देश में तीन बरस पढ़ाई वाले डॉक्टरों की बहुत जरूरत है

संपादकीय
8 सितंबर 2017


छत्तीसगढ़ में अभी कुछ दिन पहले राज्य सरकार ने आयुर्वेदिक डॉक्टरों को एलोपैथिक दवाइयां लिखने की इजाजत दे दी है। उनकी काफी समय से यह मांग चली आ रही थी, और पिछले एक-दो बरस में सरकारी अफसरों ने डॉक्टरों को उनकी पद्धति से बाहर जाकर दवाइयां लिखने पर रोका था, और तब से यह मांग जोर पकड़ रही थी। आयुर्वेद की पढ़ाई में कुछ हिस्सा एलोपैथिक दवाइयों का रहता है, और इसलिए बीएएमएस करने वाले डॉक्टर यह मांग करते हैं कि जरूरत के मुताबिक उन्हें एलोपैथिक दवाइयां लिखने दी जाएं। दूसरी तरफ एलोपैथिक डॉक्टरों का यह मानना रहता है कि उनकी पद्धति का इलाज करने लायक पढ़ाई बीएएमएस में नहीं करवाई जाती, इसलिए ऐसी इजाजत नहीं मिलनी चाहिए। अभी साल दो साल के पहले तक छत्तीसगढ़ में आयुर्वेद, होम्योपैथी, इलेक्ट्रिक होम्योपैथी और कई दूसरे किस्म की वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति कही जाने वाली पद्धतियों के डॉक्टर या गैरडॉक्टर इलाज करते आए थे, और वे धड़ल्ले से एलोपैथिक दवाइयां लिखते भी आए थे। नीम-हकीम कहे जाने वाले ऐसे बहुत से डॉक्टरों का कारोबार सरकार ने अभी बंद करवाया था, इसलिए अब औपचारिक रूप से आयुर्वेदिक डॉक्टरों ने एलोपैथी की इजाजत हासिल कर ली है। और इनके बाद अब होम्योपैथी के डॉक्टर मुख्यमंत्री तक पहुंचे हैं कि उन्हें भी इजाजत दी जाए।
छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में गांव-गांव में मितानिनें भी मुख्यमंत्री दवा पेटी लेकर उसमें दी गई डेढ़ दर्जन जरूरी दवाओं के साथ इलाज करती हैं, और जरूरत पडऩे पर मरीजों को सरकारी अस्पताल तक ले भी जाती हैं। ऐसे में सभी पद्धतियों के डॉक्टरों का यह कहना है कि उनकी पढ़ाई मितानिनों से तो अधिक है जो कि शायद पांचवीं या आठवीं पास हो सकती हैं, और जिनका कोई लंबा-चौड़ा औपचारिक प्रशिक्षण भी नहीं हुआ है। ऐसे में हमें जोगी सरकार के समय राज्य में शुरू की गई तीन साल की डॉक्टरी की पढ़ाई याद आती है जिसे बाद में भारतीय चिकित्सा परिषद और सुप्रीम कोर्ट ने गैरकानूनी करार दे दिया था, और बंद करवा दिया था। हमारा ख्याल है कि देश में रोजाना की मामूली बीमारियों का इलाज करने के लिए तीन साल की पढ़ाई से ऐसे सहायक चिकित्सक तैयार हो सकते हैं, जो कि सीमित इलाज करें। आज एमबीबीएस डॉक्टरों की देश में इतनी कमी है कि अगले कई बरस भी आबादी को सही अनुपात में डॉक्टर नहीं मिलने वाले। और न ही हर छोटी-मोटी तकलीफ के लिए लोगों को पांच-सात साल मेडिकल कॉलेज में लगाकर निकलने वाले एमबीबीएस डॉक्टरों की अनिवार्य जरूरत भी होती है।
न सिर्फ छत्तीसगढ़ राज्य को, बल्कि पूरे हिन्दुस्तान को यह सोचना चाहिए कि एमबीबीएस डॉक्टरों से कम शिक्षा वाले ऐसे तीन बरस के स्वास्थ्य कार्यकर्ता या सहायक चिकित्सक बनाए जाएं जो कि छोटी बीमारियों के सीमित इलाज के लिए सक्षम रहें, और उन्हें उतनी ही इजाजत रहे। आज तो आरएमपी, रजिस्टर्ड मेडिकल प्रेक्टिशनर बनने के लिए लोग कई तरह की कागजी डिग्री ले लेते हैं जो पूरी तरह फर्जी रहती है, और वे उसकी आड़ में सभी तरह के इलाज करते रहते हैं। इनके बजाय तीन बरस के औपचारिक शिक्षण-प्रशिक्षण वाले लोग गांवों में जाकर काम भी करेंगे, गरीब लोगों के बीच कम फीस पर काम भी करेंगे, और मरीज और एमबीबीएस के बीच के लंबे फासले को पाटने का काम भी करेंगे। भारतीय चिकित्सा परिषद, केन्द्र सरकार, राज्य सरकार, और जरूरत पड़े तो सुप्रीम कोर्ट को मिलकर तीन बरस की चिकित्सा शिक्षा पर विचार करना चाहिए जो कि देश की जरूरत है। इससे आज के एमबीबीएस डॉक्टरों के आत्मसम्मान को चोट पहुंच सकती है कि आधी-अधूरी पढ़ाई से तीन बरस में तैयार लोग भी डॉक्टर कहलाएंगे, तो ऐसे में उनके लिए कोई और उपयुक्त नाम छांटा जा सकता है, लेकिन इस जरूरत को पूरा करना चाहिए। और हम होम्योपैथी या दूसरी पैथियों के डॉक्टरों को एलोपैथिक दवाइयों को लिखने की इजाजत देने के खिलाफ हैं जिन्होंने इसकी सही पढ़ाई नहीं की है, उन्हें यह औजार नहीं थमाना चाहिए।

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