दीवारों पर लिक्खा है, 31 दिसंबर

साफ-सुथरी जिंदगी, सौ फीसदी सावधानी में ही सुरक्षा है...

संपादकीय
31 दिसंबर 2018


छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में एक गांव में किसी परिवार के एक सदस्य का कोई सेक्स-वीडियो फैलने की चर्चा है, और उस परिवार में एक महिला ने बाकी लोगों को जहर दे दिया, और खुद भी खा लिया। अब तक तीन लोग मर चुके हैं, और कुछ लोग बेहोश हैं। यह अपने किस्म की बड़ी वारदात जरूर है लकिन न तो पहली है, और न ही अकेली। ऐसे वीडियो सामने आने के बाद या उस डर से आत्महत्या करने की खबरें आए दिन आती रहती हैं। और ऐसे मामलों में गिरफ्तारियां भी होती हैं, हालांकि मामले-मुकदमे बरसों तक चलते हैं, और जब तक कोई फैसला आता है, तब तक लोगों को ऐसी मौतों की खबर याद भी नहीं रहती। नतीजा यह होता है कि ऐसी हरकत पर क्या सजा मिलती है, यह सबक नहीं बन पाता। 
आज टेक्नालॉजी इतनी आसान हो गई है कि लोग अपने अंतरंग संबंधों की रिकॉर्डिंग भी निजी उत्तेजना के लिए, या कि बाद में मजा लेने के लिए कर बैठते हैं। इंटरनेट पर देखें तो जितने किस्म के वीडियो क्लिप तैरते हैं, उनमें से अधिकतर ऐसे रहते हैं जो कि आम लोगों ने अपने तक ही रखने के लिए बनाए थे, और वे अब बाजार में फैल रहे हैं। उत्तर भारत से तो ऐसी भी खबरें आती हैं कि वहां बलात्कार के वीडियो क्लिप कम्प्यूटर सेंटरों पर बिकते हैं। यह पूरा सिलसिला भयानक इसलिए है कि आज मोबाइल फोन की शक्ल में हर हाथ में एक कैमरा है, और जब लोग अपनी निजी इस्तेमाल के लिए खुद की ऐसी कोई फिल्म बनाते हैं, तो उन्हें उस वक्त उसके फैल जाने के खतरे का अंदाज भी नहीं रहता। कई ऐसे मामले भी रहते हैं जिनमें दो लोगों के बीच संबंध रहते हैं, और संबंध खराब होने पर जोड़ीदार को ब्लैकमेल करने के लिए लोग ऐसे वीडियो फैलाने की धमकी देते हैं, या फैलाते हैं। 
आज सामान्य समझबूझ का इस्तेमाल करके लोगों को यह सावधानी बरतनी चाहिए कि वे अपने किसी नाजुक वक्त भी, अपने सबसे करीबी व्यक्ति के साथ भी ऐसी कोई रिकॉर्डिंग न करें जिसके लिए बाद में उन्हें शर्मिंदगी झेलनी पड़ी। लोगों के संबंध आज अच्छे रहते हैं, और बाद में बहुत खराब भी हो सकते हैं। जो लोग आग के इर्द-गिर्द सात फेरे लगाकर सात जन्म तक साथ रहने की कसमें खाते हैं, उन्हीं में से बहुत से लोग तलाक के लिए सात-सात बरस तक अदालत में धक्के भी खाते हैं, पुलिस में रिपोर्ट भी लिखाते हैं, और अनगिनत वारदातें ऐसी होती हैं जिनमें जीवन-साथी एक-दूसरे को मार भी डालते हैं। जब रिश्तों में इतनी हिंसा की नौबत आती है तो यह जाहिर है कि एक-दूसरे की वीडियो क्लिप फैला देना तो उसके मुकाबले छोटी हिंसा है और छोटा जुर्म है। 
लोगों को इंसानी रिश्तों पर जरूरत से अधिक भरोसा बिल्कुल नहीं करना चाहिए। जितने किस्म के राजनीतिक या सरकारी स्टिंग ऑपरेशन होते हैं, वे जान-पहचान के लोगों के किए हुए रहते हैं जो कि उस वक्त पर बड़े भरोसेमंद भी बनकर दिखाते हैं। इसलिए इस बात को कभी नहीं भूलना चाहिए कि अपने खुद के हितों से अधिक भरोसा किसी को किसी पर नहीं करना चाहिए। फिर बाकी बातों के साथ-साथ यह भी याद रखना चाहिए कि किसी वजह से आपकी अचानक मौत हो जाए, तो बाकी चीजों की विरासत के साथ-साथ फोन और कम्प्यूटर पर दर्ज आपके वीडियो आपके बच्चों को नसीब होते हैं, और उनकी बाकी पूरी जिंदगी आपकी यादों के साथ हिकारत से जीते हुए गुजरती है। इसलिए साफ-सुथरी जिंदगी, सौ फीसदी सावधानी में ही सुरक्षा है।  
(Daily Chhattisgarh) 
5:00 PM

छोटी जमीनों पर सरकार की बड़ी छूट गरीबों के लिए एक बड़ा फैसला

संपादकीय
30 दिसंबर 2018


छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल सरकार ने तकरीबन हर दिन एक बड़ा फैसला लेने का सिलसिला जारी रखते हुए कल यह आदेश निकाला है कि पांच डिसमिल (2178 वर्गफीट) से कम की जमीन की खरीदी-बिक्री पर लगी रोक खत्म की जाती है। पिछले कई बरस से राज्य में यह प्रतिबंध लागू किया गया था, और बाईस सौ वर्गफीट से कम की जमीन की न बिक्री होती थी, न रजिस्ट्री होती थी, न ही उनका नामांतरण होता था। ऐसे में छोटे-छोटे लाखों लोग अपनी ही जमीन का कुछ नहीं कर पा रहे थे। जो लोग मुसीबत या जरूरत में रहते थे, उनके भी किसी काम की उनकी जमीन नहीं रह जाती थी। कांगे्रस ने अपने चुनाव जनघोषणा पत्र में भी इसका वायदा किया था, और सरकार के पहले पखवाड़े में ही यह आदेश जारी हो गया है। 

दरअसल राज्य में पटवारी का दफ्तर, तहसील और राजस्व विभाग के बाकी दफ्तर, और रजिस्ट्री ऑफिस, इन सबको ऐसे नियमों में बांधकर रखा गया था कि उनसे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता था। जमीन का बटांकन हुए बिना, पटवारी रिकॉर्ड में नाम चढ़े बिना रजिस्ट्री नहीं होती थी, और छोटी जमीन खरीदने की ताकत रखने वाले लोगों के सामने बड़ी कॉलोनियां बनाने वाले कारोबारियों से प्लॉट खरीदने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। लोग अपने मालिकाना हक की छोटी जमीन का कोई इस्तेमाल नहीं कर पा रहे थे। अब राज्य सरकार ने रजिस्ट्री के लिए खसरा नंबर में बटांकन की अनिवार्यता खत्म कर दी है और इससे इन विभागों का भयानक भ्रष्टाचार घट सकता है, खत्म हो सकता है। आज प्रदेश में लाखों ऐसे मामले सरकारी दफ्तरों के नियमों के जाल में फंसे हुए हैं, और इनको राहत मिलने से गरीब और मध्यम वर्ग को उनका जायज हक मिलेगा।
राज्य सरकार के गैरजरूरी प्रतिबंधों के बारे में दो-तीन दिन पहले ही हमने इसी जगह लिखा है कि नया रायपुर के आसपास की कई किलोमीटर जगह पर राज्य सरकार ने नाजायज प्रतिबंध लगा रखे हैं, और भू-स्वामी अपनी ही जमीन का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं। नया रायपुर विकास प्राधिकरण ने ऐसे नियम लादे हुए हैं जिनसे जमीन का टुकड़ा पांच एकड़ से अधिक होने पर ही वहां कोई अपना मकान बना सकते हैं, वरना उस जमीन का और कोई इस्तेमाल छोड़ा नहीं गया है। सरकार ने शायद उजाड़ पड़े हुए नया रायपुर को बसाने के फेर में दसियों हजार दूसरे भू-स्वामियों को उनके जायज हक से दूर कर दिया है, और यह मनमानी भी खत्म होनी चाहिए।

