खुले में शौच रोकने से पहले खुले में कातिल सोच रोकें...

संपादकीय
7 सितंबर 2017


भारत में आज नफरत की वजह से की गई दिखती एक पत्रकार की हत्या के बाद का माहौल देखने लायक है। कर्नाटक की इस महिला पत्रकार को बाकी देश में आम लोग शायद नहीं जानते थे, लेकिन अब उसकी लिखी हुई बातें अनुवाद होकर कई भाषाओं में छप रही हैं, और वह सोच आगे बढ़ रही है। लेकिन दूसरी तरफ भारत के सोशल मीडिया में लगातार इस मौत पर बहुत बड़ी खुशी भी मनाई जा रही है कि एक वामपंथी, धर्मनिरपेक्ष कुतिया की हत्या पर देश भर के कुत्ते और पिल्ले रो रहे हैं। कई लोग ऐसे और कत्ल के फतवे दे रहे हैं, और कई लोग खुशियां भी मना रहे हैं कि ऐसे एक धर्मनिरपेक्ष से पीछा छूटा। इन गालियों में बहुत नया तो कुछ नहीं है, लेकिन पिछले कुछ बरसों से लगातार यह सोच बढ़ती चली जा रही है, और आज इस पर लिखना जरूरी है।
हम किसी को गालियां देने के लिए कुत्ते और कुतिया की मिसाल को गाली नहीं मानते, और हमारा यह मानना है कि इससे इंसान का कोई अपमान नहीं होता, बल्कि इससे एक वफादार जानवर का अपमान जरूर होता है जो कि इंसान का सबसे वफादार साथी होता है, दूसरे इंसान से भी अधिक। लेकिन किसी कत्ल पर खुशी मनाने की ऐसी खुली सोच से यह सवाल उठता है कि क्या देश का कानून ऐसे लोगों के खिलाफ एकदम ही ताक पर धर दिया गया है? आज देश के बड़े-बड़े कुछ अखबारों की यह रिपोर्ट है कि एक हौसलामंद पत्रकार की ऐसी हत्या पर ट्विटर पर खुली खुशी मनाने वाले लोगों में से चार लोग ऐसे हैं जिन्हें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी फॉलो करते हैं। किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति को तो दसियों लाख लोग फॉलो कर सकते हैं, और आमतौर पर ऐसे किसी व्यक्ति के पास इतना वक्त नहीं होता कि वे उन्हें फॉलो करने वाले लोगों की छानबीन करें। लेकिन दूसरी तरफ वे तो किसी और को तभी फॉलो करते हैं जब वे अपनी पसंद से उसे छांटते हैं। यह बात हक्का-बक्का करती है कि मीडिया में पिछले दो-तीन बरस से लगातार ऐसी कई मिसालें सामने रखी गईं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कैसे-कैसे लोगों को फॉलो करते हैं, जो कि दूसरों को हत्या और बलात्कार की खुली धमकी पोस्ट करते हैं। जब ऐसी बातें सार्वजनिक रूप से राष्ट्रीय मीडिया में बार-बार आती हैं, तो यह हैरानी होती है कि प्रधानमंत्री का मीडिया अकाउंट देखने वाले लोगों को क्या इसमें कुछ भी बुरा नहीं दिखता है? और क्या प्रधानमंत्री के सलाहकार, खुद प्रधानमंत्री इसे देखकर भी अनदेखा करते हैं? कल जब देश भर में बेंगलुरू की अखबारनवीस गौरी लंकेश की हत्या पर शोक रखा जा रहा था, तब उनके कत्ल पर खुशी मनाने वाला अपने ट्विटर खाते पर फख्र से यह लिखकर चल रहा था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उसे फॉलो करते हैं, और उसके पेज पर यह दिखता भी है।
लोकतंत्र में नेताओं की सोच कई तरह की हो सकती है, लेकिन लोकतंत्र और हिंसा साथ-साथ नहीं चलते। इसलिए नरेन्द्र मोदी को चाहिए कि पिछले बरसों में लगातार राष्ट्रीय मीडिया में लिखी जा रही इस बात को और अनदेखा न करें। वे जिस तरह खुले में शौच के खिलाफ अपने कार्यकाल के शुरू से ही एक अभियान चला रहे हैं, उसी तरह लोकतंत्र में हमेशा ही एक अभियान की जरूरत रहती है जो कि खुले में कातिल सोच के खिलाफ काम करें। खुले में शौच तो एक बार चल सकती है, लेकिन खुले में कातिल सोच की लोकतंत्र में कोई जगह नहीं हो सकती। प्रधानमंत्री को चाहिए कि वे अमिताभ बच्चन की मदद लेकर दरवाजा बंद के अंदाज में गंदी जुबान बंद का भी एक अभियान चलाएं जिससे बलात्कारी और कातिल फतवे देने वाले लोगों पर रोक लग सके। लोकतंत्र महज पखानों की समझ पैदा करने का काम नहीं है, लोकतंत्र तो यह है कि जो लोग बलात्कार और हत्या पर खुशी मनाते हैं, खुली धमकी देते हैं, उन तमाम लोगों को जेल में बंद किया जाए। शौच को बंद पखाने में किया जाए, और हत्यारी सोच को खुले में फैलाया जाए, यह इस देश की संस्कृति नहीं रही है, और देश के संविधान में इसकी कोई जगह भी नहीं है। जो लोग देश के संविधान की शपथ लेकर जनता की दी गई कुर्सियों पर काबिज हैं, उन्हें खुले में शौच से पहले खुले में कातिल सोच को रोकने का काम करना चाहिए, क्योंकि इस मोर्चे पर लगातार चुप्पी को इतिहास अच्छी तरह दर्ज करते चल रहा है।

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