गांधी हत्या की फिर जांच की मांग पर सुप्रीम कोर्ट लगाए जुर्माना

संपादकीय
31 अक्टूबर 2017


महाराष्ट्र हाईकोर्ट में खारिज होने के बाद सुप्रीम कोर्ट में महाराष्ट्र के एक संगठन अभिनव भारत के एक सदस्य ने यह याचिका लगाई है कि गांधी हत्याकांड की सुनवाई दुबारा की जाए क्योंकि उस वक्त देशी-विदेशी जासूसी एजेंसियों की वजह से उसकी जांच और सुनवाई सही नहीं हुई थी। इसके खिलाफ महात्मा गांधी के प्रपौत्र तुषार गांधी भी सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं कि ऐसी कोई याचिका मंजूर नहीं होनी चाहिए।
यह पूरा सिलसिला इतना खतरनाक है, और बदनीयत से भरा हुआ है कि देश में इससे आज का कामकाज धरे रह जाएगा, और लोग इतिहास को बदलने में इस कदर लग जाएंगे कि स्कूल-कॉलेज की किताबें कागज कारखानों में भेज देनी पड़ेंगी, और नई किताबें एक नया मनपसंद इतिहास लेकर आएंगी जिसका कोई महत्व नहीं होगा। लोग पचास बरस पहले निपट चुके गांधी हत्याकांड की दुबारा जांच चाह रहे हैं, क्योंकि वे लोग गांधी के हत्यारों की पूजा करते हैं, और उनके महत्व को स्थापित करना चाहते हैं। फिर तो बहुत सारी और मौतों को, बहुत सी और हत्याओं को भी खोलने की जरूरत पड़ेगी जिनको सुप्रीम कोर्ट तक निपटा चुके हैं, या जिनको हत्या नहीं माना गया था, और प्राकृतिक मौत माना गया था। ऐसी मौतें कांग्रेस के नेताओं की भी हैं, और पहले की जनसंघ, और आज की भाजपा के नेताओं की भी है।
जो इतिहास पसंद न आए उसे बदलने के लिए अब सुप्रीम कोर्ट का ऐसा इस्तेमाल सुप्रीम कोर्ट को भी समझ में आना चाहिए, और उसे ऐसी याचिका के खिलाफ जुर्माना भी लगाना चाहिए, और हमारा मानना है कि इस केस में सुप्रीम कोर्ट ऐसा करेगा भी। लेकिन इससे परे एक दूसरी फिक्र यह है कि स्कूल और कॉलेज की किताबों में इतिहास को जिस तेजी से और जिस तेज पसंद और नापसंद से बदला जा रहा है, उसका आगे चलकर क्या होगा? भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में राजनीतिक दल हमेशा के लिए सत्ता में नहीं रहते, और वे आते-जाते रहते हैं। अगर इतिहास को अपनी पसंदगी या नापसंदगी के बिना पर इस तरह बदला जाएगा, तो हर पांच बरस में हो सकता है कि कोर्स भी बदले, किताबें भी बदलें, सड़कों और चौराहों के नाम भी बदलें, रेलवे स्टेशनों के नाम बदलें, बसों के रंग बदलें, और जाने क्या-क्या बदले। राजनीतिक अधिकार एक बात होते हैं, लेकिन देश में पहले से चली आ रही एक किस्म की व्यक्तिवादी पूजा को खत्म करके दूसरे किस्म की व्यक्तिवादी पूजा शुरू करने से क्या फर्क होगा?
गांधी को लेकर एक तरफ तो सोच यह है कि वे राष्ट्रपिता हैं, और उनको मंचों पर जगह-जगह टांगकर रख दिया जाता है, लेकिन दूसरी तरफ जब गांधी के हत्यारों का महिमामंडन करना होता है, तो गांधी के आज के ऐसे प्रशंसक उस पर मुंह भी नहीं खोलते। यह सिलसिला खतरनाक है, खासकर हत्यारों के महिमामंडन का। आज तो गांधी जा चुके हैं, लेकिन हत्यारी सोच और हत्यारों को बढ़ावा मिलने से और भी बहुत सी हत्याएं होंगी। हमने ऐसी हत्यारी सोच को पुणे और कर्नाटक में हत्या करते देखा भी है। भारत को अगर दुनिया में एक मजबूत देश की तरह उभरना है, तो उसे एक मजबूत कट्टरता के दम पर आगे बढऩे की सोच छोडऩी होगी। केन्द्र सरकार, भारतीय जनता पार्टी, और धर्म के आधार पर राजनीति करने वाली दूसरी ताकतों को यह समझना होगा कि 21वीं सदी में एक बार फिर गांधी हत्या के मुद्दे को इस तरह से उठाने पर चुप्पी रखना ठीक नहीं है। (Daily Chhattisgarh)
- सुनील कुमार

जीएसटी में फिर बदलाव, आजादी की तरह जलसे से लागू की गई कैसी हड़बड़ी?

संपादकीय
30 अक्टूबर 2017


अभी फिर खबर आ रही है कि बहुत सी चीजों पर जीएसटी में बदलाव होने जा रहा है। हैरानी की बात यह है कि यह बदलाव हर पखवाड़े कुछ न कुछ होते चल रहा है, और अब देश भर के छोटे-बड़े व्यापारियों के सामने यही साफ नहीं है कि उनका क्या भविष्य है, उन्हें कैसे इससे उबरना है। और छोटे तो छोड़ दें बड़े व्यापारियों का भी यही हाल है कि किससे जीएसटी वसूलें और किससे उन्हें जीएसटी की वापिसी होगी। यह पूरा सिलसिला यह साफ करता है कि देश में जीएसटी को बिना सही और पर्याप्त तैयारी के अचानक एक हमले की तरह लागू किया गया, और इसे एक प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया गया। आज भाजपा अंदर ही अंदर इस बात को लेकर परेशान भी है कि जीएसटी से परेशान हो चुका पूरा देश अगले चुनाव में किस तरह की प्रतिक्रिया देगा।
देश में दरअसल कुछ महीनों के भीतर दो फैसलों को सर्जिकल स्ट्राईक की तरह जनता पर फेंका गया। सर्जिकल स्ट्राईक आमतौर पर दुश्मन देश पर होती है, लेकिन यहां अपने ही लोगों पर ऐसा हमला बोला गया कि लोग हक्का-बक्का रह गए। पहला हमला नोटबंदी का था जिसमें देश के करोड़ों लोगों ने अपने कई हफ्तों या महीनों का रोजगार खोया, सुख-चैन खोया, सैकड़ों लोगों ने अपनी जान गंवा दी, और लाखों-करोड़ों लोग बिना इलाज रह गए, या दूसरे किस्म की दिक्कतें झेलीं। नोटबंदी को राष्ट्रभक्ति से जोड़ दिया गया, राष्ट्रवाद से जोड़ दिया गया, और लोगों को यह समझाया गया कि जब सरहद पर सैनिक महीनों खड़े रहते हैं तो लोग कुछ घंटों के लिए या कुछ दिनों के लिए एटीएम पर क्यों नहीं खड़े रह सकते?
आज जब देश के सामने यह साबित हो गया है कि नोटबंदी से धेले भर का फायदा नहीं हुआ, बल्कि सरकार का अघोषित खर्च कितना हुआ इसका ठिकाना नहीं है, तब यह समझ नहीं पड़ता कि अपने ही लोगों के ऊपर ऐसी सर्जिकल स्ट्राईक क्यों की गई, और उसकी क्या योजना थी? ठीक इसी तरह पिछली यूपीए सरकार के बनाए हुए जीएसटी को मोदी सरकार ने संसद में इस अंदाज में पेश किया कि यह आजादी की घोषणा के टक्कर का मौका है, और संसद में आधी रात को उसी तरह का आयोजन किया जिस तरह देश को आजादी मिली थी। आज हकीकत यह है कि देश के किसी भी कारोबारी या किसी भी स्वरोजगारी से पूछें, तो जीएसटी किसी तरह की आजादी नहीं, हर किस्म की गुलामी दिख रही है, और लोग यह नहीं समझ पा रहे हैं कि बिना किसी तैयारी के, बिना सोचे-विचारे, बिना कम्प्यूटर और सॉफ्टवेयर तैयार हुए, बिना सरकारी विभागों की तैयारी के, देश को ऐसी अनोखी आजादी का सर्जिकल स्ट्राईक क्यों दिया गया?
आज इन दोनों बातों की चर्चा इसलिए जरूरी है कि केन्द्र सरकार या किसी प्रदेश की सरकार इस तरह का कोई और सर्जिकल स्ट्राईक जनता पर न कर बैठे। लोकतंत्र एक निर्वाचित सरकार को ऐसा हक तो देता है, लेकिन इंसानों को ऐसे हमले झेलने की ताकत बिल्कुल नहीं देता। देश की जनता बहुत बुरी तरह ठगी हुई, टूटी हुई, और लुटी हुई है, और किसी भी सरकार को ऐसा अगला कोई प्रायोगिक सर्जिकल स्ट्राईक बिल्कुल नहीं सोचना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)
- सुनील कुमार

इस देश में साफ-सुथरे अखबार और टीवी चैनलों की बड़ी जरूरत

संपादकीय
29 अक्टूबर 2017


हिन्दुस्तान के आम मीडिया पर राजनीतिक साजिश, भड़काऊ साम्प्रदायिक बातें, बलात्कार, भ्रष्टाचार, और दूसरे किस्म के जुर्म इस कदर हावी हो गए हैं कि घर में बच्चों के सामने टीवी पर खबरों के चैनल चालू करना मुश्किल हो गया है, और जब अखबार घर पहुंचते हैं, तो यह सोचने की जरूरत लगती है कि कौन से पन्ने किससे छिपाए जाएं। ऐसा लगता है कि जिंदगी में सब कुछ बुरा ही बुरा हो रहा है, हर कोई बलात्कारी या यौन शोषक हो गया है, और राजनीति चोरों की जगह हो गई है, बड़ी-बड़ी कुर्सियों पर बैठे लोग साम्प्रदायिक दंगा करवाने, नफरत फैलाने की तनख्वाह पा रहे हैं। लोकतंत्र की एक अंधकारभरी तस्वीर दिखती है, और यह समझ नहीं पड़ता है कि आगे उम्मीद किस बात को लेकर की जाए? मीडिया अपनी सनसनी के जाल में खुद ही उलझते जा रहा है, और अधिक से अधिक पाठक जुटाने के दावे में अखबार गलाकाट मुकाबला कर रहे हैं, और एक-दूसरे को पीछे छोडऩे के लिए सबसे अधिक सनसनीखेज बातों को सबसे पहले सामने रखने का दावा करने में टीवी समाचार चैनलों से सीख ले रहे हैं।
क्या जिंदगी में महज ये ही नकारात्मक बातें रह गई हैं, या कि इसमें कहीं कला, संगीत, साहित्य, और अच्छी बातों की भी जगह है? आज बाजार में एक ऐसे अखबार की संभावना दिखती है जो हर बच्चे और हर महिला के पढऩे लायक हो, जिंदगी के प्रति उम्मीद बंधाता हो, और हो सकता है कि महिला-बच्चों के अलावा आदमी भी ऐसे अखबार को पढऩा चाहें। ऐसे समाचार चैनल भी हो सकते हैं जो कि भयानक दरिंदगी वाले हिंसक जुर्म के लहू टीवी के बाहर कमरों तक न फैलाएं, और दुनिया में हो रही अच्छी बातों को भी लोगों को दें। हमारा यह मानना है कि इंटरनेट पर सब कुछ उपलब्ध होने के बाद भी प्रिंट, टीवी-रेडियो, डिजिटल-नेट, और मोबाइल पर आधारित पत्रकारिता की एक गुंजाइश बाकी है। अगर लोगों को ऐसे भरोसेमंद संपादक मिलें जो कि जनता की हित के, और जनता की रूचि के, दोनों शर्तों को पूरा करने वाले समाचार उन्हें दे सकें, तो लोग उन्हें लेना चाहेंगे। आज हालत यह है कि जनहित के समाचार अखबार की बिक्री या टीवी चैनलों का टीआरपी नहीं बढ़ाते, और जनरूचि को बाजारू मीडिया तेजी से अधिक से अधिक विकृत करते चलना चाहता है ताकि  उसे अपनी गंदगी परोसना या बेचना आसान हो जाए।
मीडिया के कारोबार में जो लोग हैं, उन्हें हिन्दुस्तान के थके हुए लोगों को देखकर यह सोचना चाहिए कि ऐसा कौन सा अखबार बनाकर घरों में भेजा जा सकता है जिससे लहू न टपकता हो? यह कारोबारी नजरिए से भी एक अच्छा कामयाब नुस्खा हो सकता है, क्योंकि बहुत से लोग अपने परिवार को आज भी मीडिया की हिंसा से बचाना चाहते हैं, और उन्हें दुनिया से जोड़े भी रखना चाहते हैं। दुनिया में जो हो रहा है उससे अछूता नहीं रहा जा सकता, लेकिन आज का हिन्दुस्तानी मीडिया इस हो रहे के एक बहुत छोटे हिस्से को ही मानो सब कुछ दिखाता हुआ अपने खुद के पापी पेट को भरने में लगा हुआ है। इस बारे में पाठकों और दर्शकों को भी आवाज उठानी चाहिए, ताकि कोई न कोई समझदार कारोबारी लोगों की इस जरूरत को पूरा कर सके। जिस तरह मनोरंजन के टीवी चैनलों पर सास-बहू के झगड़े दिखाने वाले मानसिक हिंसा के अंतहीन सीरियलों के बीच कुछ साफ-सुथरे कार्यक्रम भी कभी-कभी देखने मिलते हैं, उसी तरह कोई ऐसा अखबार हर शहर या प्रदेश में बिक सकता है जो कि इस दावे के साथ घर पहुंचे कि उसमें कुछ भी नकारात्मक नहीं है, और जिनको नकारात्मक खबरों को पढ़े बिना डकार नहीं आती, वे कोई दूसरा अखबार और खरीद लें, कोई दूसरा चैनल ढूंढ लें जो कि हिंसा और सेक्स को टीवी से बहाकर पूरे घर को गीला न कर देता हो। (Daily Chhattisgarh)
- सुनील कुमार