रमन सिंह सरकार के शायद दूसरे कार्यकाल का एक और फैसला ऐसा है जिसके खिलाफ हमने इसी जगह पहले लिखा है। राज्य में पहले कॉलोनियां बनाने वाले लोगों पर यह नियम लागू किया गया था कि वे कुल रिहायशी इलाके का पन्द्रह फीसदी हिस्सा ईडब्ल्यूएस, गरीबों के लिए छोड़े। लेकिन बाद में इसमें फेरबदल करके यह किया गया कि बिल्डर या कॉलोनाईजर इस पन्द्रह फीसदी जमीन के बदले सरकार के पास एक रकम जमा करा दे तो सरकार उससे किसी सरकारी जमीन पर गरीबों के लिए मकान बनाएगी, और बिल्डर अपनी कॉलोनी की सौ फीसदी जमीन बड़े मकानों के लिए बेच सकेगा या उस पर मकान बना सकेगा। यह बात सामाजिक हकीकत को अनदेखी करने वाली थी क्योंकि कॉलोनियों के बड़े मकानों में रहने वाले लोगों को भी घरेलू कामकाज के लिए गरीब कामगारों की जरूरत पड़ती है, और कॉलोनी में गरीबों के लिए जगह खत्म कर दी गई। सरकार की गरीब-कॉलोनियां दूर-दूर बसती हैं, और वहां से काम करने के लिए लोगों का दूर की कॉलोनियां तक जाना मुश्किल रहता है। खासकर महिला कामगारों को अपने घर से बहुत दूर काम करने जाने पर न तो अपने बच्चों की देखरेख के लिए बीच में घर लौटने की सुविधा रहती है, और न ही अपना घरेलू कामकाज निपटाने की भी। नई सरकार को ऐसे गरीब-विरोधी प्रावधान को खत्म करना चाहिए और हर कॉलोनी में गरीबों के लिए निर्धारित अनुपात में जमीन छोडऩे या मकान बनाने की शर्त फिर से लागू करनी चाहिए। 

छत्तीसगढ़ के राज्य बनने के पहले से भी यह देखने में आया है कि मास्टरप्लान के तहत जमीनों का इस्तेमाल जिस तरह निर्धारित किया जाता है, जैसे बदला जाता है, उससे सत्ता के आसपास के जमीन कारोबारियों का बड़ा भला होता है, और बिना पहुंच वाले छोटे-छोटे भू-स्वामियों का बड़ा नुकसान होता है। राज्य सरकार को अपनी मास्टरप्लान  की नीति को न्यूनतम सरकारी दखल का रखना चाहिए और अगर लोगों को अपनी जमीन के इस्तेमाल की छूट न हो तो वैसे जमीन पहले सरकार खरीदे और फिर उसका मनचाहा भू-उपयोग करे। आज के कांगे्रस मंत्रिमंडल में ऐसे मंत्री हैं जो कि प्रदेश के पहले कांगे्रस मंत्रिमंडल में थे, और उन्होंने जमीनों पर ऐसी मनमानी रोक-टोक के मामले देखे हुए हैं। उस वक्त किसी की भी निजी जमीन को मास्टरप्लान में आमोद-प्रमोद कर दिया जाता था, और दूसरों की जमीनों को रिहायशी या कारोबारी बना दिया जाता था। अजीत प्रमोद जोगी सरकार में ऐसे कामकाज को लेकर यह नारा चल निकला था कि सरकार किसी की भी जमीन को आमोद-प्रमोद जोगी बना सकती है। मनमानी की ऐसी चली आ रही नीतियों को खत्म करना चाहिए और आम जनता के व्यक्तिगत अधिकार का सम्मान दुबारा कायम करना चाहिए।  (Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 30 दिसंबर

आम चुनाव में यह समझने की जरूरत कि गठबंधन हो कांग्रेसरहित या कांग्रेससहित

संपादकीय
29 दिसंबर 2018


देश में आज दो किस्म के गठबंधनों की शुरुआती सुगबुगाहट चल रही है जिसमें से एक कांग्रेस के साथ चल रहा है, और वह मोदी-एनडीए के खिलाफ है। दूसरी तरफ तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर एक ऐसे गठबंधन की पहल कर रहे हैं जो कि गैरकांग्रेसी-गैरभाजपाई होगा, और इसके लिए वे एक विशेष विमान लेकर अलग-अलग राज्यों में जा रहे हैं, और इसी बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से उनकी मुलाकात की तस्वीरें भी सामने आती हैं। यूं तो मुख्यमंत्रियों का प्रधानमंत्री से मिलना एक सामान्य बात है, लेकिन कुछ राज्यों में मुख्यमंत्रियों से मुलाकात के बाद जब केसीआर की तस्वीरें प्रधानमंत्री को शॉल ओढ़ाते आती हैं, तो अनायास यह लगता है कि क्या गैरकांग्रेस-गैरभाजपा गठबंधन दरअसल मोदी का काम आसान करने का काम तो नहीं है? 
भारतीय राजनीति की जमीनी हकीकत को अगर देखें तो यह साफ है कि आज भाजपा-एनडीए के पास देश में सबसे अधिक वोट लोकसभा चुनाव में जुटने की संभावना है। ऐसे एनडीए के खिलाफ कांग्रेस को साथ रखकर जो विपक्षी गठबंधन बनेगा, उसकी एक संभावना हो सकती है, लेकिन कांग्रेस से परहेज करके, अपने आपको एनडीए के खिलाफ बताते हुए जो गठबंधन बनेगा, वह शायद एनडीए का काम आसान ही करेगा। फिर भी आज के दिन इस बात को बिना शायद कहे कहना ठीक नहीं है क्योंकि उत्तरप्रदेश के दो सबसे बड़े दल, सपा और बसपा, ने अभी तक यह साफ नहीं किया है कि वे किस गठबंधन में जाएंगे, कांग्रेसरहित में, या कांग्रेससहित में? अब यह एक ऐसा नाजुक मौका है कि कांग्रेस को खुद भी बाकी दलों के बीच अपनी स्वीकार्यता बनानी होगी, और इसके लिए एक बड़े दल की हैसियत से हो सकता है कि उसे कुछ दरियादिली भी दिखानी है। हम राज्यों के स्तर की बारीकियों पर गए बिना भी सतह पर तैरती जो खबरें देख रहे हैं, उनके मुताबिक मध्यप्रदेश में बसपा और सपा ने कांग्रेस की अल्पमत सरकार को साथ देकर कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनने दिया, लेकिन इसके एवज में इन दोनों पार्टियों के विधायकों को कुछ नहीं मिला। इसे लेकर सपा के अखिलेश यादव ने खासी नाराजगी भी जाहिर की है, और व्यंग्य भरे बयानों से आगे का एक अलग रास्ता गिनाया भी है। 
मोदी और एनडीए की कामयाबी इसी में होगी कि उसके खिलाफ दो ऐसे गठबंधन मैदान में रहें जो कि आपस में बराबरी जैसे भी रहें, और इनमें से किसी एक की जीत की अधिक संभावना न बन सके। पिछले चुनावों में तीन बड़े हिन्दी भाषी राज्यों में जिस तरह कांग्रेस ने कामयाबी पाई है, और भाजपा जिस तरह से कमजोर और अलोकप्रिय साबित हुई है, उसे देखते हुए लोकसभा चुनाव में इन तीनों राज्यों में मोदी के सामने एक बड़ी चुनौती जाहिर तौर पर साफ-साफ दिखती है। राज्यों के चुनावों में तो पार्टियों के प्रादेशिक संगठन भी अपने इलाके में गठबंधन के फैसले में हिस्सेदारी रखते हैं, लेकिन लोकसभा के चुनाव में कम से कम कांग्रेस को क्षेत्रीय प्राथमिकताओं से उबरना होगा, और एक अधिक व्यापक और अधिक स्वीकार्य गठबंधन के लिए कोशिश करनी होगी। हमारा ऐसा ख्याल है कि इस बार के विधानसभा चुनावों में भी भाजपा को जो नुकसान झेलना पड़ा है उसमें मोदी सरकार के रूख, भाजपा की नीतियों, नोटबंदी और जीएसटी से उपजे नुकसान का भी खासा योगदान रहा है। छत्तीसगढ़ में तो पन्द्रह बरस से सत्तारूढ़ भाजपा जिस तरह पन्द्रह सीटों पर सिमट गई, वह पार्टी के लिए बड़ा सदमा होना चाहिए। और फिर चुनावी आंकड़ों को लेकर बैठें तो यह साफ-साफ दिखता है कि कांग्रेस और भाजपा अगर आमने-सामने लड़ी होतीं तो भाजपा को पन्द्रह भी नहीं, कुल तीन सीटें मिली होतीं। इस एक मिसाल को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करके देखने की जरूरत है तो यह समझ आएगा कि जिस तरह छत्तीसगढ़ में जोगी, बसपा, या बागी तीसरे उम्मीदवारों ने भाजपा को दर्जन बर सीटों पर जीत दिला दी, कुछ वैसा ही मामला राष्ट्रीय स्तर पर मोदी-एनडीए के साथ भी हो सकता है, और केसीआर जैसा एक गठबंधन कांग्रेसयुक्त गठबंधन की संभावनाओं को घटा सकता है। राष्ट्रीय स्तर पर पार्टियों को यह समझने की भी जरूरत होगी कि कौन सी पार्टी या कौन सा गठबंधन एनडीए की बी टीम की तरह रहेंगे, और वोटकटवा का काम करेंगे।  (Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 29 दिसंबर

हिन्दुस्तान की तकलीफें, और खाली बैठी नौजवान पीढ़ी...

