यह किस स्तर पर उतर गया है गुजरात का चुनाव प्रचार?

संपादकीय
30 नवम्बर 2017


चुनावों के वक्त प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हमलावर तेवरों के साथ हर बार बहुत सी ऐसी बातें कहते सुनाई देते हैं जो कि चुनावी हड़बड़ी का एक सुबूत तो हो सकती है, लेकिन जो न तो प्रधानमंत्री के पद की मर्यादा के लायक बात होतीं, और न ही किसी बड़े नेता के मुंह से सुहातीं। गुजरात में उन्होंने इंदिरा गांधी की ऐसी तस्वीर का जिक्र किया जो कि लाशों की बदबू के बीच खड़ी थीं, और नाक पर उन्होंने रूमाल रखा हुआ था। इसे लेकर मोदी ने अपने भाषणों में कहा कि उनको गुजरात से बदबू आती थी, और हमें खुशबू आती है। इसके जवाब में तुरंत ही मीडिया में ऐसी तस्वीरें आईं जो कि मौरवी की उस बाढ़ के वक्त आरएसएस के स्वयं सेवकों की हैं जो कि लाशों के बीच काम करते हुए नाक पर रूमाल और कपड़ा बांधे हुए हैं। जाहिर है कि लाशों के बीच, चाहे वे घर के लोगों की ही क्यों न हों, अगर वहां बदबू फैली हुई है तो लोग नाक पर रूमाल तो रखेंगे ही, चाहे वह इंदिरा गांधी हो, चाहे वह आरएसएस स्वयं सेवक हों। दूसरी बात मोदी की पार्टी की तरफ से राहुल गांधी के हिन्दू होने न होने को लेकर उठाई गई, और यह चुनौती उछाली गई कि आज राहुल जिस मंदिर में जा रहे हैं, सोमनाथ का वह मंदिर उनके नाना-परनाना का बनवाया हुआ नहीं है। ये दोनों बातें मोदी के आम चुनावी तेवरों की तो हैं, लेकिन उन्होंने और उनकी पार्टी ने देश के भीतर एक बहुत ही बड़ी तकलीफ भी पैदा की है कि जिस गुजरात में मोदी ने कई कार्यकाल पूरे किए, और जहां 22 बरस से उनकी पार्टी की सरकार है, वहां पर आज इस स्तर पर प्रचार करना पड़ रहा है? क्या किसी के किसी मंदिर में जाने पर इसलिए रोक लग सकती है कि वह मंदिर उसके पुरखों ने नहीं बनवाया है? लोकतंत्र अगर पुरखों का हिसाब करने बैठे तो देश के बहुत से नेताओं, पार्टियों, और संगठनों पर बहुत बड़ी-बड़ी देनदारी निकल जाएगी।
इसके जवाब में कांग्रेस ने राहुल गांधी की जनेऊधारी तस्वीर जारी करते हुए यह साफ किया है कि वे हिन्दू हैं, इस तस्वीर में शायद प्रियंका की शादी होते दिख रही है, और दुल्हन के भाई के रूप में राहुल गांधी जनेऊ पहने कुछ रस्म पूरी कर रहे हैं। यह बात अपने आपमें तकलीफदेह है कि देश के सबसे विकसित राज्य होने का दावा करने वाले गुजरात में चुनाव को इस घटिया स्तर पर ले जाया गया है कि लोगों को अपना जनेऊ दिखाना पड़ रहा है। इसी चुनाव के मौके पर उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ यह कहते सुनाई देते हैं कि राहुल गांधी को मंदिर में बैठना भी नहीं आता, और वे जब ऐसे बैठे कि मानो नमाज पढ़ रहे हों, तो पंडित को उन्हें ठीक से बैठने को कहना पड़ा। इसी मौके पर भाजपा के सबसे बड़बोले, और खासे कमअक्ल प्रवक्ता संबित पात्रा टीवी पर यह बोलते हैं कि राहुल के दादा फिरोज गांधी पारसी नहीं थे, मुस्लिम थे, और उन्हें फिरोज गांधी नहीं, फिरोज खान कहना चाहिए।
चुनाव तो आएंगे और चले जाएंगे, और हो सकता है कि चुनावों में जीत भी साम्प्रदायिक बातों से परे की है, लेकिन यह समझ लेना चाहिए कि देश में गंदगी की बातें इतिहास में अच्छी तरह दर्ज हो जाती हैं, चाहे उन्हें किसी भी पार्टी के लोग क्यों न कहें। लोगों के मंदिर जाने पर अगर उन पर ऐसे ओछे हमले होने लगें कि उनकी वल्दियत का धर्म उठाया जाने लगे, उनके हिन्दू होने न होने पर सवाल उठने लगे, और एक राज्य का मुख्यमंत्री घोर साम्प्रदायिक बयान देकर किसी को पूजा में नमाजी अंदाज में बैठने वाला कहने लगे, तो चुनाव प्रचार के ऐसे तरीकों को धिक्कार है। बाईस बरस के राज के बाद भी अगर प्रधानमंत्री और भाजपा बहस को विकास की ओर से मोड़कर धार्मिक उन्माद की ओर ले जा रहे हैं, तो यह तकलीफदेह बात है। ऐसा लगता है कि गुजरात का विकास वहां चल रहे एक नारे के मुताबिक पागल तो नहीं हुआ है, लेकिन वह मोर्चा छोड़कर, मुंह छुपाकर भाग निकला है।
इस मौके पर लोकतंत्र की एक भावना को भी समझने की जरूरत है। लोकतंत्र महज चुनावी आंकड़ों में फतह पाने का नाम नहीं है, आंकड़ों से परे लोकतंत्र की एक भावना भी है जो कि चुनावी नतीजों से साबित नहीं होती, और सत्ता जिसका विकल्प नहीं रहती। देश में धार्मिक ध्रुवीकरण करके या जाति के आधार पर, या किसी और मुद्दे पर जनमत संग्रह की तरह चुनाव मतदान लोकतंत्र नहीं है। अगर ऐसा ही होता तो लोकतंत्र में सभी मुद्दों पर अलग-अलग जनमत संग्रह करवा लिया जाता, और फिर किसी संसद की जरूरत नहीं होती, अदालत की जरूरत भी नहीं होती। बहुमत किसी भी तरह से लोकतंत्र का एक विकल्प नहीं है, बहुमत लोकतंत्र में सरकार तक पहुंचने का एक कानूनी रास्ता जरूर है, बहुमत कोई कानून नहीं है। इसलिए बहुमत का हवाला देते हुए देश की बुनियादी संस्कृति, देश की गंगा-जमुनी तहजीब के खिलाफ ओछी बातें हो सकता है कि किसी चुनाव में लोगों को बहुमत दिला दें, लेकिन इतिहास में सम्मान नहीं दिला सकतीं। आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जिस स्थिति में हैं, उन्हें, और उनकी पार्टी को, ऐसे बहुमत के लिए मेहनत करने के बजाय सम्मान के लिए, देश की एकता के लिए, देश में सर्वधर्म समभाव के लिए, देश में बेहतर संस्कृति के लिए कोशिश करनी चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 30 November

फोन तो स्मार्ट हो गए इंसान स्मार्ट न बन पाए

संपादकीय
29 नवम्बर 2017


भारत सरकार ने मोबाइल फोन के ऐसे दर्जनों एप्लीकेशन पहचाने जिनसे चीन में रखे हुए कम्प्यूटर भारतीय लोगों की जानकारी को वहां दर्ज कर रहे हैं, और उनकी जासूसी कर रहे हैं। ऐसे एप्लीकेशन इस्तेमाल न करने की सलाह सरकार ने अपनी सुरक्षा एजेंसियों के कर्मचारियों को दी है, लेकिन आम जनता इससे बेफिक्र होकर लगातार स्मार्ट फोन पर टिकी हुई है, और उसकी सेहत पर ऐसी चेतावनियों का कोई असर नहीं पड़ता। यह बात सिर्फ कम भरोसेमंद एप्लीकेशनों की नहीं है, बल्कि गूगल के भी बहुत से फीचर ऐसे हैं जो कि लोगों की जासूसी करते हैं, उनकी जानकारी दर्ज करके रखते हैं। और ऐसे एप्लीकेशन हर कुछ हफ्तों में अपने में कुछ फेरबदल करते हैं, और उन्हें इस्तेमाल करने वालों से कई तरह की इजाजत मांगते हैं, और लोग बिना देखे-समझे अमूमन ऐसी इजाजत दे भी देते हैं।
लोग अगर अपने ही फोन को देखें कि गूगल किस तरह उनके किसी भी जगह आने-जाने की जानकारी दर्ज करके रखता है, तो वे अपनी जानकारी का इतना खुलासा देखकर हड़बड़ा जाएंगे कि वे जहां जाते हैं, वहां कितनी देर रूकते हैं, यह सारी जानकारी आने-जाने के नक्शे सहित दर्ज है, और उनका फोन चोरी करके भी कोई इस तमाम जानकारी को हासिल कर सकते हैं। लोगों के पास स्मार्ट फोन तो आ गए हैं, 4जी रफ्तार का इंटरनेट भी आ गया है, इंटरनेट पर मौजूद करोड़ों एप्लीकेशनों तक उनकी पहुंच भी हो गई है, लेकिन उनका खुद का बर्ताव और उनकी समझ स्मार्ट नहीं हो पाए हैं। लोग आज भी दूसरों के कहे हुए किसी भी एप्लीकेशन को तुरंत डाऊनलोड कर लेते हैं, और उसे सभी तरह की इजाजत भी दे देते हैं। हमने पहले भी इसी जगह कई बार लोगों को सावधान किया है कि मुजरिमों से लेकर देश-विदेश की खुफिया एजेंसियों तक की नजर लोगों की खरीददारी पर, उनके नैतिक-अनैतिक संबंधों पर, उनकी आवाजाही के नक्शों पर रहती है, और आज चाहे वे लोग अपने को इतना महत्वपूर्ण न पाते हों कि कोई उन पर नजर रखे, लेकिन आगे चलकर कोई ऐसी नौबत आ सकती है कि कोई उनके इतिहास को खंगाले, और जानकारियों को निकाल ले।
दरअसल जिस रफ्तार से टेक्नालॉजी ने छलांग लगाई है, लोगों की समझ उसके मुकाबले जरा भी आगे नहीं बढ़ पा रही है। लोग अपनी पिछली सदी की सोच को लेकर इस सदी की टेक्नालॉजी का इस्तेमाल कर रहे हैं, इससे वे अपने खुद के लिए बहुत से खतरे खड़े करते जा रहे हैं, अपनी सारी निजता को खतरे में डालते जा रहे हैं। आज भारत जैसे देश में आधार कार्ड जैसी एक अकेली चीज पर निगरानी रखकर सरकार किसी इंसान के पल-पल पर नजर रख सकती है, शायद रख भी रही है। एक आधार कार्ड से लोगों के मोबाइल फोन जुड़ गए हैं, बैंक खाते जुड़ गए हैं, उनकी खरीदी और खर्च जुड़ गए हैं। सरकार की खुफिया एजेंसियां एक आधार कार्ड नंबर से यह पता लगा सकती हैं कि किस हिन्दुस्तानी ने कितनी सांसें किस जगह पर ली हैं, किन दूसरे लोगों से वे मिले हैं, क्या खाया-पिया है, क्या बातें की हैं, क्या खरीदी की है, किससे रूपए लिए-दिए हैं। यह वक्त स्मार्ट फोन के टक्कर का स्मार्ट बनने का है। जो लोग ऐसा नहीं कर रहे हैं, वे सरकार और कारोबार, दोनों के निशाने पर हैं। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 29 November

सुप्रीम कोर्ट के जज दो धर्मों के बीच शादी के खिलाफ जैसे क्यों लग रहे हैं?

