न कोई लाश इन फसलों के बीच टांग दी जाती हैं। ये हालात एकदम ही भयानक हैं, और एक लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष देश की भारत की ऐतिहासिक साख को खत्म कर चुके हैं।
जो हिन्दुत्ववादी ताकतें गौरी लंकेश नाम की इस हौसलामंद अखबारनवीस के पीछे लगी हुई थीं, उनका ऐतिहासिक टकराव ऐसे दूसरे कुछ हिन्दुओं से भी चलते आया है। सोशल मीडिया पर लोगों ने याद किया है कि महात्मा गांधी, गोविंद पंसारे, नरेन्द्र दाभोलकर, और एम.एम. कालबुर्गी का विरोध ऐसी हिन्दुत्ववादी ताकतें ही करते आ रही थीं, चाहे इनके हत्यारे अब तक पकड़े न गए हों, लेकिन यह बात तो साफ है कि मारे गए ये सारे लोग हिन्दू थे। इसलिए हिन्दुत्व की रक्षा करने के लिए आतंकी-हिंसा पर उतारू लोगों के बारे में यह बात भी समझने की जरूरत है कि वे अपने बीच के, हिन्दू धर्म में पैदा हुए ऐसे लोगों को जरा भी बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं, जो कि हिन्दुओं के साथ-साथ दूसरे धर्मों को भी बराबरी का सम्मान देने की बात कर रहे हैं। इस सिलसिले में यह भी समझने की जरूरत है कि संविधान की शपथ लेने वाली वे कौन सी ताकतें हैं जो कि सद्भाव के खिलाफ बिना बर्दाश्त वाली ऐसी हिंसक ताकतों के साथ हैं, और यह साथ कुछ लोग चुप्पी से उजागर कर रहे हैं, और कुछ लोग गालियां देकर, बलात्कार और हत्या की धमकियां देकर भी कर रहे हैं।

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