संपादकीय
28 दिसंबर 2018


सोशल मीडिया पर चारों तरफ नफरत और अफवाहें तो फैलती ही हैं, लेकिन कुछ अच्छी बातें भी फैलती हैं, और जिस तरह लोग उन्हें आगे बढ़ाते हैं, उससे लगता है कि लोगों की दिलचस्पी महज गंदगी में नहीं है, अच्छी बातों में भी है। मध्यप्रदेश के ग्वालियर रेलवे स्टेशन पर ट्रेन के मुसाफिरों को पानी पिलाने वाली 92 बरस की एक महिला का वीडियो इंटरनेट पर चल रहा है जो कि एक समाचार चैनल की रिपोर्ट है। वे रोज रेलवे स्टेशन पहुंचकर आम मुसाफिरों को ट्रेन के डिब्बे की खिड़कियों से उनकी बोतलों में पानी देने के लिए प्लास्टिक की एक चाड़ी (फनल) लगाकर पानी डालती हैं। 

यह बात छोटी सी है, लेकिन यह दूसरे लोगों को राह दिखाने वाली भी है। आज हिन्दुस्तान ऐसे करोड़ों नौजवानों से भरा हुआ है जो अपने आपको पढ़ा-लिखा कहते हैं और विपक्षी उन्हें बेरोजगार कहते हैं। मतलब यह कि उनके हाथ-पैर तो काम के लायक हैं, लेकिन उनके पास कोई काम नहीं है। ऐसे नौजवान आमतौर पर मां-बाप की छाती पर मूंग दलते हैं, और किसी तरह वक्त काटते हैं। अब सवाल यह है कि यह देश जिस तरह करोड़ों बेघर, दसियों करोड़ बीमार, करोड़ों बुजुर्ग लोगों से भरा हुआ है, जहां पर फुटपाथी बच्चों को पढ़ाने से लेकर, सरकारी पौधों में पानी डालने तक, अस्पताल में स्ट्रैचर से लेकर व्हीलचेयर धकेलने तक के लिए सौ किस्म की मदद की जरूरत है। अब एक तरफ तो लोग खाली बैठे हैं, दूसरी ओर लोगों को मदद की जरूरत है। इन दो चीजों को मिलाकर एक ऐसा समाधान निकलता है जिसमें निठल्ले को जिंदगी में कुछ हासिल करने का मौका मिले, कुछ तजुर्बा मिले, कुछ तसल्ली मिले, और जरूरतमंदों को मदद भी मिले। लेकिन इस जरूरत और इस क्षमता के बीच तालमेल बिठाने का काम नहीं हो रहा है। 

यूं तो देश भर में ऐसी समाजसेवा करने के लिए बहुत से संगठन चलते हैं, लेकिन समाजसेवा के नाम पर भी वे आत्मसेवा तक सीमित रह जाते हैं, और तरह-तरह से जुटाए गए दान का खुद पर इस्तेमाल करने का जरिया ढूंढते रहते हैं। ऐसे माहौल में ऐसी मिसालों की जरूरत है जिससे कि असंगठित नौजवान अपने आसपास कोई न कोई जरूरत तलाशें, और वहां अपनी अतिरिक्त, खाली पड़ी हुई क्षमता से सेवा करें, दूसरों की मदद करें। आज चुनाव के वक्त राजनीतिक दल इस बात को बहुत बड़ा मुद्दा बनाते हैं कि नौजवानों के वोट से सरकारें बनती और गिरती हैं, लेकिन चुनाव निपटने के तुरंत बाद ऐसे नौजवान खाली और बेरोजगार रह जाते हैं। फिर उनकी याद लोगों को अगले चुनाव के वक्त आती है। देश भर में ऐसे छोटे-छोटे स्थानीय प्रेरणास्रोत रहने चाहिए जो अपने आसपास के सौ-दो सौ या हजार-दो हजार लोगों को किसी नेक काम में लगाने का काम कर सकें। गिनने के लिए तो देश में नौजवानों की गिनती करके यह मान लिया जाता है कि हिन्दुस्तान के पास चीन के मुकाबले युवा कामकाजी फौज है, लेकिन यह नहीं देखा जाता कि जब तक यह फौज किसी उत्पादक काम में नहीं लगी है, जब तक वह अपने आपको बेहतर, अधिक उत्कृष्ट, और अधिक उत्पादक नहीं बना रही है, तब तक वह दूसरों के ही कुछ काम आ जाए, समाज का ही कुछ भला कर ले, धरती की ही कुछ सुध ले ले। 

ग्वालियर रेलवे स्टेशन पर 92 बरस की महिला जिस तरह दौड़-दौड़कर रेल मुसाफिरों को पानी देती है, उसे देखकर भी बाकी नौजवानों को शर्म न आए, तो फिर उनके जिंदा रहने का और क्या सुबूत हो सकता है? दुनिया के जितने महान समाज सेवक हुए हैं, उनमें से अधिकतर ने अपनी जवानी के दिनों में ही लोगों का भला करना शुरू किया, और तभी वे आगे बढ़ सके, मिसालें बन सके। आज हिन्दुस्तान की तमाम तकलीफों का समाधान यहां की खाली बैठी नौजवान पीढ़ी की क्षमता और ताकत के भीतर ही है, उससे कम ही है।  (Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 28 दिसंबर

एनआईए की इतनी लंबी-चौड़ी कार्रवाई से हाथ आए महज कुछ कट्टे, दीवाली के फटाके!

संपादकीय
27 दिसंबर 2018


देश में आतंकी घटनाओं को रोकने का एक खास जिम्मा और खास अधिकार एनआईए, राष्ट्रीय जांच एजेंसी, को दिया गया है जिसने कल दिल्ली और उत्तर भारत में एक बड़े आतंकी गिरोह का भांडाफोड़ करने का दावा किया है। सत्रह जगहों पर एनआईए ने छापे मारे, दस संदिग्ध लोगों को गिरफ्तार किया गया, और उनके पास से जब्त सामानों की नुमाइश की गई। इसमें हाथ से घर पर बनाए गए कुछ देसी कट्टे हैं, कुछ बारूद और बम बनाने के रसायन हैं, और साढ़े सात लाख रूपए नगद भी जब्त किए गए हैं। एनआईए का कहना है कि वे लोग हमलावर दस्ता तैयार कर रहे थे, और इसके लिए इन लोगों ने सोना चोरी करके हथियार और सामान खरीदे थे। 

यह खबर आने के बाद से कुछ बातें अटपटी लग रही हैं। सत्रह जगहों पर छापे मारने के बाद अगर मुट्ठी भर घरेलू हथियार मिले हैं, जो पिस्तौलें मिली हैं, कारतूस किसी और साईज के मिले हैं, और इतनी जगहों पर बम बनाने के पच्चीस किलो रसायन मिले हैं। लोगों ने सोशल मीडिया पर याद दिलाया है कि अभी कुछ दिन पहले ही मेरठ के एक गिरोह के हथियार दिल्ली में पकड़ाए थे जिसमें शानदार क्वालिटी की विदेशी पिस्तौलें थीं, और दर्जनों की संख्या में थीं। ऐसे में क्या महीनों से काम करने वाले संदिग्ध आतंकी चार महीने की निगरानी के बाद महज इतने से सामानों के साथ पकड़ा सकते हैं? एनआईए के दावे को गलत कहना यहां मकसद नहीं है, लेकिन देश की इस सबसे बड़ी आतंक-रोधी एजेंसी की इतनी बड़ी कार्रवाई के बाद, महीनों की निगरानी के बाद इतना सा हासिल चौंकाता है। और इसके साथ-साथ कई लोगों के मन में यह संदेह भी पैदा करता है कि क्या यह मीडिया में लगातार मोदी सरकार के खिलाफ चल रही सुर्खियों की तरफ से ध्यान हटाने के लिए की गई कार्रवाई है? 

दरअसल समय-समय पर विपक्ष में रहने वाली पार्टियों ने सत्ता के तहत काम करने वाली तोता-मैना जैसी साख वाली निगरानी और जांच एजेंसियों पर हमले करके उनकी विश्वसनीयता को पर्याप्त घटा दिया है। इस काम में कोई एक पार्टी मुजरिम नहीं है, बल्कि जो पार्टी विपक्ष में रहती है उसे सीबीआई से लेकर आईबी तक और एनआईए तक सत्ता के काबू में मिट्ठू-मिट्ठू बोलने वाले तोता लगते हैं। ऐसे में कई लोगों के मन में यह शक पैदा होता है कि क्या समय-समय पर थलसेनाध्यक्ष के अटपटे और अवांछित बयानों से लेकर, कई एजेंसियों की कार्रवाई तक का काम सुर्खियां बदलने के लिए होता है? उत्तर भारत के जिस हिस्से में एनआईए की इतनी बड़ी और व्यापक कार्रवाई हुई है, उसमें छोटे-छोटे से मुजरिम भी इतने हथियार लिए बैठे रहते हैं। और पता नहीं यह कहां की समझदारी थी कि जब्त हथियारों की नुमाइश में एनआईए ने इन कथित आतंकियों के पास से जब्त दीवाली के सुतली बम भी सजाए हैं, जिनसे शायद एक कुत्ते को भी नहीं मारा जा सकता। 