जिद और तैश में कांग्रेस की सीडी रणनीति आत्मघाती

संपादकीय
28 अक्टूबर 2017


कल सुबह से शुरू हुए छत्तीसगढ़ के एक सेक्स-सीडी कांड पर हमने कल भी इसी जगह लिखा, और उसके कई पहलुओं पर साफ-साफ लिखा। लेकिन चौबीस घंटे गुजरने पर और कांग्रेस, भाजपा, जोगी, और राज्य सरकार का रूख इस मामले पर  सामने आने के बाद, इस मामले में गिरफ्तार पत्रकार विनोद वर्मा का टीवी कैमरों के सामने चिल्लाकर कहा हुआ सामने आने के बाद, और कांग्रेस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष द्वारा यह सीडी दिखाने और देने के बाद अब कांग्रेस और भाजपा ने अपनी-अपनी पार्टी पोजिशन साफ कर दी है। जैसी कि भाजपा से उम्मीद थी वह अपने मंत्री के साथ खड़ी दिख रही है, सरकार भी मंत्री के साथ है, जोगी कांग्रेस को यह मौका मिला है कि अब तक की सारी सीडी-तोहमतों को धोकर वह अब दूसरों पर आरोप लगा सके, और कांग्रेस पार्टी ने इस तोहमत को अपने ऊपर ओढ़ लिया है, जो कि कुछ हैरानी की बात है।
हम प्रदेश की राजनीति के हिसाब से देखें तो यह लगता है कि एक तरफ जब मुख्यमंत्री अपनी सरकार के आखिरी तीन सौ दिन काम के मानकर जिला कलेक्टरों को चेतावनी के साथ लक्ष्य दे रहे हैं, उस वक्त एक अच्छे-भले चलते विपक्ष के मुखिया अपने आपको एक घटिया तौर-तरीके से खुद होकर जोड़ रहे हैं। कल सुबह जब छत्तीसगढ़ पुलिस ने गाजियाबाद में पत्रकार विनोद वर्मा को, खुद विनोद वर्मा द्वारा घोषित, एक अश्लील वीडियो के आरोप में गिरफ्तार किया, तब तक कांग्रेस पार्टी पर कोई तोहमत नहीं लगी थी। लेकिन कुछ देर के भीतर ही भूपेश बघेल ने अपने आपको इस तोहमत का हकदार खुद ही बनाते हुए पेश कर दिया, और सरकार पर इसे लेकर हमला बोल दिया। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि इसी जगह हम कई बार लिख चुके हैं कि छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी देश में राष्ट्रीय स्तर पर चलने वाली कांग्रेस पार्टी के मुकाबले बहुत बेहतर है। भूपेश बघेल लगातार सरकार के खिलाफ हल्ला बोल रहे थे, और अभियान चला रहे थे। किसी भी राज्य में तेरहवें बरस में उस विपक्ष के खड़े रहने की अपनी मुसीबतें रहती हैं जिस पार्टी की केन्द्र में भी सरकार न रह गई हो। फिर भी भूपेश बघेल एक मजबूत विपक्ष चला रहे थे। इस बात को बार-बार दोहराने और लिखने का जिक्र यहां इसलिए जरूरी है कि आगे लिखी हुई बातों को उसी संदर्भ में समझने की जरूरत है।
हमने कल भी इस बात को लिखा था कि बंद कमरे में अगर आपसी सहमति से दो वयस्क लोगों के बीच सेक्स हो रहा है, तो उसमें जुर्म तभी दाखिल होता है जब कोई चोरी-छुपे इसकी रिकॉर्डिंग करता है। ऐसे मामले में एक जुर्म से हासिल एक सेक्स-वीडियो का तब तक कोई राजनीतिक या कानूनी, या सार्वजनिक महत्व नहीं हो सकता, जब तक इस सेक्स के पीछे ओहदे की ताकत न हो, या कि ब्लैकमेलिंग जैसी कोई नौबत न हो, किसी महिला या नाबालिग का शोषण न हो। ऐसे में भाजपा की सत्ता के तेरहवें बरस के अंत में तमाम दूसरे मुद्दों को छोड़कर अगर भूपेश बघेल ऐसे एक वीडियो पर इतना बड़ा दांव लगा रहे हैं, तो यह हमारे हिसाब से विपक्ष का दीवालियापन है। राज्य में भाजपा की सरकार ने अपने तीन कार्यकाल में विरोध के लायक अनगिनत मुद्दे मीडिया और विपक्ष को जुटाकर दिए हैं। इनमें से बहुत से मुद्दों पर कांग्रेस लगातार सड़क और मीडिया पर लड़ाई लड़ते भी आई है। लेकिन इस लड़ाई में ऐसे किसी वीडियो की जगह हो सकती है, ऐसा सोचना भी मुश्किल था। ऐसा वीडियो सरकार में कुछ शर्मिंदगी ला सकता है, पार्टी संगठन के भीतर थोड़ी सी शर्मिंदगी आ सकती है, लेकिन उससे परे इसका क्या कानूनी दर्जा है? और फिर कांग्रेस पार्टी के सामने अपनी खुद की अनगिनत मिसालें हैं। उसने अपने राष्ट्रीय प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी को ऐसे ही एक सेक्स-वीडियो के बाद प्रवक्ता पद से हटा दिया था, लेकिन कुछ महीनों के बाद उन्हें फिर वही जिम्मा दे दिया गया। सुप्रीम कोर्ट के एक कामयाब वकील सिंघवी को अगर इस सेक्स-वीडियो के पीछे किसी साजिश की गंध आती, तो वे अदालत में लोगों को घसीट सकते थे, लेकिन उन्होंने इसे गुजर जाने दिया, और आज वे रोज नेशनल टीवी पर कांग्रेस की वकालत करते दिखते हैं।
छत्तीसगढ़ कांग्रेस को अपने खुद के भले के लिए मुद्दों की लड़ाई लडऩी चाहिए। जिस तरह से उसने एक बेनाम-गुमनाम सेक्स-वीडियो को लेकर उसे इतना बड़ा मुद्दा बनाया है कि वह पार्टी के व्यापक हितों के खिलाफ जाएगा, और राज्य के लोकतंत्र में विपक्ष इससे कमजोर होगा। ऐसे सेक्स-वीडियो से किसी सरकार या पार्टी के लिए शर्मिंदगी तभी होती है जब वे हवा में तैरते हुए फैल जाते हैं। जब लोग इन्हें पेश करते हैं, तो ये सवाल उठते हैं कि इसमें कुछ गैरकानूनी भी है, या कि ये सामाजिक मान्यताओं के पैमानों पर महज अनैतिक कहे जाने वाले हैं? यह सोचना पाखंड से परे नहीं होगा कि लोगों का इस किस्म का कोई सेक्स जीवन नहीं होता, बहुत से लोगों का बंद कमरे के भीतर ऐसा जीवन होता है, और जुर्म करते हुए, निजता भंग करते हुए ऐसी रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल किसी भी इज्जतदार पार्टी को तब तक नहीं करना चाहिए जब तक कि इस रिकॉर्डिंग के भीतर कोई जुर्म होते न दिख रहा हो। कांग्रेस पार्टी ने छत्तीसगढ़ में इस मुद्दे पर आंदोलन की घोषणा की है, लोकतंत्र में कोई भी पार्टी किसी भी मुद्दे पर, या कि बिना मुद्दे भी, सड़कों पर उतर सकती है, लेकिन छत्तीसगढ़ कांग्रेस तैश और जिद में एक गलत काम करने जा रही है, इससे पार्टी प्रदेश अध्यक्ष का कम, और बाकी पार्टी का अधिक नुकसान होगा। आखिर में यह भी सोचने की जरूरत है कि ऐसी सेक्स-सीडी में जो महिला दिख रही है, उसकी इज्जत उछालने का हक किसको मिल सकता है? पहले तो उसके निजी पलों की वीडियो रिकॉर्डिंग किसी गुमनाम ने की, और अब नामी लोग उसके वीडियो का प्रचार कर रहे हैं क्योंकि उसमें का आदमी एक मंत्री सरीखा दिखने का आरोप है। इस राजनीतिक आरोपबाजी में उस महिला की क्या गलती है जो कि उसकी वीडियो इस तरह फैलाई जा रही है? क्या नेताओं से परे आम लोगों को कोई हक नहीं हैं? भूपेश बघेल को ठंडे दिल से, और अपनी पार्टी के हित में अपनी रणनीति पर फिर से सोचना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)
- सुनील कुमार

सेक्स-सीडी और विनोद वर्मा की गिरफ्तारी से उठे सवाल

संपादकीय
27 अक्टूबर 2017


छत्तीसगढ़ में बरसों तक पत्रकार रहे, और देश के बड़े प्रतिष्ठित मीडिया में काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार विनोद वर्मा को कल आधी रात के बाद दिल्ली राजधानी क्षेत्र के उनके घर पर छत्तीसगढ़ पुलिस ने दिल्ली और गाजियाबाद की पुुलिस के साथ जाकर उनको गिरफ्तार किया। उन पर यह आरोप लगाया गया है कि छत्तीसगढ़ मेें किसी प्रमुख व्यक्ति को ब्लैकमेल करने के लिए दिल्ली से आए टेलीफोन की जांच में यह पता लगा कि उन्होंने ऐसी सेक्स-सीडी कॉपी करवाई है। उन पर सीधे कोई आरोप नहीं लगा है, लेकिन सीडी कॉपी करने वाले से जानकारी मिलने का दावा करते हुए छत्तीसगढ़ पुलिस ने यह गिरफ्तारी की है, और आज दोपहर मीडिया को यह बताया है कि विनोद वर्मा के घर से ऐसी पांच सौ सीडी मिली हैं। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में आज सुबह प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल ने इसे लेकर राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं, और उनकी तरफ से यह सीडी भी जारी की गई है जिसमें राज्य के एक मंत्री के सेक्स का आरोप है।  इस आरोप के जवाब में प्रदेश के एक वरिष्ठ मंत्री राजेश मूणत ने गंदी राजनीति का आरोप लगाते हुए जांच की मांग की है, और इस सीडी को फर्जी बताया है। उनके साथ कुछ और मंत्री तथा भाजपा प्रदेशाध्यक्ष भी मीडिया के सामने बैठे।
अब इस मामले के कई पहलू हैं जिन्हें समझने की जरूरत है। विनोद वर्मा का पत्रकारिता का लंबा इतिहास है, और वे अपने पूरे कार्यकाल में बहुत ही अच्छे पत्रकार गिने जाते रहे। (यहां यह खुलासा करना जरूरी है कि टिप्पणी लिखने वाले संपादक के साथ भी विनोद वर्मा ने बरसों काम किया हुआ है, और उनसे इस संपादक के बहुत मधुर संबंध रहे हैं। विनोद वर्मा की गिरफ्तारी से हमें तकलीफ भी हुई है, और उस तकलीफ के साथ तटस्थ होकर लिखने की यह कोशिश है।) हाल के महीनों में विनोद वर्मा के बारे में ऐसी सूचना भी रही है कि वे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल के लिए राजनीतिक सलाह-मशविरे का काम भी कर रहे थे और वे अनौपचारिक लेकिन लगभग घोषित रूप से भूपेश बघेल के लिए कुछ न कुछ काम करते रहते थे। अब यहां पर इस बात में फर्क कर पाना कुछ मुश्किल है कि हाल के महीनों में वे एक पेशेवर पत्रकार के रूप में काम कर रहे थे, या कि राजनीतिक सलाहकार या रणनीतिकार के रूप में ये भूपेश बघेल से जुड़े हुए थे, जिनके कि वे रिश्तेदार भी हैं।
इससे परे एक दूसरा सवाल यह उठता है कि छत्तीसगढ़ पुलिस को कल दोपहर बाद इस मामले को लेकर एक शिकायत मिलना बताया गया है। फिर रात तक इस पुलिस ने दिल्ली में टेलीफोन नंबर से दुकानदार की जांच करके वहां से विनोद वर्मा का पता हासिल करके उनकी गिरफ्तारी की बात कही है। यह भी कहा है कि एक दूसरे मामले की जांच में छत्तीसगढ़ पुलिस पहले से दिल्ली गई हुई थी, और उसने इस मामले में इसलिए कार्रवाई की क्योंकि किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा के खिलाफ ऐसा लीक हो जाने का खतरा था। यहां पर पुलिस की बात कुछ अटपटी लगती है क्योंकि न तो रिपोर्ट में किसी व्यक्ति का नाम लिखाया गया था कि किसकी प्रतिष्ठा खराब होगी, और न ही छत्तीसगढ़ पुलिस ऐसी तेज रफ्तार कार्रवाई के लिए जानी जाती है कि रिपोर्ट लिखाने के कुछ घंटों के भीतर वह दिल्ली में इतनी जांच कर लें, और देश के एक चर्चित पत्रकार/या पत्रकार रहे हुए, विनोद वर्मा के घर पर आधी रात के बाद छापा मारकर उन्हें इस तरह से गिरफ्तार करे। यह सिलसिला लोगों के मन में भरोसा पैदा नहीं कर पा रहा है।
अब इस मामले का एक और पहलू समझना जरूरी है जिसके बारे में हमारी अपनी मजबूत राय है। हम ऐसी किसी सेक्स-रिकॉर्डिंग के इस्तेमाल के सख्त खिलाफ हैं जिसमें दो वयस्क अपनी सहमति से कुछ करते दिख रहे हैं। इस रिकॉर्डिंग को देखकर ऐसा ही लगता है, और इसका कोई भी राजनीतिक इस्तेमाल, कोई भी सार्वजनिक इस्तेमाल अपने आपमें एक गंभीर अपराध होना चाहिए। हमें छत्तीसगढ़ के किसी मंत्री के इसमें होने या न होने से कोई लेना-देना नहीं है। इसमें चूंकि कोई जुर्म होते नहीं दिख रहा है, इसलिए किसी भी आदमी और किसी भी औरत की इज्जत को खराब करने वाली ऐसी रिकॉर्डिंग अपने आपमें किसी जुर्म से ही हासिल हो सकती है, और अगर इसके लोग सरकारी पदों पर हैं, या कि सार्वजनिक जीवन में हैं, तो भी वे कोई जुर्म नहीं कर रहे हैं। राजनीति या किसी और दायरे में ऐसी सेक्स-रिकॉर्डिंग की कोई जगह नहीं होनी चाहिए, और ऐसी रिकॉर्डिंग पर किसी राजनीतिक जवाब के बजाय इस पर जवाब मांगना चाहिए कि ऐसी रिकॉर्डिंग का श्रोत क्या है।
विनोद वर्मा की गिरफ्तारी पर कुछ घंटों के भीतर ही देश का मीडिया उबल पड़ा है क्योंकि वे एक प्रमुख पत्रकार हैं/रह चुके हैं। उनको खुद को भी यह खुलासा करना चाहिए कि वे अभी पत्रकारिता के पेशे में हैं, या राजनीतिक काम कर रहे हैं। पत्रकारिता करते-करते राजनीति में जाना कोई अटपटा काम नहीं है, और एमजे अकबर से लेकर बहुत से दूसरे पत्रकार समय-समय पर ऐसा करते रहे हैं। पत्रकारिता करते-करते राजनीतिक सलाहकार बनना भी कोई नई बात नहीं है, बहुत से लोग ऐसा भी करते हैं। लेकिन राजनीति और पत्रकारिता इन दोनों के सम्मान के लिए यह जरूरी है कि ये दायरे बिल्कुल अलग-अलग और बिल्कुल स्पष्ट होने चाहिए।
यह मामला बहुत बड़ा है, और इस पर विनोद वर्मा, भूपेश बघेल, कांग्रेस पार्टी, और छत्तीसगढ़ सरकार इन सबको अपना-अपना पक्ष स्पष्ट तथ्यों और सुबूतों के साथ रखना चाहिए। अभी हम इस मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहे हैं, लेकिन यह पूरा सिलसिला बहुत सी सफाई जरूर मांगता है। 

हत्या-राजद्रोह में हरियाणा जेल में बंद रामपाल के प्रवचन सरगुजा जेल में !