संपादकीय
28 नवम्बर 2017


केरल की एक पच्चीस बरस की हिंदू युवती ने एक मुस्लिम युवक से शादी की, और उसके बाद उसे लव-जेहाद करार देते हुए भारत सरकार ने ऐसी कुछ और शादियों के मामलों को राष्ट्रीय जांच एजेंसी, एनआईए को जांच के लिए दे दिया। यह एजेंसी बनते समय यह कहा गया था कि यह आतंक के मामलों की जांच के लिए बनाई जा रही है क्योंकि ऐसे मामले एक से अधिक राज्यों तक बिखरे रहते हैं, और उनकी तेजी से जांच के लिए ऐसी एक एजेंसी जरूरी है। अब दो धर्मों के बीच की शादियों को मानो आतंक का दर्जा देते हुए ऐसी जांच शुरू की गई जो कि इस शादी के दोनों पक्षों के बुनियादी हक के खिलाफ बात पहली नजर में ही दिखती है। लेकिन कानून की बारीकियां और उलझनें ऐसी रहीं कि यह मामला हाईकोर्ट से होते हुए अब सुप्रीम कोर्ट में है, और कल इसकी सुनवाई के दौरान जजों ने एक बालिग शादीशुदा महिला के निजी फैसलों पर जिस तरह से दखल दिया है, वह हक्का-बक्का करने वाला है। शादी के बाद वह महिला अपने पति को अभिभावक के रूप में चाहती थी, तो सुप्रीम कोर्ट के जज ने अपनी खुद की मिसाल दी कि वे भी अपनी पत्नी के अभिभावक नहीं हैं। इसके साथ ही जज ने उस कॉलेज के डीन को इस महिला का अभिभावक बनाया जहां वह आगे पढ़ाई करना चाहती है। एनआईए की जांच और नीचे की अदालत के चलते पिछले ग्यारह महीनों से इस महिला को उसके हिंदू मां-बाप के हवाले किया गया था, और करीब एक बरस उनके साथ रहने के बाद भी उसने अदालत में कहा कि वह अपने पति के साथ रहना चाहती है, उसकी पढ़ाई का खर्च उसका पति उठाएगा, और वह अपने पति को ही अभिभावक के रूप में चाहती है।
सुप्रीम कोर्ट के जजों का इस बारे में रूख बड़ा हैरान करने वाला है। जहां एक तरफ एनआईए की इस पूरी जांच को खारिज किया जाना चाहिए था, अदालत ने वह तो किया नहीं, दूसरी तरफ जजों ने कुछ ऐसा रूख दिखाया है कि पच्चीस बरस की यह युवती अपनी जिंदगी के फैसले लेने के लायक नहीं है। जजों ने इस बात को भी अनदेखा किया कि एक शादीशुदा महिला को करीब साल भर जबर्दस्ती उसके मां-बाप के पास रखा गया, पति से दूर रखा गया, फिर भी वह चट्टान की तरह अपने फैसले, अपने इरादे, और अपने पति के साथ खड़ी हुई है। ऐसे में भारी पूर्वाग्रह से भरी हुई दिखती इस जांच के अधकचरा नतीजों को जज इतनी गंभीरता से ले रहे हैं कि वे इस युवती के मौलिक अधिकारों के ऊपर एनआईए की साजिश की कहानी पर भरोसा कर रहे हैं। भारत की अदालत को इतने दकियानूसी अंदाज में काम नहीं करना चाहिए कि वे पच्चीस बरस की एक शादीशुदा युवती को अपनी जिंदगी के बारे में बोलने का हकदार भी न पाएं। यह पूरा सिलसिला बड़ा निराश करता है, और ऐसा लगता है कि अदालत दो धर्मों के बीच शादी के ही खिलाफ है। ऐसा आभास भी भारतीय लोकतंत्र के लिए बहुत ही खतरनाक है क्योंकि आज इस देश में कुछ ताकतें धर्मों के बीच एक अंतहीन तनाव खड़ा करना, और बढ़ाते चलना चाहती हैं, और उनकी नीयत को अदालत के ऐसे रूख से बड़ा बढ़ावा मिल रहा है। अभी इस मामले की सुनवाई जारी है, और अदालत का कोई फैसला नहीं आया है, महज टुकड़ा-टुकड़ा आदेश ही आ रहे हैं। लेकिन आज देश की धर्मनिरपेक्ष ताकतें, देश की आजादी की हिमायती ताकतें अदालत के फैसले के पहले के रूख को भी ध्यान से देख रही हैं, और बहुत निराश हो रही हैं। कल खबर आने से लेकर आज दोपहर तक सोशल मीडिया पर बहुत से जिम्मेदार अखबारनवीसों ने सुप्रीम कोर्ट के रूख पर बहुत ही निराशा जताई है, और उसके खिलाफ लिखा है। हादिया नाम की इस युवती को मां-बाप के घेरे से लेकर पुलिस के घेरे तक में सुप्रीम कोर्ट में खड़े रहकर इस हौसले के साथ जजों को जवाब दिया है, वह देखने लायक है। और अदालत को उसे यह कहने का भला क्या हक बनता है कि वह पहले अपनी पढ़ाई पूरी करे? वह पढ़े या न पढ़े, यह भला कैसे अदालत के सोचने-विचारने का मामला हो सकता है?

-सुनील कुमार

दीवारों पर लिक्खा है, 28 November

बलात्कार पर फांसी, निकम्मापन छुपाने का सरकार का पाखंड

संपादकीय
27 नवम्बर 2017


मध्यप्रदेश में कल यह तय किया है कि बारह बरस या उससे कम उम्र की लड़कियों से बलात्कार करने पर, या किसी भी उम्र की महिला से सामूहिक बलात्कार करने पर मौत की सजा दी जा सके। इसके लिए वहां की सरकार विधानसभा में कानून का प्रस्ताव ला रही है। इसके साथ-साथ महिलाओं के साथ बाकी किस्म के अपराधों पर भी कड़ी सजा का इंतजाम किया जा रहा है। अभी पिछले ही हफ्ते जब इस प्रस्तावित सजा पर चर्चा हो रही थी, कुछ लोगों ने यह राय रखी थी कि इस सजा का एक खतरा यह रहेगा कि लोग बलात्कार के बाद बलात्कार की शिकार को मार ही डालेंगे क्योंकि सजा तो हत्या जितनी ही बलात्कार की भी मिलेगी, ऐसे में सुबूत या गवाह को क्यों छोड़ा जाए?
हम इसके पहले भी कई बार यह बात लिख चुके हैं कि भारत को एक सभ्य लोकतंत्र के रूप में मौत की सजा खत्म करनी चाहिए। दुनिया के बेहतर देशों में एक-एक करके इसे खत्म किया जा रहा है, खासकर उन देशों में जहां पर लोकतंत्र के बारीक पहलुओं को महत्व दिया जाता है। अमरीका में भी कई राज्यों में यह सजा खत्म हो चुकी है, और तकरीबन हर राज्य में इसका बड़ा विरोध होता है। इस आधार पर भी भारत में अधिक किस्म के अपराधों पर मौत की सजा का विस्तार करना एक गलत सिलसिला है। दूसरी बात यह है कि अधिक कड़ी सजा से किसी अपराध में कमी आती हो ऐसा जुर्म के इतिहास के इतिहास में कहीं स्थापित नहीं है। बलात्कारियों को मौत की सजा दी जाए, या नहीं, इसका फैसला करते हुए सरकारों के सामने जब सड़कों और चौराहों पर भीड़ चीखती होती है, तब वोटों से चुनी गई सरकारें आमतौर पर कड़वे फैसले नहीं ले पातीं। लेकिन हमारा मानना है कि कानून का फेरबदल भीड़ के सिरों को गिनकर नहीं होना चाहिए, बल्कि इस नजरिए से होना चाहिए कि उसके असर से जुर्म कम हों। जो लोग बलात्कार के लिए मौत की सजा मांग रहे हैं, उनको यह समझने की जरूरत है कि आज तो बलात्कारी पांच-सात बरसों में छूटकर बाहर आ जाते हैं। कल जब उनको पता होगा कि बलात्कार की सजा भी फांसी होगी, तो सुबूत खत्म करने के लिए उनके पास सबसे आसान तरीका होगा, बलात्कार की शिकार का कत्ल कर देना। न सुबूत, न गवाह, और न फांसी। इसलिए कानून में फांसी जोड़ देने से बलात्कार तो कम नहीं होंगे, सजा मिलना तो नहीं बढ़ेगा, कत्ल और बढ़ जाएंगे।
दरअसल जो सरकारें मौजूदा कानून को कड़ाई से लागू नहीं कर पाती हैं, वे अपनी नालायकी, और अपने निकम्मेपन को छुपाने के लिए कानून को और कड़ा करके यह जाहिर करती हैं कि वे सचमुच कुछ कर रही हैं। जबकि मध्यप्रदेश या भारत के किसी भी दूसरे राज्य में अगर सरकारें लड़कियों और महिलाओं को सामाजिक सुरक्षा दे पातीं, उनको बलात्कारियों से, छेडख़ानी करने वालों से बचा पातीं, तो फांसी की इस नई सजा का इंतजाम करने की नौबत भी नहीं आती। मध्यप्रदेश में देश के बाकी राज्यों के मुकाबले बलात्कार का अनुपात बहुत अधिक है। मध्यप्रदेश में दलितों पर अत्याचार भी बहुत अधिक है, और जहां-जहां दलित आदिवासी पर जुल्म अधिक होते हैं, वहां-वहां उनकी महिलाओं पर ऐसे जुल्म और जुर्म अनुपात से अधिक होते ही हैं। यह नौबत बदलने के लिए सरकार को कानून को कड़ा करने के बजाय मुजरिमों पर रोकथाम को कड़ा करने की जरूरत है। रसोई में अगर खाना जल गया है, तो गैस सिलेंडर को खुले में ले जाकर जला देना किसी बात का समाधान नहीं हो सकता। मध्यप्रदेश की राजधानी में ही पुलिस मां-बाप की बेटी सामूहिक बलात्कार के बाद 20 घंटे से अधिक भटकती रहे, थाने में रपट दर्ज कराने, और उसके बाद सरकारी डॉक्टर एक फर्जी मेडिकल रिपोर्ट बनाए कि उस लड़की के साथ कोई बलात्कार नहीं हुआ है, उसने अपनी सहमति और मर्जी से सेक्स किया है। जिस प्रदेश में सरकार में बैठे लोगों का महिलाओं के साथ यह रूख है, वहां पर मध्यप्रदेश सरकार मुजरिमों से यह उम्मीद करती है कि वे अधिक कड़ी सजा से डर-सहम जाएं।
समाज और सरकार, संसद और अदालत, अपनी नालायकी को छुपाने के लिए कानून को अधिक लायक बनाने में जुट जाते हैं। अगर चौकीदार सो रहा है, तो उसकी लाठी की जगह बंदूक, या मामूली बंदूक की जगह मशीनगन दे देने से क्या फर्क पड़ेगा? अगर कोई बच्चा पढऩे में दिलचस्पी नहीं रखता, तो उसे एक किताब की जगह दस किताबें दे देने से क्या फर्क पड़ेगा? दरअसल कड़े कानून की कड़ी-कड़ी बातें, लोगों के मुंह को अपने निकम्मेपन की कड़वाहट से बचा लेती हैं। यह सिलसिला बहुत घातक है। जहां समाज में महिला को पैदा होने के पहले से ही बराबरी के हक से परे कर दिया जाए, पेट में ही मार दिया जाए, या पैदा होते ही घूरे पर फेंक दिया जाए, ट्रेन में छोड़ दिया जाए, या पटक-पटककर मार दिया जाए, जहां कदम-कदम पर उससे शारीरिक और मानसिक बलात्कार हो, जहां उसे घर में बराबरी का खाना न मिले, दहेज की कमी से जिसे प्रताडऩा मिले या मर जाने पर मजबूर होना पड़े, जहां उसके साथ हुए बलात्कार की पुलिस जांच देश के आम निकम्मेपन की वजह से कमजोर हो, जहां पर अदालतें एक-एक पीढ़ी लगा दें फैसला करने में, जहां पर आखिरी अदालत के फैसले के बाद भी बच्चियों के बलात्कारी-हत्यारों को  राष्ट्रपति  माफ कर दे, उनको फांसी से बचा ले, वहां पर बलात्कारियों को फांसी की सजा का इंतजाम करने से क्या हो जाएगा? अपने काम को ठीक से न करने वाली लोकतांत्रिक संस्थाएं, और उनको हांकने वाले, उन पर काबिज लोग कड़े-कड़े कानूनों की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। यह सिलसिला बहुत खतरनाक है और अपने आपको धोखा देने का है। कड़े कानून के झांसे में उन लोगों को आना चाहिए जो कि नर्म कानून को असरदार होते देख चुके हों। आज देश में बलात्कारियों में से अधिकतर, और बाकी किस्म के जुर्मों में भी अधिकतर मुजरिम जब अदालत से छूट जाते हैं, उनमें से अधिकतर बाइज्जत बरी होते हैं, तो नया और कड़ा कानून क्या खाकर किसी को सजा दिला देगा?
 बलात्कारियों को फांसी का इंतजाम अगर सजा में किया जाता है, तो उससे  एक बात की गारंटी हो जाएगी, कि फांसी से बचने के लिए बलात्कारी अपनी हिंसा की शिकार को मार डालेंगे। जब बलात्कार की सजा फांसी, और उसके बाद हत्या की सजा भी फांसी, तो फिर सुबूत को पूरी तरह खत्म करके अपनी जिंदगी बचाने की कोशिश में क्या बुराई है? आज अगर कोई बलात्कारी किसी बच्ची या लड़की को, या महिला को, सिर्फ उसकी देह लूटकर जिंदा छोड़ देते हैं, तो चार-छह फांसियों की खबर छपते ही ऐसी जिंदगी बचना खत्म हो जाएगा। लेकिन आज संसद से लेकर सड़क तक जिन लोगों की हस्ती नारों पर चलती है, उनको मौत की सजा का नारा अपनी जनता के लिए, अपने वोटरों के लिए लुभावना लग रहा है। मौत की सजा की मांग खत्म होनी चाहिए, और समाज को, सरकार को, संसद को, अदालत को यह सोचना चाहिए कि कैसे बलात्कार थमें, कैसे जांच बेहतर हो, कैसे अदालतों में जुर्म साबित हो, और कैसे सजा मिले। इससे परे की बात करना आज की नाकामयाबी पर एक नए कानून का कफन ढांकने जैसा है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 27 नवंबर