यह पूरा सिलसिला अटपटा लग रहा है, और इस मामले में हिरासत में लिए गए तमाम लोग मुस्लिम समुदाय के हैं। ऐसे में कई लोगों के मन में यह शक भी पैदा होता है कि क्या किसी एक धर्म या सम्प्रदाय के लोगों को बदनाम करने के लिए, परेशान करने के लिए ऐसी कार्रवाई की गई है? क्योंकि भारत का ताजा इतिहास बताता है कि जांच एजेंसियों और खुफिया एजेंसियों को अपनी कार्रवाई के लिए मुस्लिम अल्पसंख्यक लोग पसंदीदा शिकार दिखते हैं, और ऐसे लोग पांच-दस बरस गुजारकर अदालत से छूटकर जब घर लौटते हैं, तो उनकी जिंदगी तबाह हो चुकी होती है। हम चाहते हैं कि एनआईए की कार्रवाई ईमानदार हो, अदालत में साबित होने लायक हो, और उसकी विश्वसनीयता बनी रहे। देश की बड़ी-बड़ी संस्थानों के राजनीतिक इस्तेमाल का संदेह लोकतंत्र को कमजोर करता है। खुफिया एजेंसियां और जांच एजेंसियां देश-प्रदेशों में राजनीतिक दबाव के तले गीली मिट्टी की तरह मुड़ जाने, दब जाने की आदी हो चुकी हैं, और इस बार की इस बड़ी और व्यापक कार्रवाई की जब्ती बड़ा और व्यापक संदेह भी पैदा करती है। (Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 27 दिसंबर

खुद के अज्ञान की नुमाइश और अपनी बदनीयत का हलफनामा

संपादकीय
26 दिसंबर 2018


छत्तीसगढ़ में सरकार बदली तो राजनीति और सरकार में दिलचस्पी रखने वाले लोगों के बीच जरा-जरा सी बात को लेकर लोग तेजी से बड़े-बड़े नतीजे निकालने लगे हैं। किस नेता या पार्टी का भविष्य खत्म हो गया है, वहां से लेकर लोग ऐसे दावे भी करने लगे हैं कि कौन पन्द्रह बरस तक छत्तीसगढ़ का मुख्यमंत्री रहेगा, या कौन पन्द्रह बरस तक विपक्ष में रहेगा। जब कांग्रेस पार्टी को मुख्यमंत्री चुनने में दो-तीन दिन लगे, तो लोगों ने सोशल मीडिया पर लिखना चालू किया कि कांग्रेस की लीडरशिप इतनी कमजोर है कि एक राज्य का मुख्यमंत्री नहीं चुन पा रही है। मुख्यमंत्री बिना किसी विवाद के काम सम्हाल चुके, तो फिर लोगों ने यह लिखना और बोलना शुरू किया कि कई दिनों में मंत्रिमंडल तय नहीं हो पाया। अब कल जब पूरा मंत्रिमंडल बन गया तो लोगों ने लीडरशिप की कमजोरी साबित करने को एक नया तर्क ढूंढ लिया कि विभागों का बंटवारा तय नहीं हो पाया। आजकल में यह हो जाएगा तो लोगों को निगम-मंडलों में कांग्रेस नेताओं की नियुक्ति में देर होती लगेगी। और जब कांग्रेस सरकार का यह काम पूरा हो चुका रहेगा तब लोगों का ध्यान जाएगा कि भाजपा ने अब तक नेता प्रतिपक्ष क्यों नहीं चुना है। दरअसल लोगों की याददाश्त तकरीबन जीरो रहती है, उनकी जानकारी बहुत हद तक अधूरी रहती है, तर्क की उनकी क्षमता बड़ी सीमित रहती है, और न्याय की उनकी भावना बड़ी कमजोर रहती है। लेकिन किसी अटकल या नतीजे तक पहुंचने की उनकी हसरत बेपनाह रहती है, और वह सोशल मीडिया की मेहरबानी से सिर चढ़कर बोलती है। 
लोकतंत्र में हर किस्म की आजादी रहती है, और रहनी भी चाहिए। इसका भरपूर इस्तेमाल करते हुए लोग मनमानी बातों को लिखते हैं, और हसरतों को हकीकत की तरह पेश करते हैं। किसी एक अज्ञानी की बातों पर सिर हिलाने वाले लोग भी उतने ही उत्साह से मौजूद रहते हैं जितने उत्साह से किसी धार्मिक पाठ के दौरान सिर हिलाने वाले और हामी भरने वाले सामने मौजूद रहते हैं। सोशल मीडिया में एक तरफ जहां लोगों को अपनी सोच को सामने रखने का अभूतपूर्व और असीमित मौका दिया है, वहीं सोशल मीडिया ने सोच के नाम पर शौच को सजाकर पेश करने का मौका भी दिया है, और इसका भरपूर इस्तेमाल भी किया जा रहा है। लोग इस पर जितनी मोहब्बत की बातें करते हैं, उससे कई गुना अधिक नफरत की बातें करते हैं, और नफरत में लोगों को बांधकर रखने की अपार ताकत भी होती है। मोहब्बत की बातों की पालकी ढोने को चार लोग नसीब नहीं होते, और वहीं अगर मोहब्बत की अर्थी निकालकर उस पर नफरत को सजाकर ले जाएं, तो चालीस लोग पल भर में जुट जाएं। ऐसे ही लोग पुरानी मिसालों, पुरानी परंपराओं को याद रखे बिना, पुराने तजुर्बों के बारे में सोचे बिना मनमानी बातों को निष्कर्ष की तरह लिखते चलते हैं। छत्तीसगढ़ के मंत्रिमंडल के शपथ ग्रहण में तीन विधायक नहीं आए, और चार नाराज हैं, तो इससे सरकार डांवाडोल हो गई, ऐसा सोचने और लिखने वाले लोग यह भूल जाते हैं कि जब यह राज्य बना तब महज नेता प्रतिपक्ष चुनने के लिए भाजपा दफ्तर के भीतर छत्तीसगढ़ के एक सबसे बड़े भाजपा नेता की कार को जला दिया गया था, और दिल्ली से भेजे गए पार्टी पर्यवेक्षक नरेन्द्र मोदी पर इतने पत्थर चलाए गए थे कि एक कमरे में छुपकर, टेबिल के नीचे बैठकर उन्हें बचना पड़ा था। लेकिन उसके बाद वही पार्टी सत्ता में आई और सभी खेमों के लोग मिलकर पन्द्रह बरस सरकार में रहे। इसलिए छोटी-छोटी राजनीतिक हलचलों पर बड़ी-बड़ी अटकलें लगाना, और बरसों बाद तक को लेकर भविष्यवाणियां करना लोगों की भड़ास तो निकालती है, लेकिन इसे अधिक वजन देकर लोगों को अपना वक्त बर्बाद नहीं करना चाहिए। 
सोशल मीडिया ने लोगों को अपने मन की बातें कहने का एक अभूतपूर्व मौका भी दिया है, और इसका इस्तेमाल करके लोगों को ऐसी वैचारिक बहस छेडऩी चाहिए जिससे कि उनकी अपनी विचारधारा की इज्जत बढ़ सके, उनकी पार्टी और उनकी खुद की इज्जत बढ़ सके। सोशल मीडिया पर झूठ, अफवाह, और घटिया बातों को लिखकर लोग अपनी खुद की साख चौपट करने का काम अधिक आसानी से कर सकते हैं, और अधिक लोग ऐसा ही कर भी रहे हैं। चूंकि जनता के एक हिस्से की जिंदगी में सोशल मीडिया अब बहुत मायने रख रहा है, और इससे गंभीर जनमत भी कुछ हद तक प्रभावित होता ही है, इसलिए यह छोटी सी नसीहत यहां लिखना जरूरी है कि जब लोग पुरानी मिसालों को याद किए बिना बड़ी-बड़ी तोहमतें लिखते हैं, तो वे दूसरों की गलतियों से अधिक अपने खुद के अज्ञान की नुमाइश करते हैं, और बहुत से मामलों में अपनी बदनीयत का हलफनामा भी देते हैं।  (Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 26 दिसंबर

सरकारों की आवाजाही बड़े तजुर्बों का मौका...

संपादकीय
25 दिसंबर 2018


छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ दिनों में राज्य सरकार ने अधिकारियों की कुर्सियां जिस तरह से बदली हैं, और जिस तरह आने वाले और कुछ दिनों में बदली जाने की उम्मीद है, उस नौकरशाही को बहुत से सबक लेने की जरूरत है। दरअसल जब किसी एक पार्टी की सत्ता लगातार पन्द्रह बरस तक जारी रहती है, तो निर्वाचित लोगों के तहत काम करने वाले अफसरों का मिजाज भी एक ऐसी निरंतरता का हो जाता है कि उन्हें एक ही मुख्यमंत्री और एक ही पार्टी के मातहत हमेशा काम जारी रखना है। लंबी चली ऐसी सरकार के तहत कुछ चुनिंदा अफसर अधिक ताकतवर हो जाते हैं, और मुख्यमंत्री को लगातार पन्द्रह बरस मिल जाएं, तो फिर सरकार में बैठे लोग यह सोच भी नहीं पाते कि किसी दिन दूसरी पार्टी की सरकार आ सकती है, या कि दूसरे मुख्यमंत्री बन सकते हैं। नतीजा यह होता है कि सरकार चलाने में जो सावधानी होनी चाहिए वह खत्म हो जाती है, नियम-कानून के लिए सम्मान घट जाता है, और लोग इस अंदाज में काम करने लगते हैं कि वे मानो अमरबूटी खाकर आए हों। इसी का नतीजा है कि इस सरकार के आते ही बहुत से अफसरों को हटाने की जरूरत पड़ी, और बहुत से अफसरों के कामकाज के खिलाफ जांच की जरूरत भी अब दिख रही है। लोकतंत्र में सरकार में पार्टी या मुखिया के बदलने का एक फायदा यह भी होता है कि सरकार चला रहे अफसर अपने को आजीवन सत्तारूढ़ मानने की खुशफहमी नहीं पालते जो कि रमन सिंह सरकार में आ गई थी। इसी वजह से अफसरों ने बहुत से ऐसे काम किए जिनके चलते वे कानूनी दिक्कतों में भी पड़ सकते हैं, और उनकी बाकी नौकरी दागदार भी हो गई है।