संपादकीय
26 अक्टूबर 2017


छत्तीसगढ़ के सरगुजा में अंबिकापुर जेल में एक ऐसे स्वघोषित संत के प्रवचनों का कार्यक्रम रखा गया जो खुद हत्या और राजद्रोह के मामलों का सामना करते हुए हरियाणा जेल में बंद है। रामपाल नाम के इस आदमी ने पिछले बरस अपने किलेनुमा आश्रम में पुलिस और अफसरों को घुसने से रोकने के लिए जिस तरह की हथियारबंद फौजी तैनाती की थी, उसे देखते हुए सरकार को सैकड़ों जवानों को वहां तैनात करना पड़ा, और कई दिन के घेरे-डेरे के बाद यह आदमी वहां से बाहर निकला। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि उस वक्त हमने यह रिपोर्ट भी छापी थी कि किस तरह छत्तीसगढ़ से भी बहुत से लोग इस आदमी की भक्ति में जाकर वहां पर घेरेबंदी में फंस गए थे, उसके बाद दर्जनों छत्तीसगढ़ी लोग जेल में भी बंद थे, और अब जमानत पर छूटे हुए हैं।
हत्या और राजद्रोह के केस के बावजूद ऐसे आदमी के वीडियो प्रवचन जेल के कैदियों को सुनाना अपने आपमें एक जुर्म से कम नहीं है, और देखना है कि राज्य सरकार इस पर क्या कार्रवाई करती है। छत्तीसगढ़ में इसके पहले भी अपने आपको बापू कहलाने वाले आसाराम नाम के, बलात्कार के आरोप में जेल में बंद, आदमी की किताबों को स्कूलों में बांटते हुए उसके भक्त पकड़ाए थे, और सरकारी स्कूलों में आसाराम के भक्तों ने सामान्य ज्ञान की परीक्षा भी करवा दी थी। इसका मतलब यही है कि सरकार के ढांचे में संवेदनशीलता की कमी है जो कि यह समझने ही नहीं देती कि जिन लोगों पर बलात्कार, हत्या, राजद्रोह जैसे मुकदमे चल रहे हैं, उन्हें महान मानना तब तक रोककर रखना चाहिए, जब तक कि वे उन मामलों से बाइज्जत बरी न हो जाएं।
आज इस देश में किसी भी धर्म से जुड़े हुए लोग, आध्यात्म की दुकान चलाते हुए लोग जैसे कुकर्म कर रहे हैं, उससे भी न आम लोगों को अधिक अक्ल आते दिख रही है, और न ही सरकारी लोगों को इससे कोई परहेज दिख रहा है। अभी कुछ ही हफ्ते पहले दिल्ली में एक पुलिस चौकी के कुछ अफसरों को सस्पेंड किया गया था जिसमें राधे मां नाम की विवादास्पद, धार्मिक दिखती एक महिला थानेदार की कुर्सी पर बैठी थी, और थानेदार हाथ जोड़े उसके बगल में खड़ा हुआ था। लोगों को यह भी याद होगा कि किस तरह राम रहीम नाम का एक और बलात्कारी बाबा एयरपोर्ट पर आते-जाते अपने पैरों पर बिछे हुए सुरक्षा कर्मचारियों के साथ तस्वीर खिंचवा रहा था। जब राम रहीम को अदालत ने दो बलात्कार के लिए दस-दस बरस की दो सजाएं सुना दी थीं तब भी जेल जाते इस बाबा का सूटकेस सरकारी वकील उठाए चल रहा था, और उसे बाद में हरियाणा सरकार ने इस ओहदे से हटा दिया। हमारा ख्याल है कि सरकार में बैठे हुए लोग अगर ऐसे भयानक जुर्म के आरोप में जेल में बंद लोगों का ऐसा सम्मान करते हैं, तो वे अपनी सरकारी जिम्मेदारी के साथ इंसाफ नहीं कर सकते। ऐसे लोगों को तुरंत इसलिए हटाना चाहिए कि इनकी एक तो अक्ल ही कम दिखती है, दूसरा इनको सरकारी नियमों और जिम्मेदारी की इज्जत करने की फिक्र नहीं दिखती।
धर्म और आध्यात्म के नाम पर जितना भी जुर्म होता है, उसके पीछे सत्ता में बैठे हुए लोगों का ऐसे पाखंडियों को महत्व देना एक बड़ा कारण होता है। छत्तीसगढ़ में हम ऐसे दूसरे बाबाओं को भी देख चुके हैं जिनके सम्मान में रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर जिला जज से लेकर बड़े-बड़े पुलिस अफसर तक लेट जाते हैं, और फिर बाद में अपनी सरकारी अधिकार का बेजा इस्तेमाल ऐसे बाबाओं के महिमामंडन के लिए करते हैं। यह भी याद रखने की जरूरत है कि धर्म और आध्यात्म के बहुत सारे चोगे, वेटिकन से लेकर ब्रिटेन के मदरसों तक, और हिन्दुस्तान के मठ-मंदिरों से लेकर आश्रमों तक उस वक्त आनन-फानन उतर जाते हैं जब उन्हें बलात्कार करने का मौका मिलता है। समाज में जब सत्ता पर बैठे लोग पाखंडियों का सम्मान करते हैं, तो कमअक्ल आम लोग भी ऐसे लोगों के झांसे में आ जाते हैं, और अपने बच्चों को भी ऐसे बलात्कारियों की सेवा में झोंक देते हैं। यह सिलसिला कड़ी कानूनी कार्रवाई से रोका जाना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)
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कामयाबी और शोहरत के मिलेजुले जानलेवा नशे की एक मिसाल, और उसकी ठीक उलटी मिसाल भी

संपादकीय
25 अक्टूबर 2017


कामयाबी का नशा ऐसा होता है कि वह सिर चढ़कर बोलता है। बहुत से लोग कहते हैं कि कामयाबी पाना जितना मुश्किल होता है उससे अधिक मुश्किल होता है सिर पर चढ़ बैठी कामयाबी पर काबू रख पाना। दूसरी तरफ कुछ ऐसा ही शोहरत के साथ भी होता है, बहुत से लोग शोहरत को जिंदगी भर की दौलत मानकर उसके नशे में बदसलूकी पर उतर आते हैं। और जब कामयाबी और शोहरत इन दोनों का मेल होता है, तो दो अलग-अलग और अटपटे नशों के मेल की तरह यह बहुत अधिक घातक भी हो सकता है। इन दोनों का नशा जब एक साथ चढ़े, तब पांव सम्हाल पाना बड़ा मुश्किल होता है। सार्वजनिक जीवन में जो लोग रहते हैं, वे पूरे वक्त मानो घरों में सजने वाले एक्वेरियम की तरह, उसके भीतर मछली की तरह जीते हैं, और ऐसे नशे में लडख़ड़ाते हुए पांव लोगों को साफ दिखने लगते हैं।
यह चर्चा जरूरी इसलिए है कि जिंदगी के अलग-अलग दायरों में बहुत से लोग कामयाब होते हैं, और उनमें से कुछ लोग मशहूर भी हो जाते हैं जिनकी शोहरत चारों तरफ फैलने लगती है। ऐसे लोगों का अपना दायरा भी ऐसा हो जाता है जो कि उनके पांव जमीन पर नहीं पडऩे देता। और दुनिया की कुछ बड़ी-बड़ी टूरिस्ट जगहों पर जिस तरह आसमान को छूते हुए रोलर-कोस्टर रहते हैं, उन पर ऊपर जाते हुए जैसा लगता है, कुछ वैसा ही नशा कामयाबी और शोहरत के मिलने से बनता है। लेकिन पूरी ऊंचाई पर पहुंचने के बाद रोलर-कोस्टर की सीटों पर बंधे हुए लोग जिस रफ्तार से धरती की तरफ नीचे गिरते हैं, कुछ वैसा असल जिंदगी में भी होता है। लोगों को कामयाबी और शोहरत के वक्त अपना सिर जिस तरह काबू में रखना चाहिए और अपने पैर जिस तरह जमीन पर टिकाए रखना चाहिए, इसकी एक अच्छी मिसाल पिछले दिनों सामने आई है।
हिन्दुस्तानी टीवी पर कुछ बरसों के भीतर कॉमेडियन कपिल शर्मा की शोहरत इस रफ्तर से आसमान पर पहुंची, और कामयाबी ने उनको रातों-रात ऐसा बना दिया कि वे 15 करोड़ रूपए इंकम टैक्स देने की ट्वीट करने लगे। लेकिन इस नशे के साथ एक अंतरराष्ट्रीय उड़ान पर उन्होंने अपने साथी कलाकारों से जिस तरह की बदसलूकी की, उससे वे धड़ाम से जमीन पर आ गिरे, और आज की तारीख में कोई उन्हें छूने को भी तैयार नहीं दिखता। सबसे बड़ी कामयाबी के बावजूद बहुत से साथी कलाकार उनके साथ काम करने को तैयार नहीं हैं। राजनीति में भी ऐसा ही होता है, कई लोग चुनावी कामयाबी पाते हैं, और शोहरत इतनी मिलती है कि लोग उनको पूरी जिंदगी के लिए उस ओहदे का हकदार मानने लगते हैं। और ऐसे ही वक्त पर लोग बदगुमानी और बददिमागी में गलत फैसले लेने लगते हैं, उन्हें लगता है कि वे अकेले सबसे अधिक कामयाब हैं। यह बात सही है कि कामयाबी के साथ बहस नहीं होती, और शोहरत का शोर सही बातों को सुनने की ताकत भी छीन लेता है। ऐसे में लोग अपने आपको हमेशा का बादशाह मानकर मनमानी करने लगते हैं। ऐसे लोगों के लिए यह बात याद  पड़ती है जो कि कोई समझदार बुजुर्ग कभी लिख गया है-
तुमसे पहले वो जो इक शख्स यहां तख्तनशीं था,
उसको भी अपने खुदा होने पे इतना ही यकीं था...
हमारी यह नसीहत बहुत अधिक काम की नहीं होती है, क्योंकि कबीर की जुबान में जिन्हें निंदक नियरे राखिए की नसीहत दी गई थी, उसके चापलूसों और मुसाहिबों ने सबसे पहले अपने घेरे से निंदकों को ही मार-मारकर भगाया था। जब तक ऐसे लोग करीब रहें, तब तक बददिमागी घेरे में दाखिल नहीं होती है। ऐसे सवालिया लोगों को निकालने के बाद जो बचता है, वह कामयाबी और शोहरत के मिले-जुले जानलेवा नशे को बढ़ाने वाला रहता है। हमने ऊपर कपिल शर्मा की मिसाल दी है, लेकिन उसकी ठीक उलटी भी एक मिसाल हमारे पास है, जो कि उससे भी बड़ी है। आसमान को छूती हुई कामयाबी, और पूरी धरती पर फैली हुई सी शोहरत ने मिलकर भी अमिताभ बच्चन को बददिमाग बनाने में कामयाबी नहीं पाई है। अमिताभ के मुंह से किसी के बारे में बदजुबानी किसी ने सुनी नहीं होगी, उनको बदसलूकी करते किसी ने देखा नहीं होगा। इसलिए सीखना हो तो इन दोनों मिसालों को देखकर कुछ सीखा जा सकता है।
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दलबदल के बाद कुछ बरस नई पार्टी से चुनाव लडऩे पर रोक लगाने का कानून बने...

संपादकीय
24 अक्टूबर 2017


गुजरात में चुनाव करीब आते ही लोगों की खरीद-बिक्री शुरू हो गई है। पहला आरोप भाजपा पर लगा है कि उसने कुछ सामाजिक आंदोलनकारियों को खरीदने की कोशिश की, और गुजरात के सबसे बड़े आंदोलनकारी के दो करीबी लोगों ने भाजपा पर ऐसे आरोप लगाए और लाखों के नोट पेश किए। दूसरी तरफ हिमाचल, जहां कि चुनाव की घोषणा हो गई है, वहां पर भ्रष्टाचार के लिए कुख्यात सुखराम अपने बेटे सहित भाजपा में आ गए हैं। जब वे कांगे्रस के केंद्रीय मंत्री थे, तो वे भ्रष्टाचार के बड़े आरोप में बड़ी नगदी सहित पकड़ाए थे, और उस वक्त भाजपा ने इस भ्रष्टाचारी के खिलाफ कई दिन तक संसद चलने नहीं दी थी। अब वही सुखराम भाजपा में राम-राम जपते हुए सुख पाने के लिए पहुंच गए हैं, और ऐसा आसार है कि उनका बेटा विधानसभा चुनाव में भाजपा की टिकट भी पा जाएगा।
देश में कई किस्म के चुनाव सुधारों पर चर्चा होती है, लेकिन वह चर्चा चुनावी खर्च को लेकर, अंधाधुंध पैसे बांटने को लेकर होती है। एक पहलू पर अभी तक चर्चा नहीं हुई है कि दलबदलुओं को नई पार्टी में कितने दिनों तक चुनाव लडऩे से रोकना चाहिए। आज देश में दलबदल की हालत यह हो गई है कि गुजरात में कांगे्रस का एक नेता इस्तीफा देता है, और अगले ही दिन भाजपा उसको राज्यसभा का अपना प्रत्याशी बनाकर, जिताकर संसद भेज देना चाहती है, उसका राज्यसभा का नामांकन भरवाती है, और उसे अहमद पटेल के मुकाबले खड़ा करती है। नतीजा यह होता है कि देश भर में लोगों को यह समझ आता है कि किसी पार्टी को लात मारकर रातों-रात किसी दूसरी पार्टी से सांसद या विधायक बना जा सकता है। ऐसे दलबदल के दलदल को घटाने के लिए यह जरूरी है कि पार्टी बदलने के बाद कुछ बरसों तक विधानसभा और लोकसभा के चुनाव लडऩे पर रोक लगे, और यह रोक ऐसे हर चुनाव तक आगे बढ़ाना चाहिए जो कि पार्टियों के चुनाव चिन्ह पर लड़े जाते हैं। जिन लोगों को दलबदल करना हो वे चुनाव के इतने पहले यह काम कर लें कि उससे उनकी पार्टी को होने वाला नुकसान सुधारा जा सके।
भाजपा ने पूरे देश में कांगे्रसमुक्त भारत का जो नारा दिया है, उस पर बनने वाला एक मजाक यह भी है कि भारत कांगे्रसमुक्त बने या न बने, भाजपा जरूर कांगे्रसयुक्त हो गई है। लोग आंकड़े गिनाते हैं कि किस राज्य में भाजपा के आज के कितने सांसद और कितने विधायक कांगे्रस से ताजा-ताजा आए हुए हैं। यह हो सकता है कि भाजपा को आज पूरे देश में कांगे्रस को खत्म करने की हड़बड़ी हो, लेकिन इस बात का क्या जवाब हो सकता है कि दस-बीस बरस से जिस गुजरात में भाजपा राज कर रही है, और जहां से प्रधानमंत्री और भाजपाध्यक्ष दोनों ही आते हैं, वहां रातोंरात कांगे्रस के विधायक से इस्तीफा दिलवाकर उसे भाजपा का राज्यसभा उम्मीदवार बनाया जाए। खुद भाजपा में इतने बरसों की राजनीति के बाद इस प्रदेश में सैकड़ों नेता होने चाहिए थे, और उन सबको छोड़कर, कांगे्रसाध्यक्ष के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल को हराने की नीयत से इस तरह का दलबदल और कल के कांगे्रसी को आज भाजपा उम्मीदवार बनाना अगर जायज माना जा सकता है, तो हमारा मानना है कि चुनाव आयोग को, सुप्रीम कोर्ट को इसे नाजायज बना देने का काम करना चाहिए। जब संसद और राजनीतिक दल यह काम न करते हों, तो चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट को संसद के सामने यह सवाल खड़ा तो करना चाहिए ताकि शर्म खाकर सरकार और संसद ऐसा कानून बनाने को मजबूर हों। पूरे देश में ऐसे दलबदलुओं के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन चलना चाहिए कि ताजा-ताजा दलबदलू हर हाल में हराया जाए। पता नहीं हमारी यह अतिआशावादी सोच किसी किनारे पहुंच पाएगी या नहीं, लेकिन दुनिया का हर कानून किसी न किसी आशावादी सोच के बाद ही बनता है।
पैसों और ओहदों से, टिकटों और दूसरे किस्म के लालच या धमकी से दलबदल एक बहुत ही शर्मनाक परंपरा है और लोकतंत्र में इसे जमकर धिक्कारना चाहिए।
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अतीत के साथ वर्तमान व्यतीत करने की दरियादिली सीखें...

