नोबल शांति पुरस्कार का आतंक नाजायज

संपादकीय
9 सितंबर 2017


भारत के पड़ोस के म्यांमार में वहां के बौद्ध बहुसंख्यक लोग फौज और पुलिस में बौद्ध लोगों के साथ मिलकर धार्मिक अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुस्लिमों को देश से मारकर भगा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट यह कहती है कि उन्हें बड़ी संख्या में मार दिया गया है, और पूरा समुदाय बौद्ध-सरकारी हिंसा का शिकार है। म्यांमार में सरकार की मुखिया आंग-सान-सू-ची को 1991 में वहां की फौजी तानाशाही के खिलाफ बहुत लंबे लोकतांत्रिक संघर्ष के लिए नोबल शांति पुरस्कार भी दिया गया था, और अब यह मांग भी हो रही है कि वे जिस तरह रोहिंग्या मुस्लिमों की दसियों हजार हत्याओं को देखते हुए चुप हैं, लाखों के देश से निकाल दिए जाने को देखते हुए चुप हैं, और जिस तरह से उन्होंने यह तय किया है कि संयुक्त राष्ट्र की जांच टीम को देश में घुसने नहीं दिया जाएगा, उसे देखते हुए उनका नोबल शांति पुरस्कार वापिस लिया जाए। इस बारे में अभी-अभी खबर आई है कि नॉर्वे के नोबेल संस्थान का कहना है कि न तो पुरस्कार के संस्थापक अल्फ्रेड नोबेल के वसीयत के अनुसार और न ही नोबेल फाउंडेशन के नियमों के अनुसार प्राप्तकर्ताओं से पुरस्कार वापस लेने का कोई प्रावधान है। संस्थान ने कहा है कि एक बार नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान किए जाने के बाद प्राप्तकर्ता से पुरस्कार वापस नहीं लिया जा सकता।
आज का यह मुद्दा म्यांमार पर केन्द्रित नहीं है, बल्कि इस पर केन्द्रित है कि सम्मान और पुरस्कार वापिस लेने का कोई प्रावधान होना चाहिए या नहीं? बहुत से लोगों को जीते जी सम्मान मिल जाते हैं, और उनकी बाकी जिंदगी में ही ऐसे कई मामले सामने आते हैं जो कि उस सम्मान के लिए अपमानजनक होते हैं। ऐसे में हमारा ख्याल है कि हर सम्मान के साथ यह शर्त जुड़ी रहनी चाहिए कि इस सम्मान का अपमान होने की नौबत में इसे वापिस लिया जा सकता है। इस बारे में भारत में फौज के नियम साफ हैं। अगर किसी फौजी को मिला हुआ सम्मान बाद में उसके किसी काम या उसके चाल-चलन की वजह से सम्मान के अपमान में बदलता दिखे, तो उसे वापिस लिया जा सकता है। आज भारत में जैसे सचिन तेंदुलकर जैसे कम उम्र के नौजवान क्रिकेट खिलाड़ी को भारत रत्न का देश का सबसे बड़ा सम्मान दिया गया है। उनकी अभी लंबी उम्र बाकी है, और अपनी शोहरत और कामयाबी के चलते वे अरबों के कारोबारी भी हो गए हैं, और हो सकता है कि आगे-पीछे उनको लेकर कोई अप्रिय चर्चा हो, और वे कोई गलती या गलत काम कर बैठें, तो उस हालत में उनका भारत रत्न कायम रहना ठीक नहीं होगा। पहले ऐसे बहुत से सम्मान मरने के बाद ही दिए जाते थे, और मौत के बाद किसी के गलत काम सामने आने की नौबत कम ही रहती थी, लेकिन जब जीते जी सम्मान मिल रहे हैं, तो उनको वापिस लेने का एक पुख्ता इंतजाम ही लोकतंत्र, इंसानियत, और सम्मान के सम्मान में जरूरी है।
आज दुनिया में यह भी माना जा रहा है कि आंग-सान-सू-ची के खिलाफ दुनिया में आज आवाज इसलिए नहीं उठ रही है कि लोग उनके नोबल पुरस्कार के दबाव में चुप हैं। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि जिसने इतने लंबे समय तक लोकतांत्रिक लड़ाई लड़ी है, उसकी सत्ता के तहत हो रही हिंसा का कुछ सोच-समझकर ही विरोध करना होगा। हमारा ख्याल है कि किसी सम्मान या पुरस्कार के आतंक में लोगों की गलतियों या गलत कामों को अनदेखा करना ठीक नहीं है। लोगों को याद होगा कि किस तरह अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के पहले कार्यकाल में ही, बिना उनके किसी भी योगदान के किस तरह उन्हें खुद को हक्का-बक्का करने वाला नोबल शांति पुरस्कार घोषित कर दिया गया था, और बाद में उसके बारे में कुछ लोगों ने यह भी लिखा था कि शायद यह उनसे बाकी कार्यकाल में शांति की कोशिशों के लिए दिया गया एडवांस नोबल शांति पुरस्कार है। पुरस्कार और सम्मान लोगों के ऊपर गलत कामों से बचने के लिए एक नैतिक दबाव की तरह होने चाहिए, न कि उनके गलत कामों को बचाने के लिए एक ढाल की तरह। पुरस्कारों और सम्मानों की राजनीति वैसे भी विवादों से घिरी रहती है, और हमारा मानना है कि सम्मान प्राप्त लोगों को खुद भी उस सम्मान का सम्मान करना चाहिए, या फिर उनमें इतनी आत्मा बची रहनी चाहिए कि वे उसे लौटा दें।

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