आज इस मौके पर पूरी नौकरशाही को यह सबक भी लेना चाहिए कि राजनीतिक मुखियाओं के लिए गलत काम नहीं करने चाहिए, और अपने निर्वाचित मंत्रियों को भी गलत काम से रोकना चाहिए। एक दूसरी जरूरी बात यह भी है कि राज्य में रिटायर्ड अफसरों को संवैधानिक कुर्सियों पर मनोनीत करने का सिलसिला खत्म होना चाहिए। इस राज्य में आयोगों और ऐसी दूसरी जगहों पर रिटायर्ड अफसरों को बिठाने का सिलसिला इतना लंबा चल रहा है और वह इतना चौड़ा फैल चुका है कि मानो कोई भी अफसर रिटायर ही नहीं होते। नतीजा यह होता है कि नौकरी के आखिरी कुछ बरस ऐसे अफसर अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने में लगे रहते हैं ताकि रिटायर होने के बाद सहूलियतों और मोटी तनख्वाह वाली कुर्सी मिल जाए, बंगला-गाड़ी जारी रहे। यही हाल हाईकोर्ट से रिटायर होने वाले जजों का भी होता है। इस बात पर एक कानूनी रोक लगनी चाहिए कि जिस राज्य से अफसर या जज रिटायर हों, उन्हें उस राज्य में किसी पद पर मनोनीत न किया जाए। इस बारे में हम पहले भी बहुत बार लिख चुके हैं कि यह सिलसिला सरकार में गलत कामों को बढ़ाने वाला रहता है, और रिटायर्ड लोग अगर इतने ही होनहार और विशेषज्ञ हैं तो उन्हें दूसरे किसी राज्य में भी जगह मिल सकती है। कुल मिलाकर आज इस मुद्दे पर लिखने का मकसद यह है कि तमाम अफसर आज की नौबत को देखकर यह सबक जरूर ले लें कि लोकतंत्र में न किसी पार्टी का राज स्थाई होता है, और न ही कोई नेता स्थाई होते हैं। इसलिए सबको यह मानकर काम करना चाहिए कि अगली सरकार आकर पिछली सरकार के सारे कामकाज की जांच करवा सकती है। नई सरकार भी, इसके निर्वाचित नेता भी पुराने तजुर्बे से बहुत कुछ सीख सकते हैं कि क्या-क्या नहीं करना चाहिए, कैसे-कैसे नहीं करना चाहिए।  (Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 25 दिसंबर

अफसरों के बाद मंत्री, सरकार के तेज कामकाज की जरूरत

संपादकीय
24 दिसंबर 2018


छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बीती आधी रात के बाद जारी एक लंबी तबादला सूची में राज्य के एक चौथाई से अधिक आईएएस अफसरों का तबादला किया है। इसके अलावा कुछ आईएफएस अफसरों को हटाया भी गया है जो कि विभाग से बाहर शासन में काम कर रहे थे। इस लिस्ट में कुछ जिलों के कलेक्टर भी बदले गए हैं, लेकिन अधिक महत्वपूर्ण फेरबदल कई ऐसे विभागों में तैनात अफसरों का है जिन पर लंबे समय से एक ही जगह पर काम करने की तोहमत थी, और इनमें से कुछ पर बहुत मोटी कमाई करने के आरोप भी थे। खासकर स्वास्थ्य विभाग में खरीदी करने के लिए बनाए गए एक निगम में एक-एक मशीन पांच-दस गुना दाम पर भी खरीदने के सुबूत बिखरे पड़े हैं, लेकिन स्वास्थ्य विभाग की बाकी बेईमानी की तरह यह निगम भी गरीब जनता के हक को लूटने में लगा हुआ था, और आगे बारीक जांच में कई अफसरों को जेल भेजने के लिए जरूरत से अधिक सुबूत मौजूद रहेंगे। ऐसा हाल कई और विभागों में भी निकलेगा, और ऐसे अफसरों का क्या करना है, उनके ऊपर के मंत्रियों का क्या करना है, यह बात नई सरकार हमसे बेहतर जानती है, और इसलिए उसे कोई बिना मांगा मशविरा देने की जरूरत नहीं है। 
कल ही भूपेश-मंत्रिमंडल का विस्तार और शपथ ग्रहण है, और ऐसी उम्मीद की जाती है कि सभी महत्वपूर्ण विभागों को मंत्री मिल जाएंगे। अफसर अधिकतर इस लिस्ट में बदल गए हैं, और कुछ और बदल भी जाएंगे। इसके बाद सरकार को पिछली सरकार के कुकर्मों की जांच के अलावा आगे का काम भी किफायत और योजना के साथ तेजी से करना होगा क्योंकि नीतियों और कार्यक्रमों में बड़ा बदलाव आने के बाद इस नई हवा में हर किसी को अधिक तैयारी भी करनी पड़ेगी। कुछ महीनों बाद के लोकसभा चुनाव के फिर कुछ महीनों बाद पंचायत-म्युनिसिपल के चुनाव भी आ जाएंगे, और इन दोनों के नतीजों को लोग बारीकी से देखेंगे। यह एक बड़ी चुनौती इसलिए भी है कि इस मौके पर चुनावी वायदों को पूरा करने के लिए एक बहुत बड़े खर्च का साल भी यह रहेगा, और दो-दो चुनावों में जनता को खुश रखने का साल भी यह रहेगा। यह पहला साल इन पांच बरसों का सबसे ही चुनौती भरा साल रहेगा, फेरबदल, योजना, चुनावी प्रदर्शन, और भ्रष्टाचार पर कार्रवाई। 
ऐसे में दो-चार दिन के भीतर शक्ल ले लेने वाली नई सरकार को एक बहुत मेहनतकश टीम की तरह काम करना होगा, और यह बहुत मुश्किल भी नहीं है। कांग्रेस के नेताओं ने पिछले पांच बरस भरपूर मेहनत की है, और उन बातों को अच्छी तरह समझा भी है जिनके चलते रमन सिंह की पन्द्रह बरस की सरकार डूब गई। इसलिए यह ताजा-ताजा तजुर्बा कांग्रेस के सामने है, और उसके मंत्रियों के पास भाजपा के मंत्रियों के मुकाबले अधिक लंबा, या कम से कम बेहतर तजुर्बा भी है। नए मुख्यमंत्री ने वीआईपी कल्चर के खिलाफ बयान दिया है, और सादगी के साथ काम करने के लिए अफसरों को कहा है। भाजपा के इतने लंबे राज में पूरा प्रशासन मुख्यमंत्री-सचिवालय में केन्द्रित हो गया था, और जिलों से लेकर विभागों तक सबकी जवाबदेही इसी एक दफ्तर तक रह गई थी। कांग्रेस सरकार को जिलों और विभागों को कामकाज करने के लिए कहना चाहिए, बजाय राजनीतिक कार्यक्रमों के इंतजाम के लिए, या सत्तारूढ़ नेताओं के इर्द-गिर्द घूमने के। 
कांग्रेस के साथ एक दिक्कत यह भी है कि वह इतने बड़े बहुमत के साथ जीतकर आई है कि उसके मगरूर हो जाने का भी एक खतरा बना हुआ है। इस बार के चुनावी नतीजों का आगे के किसी भी चुनाव में इस हद तक फिर से होने की संभावना बड़ी मुश्किल बात रहेगी, और इसलिए सरकार को अपने आगे के कामकाज पर बहुत अधिक ध्यान देना होगा। वैसे एक बात यह भी है कि पिछली सरकार के भ्रष्टाचार के मामलों को सामने लाकर, उनकी जांच करवाकर, उन पर कार्रवाई करके, उन्हें अदालत तक पहुंचाकर प्रदेश के नेताओं और अफसरों को एक बड़ा सबक भी दिया जा सकता है, और उससे अगले चुनाव कुछ आसान भी किए जा सकते हैं। फिलहाल इस सरकार को इस ताजा तजुर्बे के साथ आगे काम करना चाहिए कि कोई भी सरकार अमरबूटी खाकर नहीं आती, और उसके जाने के बाद बहुत सी कब्रें खुदती भी हैं। हम ऐसे भ्रष्टाचार की जांच के खिलाफ भी नहीं हैं, और इस बात को लिखते आए हैं कि  हर सरकार को पिछली सरकार के भ्रष्टाचार की जांच करनी चाहिए, क्योंकि उन्हें गिनाकर ही तो कोई पार्टी चुनाव में जीत हासिल करती है। ऐसे में यह जनता के प्रति जवाबदेही की बात भी है, और संविधान की शपथ भी यह उम्मीद करती है कि जानकारी में आए हर भ्रष्टाचार की जांच की जाए, उस पर कार्रवाई की जाए।  (Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 24 दिसंबर