23 अक्टूबर  2017

मीडिया में दिलचस्पी रखने वाले लोगों के लिए इन दिनों ट्विटर पर एक दिलचस्प झगड़ा चल रहा है। लंबे समय तक एनडीटीवी पर काम करने वाली, और उसकी सबसे दिग्गज टीवी जर्नलिस्टों में से एक बरखा दत्त एनडीटीवी पर टूट पड़ी हैं। और महज अपने निकल जाने के बाद के एनडीटीवी पर नहीं, बल्कि अपने वहां रहने के वक्त की बातों को लेकर भी। दूसरी तरफ अभी एनडीटीवी में काम कर रहीं कुछ दूसरी महिला जर्नलिस्ट ऐसी हैं जो कि बरखा दत्त के सितारा दर्जे के सामने कभी उभर नहीं पाई थीं, और उनमें से कुछ ने अभी एनडीटीवी की तरफ से मोर्चा सम्हाला है। कुछ लोग चटखारे लेकर इस झगड़े को देख रहे हैं क्योंकि भारत में एनडीटीवी के विरोधियों का एक बड़ा तबका ऐसा है जो कि इसे और गहरी मुसीबत में देखने की हसरत रखता है, और वह बरखा दत्त को री-ट्वीट करने में लगा हुआ है।
इस पर कल जब मैंने यह ट्वीट किया कि इन दोनों खेमों सहित बाकी लोगों को भी यह सीखना चाहिए कि अपने भूतकाल के साथ कैसे जिया जाए, भूतपूर्व मालिक के साथ, भूतपूर्व कर्मचारी के साथ, भूतपूर्व सहयोगियों के साथ, तो इस ट्वीट पर एक बहुत ही दिलचस्प इंसान की तरफ से तारीफ का एक शब्द पोस्ट हुआ जिसका कि इस झगड़े से, या कि राजनीति से कोई लेना-देना नहीं दिखता है। विराट कोहली ने इस ट्वीट के जवाब में तारीफ का एक शब्द लिखा, और वह शब्द शायद बरखा और उसकी भूतपूर्व सहयोगियों के लिए नसीहत का एक अधिक भारी-भरकम ट्वीट था, मेरे ट्वीट के मुकाबले।
दिक्कत यह है कि लोग अपने भूत के साथ जीने का शऊर नहीं रखते। भूतपूर्व पति-पत्नी या भूतपूर्व प्रेमी-प्रेमिका एक-दूसरे से हिसाब चुकता करने के लिए किसी भी हद तक चले जाते हैं। मध्यप्रदेश में बहुत पहले एक बड़ा दिलचस्प मामला था जब एक चर्चित आदमी ने अपनी बीवी को तलाक दे दिया था, और उसके बाद उस महिला की किसी और से दोस्ती हुई, और उस दोस्ती को बर्दाश्त न करते हुए वह भूतपूर्व पति उस दोस्त या प्रेमी का वर्तमान दुश्मन बन बैठा, और अपनी ताकत का बड़ा इस्तेमाल उसे बर्बाद करने में लगाने लगा। भारत की राजनीति में हम रोज ही देखते हैं कि कल तक के हमप्याला-हमनिवाला लोग पार्टी बदलते ही एक-दूसरे के खिलाफ ऊंचे दर्जे का जहर उगलने लगते हैं, और खून के प्यासे हो जाते हैं।
यह पूरा सिलसिला लोगों का अपना ओछापन बताता है कि वे किस घटिया दर्जे के लोग हैं। अगर भूत को जगाने की कोशिश की जाए, तो बहुत करीबी रहे हुए लोग आत्मघाती अंदाज में एक-दूसरे का भारी नुकसान कर सकते हैं, और अपना खुद का भी। लेकिन यह मामूली बात उनकी मोटी समझ में नहीं बैठ पाती कि ऐसा करते हुए वे अपनी खुद की साख पूरी तरह खत्म कर बैठते हैं। आसपास के और लोग समझ जाते हैं कि इनसे संबंध रखने का मतलब कुछ बरस बाद जाकर खुद भी अपनी ऐसी-तैसी करवाना है, इसलिए बाजार में ऐसे लोगों की साख गटर की गहराईयों तक पहुंची हुई रहती है।
भारत की राजनीति में एक इंसान ऐसा भी दिखता है जिसने रिश्ता खत्म होने के बाद कभी मुंह भी नहीं खोला। राजीव गांधी के प्रधानमंत्री रहते हुए उनके रक्षा राज्यमंत्री रहे अरूण सिंह राजीव-सरकार से अलग होने के बाद जाकर पहाड़ में बस गए, और उनके बारे में बाद में किसी ने देखा-सुना भी नहीं। उन्होंने कभी भी अपनी जुबान राजीव-सरकार या उसके विवादास्पद बोफोर्स सौदे सहित किसी भी बारे में नहीं खोली। भारतीय राजनीति में ऐसा बहुत ही कम देखने में आया है। दूसरी तरफ जो नेहरू के वफादार निजी सहायक होने का दंभ रखते रहा, वह ओ.एम. मथाई अपनी आत्मकथा में नेहरू की बेटी के बारे में अश्लील इशारों के साथ बेबुनियाद गंदी बातों को लिखकर अपनी किताब बेचता रहा।
दरअसल इंसान आमतौर पर ऐसा ही ओछा और घटिया होता है, और गिने-चुने लोग ही ऐसे ओछेपन से ऊपर उबर पाते हैं कि वे अपने भूतकाल को सचमुच ही भूत बने रहने दें। आमतौर पर लोग भूतकाल से कुश्ती लड़ते हुए अपना वर्तमान बर्बाद कर बैठते हैं, और अपना भविष्य भी।
लोगों को याद होगा कि जब इमरजेंसी के वक्त बाबू जगजीवन राम इंदिरा गांधी से अलग हो रहे थे, या अलग हो चुके थे, तब इंदिरा के तानाशाह बेटे संजय की पत्नी मेनका ने अपनी नई-नई पत्रिका, सूर्या, में जगजीवन राम के बेटे सुरेश राम और उसकी महिला मित्र सुषमा की बंद कमरे की अंतरंग तस्वीरों को छापने का एक ऐसा काम किया था जो कि भारतीय पत्रकारिता में न उसके पहले हुआ, न उसके बाद। वह पूरा का पूरा अंक महज इन्हीं सेक्स-तस्वीरों से भरा हुआ था, और उन तस्वीरों का न तो कोई सार्वजनिक महत्व था, न ही सुरेश राम किसी तरह की सार्वजनिक जिंदगी में था। बाबू जगजीवन राम से हिसाब चुकता करने के लिए, या कि उन्हें ब्लैकमेल करने के लिए, नेहरू की बेटी इंदिरा की बहू ने ऐसा घटिया काम किया था, और जाहिर है कि यह इंदिरा की सहमति से किया गया होगा। जगजीवन राम से लंबे संबंधों का कोई महत्व नहीं रह गया, और नेहरू का कुनबा भारत के इतिहास की सबसे बुरी पीत-पत्रकारिता पर उतर आया।
लेकिन भूत भगाए नहीं भागते हैं। अभी मेनका के सांसद बेटे वरूण गांधी की उसी किस्म की कई तस्वीरों का सैलाब दिल्ली में आया हुआ है क्योंकि वे भाजपा की मौजूदा रीति-नीति से कुछ तिरछे-तिरछे चल रहे हैं, और ऐसी अफवाहें भी हैं कि वे भाजपा छोड़ सकते हैं। ऐसे में उनकी बताई जा रही ऐसी सेक्स-तस्वीरों का बाजार में आना, सूर्या पत्रिका के उस अंक की याद तो दिलाता ही है। यह अपने भूतकाल के साथ जीने की क्षमता में कमी की एक और मिसाल है कि अगर कोई सांसद पार्टी का भूतपूर्व बनते दिख रहा है, तो उसे इस तरह से निपटाया जाए, या कि रोका जाए।
राजनीति तो है ही घटिया, लेकिन इंसानों को ऐसे घटियापे से उबरने की कोशिश करनी चाहिए। अच्छे दिनों के रिश्तों की जानकारी को बुरे दिनों के हिसाब चुकता करने के लिए इस्तेमाल करने का कोई अंत नहीं हो सकता। यह सिलसिला सबको जलाकर रख देता है, और आत्मघाती आतंकियों का यह अंदाज भले इंसानों का कभी नहीं हो सकता। इसलिए लोगों को अपने अतीत के साथ वर्तमान व्यतीत करना आना चाहिए।
अभी मुंबई में देश की एक सबसे बड़ी विज्ञापन एजेंसी में कल्पनाशील काम करने वाले एक बड़े कामयाब और नामी-गिरामी नौजवान ने काम छोड़ा। इसके बाद इस विज्ञापन एजेंसी ने मुंबई की सड़कों के किनारे कम से कम एक बड़े महंगे होर्डिंग पर उसके लिए बिदाई संदेश टांगकर यह लिखा- राजीव राव, जहां कहीं जाओगे, हमारा प्यार तुम्हारा पीछा करता रहेगा, तुम्हारी कमी खलती रहेगी, जहां भी रहो, कामयाब रहो-ओजिल्वी (विज्ञापन एजेंसी)।
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राज्य के संवैधानिक आयोगों में राज्य के निवासी मनोनीत न हों

संपादकीय
23 अक्टूबर 2017


सुप्रीम कोर्ट ने कल केन्द्र सरकार से पूछा है कि क्या देश भर में महिलाओं के लिए बने राज्य महिला आयोग सच में अस्तित्व में हैं? अदालत ने वृंदावन और ऐसी दूसरी जगहों पर रह रहीं निराश्रित विधवाओं के मुद्दे पर एक सुनवाई के दौरान यह सवाल पूछा, और यह कहा कि राज्य सरकारों को ऐसे पैनल की स्थापना करने को कहा जाए। दूसरी तरफ अभी-अभी यह खबर मिली है कि बस्तर के एक छात्रावास में राखी के मौके पर सीआरपीएफ के जवानों द्वारा की गई छेड़छाड़ की जांच के लिए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का एक जांच दल कल छत्तीसगढ़ पहुंच रहा है।
हम छत्तीसगढ़ की ही बात करें, तो ऐसे कई संवैधानिक आयोग बने हुए हैं जिन पर सवार लोग सरकारी सहूलियतें पाकर बिना काम किए वक्त गुजार रहे हैं, और महत्व पा रहे हैं। होता यह है कि इन कुर्सियों पर लोगों को मनोनीत करने का काम राज्य सरकार करती है, और आमतौर पर सत्तारूढ़ पार्टी के लोग इन पर बिठाए जाते हैं, और जहां पर रिटायर्ड अफसरों या जजों की जरूरत होती है, वहां पर भी ऐसे मनपसंद लोगों को बिठाया जाता है कि वे अपने पूरे कार्यकाल में सत्ता के लिए कोई असुविधा खड़ी न करें। नतीजा यह होता है कि राज्य में बच्चों के साथ जुल्म के मामले आते हैं, महिलाओं के साथ जुल्म होता है, दलित और आदिवासी तबकों के साथ अत्याचार होता है, कहीं अल्पसंख्यकों पर ज्यादती होती है, और राज्य के इंसानों पर हिंसा होती है, तो ये सारे आयोग सरकार का चेहरा देखकर नाम के लिए कुछ चिट्ठी-पत्री जरूर कर देते हैं, लेकिन इस बात का पूरा ध्यान रखते हैं कि सत्ता को असुविधा न हो।
आयोगों के बारे में हम पहले भी लिख चुके हैं कि इनको निगम-मंडल की तरह सुविधाभोगी मनोनयन नहीं बनाना चाहिए, बल्कि संविधान की भावना का सम्मान करते हुए इन्हें ऐसी संस्था बनाना चाहिए जो सरकार और समाज को गलतियों से रोकने का साहस रखे। इसके लिए पहली शर्त तो यही होनी चाहिए कि राज्य के बाहर के अच्छे लोगों को लाकर यह जिम्मेदारी दी जाए। इसके बिना राज्य के भीतर के लोग  व्यक्तिगत संबंधों के चलते, राजनीतिक प्रतिबद्धता के चलते सत्ता के साथ कभी भी कड़ाई नहीं बरत सकते। दूसरी बात यह कि सूचना आयोग या मानवाधिकार आयोग जैसे संवैधानिक आयोगों में राज्य के ही रिटायर्ड अफसरों को बिठाने से उनके सामने उन्हीं के कार्यकाल के कई ऐसे मामले आ सकते हैं जिनमें वे खुद प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जिम्मेदार रहे हों, या कि उनकी पसंद के अफसर जवाबदेह हों। ऐसे में कभी भी वे अपनी जिम्मेदारी के साथ इंसाफ नहीं कर सकते। हमारा तो यह ख्याल है कि अगर कोई सुप्रीम कोर्ट में अपील करे, तो अदालत ही यह प्रतिबंध लागू कर देगी कि ऐसे संवैधानिक पदों पर राज्य के भीतर के लोगों को रखा ही न जाए। और राज्य सरकारें इन ओहदों के साथ जितना भत्ता, जितनी सहूलियतें रखती हैं, उनके चलते राज्य के बाहर के काबिल लोग भी उन पर आने को तैयार हो सकते हैं। यह बात राज्यपालों की नियुक्ति में अनिवार्य रूप से लागू होती है कि किसी को भी अपने गृह राज्य में राज्यपाल नहीं बनाया जाता। हमारा पक्का मानना है कि ऐसी ही व्यवस्था राज्य के हर आयोग के लिए भी लागू होने से लोकतंत्र में संवैधानिक जिम्मेदारी बेहतर तरीके से पूरी हो पाएगी।
आज जब छत्तीसगढ़ के किसी मामले में राज्य के मानवाधिकार आयोग, महिला आयोग, बाल कल्याण परिषद के रहते हुए भी राष्ट्रीय स्तर से ऐसे आयोगों को आकर जांच करनी पड़ती है, तो उससे यही साबित होता है कि राज्य की संवैधानिक संस्थाओं ने अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं की है। आज प्रदेश में आदिवासियों की जमीनों को गैरआदिवासी उद्योगों ने जालसाजी करके खरीदा है, लेकिन राज्य के किसी संवैधानिक आयोग ने इस पर कुछ भी नहीं किया। केन्द्र से इसके लिए आयोग ने कार्रवाई की है। सुप्रीम कोर्ट को ऐसी नौबत पर दखल देना चाहिए, और यह कानूनी रोक लगानी चाहिए कि किसी संवैधानिक आयोग में उस राज्य के निवासी मनोनीत न किए जा सकें।  Visit Website