जब तक पाखंड चलता रहेगा, तब तक जारी रहेगी निजी हिंसा

संपादकीय
26 नवम्बर 2017


हिन्दुस्तान से लेकर दुनिया के बाकी बहुत से देशों तक निजी और पारिवारिक हिंसा की दिल दहलाने वाली खबरें आती हैं। हमारे आसपास भी कोई ऐसा दिन नहीं गुजरता जब परिवार के भीतर हत्या और आत्महत्या जैसे मामले सामने न आते हों। हिन्दुस्तान में जहां पर कि लोगों को मानसिक परामर्शदाता या मानसिक चिकित्सक उपलब्ध नहीं है, वहां से लेकर दुनिया के विकसित या संपन्न देशों में जहां पर मानसिक चिकित्सा आसानी से हासिल है, सभी जगहों पर निजी हिंसा होती है, और लोग या तो खुद को मार डालते हैं, या कि अपने प्रेमी-प्रेमिका को, परिवार के लोगों को, या सहकर्मियों को। ऐसे बहुत से मामलों में जब हिंसा हो चुकी रहती है, तब अगर आसपास के लोगों से पूछा जाता है तो पता लगता है कि मुजरिम के ऐसे हिंसक मिजाज का उन्हें अंदाज ही नहीं था।
ऐसे में दुनिया के कुछ ऐसे देश हैं जहां पर ऐसी हिंसा बहुत कम है, न के बराबर है। योरप में स्कैंडेनेवियाई कहे जाने वाले देश बहुत से सर्वे में सबसे सुखी देशों में पाए गए हैं, और वहां के लोग अपने जीवन से, अपने कामकाज से, और परिवार के अपने किस्म के ढांचे से संतुष्ट हैं, सुखी हैं, और खुश हैं। वहां पर शादी का रिवाज है भी,  और लोग उसके बिना भी रह लेते हैं। परिवार के लोगों के लिए, और समाज के लिए यह बात मायने ही नहीं रखती कि वहां शादी के पहले बच्चे हो रहे हैं, या कि लोग अपने ही सेक्स के लोगों से समलैंगिक विवाह कर रहे हैं। न शादी का महत्व, और न तलाक का, लेकिन लोग खुश हैं। दूसरी तरफ हम हिन्दुस्तान में देखते हैं तो यहां के लोग एक झूठे आत्मगौरव में जीने का मजा लेते हैं कि पश्चिम बहुत ही तनाव और कुंठा में जीता है, और मानसिक शांति के लिए वह भारत की तरफ देखता है। ऐसा धोखा शायद इसलिए भी होता है कि पश्चिम से आए कुछ गोरे या काले लोग भारत के कुछ शहरों में योग करते, या बाबा लोगों की चिलम से गांजा पीते दिख जाते हैं, और आम हिन्दुस्तानी यह मान लेते हैं कि ये लोग वहां अपने देश में मानसिक अशांति के शिकार हैं, और शांति के लिए भारत आए हैं।
यह धोखा लोगों को अपने रीति-रिवाजों से, अपने पाखंडों से चिपके रहने में मजा देता है, और लोगों को लगता है कि भारतीय संस्कृति में कोई ऐसी चीज है, या कि सारी की सारी संस्कृति ऐसी है कि लोग यहां आते हैं, और वे लोग अपने खुद के जीवन में बड़े दुखी हैं। ऐसा झूठा गौरव लोगों को भारत में प्रेम के खिलाफ हिंसा, दूसरी जाति में शादी के खिलाफ हिंसा, दूसरे धर्म में शादी के खिलाफ हिंसा के लिए उतारू करता है। फिर यहां नालों और घूरों पर जो नवजात शिशु मिलते हैं वे तमाम हिन्दुस्तानी किसी मानसिक शांत देश की संतानें नहीं रहते, वे एक पाखंडी देश की औलाद रहते हैं जो कि अविवाहित या अकेली महिला को मां बनने का हक नहीं देता। इस झूठे आत्मगौरव और दंभ से मुक्त हुए बिना भारत में हिंसक तौर-तरीके खत्म होने वाले नहीं हैं। यहां की पारिवारिक हिंसा दुनिया के कुछ दूसरे देशों की हिंसा से अलग इस तरह है कि यहां प्रेम के खिलाफ खूब हत्याएं होती हैं, जो कि दुनिया के सभ्य और विकसित देशों में नहीं होतीं। हम पहले भी कई बार इसी जगह लिख चुके हैं कि हत्या और आत्महत्या तो खबरों में आ जाती है, लेकिन इनके पहले तक की कुंठा और निराशा खबरों में नहीं आतीं। भारत में जो लोग निजी पसंद और प्रेम की आजादी नहीं पाते हैं, उनका समाज के लिए योगदान भी कम रहता है, ऐसे लोग हिंसक भी अधिक हो सकते हैं, चाहे दूसरों के प्रति, चाहे अपनों के प्रति। भारत को यह मानना होगा कि यह एक बेहद हिंसक समाज है, और यहां कोई शांति की तलाश में नहीं आते, यहां पर धर्म और आध्यात्म का जो तिलस्म दिखता है, उस फेर में सैलानी आते हैं, और वे अपनी जिंदगी में यहां के मुकाबले अधिक खुश हैं, अधिक प्रेम से जीते हैं, और कम हिंसा करते हैं।
-सुनील कुमार 
( Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 26 November

बलात्कार के बाद अब इस देश में रेप-पोर्न का पनपता बाजार!