नया रायपुर और नई सरकार, नए सिरे से फैसले की जरूरत

संपादकीय
23 दिसंबर 2018


छत्तीसगढ़ में नई सरकार को पिछली सरकार के जिन खर्चीले फैसलों पर सोचना चाहिए, उनमें से एक अटल नगर नाम की राजधानी भी है। नया रायपुर के नाम से इसे बनाना तो राज्य बनने के बाद से शुरू हुआ था, लेकिन तीन बरस की कांग्रेस सरकार के वक्त बस एक शिलालेख रखा गया था, उसकी पूरी योजना और उस पर पूरा खर्च पिछले पन्द्रह बरसों में हुआ है। इन बरसों में राज्य सरकार ने इसे शहर बनाने के लिए, और पांच लाख की आबादी वाला शहर बनाने के लिए लाख कोशिशें कीं, लेकिन उसका कोई नतीजा निकल नहीं पाया है। नया रायपुर में तकरीबन सौ फीसदी खर्च सरकार का खुद का हुआ है, और इक्का-दुक्का निजी कंपनियों ने दो-चार इमारतें बनाई भी हैं, तो भी वह राजधानी किसी तरह बस या पनप नहीं पा रही है। राज्य सरकार ने लोगों को वहां भेजने के लिए अपने कर्मचारियों को बाकी प्रदेश में मिलने वाले आवास भत्ते से दोगुना आवास भत्ता देना शुरू किया, शासन के हाऊसिंग बोर्ड ने सैकड़ों या हजारों करोड़ से वहां बड़ी-बड़ी कॉलोनियां बनाईं, लेकिन वे बस नहीं पाईं। इन मकानों को सरकार ने खुद ही पुलिस विभाग को बेचना चाहा, लेकिन पुलिस ने इन्हें खरीदने से मना कर दिया क्योंकि उसके पास अपना पुलिस हाऊसिंग बोर्ड है जो जरूरत के मुताबिक जगहों पर कॉलोनियां बनाता है, और नई राजधानी में पुलिस को बसाने का कोई तुक नहीं है। नया रायपुर या अटल नगर, जो भी कहें, उसमें सड़कों और फुटपाथों का इतना बड़ा ढांचा तैयार किया गया है कि उसकी उपयोगिता इन पन्द्रह बरसों में भी बढ़ते-बढ़ते एक फीसदी भी नहीं हो पाई है, और निर्माण की अपनी एक जिंदगी होती है जो कि इन सबको खत्म कर ही देगी। इसके बाद इनका रख-रखाव एक सफेद हाथी को पालने जैसा है जिसे खिलाना भी महंगा पड़ता है, और नहलाना भी। 
नया रायपुर को अधिक से अधिक बड़ा बनाने में सत्ता में बैठे अफसरों और नेताओं की बराबरी से दिलचस्पी थी। और हमने इसी जगह इसे एक महंगे ताजमहल जैसा खर्चीला बताया था, और इस पर फिजूलखर्ची रोकने की नसीहत भी दी थी। लोगों ने देश और दुनिया की सबसे बड़ी योजनाबद्ध राजधानी बनाने का एक रिकॉर्ड कायम करने के लिए नया रायपुर पर हजारों करोड़ रूपए खर्च किए, लेकिन उसके बाद भी न तो मौजूदा पुराने रायपुर शहर से उसका कोई रिश्ता कायम हो सका,और न ही बिना मजबूरी शहर के कोई लोग नया रायपुर जाते हैं, वहां जाकर बसने की बात तो दूर ही रही। राज्य सरकार ने कुछ बरस पहले एक ऐसा अंतरराष्ट्रीय सेमीनार भी करवाया था जिसमें कई देशों के विशेषज्ञों ने आकर पुराना रायपुर और नया रायपुर के बीच रिश्ता कायम करने की योजनाएं भी बनाई थीं, लेकिन वह बात नामुमकिन थी, और कुछ हो नहीं सका। 
हमारा ख्याल है कि राज्य सरकार को अपने अफसरों से परे के कुछ शहरी योजना विशेषज्ञों को बुलाकर अटल नगर पर आगे खर्च के पहले यह तैयारी करनी चाहिए कि वह खर्च किस तरह उत्पादक भी हो। जिस प्रदेश में गरीबों को एक रूपए किलो चावल मिलने से वे दो वक्त खा पाते हैं, उस प्रदेश में ऐसी राजधानी पर ऐसा आसमान छूता खर्च ठीक नहीं है, और अब चूंकि यह ढांचा छाती पर वजन की तरह बैठा हुआ है, इसलिए मौजूदा शहर को उससे जोडऩे के लिए राज्य सरकार को भूमि उपयोग को इस तरह बदलना चाहिए कि शहर से मंत्रालय तक का 25 किलोमीटर का फासला आबाद हो सके। इन डेढ़ दशकों में राज्य सरकार ने इस राजधानी को आबाद करने के लिए इसके आसपास की जमीनों के इस्तेमाल पर बहुत बुरी बंदिशें लगाईं जो कि असंवैधानिक भी थीं, लेकिन लोग अदालत तक नहीं गए, इसलिए वे चल रही हैं। लोग अपनी निजी जमीन का कैसा उपयोग करें, इस पर एक सीमा से अधिक रोकटोक सरकार की नहीं होना चाहिए वरना सत्ता में बैठे लोग ऐसे नियंत्रण से ही करोड़ों की जमीन की अरबों का बना लेते हैं, या किसी की करोड़ों की जमीन बाजार में लाखों की भी नहीं रह जाती। राजनीतिक या प्रशासनिक मनमानी से लोगों की जिंदगी पर ऐसा फर्क करना ठीक नहीं है। नया रायपुर के आसपास का भू-उपयोग ऐसी ही मनमानी का शिकार रहा है, और इसे किसी भूमाफिया, या किसी गिरोह की मर्जी से परे सरकार को लोगों के ऊपर छोडऩा चाहिए कि वे अपनी संपत्ति का अपनी जरूरत का इस्तेमाल कर सकें। बीते बरसों में राज्य सरकार ने लोगों को निर्माण की इजाजत इसलिए नहीं दी कि वह नया रायपुर को आबाद करना चाहती थी। सरकार की अपनी योजनाएं लोगों की निजी जिंदगी को कुर्बान करने की कीमत पर नहीं बननी चाहिए। नई सरकार को नया रायपुर को लेकर एक व्यापक जनसुनवाई करनी चाहिए, और इसके आगे के भविष्य को नए सिरे से तय करना चाहिए।  (Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 23 दिसंबर

भारतीय लोकतंत्र में थोड़ी सी इंसानियत बाकी भी रहने दें...

संपादकीय
22 दिसंबर 2018


दिल्ली की विधानसभा में एक अजीब सा विवाद शुरू हुआ है कि वहां आम आदमी पार्टी की ओर से यह प्रस्ताव रखा गया कि 1984 के सिख विरोधी दंगों को देखते हुए राजीव गांधी को मरणोपरांत दिया गया भारत रत्न वापिस लिया जाए। अब इस पर शुरू हुए बवाल को देखते हुए आम आदमी पार्टी जिम्मेदारी किसी व्यक्ति पर डाल रही है, लेकिन यह बात बड़ी शर्मनाक और बड़ी असंसदीय है कि इस तरह की कोई चर्चा विधानसभा में हो। 1984 के दंगों को लेकर कांग्रेस पर कई तरह के आरोप लगते रहे हैं, और हाल ही में उसके एक नेता, सज्जन कुमार, को उम्रकैद भी हुई है। यह बात भी सही है कि 1984 में इंदिरा की हत्या के बाद विचलित राजीव गांधी ने किसी बड़े पेड़ के उखडऩे पर धरती के हिलने का जो बयान दिया था, वह सही नहीं था, लेकिन अपनी मां को उस किस्म की आतंकी हत्या में खोने के तुरंत बाद एक बेटे का दिया गया वह बयान था। अब अभी पिछले बरस हुए चुनावों में जिस तरह पंजाब की जनता ने कांग्रेस पार्टी को चुना है, उससे यह जाहिर है कि सिखों के बीच कांग्रेस पार्टी द्वारा दंगों को लेकर मांगी गई माफी का असर हुआ है, और सिख समाज उससे कुछ हद तक उबर भी गया है, वरना भला कांग्रेस पंजाब में कैसे जीतती। और इसी चुनाव में नहीं, 84 के बाद और भी चुनावों में कांग्रेस वहां जीत चुकी है। बिना कोई माफी मांगे 2002 के दंगों के बाद गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी भी वहां पर बार-बार चुनाव जीतते रहे हैं, यह एक अलग बात है कि पंजाब में सिख बहुतायत में है, और गुजरात में दंगों के शिकार मुस्लिम बहुत अल्पसंख्यक हैं। फिर भी यह फर्क तो है ही कि कांग्रेस ने औपचारिक रूप से इन दंगों के लिए माफी मांगी, और मोदी-भाजपा ने गुजरात दंगों को लेकर कोई माफी नहीं मांगी। 
राजीव गांधी को भारत के खिलाफ काम करने वाले विदेशी आतंकियों ने जिस तरह मारा, उस शहादत को अनदेखा करके अगर दिल्ली में आम आदमी पार्टी सिख भावनाओं को भड़काने के लिए इस तरह की हरकत कर रही है, तो यह बहुत ही ओछी बात है, और लोकतंत्र के बुनियादी मूल्यों के खिलाफ भी है। दिल्ली विधानसभा को भी अपनी जिम्मेदारी समझना चाहिए कि ऐसी भड़काऊ बातों को लेकर उसका ऐसा असंसदीय इस्तेमाल न हो। सज्जन कुमार को अदालत से मिली सजा, और 84 दंगों में भागीदारी की तोहमतें झेल रहे कमलनाथ को मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने की वजह से अभी सिख भावनाएं भड़की हुई हैं, और ऐसे में आम आदमी पार्टी जिस हिंसक तरीके से उनको दुह रही है, वह एक घटिया हरकत है। राजीव गांधी की शहादत की वजह से उन्हें भारत रत्न दिया गया था, उसे 84 दंगों को याद करते हुए वापिस लेने की बात करना कुछ उसी किस्म का होगा जिस तरह कि यह कहा जाए कि 2002 के गुजरात दंगों को अनदेखा करके चुपचाप बैठे रहने वाले अटल बिहारी वाजपेयी से भी भारत रत्न वापिस ले लिया जाए। भारतीय लोकतंत्र में थोड़ी सी इंसानियत बाकी रहने देना चाहिए। (Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 22 दिसंबर