राजस्थान का अध्यादेश कूड़े की टोकरी के लायक, सुप्रीम कोर्ट वहीं फेंकेगा

संपादकीय
22 अक्टूबर 2017


गुजरात सरकार ने एक अध्यादेश जारी कर अदालतों पर यह रोक लगा दी है कि वे भ्रष्टाचार के मामलों में फंसे अफसरों, और जजों, भूतपूर्व जजों, मंत्रियों के खिलाफ लोगों की शिकायतों पर कोई मामला दर्ज नहीं कर सकेंगे। इसके साथ ही मीडिया और जनता पर भी यह रोक लगाई गई है कि जब तक सरकार इन पदों पर बैठे लोगों के खिलाफ जांच की मंजूरी नहीं देगी तब तक वे उनका नाम उजागर नहीं कर सकते। यह अध्यादेश नाम उजागर करने पर दो बरस तक की कैद और जुर्माने वाला प्रावधान वाला है। जैसा कि इस अध्यादेश की नीयत से साफ है, यह सरकार और अदालत इन दोनों में बैठे हुए भ्रष्ट लोगों को अधिकतम सीमा तक बचाने की नीयत से लाया गया है, लोगों का यह भी कहना है कि राज्य सरकार को कानून में इस तरह के फेरबदल का कोई अधिकार नहीं है।
हमें ऐसी उम्मीद है कि यह सुप्रीम कोर्ट में जाकर खारिज हो जाएगा। यह पूरा अध्यादेश जनता और मीडिया के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को कुचलता है। अगर किसी को भ्रष्ट कहा जाता है, तो संबंधित अधिकारी, जज, मंत्री, या और कोई नेता, इसके खिलाफ अदालत जाकर सजा की मांग कर सकते हैं। लेकिन लोगों के बोलने, लिखने, या छापने के अधिकार पर इस तरह की रोक संविधान के खिलाफ है, और हमारा यह मानना है कि राजस्थान की वसुंधरा राजे की भाजपा सरकार अपने भ्रष्ट लोगों को बचा तो नहीं पाएगी, उल्टे वह औंधेमुंह जरूर गिरेगी, इसमें सुप्रीम कोर्ट का दखल आने में अधिक समय नहीं लगेगा, किसी को वहां जाने भर की जरूरत है। हमारा यह भी ख्याल है कि भारतीय प्रेस परिषद को भी खुद होकर इस अध्यादेश का संज्ञान लेना चाहिए, और इस पर कार्रवाई करनी चाहिए। प्रेस कौंसिल ऐसे अध्यादेश को खुद होकर खारिज तो नहीं कर सकती, लेकिन ऐसी कोई रोक नहीं दिखती कि वह इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट न जा सके।
भारत में केन्द्र और राज्य सरकारों के स्तर पर अपने-अपने भ्रष्ट लोगों को बचाने का मुकाबला चलते रहता है। हम छत्तीसगढ़ में ही देखते हैं कि सरकार कई-कई बरस तक भ्रष्ट लोगों पर कोई कार्रवाई नहीं करती है, बल्कि जब ऐसे अफसरों पर कार्रवाई की मंजूरी भी केन्द्र सरकार से या यूपीएससी से आ जाती है तो भी कार्रवाई की इजाजत नहीं दी जाती, और बार-बार ऐसे मामले वापिस केन्द्र सरकार या यूपीएससी के पाले में इसलिए डाले जाते हैं कि उन पर कभी कार्रवाई ही न हो सके। मजे की बात यह है कि पिछली जोगी सरकार के समय भ्रष्टाचार करने वाले जो अफसर हैं, उनको भी आज की सरकार में भारी कमाई की कुर्सियां मिली रहती हैं, और इससे भी आगे बढ़कर मजे की बात यह है कि रिटायर होने पर ऐसे लोग और अधिक कमाई की कुर्सियों की उम्मीद भी रखते हैं। यह हाल कमोबेश पूरे देश का है, सिवाय वामपंथी पार्टियों की सरकारों के। अब राजस्थान सरकार इसमें और एक कदम आगे बढ़कर अपने भ्रष्ट लोगों को बचाने का ऐसा काम करने जा रही है और भ्रष्ट को भ्रष्ट कहने पर दो बरस की कैद घोषित कर चुकी है। अब देखना यह है कि जो पार्टी अपने आपको लंबे समय से शुचिता की चौकीदार बताते आई है, जो भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की बात कहती है, वह अपनी सरकार के इस अध्यादेश पर क्या कहती है?
आज देश में जरूरत इस बात की है कि केन्द्र से लेकर राज्य तक जब सरकार से किसी मंत्री, अफसर, या जज के खिलाफ जांच की इजाजत न मिले, तो जांच एजेंसियों को तीस दिन के भीतर जांच शुरू कर देने का हक रहना चाहिए। इसके बाद सरकार या अदालतों के किसी भी ओहदे पर बैठे हुए लोगों के खिलाफ अदालत में मामला ले जाने के लिए जांच एजेंसी को किसी भी इजाजत की जरूरत नहीं रहनी चाहिए। इसके बाद जरूरत इस बात की रहनी चाहिए कि सरकार में जो लोग जितने बड़े ओहदे पर बैठे हुए हैं, उनके अपराधों पर उन्हें उतनी ही बड़ी सजा का प्रावधान करना चाहिए। देश में ओहदों और दौलत के आधार पर हर किसी का एक दर्जा तय हो जाना चाहिए, और जितने ऊंचे दर्जे वाले ने जुर्म किया हो, उतनी ही बड़ी सजा भी होनी चाहिए। डबलरोटी चुराने पर एक गरीब को जितनी सजा होती है, किसी अरबपति को उतनी ही चोरी पर उससे दस गुना सजा तो होनी ही चाहिए। इसी तरह अफसर, मंत्री, जज, ये सब अपने बड़े ओहदे के अनुपात में ही सजा के हकदार होने चाहिए। राजस्थान सरकार का यह अध्यादेश महज कूड़े की टोकरी के लायक है, और सुप्रीम कोर्ट उसे वहीं पर फेंकेगा।  Visit Website

दीवाली पर प्रदूषण कुछ घटा, सरकारों को अपनी जिम्मेदारी और भी निभाने की जरूरत

संपादकीय
21 अक्टूबर 2017


सुप्रीम कोर्ट के कड़े आदेश के बाद दिल्ली राजधानी क्षेत्र में पटाखों की बिक्री प्रतिबंधित रही, लेकिन अदालत का आदेश बाहर से पटाखे लाकर जलाने पर रोक का नहीं था, इसलिए पटाखे तो जले, लेकिन पिछले बरस से कम रहे, और दिल्ली में पिछली तीन दीवालियों के मुकाबले यह दीवाली सबसे कम जहरीली हवा वाली रही।  लेकिन छत्तीसगढ़ में सुप्रीम कोर्ट का ऐसा कोई आदेश नहीं था, और यहां पर राज्य सरकार ने जिस तरह की कड़ाई बरती थी, उसके चलते पिछली दीवाली के मुकाबले  इस बार राजधानी रायपुर में वायु प्रदूषण करीब एक चौथाई कम हुआ। राज्य सरकार के पर्यावरण विभाग और पर्यावरण संरक्षक मंडल ने सभी जिलों में कड़ाई बरतने के आदेश दिए थे, और उसका असर कमोबेश सभी जगह देखने मिला। रायपुर के आंकड़े यह हौसला बढ़ाते हैं कि बिगड़ा हुआ मिजाज भी सुधारा जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने जब दिल्ली राजधानी क्षेत्र में पटाखों की बिक्री पर रोक लगाई तो सुप्रीम कोर्ट का पटाखा समर्थकों की तरफ से भारी विरोध किया गया, और सुप्रीम कोर्ट का मखौल उड़ाया गया। इसे धार्मिक मामलों में अदालती दखल करार देते हुए पर्यावरण बचाने की इस पहल का घोर साम्प्रदायिककरण किया गया। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हमने कुछ दिन पहले इसी जगह लिखे संपादकीय में देश में भयानक स्तर तक पहुंच चुके धार्मिक प्रदूषण का जिक्र किया था, और यह भी लिखा था कि सभी धर्मों के लाउडस्पीकर पूरी तरह बंद होने चाहिए, नदियों और तालाबों में धार्मिक विसर्जन को कड़े नियमों से काबू करना चाहिए, और सड़कों पर धार्मिक उत्पात खत्म किया जाना चाहिए।
एक तरफ तो केन्द्र सरकार गंगा को साफ करने को अपना एक बड़ा अभियान बनाकर चल रही है और इसके लिए एक पूरा मंत्रालय ही समर्पित है। दूसरी तरफ देश की राजधानी में भी अगर हवा में भयानक जहरीले रसायन घुलने से रोकने के लिए अदालत पटाखों पर रोक लगा रही है, तो उसका जमकर विरोध किया जा रहा है, और इस आदेश के मुकाबले दूसरे धर्मों के रीति-रिवाज गिनाए जा रहे हैं। एक की देखादेखी दूसरे धर्म के कट्टर और धर्मांध लोग अगर अपने धर्म का प्रदूषण बढ़ाते चलेंगे, तो इससे यह देश और यह धरती एक दिन खत्म ही हो जाएंगे। पटाखे जलाने वालों को यह याद रखना चाहिए कि इससे जहरीली होने वाली हवा सबसे पहले उनके परिवार को, फिर उनके पड़ोस को, और फिर मुहल्ले के फेंफड़े छलनी करती है। ऐसा भी क्या धार्मिक रिवाज जो कि अपने बच्चों को अस्थमा का मरीज बना जाए। और जो धर्मांध लोग पटाखे जलाने पर आमादा हैं, उनको यह भी याद रखना चाहिए कि भारत में मुगलों के आने के पहले पटाखे शायद थे भी नहीं, और आज जब वे मुस्लिम संस्कृति को खत्म करना चाहते हैं, तो पटाखों को खत्म करना तो उनकी जिम्मेदारी बनती ही है।
भारत में अदालतें, और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल सभी तरह के प्रदूषण के खिलाफ खासी कड़ाई बरत रही हैं। ऐसे में केन्द्र और राज्य सरकारों को भी जनकल्याण की अपनी कड़वी जिम्मेदारी को पूरा करना चाहिए। एक संपन्न तबका ऐसा है जिसके पास हवा में अधिक जहर घोलने की ताकत है, और इसी तबके के कुछ धर्मांध लोग ऐसे हैं जो कि उस पर आमादा हैं। यह सिलसिला खत्म करने के लिए सरकारों को अपनी अप्रिय जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। छत्तीसगढ़ में कुछ हफ्ते पहले प्लास्टिक और पॉलीथीन के सामानों पर जो रोक लगी है, उसका असर दिखना शुरू भी नहीं हुआ है। उसके हिसाब से तो विज्ञापन होर्डिंग्स के फ्लैक्स पर पूरी तरह से रोक लगी है, लेकिन अभी यह सिलसिला धड़ल्ले से चल रहा है, और सरकार ने कोई भी कार्रवाई नहीं की है। इस किस्म का प्रदूषण पटाखों की तरह धमाके और रौशनी से सामने नहीं आता है, लेकिन वह धरती पर दसियों हजार बरस का बोझ रहेगा। इसलिए छत्तीसगढ़ सरकार को अपने इस आदेश पर कड़ाई से टिके रहना चाहिए, और राजनीतिक या कारोबारी विरोध को अनदेखा करते हुए इंसान और धरती के प्रति अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। छत्तीसगढ़ में प्लास्टिक और पॉलीथीन, गाडिय़ों के धुएं, और औद्योगिक धुएं, पटाखे जैसे निहायत गैरजरूरी रसायन, इन सब पर कड़ाई से काबू करना चाहिए।
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शाहिद कपूर के गाने पर नाचते-गाते बड़े-बड़े नेता

संपादकीय
18 अक्टूबर 2017


अभी पिछले कुछ घंटों से अमरीकी मीडिया इस बात पर उबल रहा है कि राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने विदेशी मोर्चे पर शहीद हुए एक नौजवान सैनिक की पत्नी से फोन पर बात करते हुए एक से अधिक बार यह याद दिलाया कि जब उसने फौज की नौकरी की, तब भी उसे यह मालूम था कि उसके साथ क्या हो सकता है। जो लोग अमरीका में ट्रंप के आदतन-आलोचक नहीं हैं, वे लोग भी बुरी तरह से विचलित हैं कि एक ऐसे शहीद की पत्नी के साथ बात करते हुए राष्ट्रपति ने ऐसी ओछी और घटिया बात कही है जो कि अब तक शायद किसी राष्ट्रपति ने न की हो। यह वह शहीद है जो अपने पीछे दो बच्चे और गर्भवती पत्नी छोड़ गया है, और जो देश के लिए लड़ते हुए ऐसी बुरी मौत मरा है कि अंतिम संस्कार के पहले उसका ताबूत भी नहीं खोला गया, जाहिर है कि उसकी लाश देखने लायक भी नहीं रही होगी। ट्रंप अपनी उस जुबान के लिए कुख्यात हैं जिसे इंसानी जुबान में हैवानियत कहा जाता है, हालांकि न हैवान नाम की कोई चीज होती, और न ही कुछ हैवानियत होती, यह पूरा मिजाज इंसानों के मिजाज का एक हिस्सा है, जो कि समय-समय पर बेकाबू होकर बाहर आते रहता है। हैरानी इसमें बस यही है कि जब लोग देश या प्रदेश के किसी सबसे बड़े ओहदे पर पहुंच जाते हैं, तो उसके बाद भी अपने भीतर की हैवानियत पर उनका काबू ऐसा खोते रहता है, और यह हैवानियत सार्वजनिक रूप से इस तरह सामने आती रहती है।
हिन्दुस्तान में भी हम बहुत से ओहदों पर बैठे हुए लोगों को देखते हैं जो कि मुंह खोलते हैं, और गंदी, हिंसक, साम्प्रदायिक, अश्लील, और भद्दी बात करते हैं। इनमें से कुछ लोग तो धर्म का लबादा भी ओढ़े रहते हैं, बहुत से लोग अपने आपको किसी संस्कारी पार्टी या संगठन का कहते हैं, और वे गरीबों के खिलाफ, महिलाओं के खिलाफ और लड़कियों के खिलाफ गंदा कहना उसी तरह जारी रखते हैं जिस तरह किसी एक फिल्मी गाने में कोई किरदार यह गाता है- अब करूंगा गंदी बात, तेरे साथ...। भारत में हम महिला मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी से काम सम्हालते ही बलात्कार की शिकार एक महिला के बारे में यह सुन चुके हैं कि महिला की शिकायत राज्य सरकार को बदनाम करने की साजिश है। हम हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की चुनाव के पहले की यह बातें सुन चुके हैं कि जिन लड़कियों या महिलाओं को शाम के बाद बाहर निकलना हो वे बिना कपड़ों के नंगी होकर क्यों नहीं निकलतीं। अभी बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में लड़कियों पर यौन हमले के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन और राज्य सरकार के लोगों के तरफ से भी बहुत ही गंदी और ओछी बातें कही गईं। जेएनयू के विवाद के समय राजस्थान के एक भाजपा विधायक ज्ञानदेव आहूजा ने जेएनयू के अहाते में हर दिन तीन हजार इस्तेमाल हो चुके कंडोम और दो हजार शराब-बोतलें मिलने की बात कही थी। विधायक का नाम तो ज्ञानदेव है, लेकिन जिस विश्वविद्यालय में देश की होनहार लड़कियां भी पढ़ती हों, उसके बारे में गंदी बात कहते हुए इस विधायक का ज्ञान धरे रह गया।
हम ट्रंप के बारे में तो यह नहीं कहते, लेकिन हिन्दुस्तान के बारे में जरूर कह सकते हैं कि यह देश यौन-कुंठाग्रस्त देश है जिसके लोगों को स्वाभाविक और प्राकृतिक सेक्स भी आपत्तिजनक, वर्जित, और जुर्म लगता है। यह वही देश है जिसमें सदियों पहले खजुराहो जैसे मंदिरों पर बड़ी मेहनत से कलाकारों ने सेक्स-क्रिया की मूर्तियां उकेरी थीं, जहां पर सदियों पहले वात्सायन में दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण कहा जाने वाला सेक्स-ग्रंथ कामसूत्र लिखा था, जहां सदियों पहले शहरों में नगरवधुएं हुआ करती थीं, वहां पर आज किसी भी तरह की वयस्क बातचीत को जुर्म करार दे दिया गया है। यह यौन कुंठा महिलाओं के बारे में बात करते हुए, लड़कियों के बारे में बात करते हुए, प्रेमी जोड़ों के बारे में बात करते हुए उनके खिलाफ भारी हिंसा के साथ बाहर आती है। इस देश के बड़े पुराने-पुराने ग्रंथ इस जिक्र से भरे हुए हैं कि किस तरह राम की अयोध्या में, और कृष्ण के वक्त भी शहरों में वेश्याएं हुआ करती थीं, और वे राम के अयोध्या आने पर स्वागत करने भी पहुंचीं थीं। लेकिन आज उस इतिहास को मिटाने के लिए लोग आदमकद रबर (इरेजर) लेकर घूम रहे हैं, और जहां इतिहास पसंद नहीं आता, वहां उसे मिटाने पर जुट जाते हैं। कोई हैरानी नहीं कि इनमें से कुछ लोग कुछ बरसों के भीतर खजुराहो के मंदिरों को बम लगाकर उड़ा दें, और कामसूत्र की छपी हुई किताबों की बिक्री पर रोक भी लगवा दें। हमने बात शुरू की थी ट्रंप की गंदी बात से, फिर वह हिन्दुस्तानी नेताओं की गंदी बात पर आई, और हम आज की इस बात का अंत ऐसी गंदी बातों के पीछे की सोच की जड़ों पर लाकर खत्म कर रहे हैं। लोकतंत्र में लोगों को मुंह खोलने के पहले याद रखना चाहिए कि अब मुकरने के दिन खत्म हो चुके हैं, और उनकी कही गंदी बातों के सुबूत हमेशा के लिए दर्ज होते जाते हैं। एक वक्त आएगा जब हिन्दुस्तान में हिंसक और गंदी बातें कहने वालों को उसका दाम भी चुकाना पड़ेगा, नोटों की शक्ल में नहीं, वोटों की शक्ल में, और नेताओं के पेट पर जब मतदाता की लात पड़ेगी, तभी यह सिलसिला थमेगा। आज के डिजिटल जमाने में हमारा यह सुझाव है कि नेताओं की गंदी बातों को उनके चुनाव के वक्त उनके इलाकों में जमकर फैलाना चाहिए, और उन्हें निपटाना चाहिए, तभी लोकतंत्र की गंदी हवा साफ हो सकेगी, चाहे वह अमरीका हो, चाहे हिन्दुस्तान हो। 

सबको मालूम है लक्ष्मी की हकीकत लेकिन, दिल...