संपादकीय
25 नवम्बर 2017


उत्तरप्रदेश से एक ऐसी खबर है कि जिससे भारत की संस्कृति और सभ्यता की कल्पना पर बड़ी चोट पहुंचती है। वहां बाजारों में इन दिनों ब्लूफिल्मों की तरह वे फिल्में बिक रही हैं जो कि लोग किसी के साथ बलात्कार करते हुए बनाते हैं, और फिर कमाई करने के लिए उन फिल्मों को बेच भी देते हैं। एक से अधिक भरोसेमंद मीडिया में ऐसी खबरें आई हैं, और वे सोशल मीडिया में कभी-कभी गैरजिम्मेदारी से भी लिख दी जाने वाली कुछ झूठी बातों सरीखी नहीं दिखती है। वहां बाजारों में ऐसी फिल्मों की रिकॉर्डिंग खूब चल रही है, और पुलिस की जानकारी में और उसकी नजरों के सामने यह कारोबार चल रहा है। ऐसी हरकत से इस बात की गारंटी हो जाती है कि जिससे बलात्कार हुआ है, उससे बाकी जिंदगी भी सामाजिक यातना का बलात्कार होता चले।
एक तरफ तो देश का आईटी कानून इतना कड़ा है कि सुप्रीम कोर्ट को दखल देकर उसकी कुछ धाराओं को खत्म करवाना पड़ा क्योंकि सरकार और पुलिस उनका खुलकर बेजा इस्तेमाल करने लगे थे। दूसरी तरफ कल ही यह खबर आई है कि सुप्रीम कोर्ट ने जो धाराएं हटा दी हैं, उन्हें फिर से लागू करवाने के लिए संसद के अगले सत्र में सरकार एक संशोधन ला रही है ताकि अदालत की आपत्ति को ध्यान में रखते हुए नया कानून लागू हो सके। इससे दो बातें साफ होती हैं, एक तो यह कि कानून जब बहुत अधिक कड़े बनाए जाते हैं, लेकिन उसका इस्तेमाल चुनिंदा मामलों में होता है, तो वह इस्तेमाल अमूमन बेजा ही होता है। आज देश भर में बलात्कार की शिकार लड़कियों और महिलाओं के वीडियो इंटरनेट पर पटे हुए हैं, लोग इनमें से अपनी मर्जी के वीडियो छांटकर उन्हें वॉट्सऐप जैसे मैसेंजर से और चारों तरफ फैला रहे हैं। इनमें जिन लोगों की तस्वीरें दिखती हैं, उनके पास इस नौबत से लडऩे की कोई ताकत नहीं रहती। और फिर ऊपर चुपचाप बैठे यह सब देखने वाला ईश्वर इसलिए भी इस वीडियो-वितरण को देखते रहता है क्योंकि वह तो पहले बलात्कार को भी देखते ही रहा, तभी तो वह हो पाया। सुप्रीम कोर्ट सहित देश के कई हाईकोर्ट ऐसे मामलों में सरकारों को कार्रवाई के लिए कहते आए हैं, लेकिन एक बात जाहिर है कि कोई भी सरकार आईटी एक्ट का इस्तेमाल महज राजनीतिक या साम्प्रदायिक मकसद पूरा करने के लिए करती हैं।
ऐसे में जब कोई प्रेमी-प्रेमिका अपने पिछले साथी से बदला लेने के लिए रिवेंज पोर्न पोस्ट करते हैं, तो दुनिया के बहुत से सभ्य देश इसके खिलाफ कड़ा कानून बना चुके हैं, और उन पर कड़ाई से अमल भी कर रहे हैं। दूसरी तरफ हिन्दुस्तान में रोज ऐसी वीडियो-हिंसा हो रही है, और उससे बचाव का कोई रास्ता निकल नहीं रहा है। हम यह तो नहीं सुझाते कि आईटी कानून को और कड़ा किया जाए, लेकिन इतना जरूर होना चाहिए कि समाज के गैरराजनीतिक, गैरसाम्प्रदायिक, प्रमुख लोगों का एक पैनल बनना चाहिए जो कि ऐसी वीडियो-हिंसा के शिकार लोगों के हक के लिए पुलिस से जवाब ले सके, और अदालत को जवाब दे सके। बहुत से मामलों में अदालत के मित्र नियुक्त होते हैं जो कि अदालत को किसी मामले की जटिलता बताते या समझाते हैं, और अदालत का बोझ कुछ कम करते हैं। दूसरी तरफ हर प्रदेश में कुछ किस्म की संवैधानिक संस्थाएं हैं जिनमें महिला आयोग, मानवाधिकार आयोग, बाल कल्याण परिषद, अनुसूचित जाति आयोग, अनुसूचित जनजाति आयोग, जैसी अनेक संवैधानिक संस्थाएं हैं जो कि सत्तारूढ़ पार्टी के राजनेताओं से भरकर तबाह की जा चुकी हैं। हम इसीलिए इस बात पर जोर दे रहे हैं कि जनता की जेब पर और अधिक बोझ बने बिना समाज के ऐसे गैरराजनीतिक, और गैरसाम्प्रदायिक लोगों का एक ऐसा पैनल बने जो कि वीडियो-हिंसा के खिलाफ खुद होकर पहल कर सके, और कार्रवाई की सिफारिश कर सके। अगर देश और प्रदेश की संवैधानिक संस्थाएं राजनीतिक मनोनयन से अलग रखी जातीं, तो हो सकता है कि आज हमें यह सलाह देने की कोई जरूरत ही नहीं रहती। लेकिन आज नौबत ऐसी आ गई है कि लोग बलात्कार के वीडियो को मजे लेकर देख रहे हैं, तो ऐसी नौबत एक अभूतपूर्व और अनोखी कार्रवाई की मांग भी करती है। केन्द्र और राज्य सरकारों को, सुप्रीम कोर्ट को, और जब कभी संसद को बैठने की फुर्सत मिले, संसद को भी यह सोचना चाहिए कि देश को और कितना हिंसक बनने दिया जाए? यह देश बलात्कार की घटनाओं से पट गया है, अब एक तरफ तो पश्चिम के कुछ देशों में कानूनी रूप से बनने वाले वयस्क सेक्स-वीडियो पर तो इस देश में सजा है, लेकिन स्थानीय बलात्कार के वीडियो देखना इस समाज में मजा है! यह नौबत बहुत ही शर्मनाक है, और सरकारों से परे भी लोगों को इस पर कड़ी कार्रवाई करना चाहिए।
-सुनील कुमार
( Daily Chhattisgarh )

दीवारों पर लिक्खा है, 25 November

दलाईलामा ने कहा कि भारतीय आलसी होते हैं

संपादकीय
24 नवम्बर 2017


भारत में दशकों से राजनीतिक शरणार्थी का दर्जा पाकर रहने वाले तिब्बत के निर्वासित नेता और बौद्ध धर्म के एक प्रमुख व्यक्ति दलाई लामा ने अभी कहा कि भारत के लोग ज्यादा आलसी होते हैं, शायद इसकी वजह यहां का मौसम हो सकता है। उन्होंने यह बात बहुत सी और बातों के बीच कही है, इसलिए उनकी यह बात एक लंबी-चौड़ी सोच मानना ज्यादती होगी, लेकिन हम इस मुद्दे को लेकर यहां पर चर्चा जरूर करना चाहते हैं।
भारत में लोग आलसी हैं, या नहीं, इसे दूसरे देशों के इंसानों की तुलना करके ही समझा जा सकता है। हो सकता है कि ऐसे कई और देश हों, जहां पर हिन्दुस्तानियों के मुकाबले लोग कम मेहनत करते हों, वक्त अधिक बर्बाद करते हों, और चौक-चौराहों पर, चाय-ठेलों पर चर्चा को बहुत अहमियत का काम मानते हों। लेकिन हम लोगों की अपनी जरूरतों, और अपनी महत्वाकांक्षाओं को देखते हुए ही उनके मेहनतकश होने, या कि आलसी होने की बात कर सकते हैं। कई लोग जंगलों में बसते हैं, अपनी जरूरतों के लिए कुछ शिकार करते हैं, कुछ कंद-मूल ढूंढते हैं, मछली मार लेते हैं, और जिंदगी गुजार लेते हैं। वे हर दिन जितने घंटे काम करते हैं, उतने घंटे मुंबई में दसियों लाख लोग रोज लोकल ट्रेन में काम पर आने-जाने में सफर करते हैं। उनकी जरूरतें अलग हैं, उनकी महत्वाकांक्षाएं अलग हैं। इसलिए जाहिर है कि उनकी मेहनत भी कुछ अलग किस्म की होगी।
लेकिन हम भारत के लोगों में आबादी के एक बड़े हिस्से को ऐसा पाते हैं जिसकी महत्वाकांक्षाएं बहुत हैं, जिसकी हसरतें कभी थमने का नाम नहीं लेतीं, लेकिन वे इन हसरतों को हकीकत बनाने के लिए मेहनत करने से कतराते हैं। इनमें से अधिकतर ऐसे लोग हैं जो कि अपनी जमीन पर ही बसे हुए हैं, या कि यह कहें कि मां-बाप की छाती पर मूंग दल रहे हैं। जो लोग उत्तर भारत से मुंबई जाकर दूध बेचते हैं, या कि भेल और पावभाजी के ठेले लगाते हैं, वे दिन में अठारह घंटे मेहनत कर लेते हैं। कुछ वैसी ही मेहनत छत्तीसगढ़ के मजदूर लद्दाख में सड़क बनाने में, या कि हरियाणा के ईंट भट्टे में काम करते हुए कर लेते हैं जहां कि वे अपनी जमीन से दूर रहते हैं। कुछ ऐसी ही मेहनत पंजाब से गए हुए किसान अमरीका के कैलिफोर्निया में करते हैं, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा में करते हैं। वहां पर गए हुए पंजाबी भारत के पंजाब में बदनाम नशे के शिकार नहीं रहते। कुल मिलाकर होता यह है कि जब लोग अपनी जमीन से दूर जाते हैं, जहां उन्हें मुफ्त में रहने-खाने का भी कोई ठिकाना नहीं रहता है, और जिंदा रहने के रोज के मुकाबले में मेहनत करना ही उनके सामने अकेला विकल्प रहता है, तो वे आलसी नहीं रह पाते। लोग अपने घर पर ही आलसी रह सकते हैं, दूसरी जगह उन्हें मेहनत करनी ही होती है। यही वजह है कि केरल से खाड़ी के देशों में गए हुए लोग मेहनत करके करोड़ों कमाकर लौटते हैं। छत्तीसगढ़ के जो मजदूर बाहर जाते हैं, वे बाहर से लौटकर अपनी जमीन के साथ की और जमीन खरीद लेते हैं, अपनी संपन्नता बढ़ाते चलते हैं।
लोगों का बाहर जाना इसीलिए जरूरी है कि वे आगे बढ़ते चलें। लोग जब चुनौतियों का सामना करते हैं तो वे आलसी नहीं रह जाते। जब कड़े मुकाबले में उनको टिकना ही एक रास्ता रहता है, तो वे उस मुकाबले में उतर जाते हैं। इसलिए हिन्दुस्तान के उन लोगों को अपने बारे में सोचना चाहिए जिनको कि अपना घर, अपना मुहल्ला, अपना कामकाज, और अपना समाज आगे बढऩे ही नहीं देते हैं। इन्हीं सबमें जो लोग संतुष्ट रह जाते हैं, वे लोग अधिक आलसी होकर भी जी लेते हैं। ( Daily Chhattisgarh )
-सुनील कुमार

दीवारों पर लिक्खा है, 24 November

ऐसा शर्मनाक नियम आजादी की पौन सदी बाद जारी था!