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 21 दिसंबर : छत्तीसगढ़ सरकार में अब सलाहकारों की नई पीढ़ी

संपादकीय
21 दिसंबर 2018


छत्तीसगढ़ के नए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कल राज्य शासन के चार सलाहकार नियुक्त किए हैं। भूपेश बघेल के साथ लगातार कांग्रेस की चुनावी रणनीति में हिस्सेदार रहे, भूतपूर्व पत्रकार विनोद वर्मा को मुख्यमंत्री का राजनीतिक सलाहकार बनाया गया है। प्रदेश के एक नामी-गिरामी पत्रकार रहे रूचिर गर्ग को मीडिया सलाहकार, बिलासपुर के एक कृषि एवं संबंधित मामलों से लंबे समय से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता, और भूतपूर्व पत्रकार प्रदीप शर्मा को कृषि और ग्रामीण विकास सलाहकार बनाया गया है। कांकेर के एक पुराने कांग्रेस नेता और कांग्रेस विधायक दल से बरसों से जुड़े हुए राजेश तिवारी को संसदीय सलाहकार बनाया गया है। यह पूरी टीम एक नई पीढ़ी के आगमन की घोषणा है, लेकिन इसके साथ-साथ एक नई कार्य संस्कृति की घोषणा भी है। 

अब तक आमतौर पर सलाहकार का जिम्मा ऐसे लोगों को दिया जाता था जो रिटायर होने के बाद या तो खुद काम तलाशते रहते थे, या फिर जिनकी खूबियों की वजह से सरकार जिन्हें रोज के सरकारी कामकाज से परे सलाह-मशविरे के लिए रखती थी। कई सरकारों में कुछ अघोषित गैरसरकारी सलाहकार भी रहते हैं, और कुछ सरकारों में नियमित अफसर भी अपने कामकाज को छोड़कर सलाहकार का काम करते हैं। इन सबका अलग-अलग नफा-नुकसान होता है, और जो अघोषित सलाहकार रहते हैं वे लोकतंत्र के लिए इस मायने में एक खतरा रहते हैं कि वे किसी बात के लिए जवाबदेह नहीं रहते। ऐसे सलाहकारों से बेहतर वे लोग रहते हैं जिनका नाम सरकारी तनख्वाह/भुगतान की लिस्ट में जुड़ा होता है, और जो घोषित रूप से जवाबदेह रहते हैं। अब भूपेश बघेल ने जो चार सलाहकार कल बनाए हैं, वे न केवल उनके सबसे भरोसेमंद लोगों में से हैं, बल्कि अपने-अपने दायरे में उनकी काबिलीयत लंबे समय में साबित भी हो चुकी है। और इन चारों के साथ एक बात एक सरीखी है कि वे अपने रिटायरमेंट की उम्र से बरसों दूर हैं, और वे किसी पुनर्वास के तहत अपने ढलते बरसों में यहां नहीं आए हैं। वे कामकाजी उम्र के हैं, नई पीढ़ी के हैं, नई टेक्नालॉजी से वाकिफ हैं, और जिनकी सरकार में संभावनाएं पहली बार देखी जा रही हैं। जो रिटायर्ड आला अफसर अपनी पूरी नौकरी में जिन कामों को नहीं कर पाते, कई बार उन्हीं कामों के लिए सलाहकार भी बन जाते हैं, लेकिन यहां पर मामला ठीक उल्टा है। और आज की दुनिया की नई जरूरतों के मुताबिक इस नई पीढ़ी को लाना एक साहसी फैसला है। आम लोगों की जुबान में कहें तो, कुछ लोगों को पुराने ढर्रे को देखने की आदत है, और उनको अब तक सलाहकार की कुर्सियों पर दिखने वाले डोकरों की जगह छोकरों को देखना अटपटा लग सकता है। 

सरकारी नौकरी में पूरी जिंदगी लगा देने वाले लोगों के पास रोज के कामकाज के लिए एक बड़ा लंबा तजुर्बा तो रहता है, लेकिन सरकारी बक्से से बाहर की उनकी सोच रह जाती है, और नई सोच के साथ कुछ कर पाना उनके बस का अक्सर नहीं रह जाता। ऐसे में सरकार से बाहर के, छत्तीसगढ़ से पूरी तरह वाकिफ ऐसे नए और नौजवान लोगों को सलाहकार बनाकर भूपेश बघेल ने एक नई पीढ़ी का दाखिला कर दिया है। उनके पहले के कांग्रेसी मुख्यमंत्री अजीत जोगी के मुकाबले वे खुद भी अगली पीढ़ी सरीखे हैं, और ऐसे में सरकार से परे के नौजवान सलाहकार बहुत सी जंग लगी बातों को ठीक करने में मददगार हो सकते हैं। उन्होंने यह भी अच्छा किया है कि अनौपचारिक और अघोषित सलाहकारों के बजाय घोषित और वेतन-भत्ता प्राप्त, ओहदा-दर्जा प्राप्त सलाहकार रखे हैं, और उन्हें हमारी शुभकामनाएं। (Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 21 दिसंबर

किसान कर्जमाफी से जिन पेटों में बड़ा दर्द हो रहा है, वे देश के खाली पेटों का दर्द नहीं जानते..