संपादकीय
17 अक्टूबर 2017


एक बार फिर दीवाली सामने खड़ी है, और हिंदुस्तान का लगभग पूरा हिस्सा थोड़ा सा अधिक रौशन है। कुछ लोगों के मन में यह मलाल है कि पटाखों पर कहीं कुछ रोक लगी है, वहीं दूसरे बहुत से लोग हैं जिनके सामने यह फिक्र है कि इस त्यौहार को कैसे मनाएं, कैसे अपने बच्चों को बिना खर्च त्यौहार मनाने के लिए मनाएं। हर त्यौहार एक आर्थिक-सामाजिक खाई लेकर आता है और जितनी खुशियां लेकर आता है, उससे बहुत अधिक मलाल भी लेकर आता है। दीवाली की पूजा से जिस लक्ष्मी के खुश होने की धारणा है, वह लक्ष्मी अगर है, और वह किसी पर खुश होती है, तो वह चुनिंदा लोगों पर ही होती है, और ये वे लोग हैं जिनके पास पहले से वह लक्ष्मी मौजूद है। आंकड़े बताते हैं कि हिंदुस्तान में हाल के बरसों में दौलत का जो इजाफा हुआ है, वह पूरे का पूरा कुछ चुनिंदा लोगों के पास ही हुआ है, और बाकी लोगों का हाल इसी दौर में और बदहाल हुआ है। गरीब और गरीब होते चले गया है, कुपोषण का शिकार, भूख का शिकार, पड़ोस के बांग्लादेश और नेपाल से भी अधिक कुपोषित और भूखा रह गया है।
आज जब बाजार धनतेरस की शानदार, चकाचौंध भरी खरीददारी के लिए तैयार हो रहा है, हो चुका है, तब सुबह-सुबह यह खबर थी कि आधार कार्ड नाम का पहचान पत्र न होने से एक परिवार का नाम राशन कार्ड से कट गया, और राशन न मिलने से, स्कूल की छुट्टी होने से दोपहर का भोजन भी न मिलने से झारखंड में एक गरीब बच्ची भूख से मर गई। ऐसे में एक बच्ची की मौत सरकारों की धनतेरस, और उसकी मनतेरस पर सवाल खड़े करती है। इस देश में हर दीवाली पर यही लगता है कि यह किसकी दीवाली है, एक छोटे से तबके की दीवाली, या देश की दीवाली। कहने को गरीब से गरीब घर में दीवाली पर दो दिए जल जाते हैं, क्योंकि सामाजिक व्यवस्था को ढोना है, और गरीब इस उम्मीद में भी रहते हैं कि दीवाली की लक्ष्मी पूजा से प्रसन्न लक्ष्मी उस पर मेहरबान होंगी, और उसकी गरीबी दूर होगी। लेकिन जैसा कि धर्म का मकसद था, उसे बनाने वालों का मकसद था, धर्म लोगों को ऐसे ही झांसे में रखता है, और गरीबों में बगावत को रोकने के लिए, अमीरों की हिफाजत करने के लिए यह एक हथियार बनाया गया था जो कि आज भी उतना ही कारगर है।
खर्च वाले हर त्यौहार के मौके पर यह बात और अधिक तल्खी से चुभती है कि भारत जैसे देश की उदार अर्थव्यवस्था किस तरह लक्ष्मी को समेटकर कुछ गिनेचुने लोगों तक ले जा रही है, और बाकी तमाम लोगों से उसे दूर कर रही है। फिर लक्ष्मी को भी इससे कोई परहेज नहीं है, वह भी इस इंतजाम में खुश है कि उसे बड़े-बड़े महलों, बड़ी-बड़ी तिजोरियों में रहने मिले, और कच्चे मकानों, झोपडिय़ों और बदबू से दूर रहने का मौका मिले। लक्ष्मी को कोई चुनाव तो लडऩा नहीं है कि वह किसी दलित के घर, किसी गरीब के घर जाकर रहे और खाना खाए, चाहे उस घर का, चाहे किसी रेस्त्रां से आया हुआ। लक्ष्मी की पूजा का यह त्यौहार धर्म की उसी गैरबराबरी वाली सोच पर बना और ढला हुआ है, इसे जो बना रहे हैं, उनकी हकीकत, और उनकी हसरत, सबके लिए हमारी बधाई। 

इतिहास पेंसिल से नहीं लिखा जाता कि रबर उठाया, और मिटा दिया...

संपादकीय
16 अक्टूबर 2017


एक गैरजरूरी और नाजायज बहस जो कि कुतर्कों पर आधारित हो, कभी-कभी बकवासियों को भारी भी पड़ सकती है। कुछ ऐसा ही हुआ है उत्तरप्रदेश के घोर साम्प्रदायिक और बड़बोले, हिंसक और आक्रामक भाजपा विधायक संगीत सोम के साथ। उत्तरप्रदेश इन दिनों शाब्दिक अर्थों में भी एक भगवाकरण से गुजर रहा है, और वहां की सरकारी बसों और इमारतों को भगवा रंगना तेजी से चल रहा है, प्रदेश के इतिहास का हिन्दू धर्मांतरण किया जा रहा है, और ताजमहल को इतिहास से मिटा दिया जा रहा है। ताजमहल को मौजूदा वक्त से मिटा पाना कानूनी रूप से योगी आदित्यनाथ की सरकार के हाथ में नहीं है, वरना बाबरी मस्जिद के गुंबदों की तरह उसे भी गिरा दिया जाता। ऐसे में जब उत्तरप्रदेश की पर्यटन पुस्तिकाओं से ताजमहल को हटाकर सीएम योगी के खुद के गोरखनाथ मंदिर को जोड़ा जा चुका है, साम्प्रदायिक दंगों के आरोप में जेल जा चुके भाजपा विधायक संगीत सोम ने कहा है कि देश का इतिहास अब तक बिगड़ा हुआ था उसे सुधारने का काम भाजपा कर रही है। ताजमहल कैसा इतिहास है, किस काम का इतिहास है, जिसमें अपने पिता को ही कैद कर डाला था, इन लोगों ने हिन्दुस्तान में हिन्दुओं का सर्वनाश किया था, अब भाजपा सरकार देश के इतिहास से बाबर, अकबर, और औरंगजेब की कलंक कथा को निकालने का काम कर रही है।
इस पर देश की सबसे बड़ी मुस्लिम पार्टी के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी ने जवाब दिया है कि लाल किले को भी गद्दारों ने बनवाया था, क्या पीएम मोदी लाल किले से तिरंगा फहराना बंद कर देंगे? क्या मोदी-योगी देशी-विदेशी सैलानियों को ताजमहल जाने से मना करेंगे? क्या गद्दारों के द्वारा ही बनाए गए हैदराबाद हाउस में पीएम मोदी विदेशी मेहमानों की मेहमाननवाजी बंद कर देंगे?
यह बहस इतिहास को मिटाने के अज्ञान भरे अहंकार से शुरू हो रही है, और इसका जैसा जवाब ओवैसी ने दिया है, उससे इस बकवासी विधायक की बोलती बंद हो जानी चाहिए। हिन्दुस्तान का इतिहास आज संगीत सोम और योगी की हसरत का मोहताज नहीं है, वह हिन्दुस्तान के बाहर हिन्दुस्तान से ज्यादा अच्छी तरह दर्ज हैं, और खुद हिन्दुस्तानियों द्वारा दर्ज किए गए इतिहास को भी योगी जैसे लोग मिटा नहीं सकते, वह इस पार्टी की सरकार के बाद भी कायम रहेगा, और आज पूरी दुनिया में ऐसे दकियानूसी और धर्मांध लोग जिस अंदाज में ताजमहल को मिटाने पर आमादा हैं, यह उन तालिबानों की सोच की ही शुरुआत है जिन्होंने अफगानिस्तान के बामियान में बुद्ध की पर्वताकार प्रतिमाओं को खत्म किया था। धर्मांधता से इतिहास को खत्म करने की कोशिशें तो तानाशाहों की भी कामयाब नहीं होतीं, यह तो पांच बरस के लिए निर्वाचित सरकार है। और जिन मुस्लिम शासकों को गद्दार कहते हुए जिनके बनाए ताजमहल को पर्यटन की पुस्तिकाओं पर से मिटाया जा रहा है, उन गद्दारों के बनाए लाल किले से प्रधानमंत्री आजादी की सालगिरह पर देश और दुनिया के नाम पैगाम देते हैं। फिर मुस्लिम गद्दारों के बाद अंग्रेज गद्दारों की बारी आएगी, जिनके राज में लोग ईसाई भी बने, और अंग्रेज राज ने हिन्दुस्तानियों का शोषण भी किया था। तो क्या संगीत सोम और योगी मिलकर पूरे देश से रेल की पटरियां उखाड़ फेंकेंगे? रेलवे स्टेशनों को गिरा देंगे? देश भर में ईसाई संस्थाओं द्वारा बनाई गई अस्पतालों, स्कूलों और कॉलेजों को गिरा देंगे? संसद भवन और राष्ट्रपति भवन को गिरा देंगे? और क्या वह पूरे देश को अफगानिस्तान और सीरिया की तरह खंडहर बनाकर छोड़ेंगे?
दिक्कत यह है कि भाजपा की तरफ से ऐसे धर्मांध बयानों पर कोई रोक भी नहीं लगाई जाती है। ऐसे लोग समय-समय पर रामजादा-हरामजादा जैसे फतवे जारी करते हैं, कभी मुस्लिमों के हाथ काटकर फेंक देने के फतवे जारी करते हैं, और जाहिर है कि इसकी प्रतिक्रिया में देश की हवा और अधिक जहरीली होती है। हमारा ख्याल है कि सुप्रीम कोर्ट को दीवाली गुजर जाने के बाद, पटाखों का मुद्दा निपट जाने के बाद, अब इस तरफ भी ध्यान देना चाहिए कि देश की एकता के खिलाफ, देश की सद्भावना के खिलाफ नफरत फैलाने वाले लोगों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कब तक मिले? एक धर्म के मुकाबले दूसरा धर्म अगर यही करता चलेगा, तो एक की आंख फोडऩे के मुकाबले दूसरों की आंख फोड़ते-फोड़ते यह देश ही अंधा हो जाएगा। सुप्रीम कोर्ट को अपनी जिम्मेदारी इसलिए समझनी चाहिए क्योंकि सरकारें अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर रही हैं। आज सोशल मीडिया में लोग अपने असली नाम और असली चेहरे वाले अकाउंट से भी दूसरों को बलात्कार और हत्या की धमकियां दे रहे हैं, और सरकारें अपना जिम्मा पूरा नहीं कर रही हैं। यह सिलसिला जारी रहने देना लोकतंत्र के खिलाफ है। और लोकतंत्र अकेली सरकार का मोहताज नहीं रहता। जब कार्यपालिका अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं करती है, जब विधायिका बाहुबल का शिकार रहती है, और वह बिना दांत और नाखून वाले जानवर सरीखी बेअसर हो जाती है, तब जनता न्यायपालिका की तरफ देखती है। न्यायपालिका को अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी से मुंह नहीं चुराना चाहिए, देश में नफरत और हिंसा को फैलाते हुए जब-जब कानून तोड़ा जाता है उसे तब-तब खुद होकर कार्रवाई करनी चाहिए, और अदालतों में इतनी ताकत संविधानप्रदत्त है। फिलहाल संगीत सोम को नहले पर दहला मिल गया है, और जहां तक तर्क की बात है, संगीत सोम के कुतर्क की बोलती बंद हो चुकी है। बकवास कोई कभी तक भी जारी रख सकते हैं।

पेट्रोल और आग करीब आने से धर्म-आध्यात्म का ब्रम्हचारी साम्राज्य डांवाडोल हो रहा है...

संपादकीय
15 अक्टूबर 2017


मध्यप्रदेश में एक जैन मुनि को एक भक्त परिवार की युवती के साथ बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। पैंतालीस बरस के जैन मुनि पर 19 बरस की युवती ने बलात्कार का आरोप लगाया था और उसके बाद मेडिकल जांच में बलात्कार की पुष्टि होने के बाद यह गिरफ्तारी हुई। अभी पिछले कुछ बरसों से देश लगातार आध्यात्मिक और धार्मिक नेताओं, संत-स्वामियों के बलात्कार के मामलों को देख रहा है। ऐसे में कुछ बुनियादी सवाल भी उठते हैं कि ऐसी नौबत क्यों आती है?
एक बात तो यह है कि बहुत से धर्मों में संत, मुनि, साध्वी, पोप, मौलवी जैसे ओहदों पर बैठे लोगों या उपाधियों से सजे हुए लोगों के साथ यह शर्त रहती है कि वे ब्रम्हचारी रहें। इंसान की देह का इतिहास धर्मों के इतिहास से लाखों, या शायद दसियों लाख साल पुराना है। इसलिए देह की जरूरतें धर्म से ऊपर रहती हैं। अब जो लोग धर्म या आध्यात्म के अनुशासन में जाते हैं, वे शुरुआत से ही अपने तन और मन के साथ एक संघर्ष करते हैं, और यह संघर्ष जिंदगी के आखिरी दिन तक चलता है। यह बात महज धर्म और आध्यात्म के लोगों के साथ नहीं है, महात्मा गांधी जैसे लोग भी ब्रम्हचर्य के प्रयोग करते रहे, और कई किस्म के अनैतिक तरीकों को इस्तेमाल करके भी उन्होंने अपने बदन पर काबू का इम्तिहान लेने का एक लंबा सिलसिला चलाया, और बाद में उस बारे में खुद ही लिखा भी। इसलिए चाहे किसी भी तरह के धार्मिक अनुशासन की वजह से लोगों को ब्रम्हचर्य के तहत रहना पड़ता है, उनके बारे में यह बात समझ लेना चाहिए कि वे आखिरी सांस तक के एक अंतहीन संघर्ष में पड़ते हैं, और यह संघर्ष कम कठिन नहीं होता। पौराणिक कहानियां पढऩे वालों को याद होगा कि किस तरह ऋषि विश्वामित्र की साधना को एक सुंदरी मेनका ने भंग कर दिया था।  पूरी दुनिया में ऐसे मामले हैं, और ईसाई चर्च के तो सैकड़ों-हजारों मामले बच्चों के साथ सेक्स के भी सामने आए हैं जिन्हें लेकर अदालती मुकदमे तक चले हैं। आज जब हम यह लिख रहे हैं उस वक्त भी इंटरनेट पर एक खबर तैर रही है कि इंडोनेशिया में एक ईसाई बिशप को एक महिला से अनैतिक रिश्ता रखने की वजह से इस्तीफा देना पड़ा।
ऐसी नौबत में हमारा यह मानना है कि जब आसाराम पर एक नाबालिग लड़की से बलात्कार का मामला चल ही रहा है, राम-रहीम कई नाबालिगों के साथ बलात्कार के मामले में सजा काट ही रहा है, तो बाकी धर्मों और सम्प्रदायों के भक्तों-अनुयायियों को चाहिए कि वे अपने परिवार सम्हाल कर रखें, और बलात्कार की ऐसी नौबत, ऐसे खतरे से उनको दूर रखें। दूसरी तरफ धर्म और सम्प्रदाय के जिम्मेदार लोगों को भी चाहिए कि वे अपने ब्रम्हचारी लोगों के लिए अनुशासन का कुछ ऐसा इंतजाम रखें कि वे ऐसी किसी नौबत में न फंसें। लोगों को वह पुरानी कहावत याद रखनी चाहिए कि आग और घी को साथ-साथ नहीं रखना चाहिए। आज के वक्त में कहा जा सकता है कि पेट्रोल के कनस्तर को आग के करीब रखना आगे-पीछे खतरे का सामान बनता ही है। इसलिए जिस किसी धर्म और सम्प्रदाय को ऐसी बदनामी से बचना है, उन्हें समय रहते अपने मुखिया या उनके नीचे के सेवकों को लेकर नियम-कायदे की एक परंपरा कायम करनी चाहिए। इसके बिना बड़ी संख्या में बलात्कार होते रहेंगे, और उनमें से कोई एक-दो भी पुलिस तक पहुंचकर पर्याप्त बदनामी दे देंगे।
हम यह नहीं मानते कि लोग धर्म और आध्यात्म को छोड़ ही देंगे। लोगों को अपने मन की कमजोरी की वजह से हमेशा ही ऐसे सहारे की जरूरत पड़ते रहेगी। लेकिन उनके ऐसे सहारे जेल में न रहें, इसके लिए उनको खुद को चौकन्ना रहना होगा। यह बात याद रखनी होगी कि एक किसी बलात्कारी बाबा या स्वामी, साधु या मुनि के चलते जब ऐसा कोई भांडाफोड़ होता है, तो उसके हजारों-लाखों अनुयायी और भक्त भी तरह-तरह का सामाजिक अपमान झेलते हैं, और उनके परिवार भी तरह-तरह से ताने झेलते हैं। इसलिए अपनी आस्था के उतने ही करीब जाना चाहिए जितने करीब जाने से तन और मन पर काबू टूटने न लगे। आज पूरे देश में आस्था के खिलाफ अनास्था का एक माहौल चल रहा है। इससे एक फायदा भी हो रहा है कि और लोग ऐसे खतरों में फंसने से बचेंगे, और बच रहे हैं। लेकिन यह जागरूकता बढऩी चाहिए, उसके बिना धर्म और आध्यात्म का साम्राज्य डांवाडोल है।

प्रणब-मनमोहन की दरियादिली, और देश की जहरीली हवा...