संपादकीय
23 नवम्बर 2017


भारत नियमों और कानूनों से लदा हुआ देश है। हालत यह है कि इनके तले दबकर इंसान खत्म हुए जा रहे हैं, लेकिन सरकार में बैठे लोगों को अपनी ताकत दिखाने के लिए, आम जनता को सरकारी जूतों तले कुचलने के लिए नियमों का मोह ही नहीं छूटता। इसमें से कई नियम तो ऐसे हैं जिनकी जानकारी भी आम लोगों को नहीं है, और चूंकि उनके शिकार लोग बड़ी संख्या में नहीं हैं, इसलिए इंसानियत के खिलाफ के ऐसे नियम हटाने की मांग भी कोई नहीं करते हैं। अभी केन्द्र सरकार के रक्षा मंत्रालय ने एक नियम खत्म किया है और यह छूट दी है कि वीरता पुरस्कार प्राप्त गुजर चुके सैनिक की पत्नी अगर पति के भाई के अलावा किसी और से भी शादी करती है तो उसे पति के भत्ते मिलते रहेंगे। लोगों के लिए यह समझना कुछ मुश्किल हो सकता है कि एक लोकतंत्र में, आजादी की पौन सदी के बाद भी ऐसा नियम हो सकता है कि किसी शहीद की पत्नी पर सरकार यह नियम लगाए कि वह गुजरे हुए पति के भाई से ही शादी करे, तो उसे पति की वीरता का भत्ता मिलेगा। सेना में काम करते हुए जिसने वीरता से अपनी जान दी हो, उसकी पत्नी को एक इंसान की तरह जीने का बुनियादी हक भी भारत सरकार नहीं दे रही थी, और यह बात खबरों में आई भी नहीं थी।
भारत कहने को तो एक लोकतंत्र है, लेकिन यहां पर लोगों की निजी जिंदगी में दखल देने से सरकार थकती नहीं है। लोगों के बेडरूम में झांककर सरकार और देश की अदालतें यह देखती हैं कि दो वयस्क अगर आपसी सहमति से भी सेक्स कर रहे हैं, तो कहीं वे समलैंगिक तो नहीं हैं? अगर वे समलैंगिक हैं, तो उस पर सजा देने का लालच न सरकार छोड़ पा रही है, न अदालत छोड़ पा रही है, और संसद तो जनता के वोटों से बनती है, इसलिए वह इस हकीकत को अनदेखा ही करना चाहती है कि भारत में भी लोग समलैंगिक हो सकते हैं। ऐसे पाखंड के साथ जीने वाले देश में लोगों के बुनियादी हक सभ्य देशों की बराबरी तक पहुंचने में शायद एक सदी ही लग जाए।
यह देश एक तरफ तो अनुसूचित जाति, और जनजाति के लोगों को बढ़ावा देने के नाम पर ऐसे पुरस्कार रखता है कि इन जातियों से परे के लोग अगर इन जातियों के लोगों से शादी करते हैं, तो उन्हें नगद पुरस्कार मिलेगा। लेकिन दूसरी तरफ ऐसी शादी के लिए जब एक माहौल की जरूरत होती है जिसमें कि अलग-अलग जातियों के लोग मिल-बैठ सकें, तो बाग-बगीचों से लेकर तालाब किनारे तक से पुलिस लोगों को मारकर भगाती है, और उत्तर भारत में तो पुलिस और सरकार के बढ़ावे और उकसावे से गुंडों के संगठन जवान लड़के-लड़कियों को मार-मारकर उन्हें भाई-बहन बनाने में लगे रहते हैं। जब लोगों को मर्जी से उठने-बैठने का ही मौका नहीं मिलेगा, तो फिर कहां से अंतरजातीय विवाह होगा? और दूसरे धर्म में शादी को जहां एक बहुत बड़ा आतंक मानकर, लव जेहाद मानकर, उसे राष्ट्रीय जांच एजेंसी से जांच करवाने के लायक आतंकी काम माना जाता है, तो फिर जाति व्यवस्था टूटेगी कैसे?
अभी जो ताजा समाचार आया है, वह हैरान करने लायक है कि भारत सरकार यह मानकर चलती थी कि किसी वीर शहीद सैनिक की पत्नी किसी और से शादी ही नहीं करेगी, सिवाय अपने देवर या जेठ के। यह एक किस्म से एक खतरनाक मिजाज की बात है जो कि एक महिला को उसकी निजी पसंद के साथ जीने का हक भी नहीं देती, और एक किस्म से जो महाभारत काल की एक कहानी को इक्कीसवीं सदी में भी लागू करने की कोशिश करती है। भारत के लिए यह भारी शर्मिंदगी की बात है कि अभी दो दिन पहले तक भारतीय महिला के खिलाफ ऐसा एक नियम चले आ रहा था, और खबरों में अधिक आए बिना ही यह खत्म हो गया, यह एक अच्छी बात है। भारत को एक सभ्य समाज बनने के लिए यह तय करना होगा कि निजी जिंदगी का हक सरकार के कामकाज से ऊपर का होता है। मौलिक अधिकार सरकार के शिकंजे के बाहर के होते हैं। और आज से कुछ बरस बाद सही, जब समलैंगिकता जुर्म के दायरे से बाहर किया जाएगा, तो उस दिन हो सकता है कि भारत की तबकी सरकार, संसद, और तबकी अदालत देश से यह माफी मांगें कि समय रहते उनको अक्ल नहीं आई थी। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 November

बच्चों से लेकर बड़ों तक, जान देते हुए हिन्दुस्तानी

संपादकीय
22 नवम्बर 2017


पिछले कुछ दिनों से हिन्दी अखबारों में रोजाना हिन्दी इलाकों से आई ऐसी खबरें छप रही हैं कि किसी छोटे बच्चे ने किस वजह से आत्महत्या कर ली। किसी बच्चे को पिता ने पानी लाकर न देने के लिए डांट दिया तो उसने कुएं में कूदकर जान दे दी, किसी बच्ची को मां ने स्कूल जाने कहा, तो उसने फांसी लगा ली। जब छोटे-छोटे बच्चे बहुत ही छोटी-छोटी और महत्वहीन बातों पर इस तरह आत्महत्या कर रहे हैं, तो वह महज एक पुलिस केस का आंकड़ा न होकर समाज के भीतर तनाव और कुंठा का एक संकेत अधिक है। जो बच्चे फांसी लगा रहे हैं, उनके मन में इसके पीछे के तात्कालिक कारण से परे कुछ और बातें भी रहना तय है जिससे कि उनका तनाव इस दर्जे का बना रहता है कि वे एक चिंगारी मिलते ही फट पड़ें। यह तनाव जरूरी नहीं है कि महज जायज बातों को लेकर हो, कई मौकों पर यह तनाव ऐसी नाजायज बातों का भी रहता है जो कि बच्चों को जायज लगती हैं। कुछ बच्चों के मन में मोबाइल फोन की हसरत रहती है, कुछ के मन में मोटरसाइकिल की, और जब ये पूरी नहीं होती हैं, तो उनका तनाव आसमान तक पहुंच जाता है।
लेकिन दूसरी तरफ हम अपने आसपास हर हफ्ते-पखवाड़े में ऐसे मामले देखते हैं जिनमें प्रेम-संबंधों के चलते नौजवान अकेले, या कि प्रेमी-जोड़े खुदकुशी कर लेते हैं। उनमें से कुछ फंदों पर टंग जाते हैं, तो कुछ ट्रेन के सामने पटरियों पर कूदकर जान दे देते हैं। ऐसे अधिकतर मामलों में यह पता लगता है कि घरवाले नौजवानों के प्रेम-विवाह को तैयार नहीं होते, और उसी निराशा में ये जोड़े आत्महत्या कर लेते हैं। आज जब अठारह बरस की उम्र के बाद हिन्दुस्तानी लड़के-लड़कियां अपने मर्जी से शादी कर सकते हैं, मर्जी से कहीं जाकर रह सकते हैं, उस वक्त भी समाज का दबाव इतना अधिक रहता है कि बाग-बगीचे और तालाब किनारे पुलिस नहीं बैठने देती, हर किसी की जेब में किसी रेस्तरां तक जाकर बैठने के पैसे नहीं रहते, और समाज का नजरिया यह रहता है कि लड़के-लड़कियों को कहीं साथ देखें, तो अपना दूसरा काम छोड़कर उनके मां-बाप को फोन करके बताएं। इससे परे भारतीय समाज में लोगों की सेक्स की पसंद को लेकर, समलैंगिकता को लेकर, ट्रांसजेंडर लोगों को लेकर इतने किस्म की वर्जनाएं भरी हुई हैं कि लोग अपनी असली पसंद को सबके सामने मंजूर किए बिना अपनी जान दे देने को आसान और बेहतर समझते हैं।
भारतीय समाज अपने आपको सांस्कृतिक रूप से बड़ा समृद्ध, और बड़ा सभ्य मानता है। यह समाज अपने इतिहास पर एक झूठा दंभ भी भरता है। लेकिन हकीकत यह है कि यह समाज कुंठाओं से भरा हुआ, दमित सेक्स भावनाओं वाला एक ऐसा समाज है, जो जिंदगी को न अपने ढंग से जीना जानता, और न ही किसी और को जीने देना चाहता। उसकी यह दखल सेक्स से परे भी बहुत सी बातों में रहती है, और नतीजा यह होता है कि मीडिया के रास्ते या समाज में, घर में बच्चों के सामने होती बातों के रास्ते हर उम्र के लोगों के बीच यह बात साफ होते चलती है कि वे अपनी जिंदगी अपनी तरह से नहीं जी सकते। ऐसे में उनकी दिमागी हालत उनको कभी दूसरों के साथ, तो कभी अपने साथ हिंसा करने पर आमादा करती है। बच्चों से लेकर नौजवानों तक एक यह एक सरीखी, लेकिन अलग-अलग सी दिखती निराशा छाई हुई है, और यह देश इसकी तरफ से एकदम बेफिक्र भी है। यह नौबत अगर नहीं बदली तो इस समाज की हर आने वाली पीढ़ी एक ऐसे तनाव के साथ आगे बढ़ रही है कि जिसे बाद में पूरी तरह दूर कर पाना भी नामुमकिन होगा। इसके लिए जिस तरह सरकार के प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र हैं, ठीक उसी तरह प्राथमिक मनोपचार केन्द्र, प्राथमिक परामर्श केन्द्र भी जिला स्तर पर, जिलों के नीचे भी होना जरूरी है क्योंकि एक बीमार और तनावग्रस्त दिल-दिमाग के साथ भारत के बच्चे और नौजवान देश के लिए अधिक काम भी नहीं आ पाएंगे। कुछ बहुत महंगे स्कूल-कॉलेजों को छोड़कर बाकी किसी बच्चे के लिए आमतौर पर परामर्श उपलब्ध नहीं है, और समाज में नौजवान पीढ़ी को जब प्रेम करने की संभावनाएं उपलब्ध नहीं हैं, तो फिर उन्हें कहीं रस्सी उपलब्ध रहती है, तो कहीं आती हुई ट्रेन उपलब्ध रहती है। (Daily Chhattisgarh)

बात की बात 22 November

दीवारों पर लिक्खा है, 22 November

अब अदालत या ईश्वर से ही कोई उम्मीद है...