संपादकीय
14 अक्टूबर 2017


देश की आम हवा से परे कल दिल्ली में दरियादिली और बड़प्पन का एक ऐसा नजारा देखने मिला जिससे लगा कि हिन्दुस्तान अभी बाकी है। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की किताब, द कोलिशन इयर्स, का विमोचन होना था, और इसमें पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी मौजूद थे, सोनिया गांधी और राहुल गांधी तो थे ही। इस कार्यक्रम के पहले एक इंटरव्यू में प्रणब से पूछा गया कि जब सोनिया ने उनकी जगह मनमोहन को प्रधानमंत्री बनाया, तो उन्हें कैसा लगा? उन्होंने कहा कि वे जरा भी निराश नहीं हुए, क्योंकि उनकी अयोग्यता की सबसे बड़ी वजह यह भी थी कि वे अधिकतर वक्त राज्यसभा के सदस्य थे, महज 2004 में लोकसभा जीती थी। वे हिन्दी नहीं जानते थे, और ऐसे में बिना हिन्दी जाने किसी को भारत का प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहिए। इसके बाद कार्यक्रम में जब मनमोहन सिंह के भाषण का वक्त आया तो उन्होंने कहा- 'प्रधानमंत्री पद के लिए प्रणब दा एक बेहतर विकल्प थे जो कि अपनी मर्जी से राजनेता बने थे, लेकिन मेरा राजनेता बनना एक इत्तफाक था।Ó
एक ही पार्टी में देश की सबसे ताकतवर एक ही कुर्सी के लिए सबसे दिग्गज दो नामों के बीच ही जब घोषित या अघोषित, चाहा या अनचाहा, ऐसा मुकाबला हो, और उसके बाद भी दो लोग तंज और रंज के बिना एक-दूसरे के प्रति न सिर्फ मंच और माईक से, बल्कि बाकी वक्त भी इस तरह दरियादिली दिखा सकें, तो उससे भारतीय राजनीति की गंदी साफ होती है। हम किसी एक पार्टी के भीतर वैचारिक असहमति को गलत नहीं मानते, लेकिन आज बहुत सी पार्टियों में, पार्टियों के बीच भी, सरकारों के बीच, नेताओं के बीच, विचारधाराओं के बीच जिस बुरी हद तक कड़वाहट घुल चुकी है, बातचीत के रिश्ते खत्म हो चुके हैं, वह लोकतंत्र के लिए एक डरावनी नौबत है। लोकतंत्र असहमतियों का सम्मान करने, उन्हें समझने, महत्व देने, और उनसे सीखने का नाम होता है। आज भारत का लोकतंत्र पार्टियों की खेमेबंदी में, विचारधाराओं के ध्रुवीकरण में, और साम्प्रदायिक आधार पर इस तरह खंडित-विखंडित हो गया है कि लोकतंत्र में महज चुनावी जीत ही मानो सबकुछ रह गई है। यह देश और यह लोकतंत्र अब पूरी तरह से, और बुरी तरह से चुनाव केन्द्रित कर दिया गया है, और वह चुनाव भी धार्मिक ध्रुवीकरण के बहुमत पर।
आज यह अंदाज लगाना मुश्किल है कि देश की जनता लोकतंत्र की परिभाषा को समझ पा रही है, या कि वह महज चुनावी बहुमत को लोकतंत्र मान रही है? विविधताओं से भरे हुए इस देश में एक-दूसरे के लिए, एक-दूसरे तबके के लिए, एक-दूसरे की विचारधारा के लिए जो परस्पर सम्मान होना चाहिए, उसकी एक मिसाल प्रणब-मनमोहन में देखने मिली, और उसी वजह से देश का बाकी माहौल कुछ अधिक खटकने भी लगा, और उस पर लिखने की जरूरत महसूस हो रही है। असहमति का असम्मान करके, अप्रिय लगती आवाजों को अनसुना करके अगर ध्रुवीकरण से चुनावी जीत हासिल की जाती है, तो वह लोकतंत्र की जीत नहीं हो सकती। जिस पार्टी के पास लोकतंत्र का सम्मान करते हुए भी बहुमत हासिल करने की संभावना हो उसका तंगदिल हो जाना खुद उसकी शिकस्त है। दुनिया के इतिहास में लोगों का मूल्यांकन चुनाव आयोग के नतीजों के अंकगणितीय विश्लेषण तक सीमित नहीं रहता है। ये आंकड़े ताक पर धरे रह जाते हैं, चुनावी नतीजे महज थोड़ी सी जगह पाते हैं, और लोकतंत्र की कसौटी पर जीत या हार को इतिहास विस्तार से दर्ज करता है। अगर प्रणब मुखर्जी ने मनमोहन-मंत्रिमंडल के मंत्री रहते हुए अपना वक्त सत्ता पलटने की साजिश में लगाया होता, तो आज इतिहास में उनका सम्मान नहीं होता। दूसरी तरफ अगर मनमोहन सिंह ने तीन चौथाई से अधिक मंत्री-समूहों का मुखिया प्रणब को न बनाया होता, तो मनमोहन भी तंगदिली की तोहमत झेलते। यह उदारता लोकतंत्र में पार्टियों के बीच भी कायम रहना चाहिए। एक-दूसरे का ओछा और अंधा विरोध लोकतांत्रिक नहीं होता। भारत की राजनीतिक हवा में इतना जहर घुल गया है, और वह लगातार बढ़ाया भी जा रहा है, इस हद तक कि वह दिल्ली के पटाखों के प्रदूषण को मात कर रहा है। दिक्कत यह है कि इस पर रोक कोई सुप्रीम कोर्ट नहीं लगा सकता, महज जनता लगा सकती है। और जनता के बीच चुनाव और लोकतंत्र में फर्क की जागरूकता लानी होगी। वरना यह बात तो दुनिया में समझदार लोग बहुत पहले से कह गए हैं कि लोकतंत्र में लोगों को वैसी ही सरकार नसीब होती है, जैसी सरकार पाने के हकदार वे होते हैं।

बेटी की हत्या की तोहमत से बरसों बाद आजाद मां-बाप

संपादकीय
13 अक्टूबर 2017


(मई 2012 में इसी जगह हमने आरूषि हत्याकांड के तमाम पहलुओं को लेकर जो लिखा था, आज उसे फिर से प्रकाशित कर रहे हैं, सिर्फ इसका शीर्षक नया है-संपादक)
आज से अदालत में फिर आरूषि हत्याकांड की सुनवाई तेजी से आगे बढऩे वाली है। यह मामला दिल्ली का होने की वजह से खबरों में जरूरत से हजार गुना अधिक रहा और पूरे देश में इस पर चर्चा भी जरूरत से हजार गुना रही। नतीजा यह हुआ कि अखबारों में और टेलीविजन पर इस हत्याकांड में मां-बाप की गिरफ्तारी और उन पर सीबीआई का चलाया जा रहा मुकदमा खबरों में इस कदर रहा कि देश भर में बच्चों से लेकर बड़ों तक को मानसिक तनाव झेलना पड़ा। अभी भी बहुत से बच्चे इस तनाव में जीते हैं कि उनके मां-बाप भी उन्हें मार सकते हैं। भारत में चूंकि बच्चों के मानसिक तनाव को लेकर किसी किस्म की चर्चा या सलाह-मशविरे का रिवाज नहीं है इसलिए कोई यह अंदाज लगाने वाले नहीं हैं कि दो कत्लों की यह खबर देश में कितना सामाजिक तनाव खड़ा कर गई है और बच्चों के दिल-दिमाग पर इन खबरों का कितना बुरा असर पड़ा है। इस बात पर आज यहां लिखना इसलिए भी ठीक और जरूरी लग रहा है क्योंकि सीबीआई ने इस पूरे मामले में अब तक जो कुछ हासिल बताया है उसमें इस बच्ची के कत्ल के लिए मां-बाप के खिलाफ और कोई सुबूत नहीं दिखे हैं, केवल यही सुबूत दिखा है कि किसी और के खिलाफ कोई सुबूत नहीं हैं। पहली नजर में अभी तक कि सीबीआई की कही बातें ये हैं कि चूंकि और कोई कत्ल करने की हालत में नहीं था, किसी और की लाशों तक पहुंच नहीं थी, इसलिए मां-बाप ने ही यह किया होगा। हम अभी इस केस पर अधिक जाना नहीं चाहते क्योंकि वह तो अदालत में तय होगा, लेकिन एक बात पर बहुत तकलीफ के साथ लगती है कि हत्या के चार बरस बाद भी आज हर कुछ दिनों में मां-बाप अदालत में घसीटे जाते हैं, मीडिया के कैमरे उनको हर बार बाकी देश के सामने पेश कर देते हैं, और चार बरसों के लंबे अरसे के बाद भी अभी यह तय नहीं है कि केस मां-बाप के खिलाफ कितना वजनदार है।
अब हम सिर्फ बहस के लिए एक ऐसी नौबत सोचते हैं जिसमें कि इस बच्ची के मां-बाप अदालत से बरी हो जाते हैं। आगे चलकर अगर ऐसा होता है, तो इन बीते चार बरसों में, या इनकी गिरफ्तारी के बाद के ढाई-तीन बरस में इनकी जो प्रताडऩा हुई है, उसकी भरपाई कैसे होगी? जब भारतीय न्याय-व्यवस्था की भावना यह है कि चाहे सौ कुसूरवार छूट जाएं, एक भी बेकसूर को सजा नहीं होनी चाहिए, तो ऐसे में कत्ल की शिकार लड़की के मां-बाप की बरसों तक चली जांच और बरसों तक चली प्रताडऩा हमें एक बड़ी बेइंसाफी लगती है। मां-बाप पर शक करने की अगर कोई वजह है तो भी या तो यह जांच कुछ जल्दी होनी चाहिए थी, या फिर मां-बाप को इतने लंबे समय तक मुकदमे की सुनवाई के पहले जांच और अदालत की प्रताडऩा से दूर रखना चाहिए था। हो सकता है कि ऐसी नौबत देश में बहुत से दूसरे लोगों के सामने भी आती हो, लेकिन उन सबके बारे में भी हमारा यही मानना है कि जुर्म साबित होने के पहले की प्रताडऩा, सामाजिक सजा की लंबाई कम होनी चाहिए। क्योंकि आज जिस रफ्तार से यह प्रताडऩा और सजा इस बच्ची के मां-बाप पा रहे हैं, वह न्याय की भावना के हिसाब से बहुत ही नाजायज है। किसी भी मां-बाप को इतनी लंबी प्रताडऩा से नहीं गुजारना चाहिए। यह कहते हुए हम यह भी जानते हैं कि इसी देश में तकरीबन हर दिन कहीं न कहीं मां-बाप अपने बच्चों का कत्ल करवाते पकड़ा रहे हैं, और बहुत से मामले सही भी साबित हो रहे हैं। लेकिन ऐसे तमाम मामलों में जांच के दौरान की बरसों की जेल ठीक नहीं है। जांच एजेंसियों के सुबूत और गवाह तेजी से जुटाकर उनकी हिफाजत का इंतजाम कर लेना चाहिए और फिर संदिग्ध रिश्तेदारों को जमानत मिलने देना चाहिए जो कि उनका हक भी है।
यह मौका मीडिया के लिए यह सोचने का भी है कि दिल्ली में टीवी चैनलों के कैमरों की अंधाधुंध मौजूदगी की वजह से क्या इतना बड़ा कवरेज ठीक है जिससे कि बाकी देश पर एक बुरा असर पड़े? एक वक्त भारत में अपराध की कहानियों वाली कुछ पत्र-पत्रिकाएं देश की सबसे बड़ी समाचार पत्रिकाओं से भी अधिक बिकती थीं। आज टीवी के समाचार चैनल या तो पुलिस के हुलिए में, या किसी अपराधी के हुलिए में अपने स्टूडियो से अपराध की घटनाओं को उसी तरह पेश करने लगे हैं। ऐसे बुलेटिनों से परे भी जब मुख्य समाचार बुलेटिन हत्या के शक में गिरफ्तार मां-बाप को जरा-जरा सी अदालती घट-जोड़ के लिए दिखाते चलते हैं तो यह भी एक भयानक नौबत है। इस पर सभी तबकों को सोचना चाहिए।