संपादकीय
21 नवम्बर 2017


दिल्ली शहर के बीच सबसे व्यस्त इलाके में सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा करके बनाई गई बजरंगबली की 108 फीट ऊंची प्रतिमा के बारे में हाईकोर्ट ने पूछा है कि क्या इसे हवाई रास्ते से वहां से हटाया जा सकता है? इस प्रतिमा के चारों ओर अवैध निर्माण और अवैध कब्जों को हटाने के लिए अदालत एक मुकदमे की सुनवाई कर रही है, और उसी के चलते यह सवाल पूछा गया। अभी दस बरस पहले ही तेरह बरस के निर्माण के बाद यह प्रतिमा पूरी हुई थी, और दिल्ली मेट्रो के बगल में बनाई गई यह प्रतिमा आते-जाते दिखती है।
न सिर्फ यह प्रतिमा, बल्कि देश भर में दसियों लाख ऐसे धर्मस्थल हैं जिन पर सुप्रीम कोर्ट का बरसों पहले का एक आदेश लागू होता है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह साफ किया है कि किसी भी सार्वजनिक स्थान पर कोई भी अवैध धर्मस्थल बनाया जाए तो जिला प्रशासन उसे कड़ाई से हटाए। और उसके पहले के ऐसे धार्मिक अवैध निर्माणों को हटाने की योजना बनाई जाए। यह बात जाहिर है कि देश में अवैध धार्मिक निर्माण सड़कों को बर्बाद करते हैं, लोगों की जिंदगी तबाह करते हैं, और उनका शोरगुल रिहायशी इलाकों, स्कूल-कॉलेज, अस्पताल जैसी जगहों में जीना हराम करता है। फिर एक धर्म के देखा-देखी दूसरी धर्म के लोग अपनी आस्था के अवैध निर्माण करते हैं, और एक गिरोह के मुकाबले दूसरा गिरोह हरकत में आ जाता है। धार्मिक अवैध कब्जे और अवैध निर्माण इसलिए भी अधिक खतरनाक होते हैं क्योंकि उनको हटाने पर धर्मांध-कट्टरपंथी लोग हिंसा पर आमादा हो जाते हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के बड़े साफ आदेश के बावजूद किसी भी राज्य में सरकारें उस पर अमल नहीं करती हैं क्योंकि वोटरों के एक पूरे तबके को नाराज करने का हौसला किसी में नहीं है। और तो और जिस पश्चिम बंगाल में वामपंथियों का राज लंबे समय तक रहा, वहां भी धार्मिक अवैध निर्माण हटाने की कोई कार्रवाई न उस वक्त हुई, और न ही अब ममता बैनर्जी की सरकार कर पाई है।
देश में जिस तरह का धार्मिक और साम्प्रदायिक माहौल बनाया और बढ़ाया जा रहा है, उसमें अदालत की आवाज खत्म हो गई है। अदालतों ने शोरगुल के खिलाफ, सड़कों पर जुलूसों के खिलाफ, सड़कों पर धार्मिक पंडालों के खिलाफ समय-समय पर कई आदेश दिए हैं। लेकिन वे सब धरे रह जा रहे हैं, और सरकारें कोई कार्रवाई करने के बजाय उन्हें अनदेखा करने के रास्ते तलाशती रहती हैं। हमारा ख्याल है कि सुप्रीम कोर्ट को और सख्ती करनी होगी क्योंकि जजों को चुनाव नहीं लडऩा होता, और वे ही कड़ी कार्रवाई कर सकते हैं। देश का बहुत सा समय, बहुत सी ताकत धार्मिक कब्जों को हटाने में बर्बाद हो रही है, और यह सिलसिला कहीं न कहीं जाकर थमना चाहिए। एक बार धार्मिक अवैध निर्माण हो जाए, तो फिर उसे हटाना जनता की जेब पर बहुत भारी भी पड़ता है। अब आज अगर दिल्ली हाईकोर्ट यह जानना चाह रहा है कि क्या 108 फीट के बजरंगबली हवाई रास्ते से हटाए जा सकते हैं, तो वह अगर मुमकिन भी हो, तो भी वह होगा तो जनता के ही खर्च पर। एक दूसरा रास्ता यह भी हो सकता है कि अगर ईश्वर में ताकत हो तो उसके नाम पर अवैध कब्जा और अवैध निर्माण करने वाले लोगों को वही नष्ट या भस्म कर दे। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 21 November

ऐसे देश को बचाने के लिए एक भगवान बहुत जरूरी

संपादकीय
20 नवम्बर 2017


एक फिल्म पद्मावती में एक राजपूत रानी की कहानी को लेकर राजस्थान के राजपूत संगठनों से लेकर बाकी देश के राजपूतों तक में बड़ी नाराजगी है। आज सुबह मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री निवास पर राजपूत नेताओं की एक सभा हुई, और उसमें शिवराज ने यह घोषणा की कि मध्यप्रदेश में इस फिल्म को इजाजत नहीं दी जाएगी। एक-एक फिल्म की कहानी पर अब एक-एक जाति या धर्म के लोग इस बड़े पैमाने पर उबलने लगे हैं कि फिल्म निर्माता-निर्देशक का सिर काटकर लाने पर करोड़ों के ईनाम रखे जा रहे हैं। भाजपा के हरियाणा के प्रवक्ता ने कल शायद दस करोड़ के ईनाम का ऐलान किया है, और पार्टी को आज उसे एक कारण बताओ नोटिस देना पड़ा है। लेकिन जैसा कि किसी भी क्रिया की एक प्रतिक्रिया होती है, इस फिल्म के विरोध की एक प्रतिक्रिया सामने आ रही है, जो लोग इस बात को भूल चले थे कि राजस्थान में महिलाओं के साथ कितना भेदभाव है, वे अब याद कर रहे हैं कि सैकड़ों बरस पहले की एक रानी के गौरव के लिए जो लोग मरने-मारने पर उतारू हैं, वे आज अपने प्रदेश की जिंदा लड़कियों और महिलाओं के साथ कैसा सुलूक कर रहे हैं। यह याद करते हुए आलोचक जातियों की बात भी कर रहे हैं कि कौन सी जाति ने तब क्या किया था जब नीची समझी जाने वाली किसी जाति की महिला के साथ बलात्कार किया गया था। लोगों को ऐसे में डकैत रह चुकी फूलन की याद भी आ रही है कि किस तरह के बर्ताव उसके साथ किया गया था, कैसा सामूहिक बलात्कार हुआ था, और फिर किस तरह उसके जवाब में उसने बलात्कारियों की जाति की महिलाओं के साथ वैसा ही जुल्म करवाया था।
आज भारत में एक तरफ तो इसरो के अंतरिक्षयान चांद पर जाकर लौट रहे हैं, और मंगल पहुंच रहे हैं। दूसरी तरफ इतिहास के तथ्यों के खिलाफ जाकर, एक काल्पनिक और मनपसंद इतिहास गढऩे वाले लोग आए दिन कभी किसी फिल्म के खिलाफ, कभी किसी किताब के खिलाफ, तो कभी किसी नाटक, और यहां तक कि इतिहास के शोध केन्द्रों के खिलाफ भी हिंसा कर रहे हैं। आज देश में हालत यह हो गई है कि जिस जाति या विचारधारा के लोगों की बड़ी संख्या है, उनकी किसी कल्पना या मान्यता के खिलाफ हकीकत की कोई बात कहना भी खतरे से खाली नहीं है। देश को एक बौद्धिक बेईमानी की तरफ धकेला जा रहा है, और पौराणिक कथाओं को इतिहास की तरह दर्ज करने की जिद को चुनाव में देख लेने तक ले जाया जा रहा है। वोट न देने की धमकी से परे यह धमकी भी दी जा रही है कि सिर काटकर लाएं तो नोट दिए जाएंगे, और ऐसी खुली धमकी टीवी चैनलों पर प्रसारित होने के बाद भी ऐसे फतवे देने वाले तालिबानियों के खिलाफ किसी राज्य या केन्द्र की सरकार कोई जुर्म दर्ज नहीं कर रही हैं। लोगों को सरकारों की ऐसी चुप्पी को देखते हुए यह भी याद पड़ता है कि कई बरस पहले एक मुस्लिम लेखक सलमान रूश्दी के एक उपन्यास को लेकर मुस्लिमों ने उसके सिर पर एक बड़ी रकम का फतवा जारी किया था, और आज जो फतवा जारी हो रहा है, क्या यह उसी किस्म का, वैसा ही नहीं है?
वह समाज कभी आगे नहीं बढ़ सकता जिसमें कल्पनाओं के लिए भी जगह नहीं है, और अपने इतिहास को, अपनी ऐतिहासिक हकीकत को बर्दाश्त करने की ताकत नहीं है। वह समाज भी आगे नहीं बढ़ सकता जो इतिहास में इस हद तक उलझ जाता है कि जिसे न वर्तमान की फिक्र रहती, और न भविष्य की। जिसे यह दिखता है कि भविष्य तो वही मायने रखेगा जो कि अपने पसंदीदा और काल्पनिक इतिहास की बुनियाद पर बना हुआ होगा, तो ऐसा भविष्य किसी काम का नहीं रहता है। जिन लोगों को आज किसी जाति या किसी चरित्र के गौरव की सूझ रही है, और इतनी सूझ रही है कि वे मरने-मारने पर उतारू हैं, तो इतिहास से ही जानकारियां लेकर लोग अब यह भी गिनाने लगे हैं कि इतिहास में किसने क्या किया था, और कौन-कौन सी बातें बहुत गौरवशाली नहीं भी थीं।
आज भारत या तो कुछ दूसरी जरूरी चर्चाओं से बचने के लिए बेवजह के ये बवंडर खड़े कर रहा है, या कि लोगों के पास अपने वर्तमान और भविष्य की कोई फिक्र नहीं है, और वे केवल इतिहास निर्माण में लगे रहने को सब कुछ मान रहे हैं। इन दोनों में से कोई बात हो, या कि कोई तीसरी-चौथी बात हो, यह सिलसिला बहुत ही खतरनाक है, और यह इस देश को बाकी दुनिया की नजरों में एक पाखंडी, कट्टरपंथी समाज साबित कर रहा है। यह देश वैज्ञानिकता को खो रहा है, और बड़ी तेजी से यह धर्मान्ध और अंधविश्वासी बनते जा रहा है। ऐसे देश को बचाने के लिए एक भगवान बहुत जरूरी है। (Daily Chhattisgarh)

बात की बात, 20 November

दीवारों पर लिक्खा है, 20 November

अंतरराष्ट्रीय रेटिंग इस देश की जनता की हकीकत नहीं

संपादकीय
19 नवम्बर 2017


हर कुछ महीनों में देश या विदेश की किसी रेटिंग एजेंसी या आईएमएफ, वर्ल्ड बैंक जैसी किसी संस्था द्वारा दुनिया के अलग-अलग देशों की अर्थव्यवस्था पर अपना आंकलन जारी किया जाता है। जिन देशों की सरकारों को ऐसे सर्वे सुहाते हैं, वे इन्हें अपने लिए एक प्रमाणपत्र मानकर खुशी मनाती हैं, या फिर जब उन्हें ये नतीजे नहीं सुहाते, तो सर्वे के पैमानों को गलत बताकर नतीजों को खारिज कर देते हैं। लेकिन इन दोनों ही मामलों में अधिकतर सर्वे देश की अर्थव्यवस्था को ऐसे पैमानों पर पेश करते हैं कि वे देश के अधिक कमाई वाले कारोबारियों के सर्वे होकर रह जाते हैं। और फिर जब इन्हें पूरे देश की पूरी जनता पर लागू करना हो तो प्रति व्यक्ति आय जैसे आंकड़े और दिखा दिए जाते हैं, जो कि एक बहुत ही झूठी तस्वीर सामने रखते हैं। जैसे छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में एनएमडीसी की कमाई के आंकड़ों की वजह से उस जिले के सबसे गरीब आदिवासियों की औसत आय आसमान छूती बताई गई थी।
दरअसल भारत और इंडिया इन दो शब्दों के अलग-अलग मायने लंबे समय से बताए जाते रहे हैं, और आर्थिक सर्वे के मामले में यह बात और अधिक बढ़-चढ़कर दिखती है। देश के एक फीसदी से भी कम के कारोबारियों की बेहतरी को देश की पूरी जनता की बेहतरी बता देने एक भयानक झूठ है। पश्चिम के एक बड़े नेता ने एक वक्त कहा था कि झूठ तीन किस्म के होते हैं, झूठ, सफेद झूठ, और आंकड़े। ये आंकड़े जैसे चाहे वैसे तोड़-मरोड़कर मनचाहे निष्कर्ष सामने रखे जा सकते हैं, और इससे ऐसा लग सकता है कि पूरा देश बड़ा खुशहाल हो गया है। देश की सबसे गरीब जनता केन्द्र सरकार के कुछ सर्वे में तो जगह पा भी लेती है, लेकिन दुनिया के अधिकतर आर्थिक-कारोबारी सर्वे आम लोगों से अछूते रहते हैं, वे पूंजीनिवेश, आयात-निर्यात, सकल राष्ट्रीय उत्पाद जैसे आंकड़ों पर आधारित रहते हैं जिनमें अगर गरीब भूखे भी मर रहे हैं, तो भी वह देश इन पैमानों पर खुशहाल नजर आ सकता है।
भारत जैसे मिलीजुली अर्थव्यवस्था वाले देश में पैमानों को फिर से तय करने की जरूरत है ताकि ऊपर की एक फीसदी जनता का हिसाब अलग हो, उसके नीचे के लोग दो-तीन तबकों में बांटकर अलग-अलग नजरिए से देखे जाएं। अडानी-अंबानी और देश के गरीबी की रेखा के नीचे के लोग किसी भी तरह से एक कागज पर एक साथ रखना फर्जीवाड़े से कम कुछ नहीं है। अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों के सर्वे के मुकाबले भारत सरकार के सर्वे भारत की गरीब जनता का अंदाज लगाने के लिए बेहतर होते हैं। हमने छत्तीसगढ़ की मानव विकास रिपोर्ट देखी हुई है जो कि छत्तीसगढ़ की जनता की एक अधिक सही तस्वीर पेश करती है।
इस देश की एक बड़ी दिक्कत यह भी हो गई है कि जो मीडिया अंतरराष्ट्रीय रेटिंग की व्याख्या करके देश के सामने एक विश्लेषण रखता है, वह मीडिया खुद कारोबारी दुनिया के इश्तहारों पर टिका रहता है, और उसी से उसकी रोजी-रोटी चलती है। इसलिए उसका उस सबसे गरीब आधी आबादी से कोई लेना-देना नहीं रहता जो कि विज्ञापनदाता की प्राथमिकता नहीं रहती। इस पूरी चर्चा का बड़ा साधारण सा मकसद यह है कि न तो भारत को किसी विदेशी रिपोर्ट को लेकर खुशियां मनाने में जुट जाना चाहिए, और न ही गम गलत करना शुरू कर देना चाहिए। भारत की सामाजिक और आर्थिक हकीकत इसी जमीन से तय होनी चाहिए, और वह हो सकता है कि देश के सबसे ऊपर के एक फीसदी से भी कम के लोगों की सीमित हकीकत न बताए, लेकिन वह देश की एक व्यापक तस्वीर अधिक ईमानदारी से जरूर बताएगी। (Daily Chhattisgarh)

बात की बात, 19 नवंबर

दीवारों पर लिक्खा है, 19 नवंबर

दिल्ली के प्रदूषण को दूर से देखने के बजाय यहां भी जागना जरूरी

संपादकीय
18 नवम्बर 2017


कभी दिल्ली शहर में प्रदूषण के चलते छा जाने वाले कोहरे-धुएं, स्मॉग, की खबरें आती हैं, तो अदालत से लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल तक और केन्द्र से लेकर राज्य सरकार तक सभी हड़बड़ाते हैं, और कुछ न कुछ करने की कोशिश करते दिखने की कोशिश करते हुए दिखते हैं। लेकिन दूसरी तरफ भारत के ऑटोमोबाइल उद्योग की आक्रामक मार्केटिंग के चलते हुए सभी तरह की गाडिय़ां सड़कों पर लगातार बढ़ते चल रही हैं। जहां तक हमारी नजर जाती है, हम देख रहे हैं कि जरूरत से कई गुना अधिक गाडिय़ां सड़कों पर आ गई हैं, और उनके मालिक उन्हें सड़कों पर ही खड़ा करके रख देते हैं। इन गाडिय़ों के लिए पार्किंग की कोई निजी जगह नहीं होती, और इन्हें फुटपाथों पर, सड़क के किनारे, घर-दफ्तर के बाहर रखा जाता है।
आज देश में एक ऐसी नीति की जरूरत है कि किसी भी गाड़ी का रजिस्ट्रेशन उसी हालत में किया जाए जबकि उसे रखने के लिए निजी जगह का इंतजाम हो। आज सार्वजनिक जगहों पर, हाईवे की पूरी की पूरी सर्विस लेन पर, और शहरों के बीच की हर खुली जगह पर कारोबारी गाडिय़ों की पार्किंग दिखती है, और ये गाडिय़ां लगातार बढ़ती चल रही हैं। भारत की उदार अर्थव्यवस्था में निजी गाडिय़ों की खरीदी पर शायद सरकार कोई रोक न लगा सके, लेकिन हर कारोबारी गाड़ी का इस्तेमाल तय रहता है। वह मुसाफिर ढोती है, या कि सामान ढोती है, या फिर वह क्रेन-बुलडोजर किस्म की कोई मशीन होती है। हर कारोबारी गाड़ी के लिए पार्किंग की जगह को तुरंत अनिवार्य करना चाहिए, तभी पुरानी गाडिय़ां घटेंगीं, और नई गाडिय़ों के लिए लोग पार्किंग की जगह का इंतजाम करेंगे। आज तो हालत यह है कि बड़े-बड़े शहरों के व्यस्त इलाकों में भी गाडिय़ों के कंकाल बरसों तक सड़क किनारे खड़े रहते हैं, उन्हें कोई जब्त भी नहीं करते।
प्रदूषण घटाने के लिए कारखानों और निर्माण सामग्री पर कड़ाई से रोक लगानी  जरूरी है, इसके साथ-साथ लोगों के चलने के लिए सार्वजनिक बसों का, मेट्रो या दूसरे साधनों का इंतजाम होना चाहिए। भारत के शहर अपनी बड़ी आबादी और चुक चुके ढांचे के चलते और आबादी की और गाडिय़ां नहीं झेल सकते। ऐसे में रात-दिन ट्रैफिक जाम के चलते गाडिय़ों का प्रदूषण कई गुना अधिक हो जा रहा है, और आज अगर केवल दिल्ली को लेकर सरकारों की नींद खुल रही है, तो बाकी देश में भी लोगों के फेंफड़े छलनी होना जारी हैं। यह भी याद रखने की जरूरत है कि प्रदूषण की सबसे बुरी मार उस गरीब तबके पर पड़ती है जो कि जाम सड़क-चौराहों पर धुआं और धूल झेलने को मजबूर रहता है। ऐसे गरीब के इलाज का बोझ भी सरकार पर आता है, और उसकी उत्पादकता भी घट जाती है। इसलिए प्रदूषण को सिर्फ हवा के जहर तक सीमित खतरा मानना तंगनजरिया होगा, और यह याद रखने की जरूरत है कि इंसान के साथ-साथ कुदरत के दूसरे पहलू भी इंसान के पैदा किए हुए, और लगातार बढ़ाए जा रहे इस भयानक प्रदूषण का शिकार होते चल रहे हैं।
देश का सुप्रीम कोर्ट आमतौर पर दिल्ली को सुधारने में अपनी खासी ताकत लगा देता है, और ऐसे में बाकी देश को दिल्ली को एक मिसाल मानकर चलना चाहिए, और अपने आपको खुद भी सुधारना चाहिए। प्रदूषण को लेकर सरकारों की गंभीरता का हाल यह है कि छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अभी चार दिन पहले रायपुर और बिलासपुर जैसे सबसे बड़े शहरों में नल के पानी में बीमारी को लेकर सरकार को कटघरे में खड़ा किया, और कल उसने यह पूछा कि राज्य सरकार इतने खर्च के बावजूद शहरों में शोरगुल से हो रहे प्रदूषण को रोक क्यों नहीं पा रही है? आज जिस समय हम यह लिख रहे हैं, पर्यावरण को बचाने के लिए राज्य सरकार उद्योगपतियों से बात कर रही है, और इसी बातचीत में कई दूसरे पहलुओं पर भी चर्चा हुई है। हमारा मानना है कि इस प्रदेश, देश और धरती को बचाने के लिए बड़ी कड़ी मेहनत की जरूरत है, वरना हम महज दिल्ली को देखते रह जाएंगे, तो दिल्ली सरीखा स्मॉग, उससे भी जहरीली हवा हमें अपने ही शहर में घेर लेगी। जनता की जागरूकता तो जरूरी है, लेकिन सबसे बड़ी जिम्मेदारी सरकार की बनती है, और उसे शहरी योजना के जानकारों और विशेषज्ञों से बात करनी चाहिए, खासकर ऐसे लोगों से जो कि सरकार के बाहर हैं। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 18 November

धर्म के हाथ हथियार देना इतना खतरनाक है, देखें...

संपादकीय
17 नवम्बर 2017


आतंक से ग्रस्त एक देश यमन पर सउदी अरब की अगुवाई वाले गठबंधन ने ऐसे आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं जिनसे वहां भुखमरी के शिकार लोग और तेजी से मरने लगेंगे। संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि यमन में दुनिया का सबसे बड़ा मानवीय संकट पैदा हो गया है, जहां 70 लाख लोग अकाल के खतरे में हैं, 10 लाख लोग बीमार हैं। ऐसे देश यमन के आसपास अरब दुनिया के जो देश हैं उन्होंने सउदी अरब की अगुवाई में तरह-तरह के प्रतिबंध लागू किए हैं जिनमें वहां के हवाई अड्डों, और वहां के बंदरगाह का इस्तेमाल भी बंद करवा दिया है। यमन में आतंकी संगठनों की हलचल के चलते अमरीका ने इस देश से लोगों के वहां आने पर भी रोक लगाई हुई थी।
आतंक का कारोबार अपने काबू के इलाके में आने वाले लोगों को कैदियों की तरह बनाए रखने, उन्हें भूखा मारने, उन्हें पढ़ाई और इलाज से दूर रखने से मजबूत होता है। इसके साथ-साथ धार्मिक आतंक करने वाले लोग तरह-तरह के धार्मिक रास्ते निकालकर लड़कियों और महिलाओं के साथ बलात्कार करने, उन्हें सेक्स-गुलाम बनाने, और उनकी बिक्री करने का काम भी कई देशों में कर रहे हैं। अरब देशों और लगे हुए अफ्रीका के देशों में धर्म के नाम पर हथियारबंद आतंकी-गुट इस तरह का काम लगातार कर रहे हैं, और इसकी वजह से उनके देश प्रतिबंध भी झेल रहे हैं। दुनिया धर्म के नाम पर चल रहे आतंक से यह इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी झेल रही है जहां दसियों लाख लोग शरणार्थी होकर अगल-बगल के देशों से और दूर तक योरप के देशों तक जा रहे हैं, और इससे कई देशों की सरकारों पर तनाव बढ़ रहा है, वहां पर उनकी स्थानीय जिंदगी भी प्रभावित हो रही है।
हथियारबंद आतंक जब राजनीतिक विचारधारा के लिए चलता है, तो उस पर काबू पाना कुछ आसान होता है। लेकिन जब यह धर्म के आधार पर चलता है, तो उसका साथ देने के लिए कई देशों की ताकतें अपनी दौलत लेकर खड़ी हो जाती हैं, और आम जनता के बीच भी उसकी पकड़ कुछ मजबूत रहती है। आज न सिर्फ अरब देशों में, बल्कि भारत जैसे मजबूत लोकतंत्र में भी धर्म को उसकी एक जायज जगह से बहुत अधिक जगह दी जा रही है, और लोगों की जिंदगी में निजी आस्था से बहुत आगे बढ़ाकर धर्म को एक हिंसक और आक्रामक रूप दिया जा रहा है। ऐसा करने वाले लोगों को लोकतंत्र से कुछ अधिक लेना-देना नहीं है, और वे किसी भी कीमत पर धार्मिक आक्रामकता का विस्तार चाहते हैं। सीरिया से लेकर यमन तक और सोमालिया तक धर्म और आंदोलन का जो मिलाजुला हत्यारा रूप चल रहा है, उसे देखते हुए बाकी दुनिया को भी सावधान होना चाहिए। धर्म को हिंसा की ताकत देना तो आसान है, लेकिन उससे फिर वे हथियार छीने नहीं जा सकते। आज जिस तरह सीरिया, यमन, सोमालिया जैसे कई देश ईश्वर के नाम पर किए जा रहे आतंक और हिंसा के हाथ अपनी आबादी का एक बड़ा हिस्सा खो रहे हैं। धर्म को निजी आस्था के रूप में, हिंसा से दूर, घर और धार्मिक स्थानों तक सीमित अगर नहीं रखा जाएगा, तो फिर ईश्वर के नाम पर बच्चियों से बलात्कार बिना हथियारों भी जगह-जगह होता था, और अब तो हथियारों के साथ यह काम इस हद तक बढ़ गया है कि इस्लामी आतंकवादी बच्चियों की, महिलाओं की खरीद-बिक्री भी कर रहे हैं, और इसे धर्म की मंजूरी भी बता रहे हैं। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 17 November