पुराने सामानों का दान तो अच्छा है लेकिन किफायत से जीना और अच्छा

संपादकीय
12 अक्टूबर 2017


दीवाली का मौका घर, दुकान, या दफ्तर की सफाई का भी रहता है, और जो लोग बहुत तंगदिल नहीं रहते, वे ऐसे मौके पर अपना कुछ फालतू का सामान आसपास के जरूरतमंद लोगों को बांट भी देते हैं। लोगों की यह दरियादिली उनके करीब काम करने वाले लोगों की मदद तो हो जाती है, लेकिन वह सबसे जरूरतमंद लोगों तक पहुंच जाए, ऐसा नहीं हो पाता है। ऐसा करने के कुछ अलग-अलग तरीके हैं जो कम या अधिक हद तक कारगर हैं। इनमें से एक तरीका दुनिया के कई देशों में नेकी की दीवार के नाम से चल निकला है, और शहर में लोग अपने गैरजरूरी कपड़े ले जाकर उस दीवार पर टांगने लगते हैं, और जरूरतमंद लोग वहां से ले जाने लगते हैं। लेकिन यह जरूरी नहीं है कि सारे लोग सामाजिक सरोकार की जिम्मेदारी को समझ सकें, और जरूरत रहने पर ही कपड़ों को वहां से ले जाएं। यह निगरानी मुमकिन भी नहीं है, और इसके बिना भी शायद कुछ लोगों को तो कपड़े या दूसरे सामान यहां से मिल जाते हैं।
अभी कुछ दिन पहले अमिताभ बच्चन के शो, केबीसी पर एक ऐसे समाजसेवी को बुलाकर उससे लंबी चर्चा की गई थी जो कि देश भर में इस तरह का काम अधिक संगठित और व्यवस्थित रूप से कर रहा है। लेकिन इसके लिए किसी परमाणु तकनीक की जरूरत नहीं है, और लोग अपने-अपने स्तर पर, अपने-अपने शहर में भी ऐसा कर सकते हैं। कपड़े और दूसरे सामान इकट्ठा किए जा सकते हैं, उनमें कोई मामूली काम हो तो वह किया जा सकता है, और जरूरतमंद लोगों तक उसे पहुंचाने का भी कोई एक रास्ता निकाला जा सकता है। लेकिन इसी मुद्दे पर कल सोशल मीडिया में अमरीका में बसे एक भारतवंशी ने दो बातें लिखी हैं। उन्होंने लिखा कि पुराने कपड़ों को दान देना अधिक खतरनाक हो सकता है, क्योंकि ऐसे में लोग अपनी जरूरत से बहुत अधिक कपड़े खरीदते जा सकते हैं, और उन्हें इस्तेमाल करने के बाद दूसरों को दे सकते हैं, और आत्मसंतुष्टि भी पा सकते हैं। इसके बजाय धरती के लिए बेहतर यह होगा कि लोग खुद ही कम कपड़े खरीदें, उनका अधिक से अधिक इस्तेमाल करें, और धरती पर सामानों का बोझ न बढ़ाएं।
यह बात एक नया नजरिया पेश करती है कि अपने गैरजरूरी सामान दूसरों को देना तो अच्छा है, लेकिन अपने इस्तेमाल के जरूरी सामानों के बाद और अधिक सामानों को लेना, धरती और पर्यावरण को बड़ा नुकसान पहुंचाना होता है। इसलिए लोगों के मन में दान देने की संतुष्टि अपने सामानों को बढ़ाते जाने के बाद उन्हें लोगों में बांटने से आना काफी नहीं है। अपने इस्तेमाल में किफायत बरतने के बाद दूसरों की मदद सीधे करना, उन गरीबों के भी अधिक काम का होगा, और धरती को भी उससे नुकसान घटेगा। और ऐसा भी नहीं है कि संपन्न लोगों में कुछ लोग ऐसी सोच के नहीं रहते हैं। कई बरस पहले गोदरेज कंपनी के मालिकान में से एक छत्तीसगढ़ आए थे, और वे फटे-पुराने सरीखे कपड़े पहने हुए थे, और वे साल भर अलग-अलग शहरों में जाकर वहां के समाज सेवा के अच्छे काम करने वाले संगठनों को दान देने का ही काम करते थे। भारत की दो-तीन सबसे बड़ी कम्प्यूटर कंपनियों को बनाने वाले अजीम प्रेमजी या नारायण मूर्ति जैसे लोग विमान में साधारण दर्जे में सफर करते हैं, और गिने-चुने सामान का इस्तेमाल करते हैं। दुनिया के बहुत से ऐसे खरबपति हैं जिन्होंने पिछले कई दशक महज दो जोड़ी जूतों में निकाल दिए हैं। दो सबसे बड़ी कम्प्यूटर कंपनियों के मालिकों को देखें, तो एप्पल बनाने वाले, अब गुजर चुके, स्टीव जॉब्स और आज फेसबुक के मालिक मार्क जुकरबर्ग एक ही रंग की टी-शर्ट, और एक ही तरह की जींस में अपने सबसे बड़े समारोहों में मंच पर दिखते आए हैं। इनके पास और किस्म के कपड़े भी बहुत सीमित हैं या थे।
अपने अतिरिक्त सामानों को दूसरों को बांट देने की तसल्ली तो ठीक है, लेकिन अपनी जरूरतों को किफायत के साथ इस्तेमाल करना अधिक समझदारी है, और धरती का सम्मान करना भी है। अभी दुनिया में कई लोग ऐसे प्रयोग भी कर रहे हैं कि छह महीने या साल भर का वक्त वे कुल पचास सामानों के साथ गुजार रहे हैं, और एक भी दूसरा सामान इस्तेमाल नहीं करते। भारत में तो जैन धर्म से लेकर गांधी तक बहुत किस्म की सोच किफायत की जिंदगी सुझाती है, और लोगों को इस बारे में सोचना भी चाहिए। फिलहाल लोग जो सामान ले चुके हैं, और इस्तेमाल करके थक गए हैं, उनको दीवाली के मौके पर अपनी छाती से बोझ कम करना चाहिए। 

सुषमा-निर्मला की इंसानियत फौज से अधिक ताकतवर...

संपादकीय
11 अक्टूबर 2017


भारत की रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण पहली बार भारत-चीन सरहद पर पहुंचीं, तो चीनी हिस्से में वहां के सैनिक भी खड़े हुए थे। सिक्किम में वे भारतीय सैनिकों से मिलने गई थीं, लेकिन नाथू ला चौकी पर अपने इलाके में उत्सुकता के साथ खड़े हुए चीनी फौजी अफसरों से भी उन्होंने बात की। उन्हें नमस्ते किया, और नमस्ते का मतलब समझाया, नफरत और तनाव से दूर विनम्रता और मित्रता की जुबान में अनौपचारिक चर्चा की, और फिर इसका वीडियो खुद रक्षा मंत्रालय ने जारी किया। एक जरा सी दरियादिली और इंसानियत ने सरहद के दोनों तरफ लोगों का दिल जीत लिया, और भारत के साथ-साथ चीन के मीडिया ने भी निर्मला सीतारमण की बड़ी तारीफ की।
हमारे पाठकों को याद होगा कि दो-तीन दिन पहले ही हमने इसी जगह भारत के वायुसेना अध्यक्ष के उस भड़काऊ बयान के खिलाफ लिखा था जिसमें उन्होंने पाकिस्तान के परमाणु ठिकानों पर हमला करने की भारतीय वायुसेना की क्षमता का जिक्र किया था। पड़ोस के देशों से संबंध अच्छे और बुरे रखने में कुछ बुनियादी फर्क रहते हैं। रिश्ते अच्छे हों तो फौजी तैयारियों पर खर्च घटता है, और रिश्ते खराब हों, तो गरीबों के मुंह का निवाला छीनकर हथियारों के कारखानों को दौलतमंद बनाया जाता है, सरहद के गांव तनाव में जीते हैं, लोग अपनी जिंदगी खोते हैं, और देश का ध्यान अपने असल और बुनियादी मुद्दों को छोड़कर जंग की सनक पर खर्च होता है। भारत के दो तरफ चीन और पाकिस्तान ऐसे देश हैं जिनके साथ पहले जंग हो चुकी है, और आज इन तीनों देशों की जंग की तैयारियों में कम से कम भारत और पाकिस्तान तो ध्यान में रहते ही हैं, पाकिस्तान की चीन के खिलाफ, और चीन की पाकिस्तान के खिलाफ कोई तैयारी नहीं रहती।
फौजी अफसर चाहे जिस देश में हो, उनको जंग का रास्ता इसलिए सुहाता है कि उन्हें अपने बची हुई नौकरी में जंग का एक तमगा मिलने की हसरत रहती है। लेकिन दूसरी तरफ हम देखें कि भारत में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज आए दिन यह ट्वीट करती हैं कि पाकिस्तान के किस परिवार को भारत में जीवनरक्षक ऑपरेशन के लिए वीजा दिया गया, और ऐसे परिवार इलाज के पहले या इलाज के बाद उनसे मिलकर शुक्रगुजार भी होते हैं। अब निर्मला सीतारमण ने भी वैसी ही इंसानियत वाली यह बहुत छोटी सी पहल की है, और देशों के बीच बंद कमरों की बड़ी-बड़ी बातचीत के मुकाबले इस छोटी सी बात ने सबको जीत लिया। इसलिए फौजी तैयारियां धरी रह जाती हैं, पेशेवर डिप्लोमेसी धरी रह जाती है, और आखिर में इंसानियत ही असरदार होती है। हम ऐसी छोटी-छोटी दोस्ताना बातों की अहमियत इसलिए बहुत मानते हैं कि इनके बढऩे से देशों के बड़े-बड़े खर्च घटते चलेंगे, और उसी की जरूरत भी है।
यह बात हर किसी को समझना चाहिए कि दुनिया भर में हथियारबंद आंदोलनों से लेकर देशों के बीच जंग तक को भड़काने में सबसे बड़ी दिलचस्पी हथियारों के कारखानेदारों की होती है। वे एक तरफ बागियों को हथियार बेचते हैं, और दूसरी तरफ उन देशों की सरकारों को। इसके साथ-साथ देशों की सरहद पर किसी तनाव के होने पर ये कारखानेदार दोनों ही देशों को हथियार खरीदने की तरफ धकेलते हैं, और खुद मोटा मुनाफा कमाकर उन देशों को कंगाल बनाते हैं। भारत, पाकिस्तान, और चीन को समझदारी दिखाते हुए सरहद के तनाव को घटाना चाहिए, आपस में दोस्ताना रिश्तों को बढ़ाना चाहिए, और जंग की हसरत पालने वाले अफसरों को काबू में रखना चाहिए। हम कई बार इस बात को लिखते हैं कि जंग की बातें उनको अधिक सूझती हैं, जो सरहदों से दूर राजधानियों में बसते हैं, और वहां बैठकर फैसले लेते हैं। यह बात भी समझनी चाहिए कि जंग का फैसला लेने वाले कभी भी सरहद पर नहीं मारे जाते, कभी भी किसी जंग में भी नहीं मारे जाते हैं, जंग में शतरंज की बिसात सरीखे छोटे प्यादे ही मारे जाते हैं, वजीर तो राजधानियों में बैठे हुए हथियार खरीदी में कमीशन खाते रहते हैं। हर देश में वहां की जनता को ही पड़ोसी देशों की जनता के साथ दोस्ताना रिश्ते इतने बढ़ाने चाहिए कि सरकारों को अपनी जनता को अनदेखा करना मुमकिन न रह जाए। हम सुषमा स्वराज और निर्मला सीतारमण के ऐसे सकारात्मक कदमों का स्वागत करते हैं, और जनता को भी खुले दिल से, राजनीति को अलग रखकर अमन की तरफ बढ़ाए जाते ऐसे कदम की तारीफ करनी चाहिए ताकि ऐसे नेताओं का हौसला बढ़ सके।

बड़ी-बड़ी कामयाबियों के बीच छोटी-छोटी दिक्कतों का अंबार

संपादकीय
10 अक्टूबर 2017


छत्तीसगढ़ में सरकार एक-एक फैसले पर हजार-हजार करोड़ रूपए खर्च कर रही है, और कहीं किसानों को धान-बोनस दिया जा रहा है, तो कहीं गरीबों को स्मार्ट फोन देने के लिए हजार करोड़ से अधिक इस बरस के बजट में रखा गया है। यहां के शहरों को देखें तो उन पर बड़ी रकम खर्च हो रही है, और लोग अगर दस बरस बाद राजधानी रायपुर आ रहे हैं तो वे इसकी शक्ल को पहचान नहीं पा रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ एक भी दिन का अखबार ऐसा नहीं होता जिसमें कहीं न कहीं बीमार को या लाश को खाट पर, कुर्सी पर, या ठेले पर लेकर जाते हुए लोग न दिखते हों। और अगर ऐसी एक तस्वीर सामने आती है, तो शायद उसके पीछे दर्जन भर ऐसे मामले और रहते होंगे जिनके आसपास कोई कैमरा न रहता हो। कमोबेश यही हाल प्रदेश के सरकारी अस्पतालों का है, और उन सरकारी दफ्तरों का है जहां पर गरीबों का काम अधिक पड़ता है। ऐसी जगहों पर जब लोगों के काम नहीं होते हैं, तो उसी का नतीजा होता है कि लोग मुख्यमंत्री के जनदर्शन में पहुंचते हैं, और उनसे नीचे अब कलेक्टरों के जनदर्शन में भी सैकड़ों लोग पहुंचने लगे हैं।
एक तरफ तो मुख्यमंत्री या कलेक्टर अपने ऐसे जनदर्शन की भीड़ को, उसमें आने वाली समस्याओं के समाधान को एक बड़ी कामयाबी मान सकते हैं, लेकिन उसके साथ-साथ यह भीड़ सबसे पहले तो इस बात का सुबूत है कि सरकार की नियमित व्यवस्था काम नहीं कर रही है, और इसीलिए लोग पूरे प्रदेश से चलकर मुख्यमंत्री निवास पहुंचते हैं, या कि पूरे जिले से चलकर कलेक्टर से मिलने आते हैं। यहां पहुंचे हुए लोगों की भीड़ उन निराश लोगों में से एक फीसदी से अधिक नहीं हो सकती जो कि सरकारी दफ्तरों के, अस्पतालों के, चक्कर काट काटकर थक चुके हैं। इसके साथ-साथ अगर पुलिस के पास पहुंचने वाली शिकायतों को देखें, तो उनमें से हर दिन कोई न कोई एक ऐसी आत्महत्या, या आत्महत्या की कोशिश की खबर आती है जिसमें कहीं कोई लड़की छेडख़ानी की शिकार है, और उसकी शिकायत पर गुंडों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। बहुत सी शिकायतें ऐसी भी रहती हैं जिसमें कोई लड़की या महिला बलात्कार की शिकायत के बाद पुलिस कार्रवाई का इंतजार करते-करते मरने की धमकी-चेतावनी देती है, तब जाकर कोई कार्रवाई होती है। हर हफ्ते शायद ऐसी खबर आती है कि सरकार की कार्रवाई के इंतजार में थक चुके आम नागरिक या सरकारी कर्मचारी ने इच्छामृत्यु की इजाजत मांगी है।
हम दो बातों को जोड़कर एक साथ आज यहां इसलिए लिख रहे हैं कि एक तरफ तो सरकार जनसुविधाओं पर बहुत बड़ा खर्च कर रही है, और जनकल्याण के लिए लोगों को सीधे फायदा भी दे रही है। और दूसरी तरफ सरकरार के इस विशाल ढांचे, और विशाल खर्च के बावजूद सबसे कमजोर तबके के लोग किसी कार्रवाई या किसी इंसाफ के लिए भटकते रहते हैं। इससे एक बात खुलकर दिखती है कि सरकार का अपना ढांचा जवाबदेही से परे है, सरकार में काम करते लोग संवेदनाशून्य से हैं। और दिक्कत यह है कि बड़ी-बड़ी कामयाबी की खबरों के बीच बहुत छोटी-छोटी, लेकिन बहुत बड़ी संख्या में नाकामयाबी की खबरें दब जाती हैं। सत्ता पर बैठे हुए लोग एक किस्म से आत्मसंतुष्ट भी हो जाते हैं कि उन्होंने अपने कार्यकाल में कितना कुछ किया है, और इस करने के मुकाबले न की गई, या कि न की जा सकीं चीजें कितनी छोटी-छोटी हैं। ये चीजें छोटी जरूर हैं, लेकिन संख्या में बहुत बड़ी हैं।
हमारा यह भी मानना है कि सरकारी कामकाज में बेहतरी को लेकर कई बार इस्तेमाल होने वाला शब्द, प्रशासनिक-सुधार, यह एक कारगर शब्द तो हो सकता है, अगर इसे अच्छी नीयत और पक्के इरादे के साथ लागू किया जाए। लेकिन अभी तक का हमारा अनुभव यह है कि राज्य में मुख्य सचिव रह चुके लोगों को प्रशासनिक सुधार का काम दिया जाता है, और अगर उनमें प्रशासनिक सुधार की क्षमता होती, तो राज्य के प्रशासनिक मुखिया रहते हुए इसे करने का पूरा मौका उनके पास था, और वे उसे नहीं कर पाए, या कि वह करना उनकी क्षमता और दिलचस्पी से परे का था। ऐसे चुक चुके लोगों को ऐसी जिम्मेदारी देने का मतलब उनके लिए किसी पुनर्वास का इंतजाम तो हो सकता है, लेकिन यह किसी भी तरह के प्रशासनिक सुधार की संभावनाओं को खत्म कर देता है। सरकार को अगर सचमुच ही प्रशासनिक सुधार करना है तो उसे सरकार के बाहर के लोगों से राय मांगनी होगी, और जब तकलीफ पाकर भुक्तभोगी बने हुए लोग कोई सुझाव देंगे, तो उसे सुनने, उनमें से सही सुझावों को मानने, और उन पर ताकत से अमल करवाने से ही कुछ अच्छा हो सकता है। सरकार का विशाल ढांचा, विशाल बजट, उसकी बड़ी-बड़ी महत्वाकांक्षाएं ये अगर जनता की बहुत ही नियमित, बहुत ही उजागर, छोटी-छोटी दिक्कतों को दूर करने के बारे में कुछ नहीं कर पाते, तो यह जनता को निराश करने वाली नौबत ही रहती है।