बात की बात 16 November

दीवारों पर लिक्खा है 16 November

अयोध्या में रविशंकर को खारिज करने की जरूरत

संपादकीय
16 नवम्बर 2017


अयोध्या में मंदिर-मस्जिद के झगड़े में मध्यस्थता करने की घोषणा के साथ आध्यात्मिक गुरू होने का दावा करने वाले श्रीश्री रविशंकर उत्तरप्रदेश पहुंचे हैं, और वहां हिन्दू और मुस्लिम दोनों पक्षों की तरफ से उनकी मध्यस्थता का विरोध भी शुरू हो गया है। वैसे यह कोई नई बात नहीं है कि शुरूआत में किसी वार्ताकार या मध्यस्थ का विरोध होने लगे, लेकिन रविशंकर की विश्वसनीयता कुछ भी नहीं है। जिस वक्त यूपीए सरकार को हटाने की नीयत से दिल्ली में केजरीवाल, अन्ना हजारे, और कर्नाटक से आए हुए रिटायर्ड जज संतोष हेगड़े एक बड़ा आंदोलन चला रहे थे, उस वक्त रविशंकर ने भी इस आंदोलन की हिमायत की थी। लेकिन वह वही दौर था जब कर्नाटक में येदियुरप्पा की भाजपा सरकार गले-गले तक भ्रष्टाचार के मामलों में डूबी हुई थी, और भाजपा के मंत्री, रेड्डी बंधु लौह अयस्क खदानों के भ्रष्टाचार के हजारों करोड़ के मामले में फंसे हुए थे, लेकिन कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू में बसे हुए रविशंकर का मुंह भी इस भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं खुला था। यह एक अलग बात है कि दिल्ली के भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन का उन्होंने समर्थन किया था।
जो सचमुच ही महान लोग होते हैं, वे मुजरिमों के बीच फर्क नहीं करते हैं, फिर वे चाहे यूपीए सरकार के भ्रष्ट मंत्री हों, या कि येदियुरप्पा सरकार के भ्रष्ट मंत्री हों। लोगों को याद होगा कि उस दौर में रविशंकर से लेकर रामदेव तक, घुमा-फिराकर हिन्दू धर्म की ही बात को चुनावी हिसाब से कहने वाले कई लोग देश में सक्रिय थे। और लोगों ने यह अच्छी तरह देखा हुआ है कि यूपीए सरकार और कांग्रेस को हटाने के लिए अन्ना हजारे आमरण अनशन पर बैठ गए थे, वे अन्ना हजारे मोदी सरकार के आने के बाद से लगभग पूरे वक्त अपने गांव में सोए हुए हैं, और दिल्ली में उस लोकपाल की कुर्सी पर किसी को बिठाया नहीं गया है, जिस लोकपाल को अन्ना हजारे और केजरीवाल लोकतंत्र की सारी बुराईयों के लिए रामबाण दवा मानते थे। इसलिए बुराई पर छांट-छांटकर वार करना कोई अच्छाई नहीं होती है, वह अच्छाई का पाखंड ही होता है, और वही काम रविशंकर अयोध्या जाकर कर रहे हैं। लोगों को याद होगा कि कुछ दिन पहले हमने इसी मध्यस्थता की खबर आने पर रविशंकर को सुझाया था कि उन्हें पहले छत्तीसगढ़ आकर यहां पर उनके नाम की दुकान चलाने वाले लोगों द्वारा हजारों लोगों को जमीन के मामले में धोखा देने के मामले सुलझाने चाहिए, उसके बाद कहीं और जाकर मध्यस्थता करनी चाहिए। भूमाफियाओं को गले लगाकर दुनिया को आध्यात्म सिखाना, और जीने की कला सिखाना पाखंड छोड़ और कुछ नहीं है।
जितने धर्मों से जुड़े हुए इस किस्म के लोग रहते हैं, जो अपने आपको आध्यात्म से जुड़ा बताते हैं, या कि योग की दुकान चलाते हैं, वे सारे के सारे लोग धर्म की राजनीति करने वाले लोगों के हाथ मजबूत करने का काम करते हैं। जाहिर तौर पर वे अपने को राजनीति से अलग बताते हैं, लेकिन नाजुक मौके पर उनकी तमाम हरकतें अपने पसंदीदा नेताओं और पार्टियों को फायदा दिलाने की रहती हैं। रविशंकर अपने खुद के दिए हुए श्रीश्री के तमगे के साथ कुछ महीने पहले नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का मखौल उड़ाते दिख रहे थे। यमुना को अपने कार्यक्रम के लिए कानून के खिलाफ जाकर बर्बाद करने, और उस पर ट्रिब्यूनल द्वारा सुनाए गए जुर्माने को न पटाने की सार्वजनिक घोषणा करने वाले रविशंकर कुछ महीनों के भीतर ही अयोध्या में किस तरह का कोई कानूनी रास्ता निकाल सकते हैं, यह किसी की समझ में नहीं आएगा। अपने खुद के मामले में जिसके मन में देश के कानून के लिए इतनी हिकारत हो, कि वो कानूनी संस्था के आदेश को कचरे की टोकरी में फेंकते हुए तरह-तरह की चुनौतियां सार्वजनिक रूप से देता रहे, उससे किसी तरह के न्यायसंगत और तर्कसंगत समाधान की उम्मीद नहीं की जा सकती। रविशंकर खारिज कर देने के लायक है, और अयोध्या जैसे जटिल मामले में यह आदमी जाकर और उलझन खड़ी करेगा। (Daily Chhattisgarh)

देश की अदालतों पर मेहरबानी भी करें...

संपादकीय
15 नवम्बर 2017


बैरूत की एक दिलचस्प तस्वीर इंटरनेट पर मौजूद है जिसमें एक इमारत एक मीटर से भी कम चौड़ाई की बनी हुई है। इसे देखकर हैरानी हो सकती है कि एक दीवार से जरा ही ज्यादा चौड़ी यह इमारत ऐसी क्यों बनाई गई है? तो वहां के बाशिंदे बताते हैं कि इसके पीछे की जमीन और उस पर मकान एक भाई के हैं, और उसे नुकसान पहुंचाने के लिए, वहां से समंदर तक जाने वाली नजर रोकने के लिए दूसरे भाई ने यह इमारत बना दी। अब यह कहानी पिछली आधी सदी से चली आ रही है, और हो सकता है कि इसमें कुछ नमक-मिर्च भी लगी हुई हो, लेकिन बैरूत के रिकॉर्ड में इस बिल्डिंग को ग्रज बिल्डिंग कहा जाता है, और ग्रज का हिन्दी मतलब द्वेष या घृणा, बैरभाव होता है।
यह दुनिया में पहला मौका नहीं है जब एक भाई दूसरे को नुकसान पहुंचाने के लिए अपना खुद का नुकसान करने को तैयार हो जाता है। एक वक्त भारत में अंबानी भाईयों के बीच की खाई कुछ ऐसी ही गहरी और चौड़ी थी, जिसे बाद में कहा जाता है कि इनकी मां ने बीच-बचाव करके पाटा। लेकिन ऐसे कई ऐतिहासिक झगड़े चले आ रहे हैं जिनमें भाई दूसरे भाई के खून का प्यासा हो जाता है। भारत की अदालतों में ऐसे लाखों मामले चल रहे हैं जिनमें परिवार की दौलत के बंटवारे के लिए भाई-बहन या भाई-भाई एक-दूसरे के सामने खड़े हुए हैं। दूर क्यों जाएं, भारत और पाकिस्तान एक ही देश से टूटकर दो बने, और इन दोनों के बीच की कड़वाहट इतनी अधिक है कि खुद कंगाल हो जाएं, लेकिन दूसरे के खिलाफ फौजी तैयारियों में कोई कमी नहीं आनी चाहिए। कुछ इसी तरह का हाल भारत के राजनीतिक गठबंधनों का देखने मिलता है, जिसके दल जब अलग होते हैं तो एक-दूसरे के अव्वल दर्जे के दुश्मन हो जाते हैं।
कुल मिलाकर इस चर्चा का मकसद यह है कि वक्त रहते लोगों को हकों और जिम्मेदारियों का बंटवारा किस तरह कर देना चाहिए कि बाद में उसे लेकर अगली पीढ़ी के बीच नफरत और हिंसा की नौबत न आए। होता यह है कि जब भाईयों, या कि एक पीढ़ी के वारिसों के बीच झगड़ा होता है, तो उसकी आग में घी डालने के लिए लोग अपनी जेब से खर्च करके, बाजार जाकर घी लेकर आते हैं। चाहे परिवार हो, राजनीतिक दल हो, फर्म या कंपनी हो, या कि देशों का मामला हो, इसे अगर समझदारी से नहीं निपटाया गया, तो इनकी बड़ी सी ताकत एक-दूसरे के खिलाफ बर्बाद होती रहती है, और समंदर का नजारा रोकने के लिए दूसरे की जमीन के सामने  अपने पैसे की बर्बादी करते दीवार जैसी पतली इमारत बना देते हैं।
हिन्दुस्तान में हम बहुत से परिवारों में झगड़े की एक जड़ यह भी देखते हैं कि बहुत लोगों को संयुक्त परिवार में गौरव प्राप्त होता है। वे सदस्यों के असंतोष की कीमत पर भी परिवार को एक छत के नीचे जोड़े रखना चाहते हैं, और ऐसे में लोगों के मन में सुलगती बेचैनी आगे चलकर तरह-तरह के झगड़े भी पैदा करती है। अधिक समझदारी की बात यह होती है कि परिवार के मुखिया वक्त रहते ही अगली पीढ़ी का अलग-अलग हिसाब कर जाएं, और देश की अदालतों पर मेहरबानी भी करें। (Daily Chhattisgarh)