संपादकीय
20 दिसंबर 2018


तीन राज्यों में कांग्रेस घोषणापत्र के मुताबिक किसानों की कर्जमाफी को लेकर गैरकिसान-हिन्दुस्तान हिल सा गया है, खासकर संपन्न, शहरी, शिक्षित लोग। सोशल मीडिया देश के बड़े-बड़े उद्योगपतियों, बड़े-बड़े अर्थशास्त्रियों और मोदीप्रेमी स्तंभकारों के लिखे से भरा हुआ है कि राहुल गांधी देश का सबसे बड़ा आर्थिक राक्षस साबित हो रहा है। बात सही है कि जब सरकार को टैक्स का पैसा किसी एक तबके से मिलता है, और जब उससे किसी दूसरे तबके को राहत दी जाती है, तो टैक्स देने वाले को दर्द जायज है। लेकिन समझने की बात यह है कि क्या कारखानों और कारोबार को सरकार से किसी तरह की टैक्स रियायत नहीं मिलती? क्या उन्हें जमीन, पानी पर सरकार से रियायत नहीं मिलती? क्या उन्हें सड़कों से अपना माल लाने ले जाने की छूट नहीं मिलती? क्या उन्हें सरकार के तरह-तरह के अनुदान नहीं मिलते? क्या कारोबारी बैंकों का कर्ज नहीं डुबाते? 
ऐसे अनगिनत सवालों को सुलझाने की कोशिश जब करें, तो पहली नजर में ही दिखता है कि देश में बड़े-बड़े, मंझले, और छोटे कारोबारियों के पास बैंकों का जितना कर्ज डूबा है, वह किसानी कर्ज की माफी के मुकाबले कई गुना अधिक है। दूसरी तरफ किसानी कर्ज में लोगों को एक लाख-दो लाख रूपए जैसी कर्जमाफी मिलती है, और कारखानेदारों को सौ-दो सौ करोड़ से लेकर दसियों हजार करोड़ तक डुबाकर भी न फांसी लगाने की नौबत मिलती, और न ही जेल जाने की। दीवालिया कारोबारी मजे से जी सकते हैं, और अपना छुपाया हुआ पूंजी निवेश देश-विदेश में खर्च कर सकते हैं। ऐसे में अनाज, फल-सब्जी, दूध पैदा करने वाले किसानों को जिंदा रहने के लिए अगर सरकारी अनुदान, सरकारी मदद मिलती है, तो उससे संपन्न लोगों के कलेजे इसलिए नहीं जलने चाहिए कि अगर इस देश में घाटे का धंधा हो चुकी किसानी को लोग छोड़ते चलेंगे, तो फिर देश के लिए अनाज, शक्कर, दाल और तेल आयात करना होगा, देश में उत्पादन और घट जाएगा, और आत्मनिर्भरता खत्म हो जाएगी, और आज जिस तरह बेकाबू दाम पर पेट्रोलियम खरीदा जा रहा है, उसी तरह के बेकाबू दाम पर खाना आयात होगा। 
हिन्दुस्तान में उद्योग धंधे चलाकर कमाने वाले लोग इस बात को भूल जाते हैं कि देश की जमीन, उसके पानी, और उसकी हवा पर हर नागरिक का हक है, खदानों पर हर नागरिक का हक है, और सरकार जब गरीबों को कोई अनुदान देती है, रियायत देती है, या कर्जमाफी देती है, तो वह उसी हक का एक भुगतान होता है। इस देश में मदद पाने वाले किसान भीख नहीं पा रहे हैं, वे फसल के उस दाम को पा रहे हैं जिसे सरकारें वक्त पर नहीं देती हैं, और फिर कर्जमाफी की शक्ल में देने को तैयार होती हैं। लोगों को यह समझने की जरूरत है कि कर्जमाफी स्थायी इलाज नहीं है, लेकिन यह जिंदा रहने के लिए आग बुझाने जैसा एक इलाज है जिसमें बहुत किफायत नहीं बरती जा सकती। आग बुझाने के लिए कितनी दमकल गाडिय़ां लगती हैं, कितना पानी लगता है, इसकी कोई सीमा नहीं होती। आज हिन्दुस्तान के किसान की जिंदगी में ऐसी ही आग लगी हुई है क्योंकि सरकार ने उसके कारोबार को एक जायज बाजार देने में कामयाबी नहीं पाई है, और उसकी उपज रस्ते का माल सस्ते में के अंदाज में बिकने को मजबूर है। देश की ग्रामीण और खेतिहर अर्थव्यवस्था की आर्थिक स्वावलंबता बनाए रखने के लिए सरकार को न्यूनतम समर्थन मूल्य को तर्कसंगत और न्यायसंगत करना होगा, इसके लिए सरकार को किसानी के साथ-साथ दूसरे छोटे-छोटे उत्पादक कामों को बढ़ावा देना होगा, और उससे बने और उगे सामानों के लिए बाजार का ढांचा बनाना होगा। जिस तरह सरकारें विशेष आर्थिक जोन बनाती हैं, औद्योगिक परिक्षेत्र बनाती हैं, उसी तरह उन्हें किसानी, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, डेयरी जैसे कामों के लिए भी ऐसा ढांचा बनाना पड़ेगा कि हर कुछ बरस बाद कर्जमाफी की नौबत न आए। लेकिन जब तक सरकारें ऐसा नहीं कर पाती हैं, किसानों को ऐसी मदद जायज है, और ऐसी कर्जमाफी देने वाले राहुल गांधी को राक्षस करार देने वालों को भारत की गरीब-अर्थव्यवस्था की कोई समझ नहीं है। जिनकी पूरी जिंदगी बड़े कारोबारियों के बीच गुजरी है, या शेयर मार्केट की कमाई के बीच गुजरी है, उन्हें देश की धड़कन चलाने के लिए अनाज उगाने वाले के दर्द की कोई समझ नहीं हो सकती। भारत को चलाने वाले लोगों के बीच भारत के पेट की एक बेहतर समझ होना जरूरी है, जो कि आज दिख नहीं रही है। इस देश में आज वित्तमंत्री की सारी काबिलीयत एक टैक्स वकील की है, जो कि खरबपतियों से नीचे किसी को बचाना नहीं जानता। ऐसे में जाहिर है कि कर्जमाफी उसे मंजूर नहीं हो सकती, और वह बाकी सरकार को भी इसके खिलाफ बनाए रख सकता है।  (Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 20 दिसंबर

सादगी, कटौती, किफायत की जरूरत, उपलब्ध रहने की भी

संपादकीय
19 दिसंबर 2018


छत्तीसगढ़ के नए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पुलिस को निर्देश दिया है कि सड़क से उनके आते-जाते ट्रैफिक को अनावश्यक न रोका जाए, और किसी एम्बुलेंस को तो किसी भी हालत में नहीं रोका जाए। उन्होंने मुख्यमंत्री के काफिले की गाडिय़ों में कटौती के लिए भी कहा है। शासन के पहले दिन से ही कटौती, किफायत, और सादगी शुरू होना इसलिए ठीक है कि एक बार जब इनकी आदत हो जाती है, या अफसरों में ही मुख्यमंत्री को खुश करने के लिए उन्हें अतिमहत्वपूर्ण साबित करने की होड़ लग जाती है, तो धीरे-धीरे मुख्यमंत्री के अलावा मंत्री भी इसके आदी होने लगते हैं, और उन्हें यह सब सुहाने भी लगता है। लेकिन यह सब कुछ उस जनता के पैसों पर होता है जो कि रियायती अनाज के बिना पेट नहीं भर सकती, और जो इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों में रिश्वत देने की ताकत भी नहीं रखती। इसलिए मुख्यमंत्री को और भी मामलों में ऐसी सादगी शुरू करनी चाहिए जो उनके मंत्रियों तक पहुंचे। वरना इसी राजधानी में हमने ऐसे स्थानीय मंत्री का काफिला चलते देखा है जिसकी पूरी जिंदगी इसी शहर में गुजरी, लेकिन एक मोहल्ले से दूसरे मोहल्ले जाते हुए भी सायरन बजाती गाडिय़ों का काफिला चलना जरूरी रहता था। यह पूरा तामझाम खत्म होना चाहिए। 
इसके अलावा सरकार में जो सामंती परंपराएं चली आ रही हैं, वे भी खत्म होनी चाहिए। दर्जन भर पुलिस वाले सजावटी-सलामी वर्दी में मुख्यमंत्री को सलामी देने के लिए तैनात रखे जाते हैं, और ऐसी सलामी भला किस काम की कि जिसके पुलिस वालों को बेहतर काम में लगाया जा सकता है। आज जेलों से अदालतों तक विचाराधीन कैदियों को ले जाने के लिए भी पुलिस नहीं मिलती है, और न ही इलाज के लिए ले जाने को। ऐसे में सलामी के लिए, बंगलों में फोन उठाने के लिए, फाटक खोलने और बंद करने के लिए जब पुलिस सिपाहियों का बेजा इस्तेमाल होता है, तो वह जनता की जेब पर बोझ होता है, और ऐसे कर्मचारी पुलिस की बुनियादी ड्यूटी भूल भी जाते हैं। इसलिए नई सरकार को शुरुआत से ही एक ऐसी कटौती शुरू करनी चाहिए जो कि लोकतांत्रिक भावना के साथ मेल भी खाए। 
इसके अलावा राज्य सरकार को यह भी तय करना चाहिए कि हफ्ते का कम से कम एक दिन ऐसा रहे जो कि दौरों और बैठकों से मुक्त रहे, और मंत्रालय से लेकर पटवारी तक हर कोई उस दिन अपने दफ्तर में रहकर लोगों को उपलब्ध रहें। आज बहुत से दफ्तरों में लोग धक्के खाते रहते हैं, और वहां पर कुर्सियों पर लोगों के बैठने का ठिकाना नहीं रहता है। इसलिए मुख्यमंत्री से लेकर पटवारी तक अगर हफ्ते में किसी एक दिन अपने दफ्तर में लोगों से मिलने के लिए मौजूद रहें, तो वह आम लोगों के लिए बहुत बड़ी राहत रहेगी। इससे छोटे-छोटे से सरकारी कामकाज टलना भी रूकेगा जिसके सबसे बुरे शिकार सबसे कमजोर लोग होते हैं। राजनीति या पैसों की ताकत वाले लोग तो किसी तरह अपना काम करवा लेते हैं, लेकिन कमजोर जनता जरा-जरा सी बातों के लिए धक्के खाते रहती है। इस सिलसिले को खत्म करना चाहिए, क्योंकि ऐसी कमजोर जनता संख्या में अधिक रहती है, और वही सरकार के खिलाफ अगले चुनाव के वक्त वोट भी देती है। हफ्ते में किसी तय दिन हर किसी की अपने दफ्तर में मौजूदगी से सरकार के प्रति लोगों का भरोसा भी बढ़ेगा।
दो दिन पहले हमने इसी जगह सरकारी फिजूलखर्ची को रोकने के बारे में भी लिखा था, और राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ के पहले वित्तमंत्री रामचंद्र सिंहदेव ने उसकी एक मिसाल भी कायम की थी। हालांकि फिजूलखर्ची के शौकीन लोग उन्हें चुनावी हार के लिए जिम्मेदार भी ठहराते थे, लेकिन वे सादगी से खुद भी जीते थे, और दूसरे मंत्रियों, अफसरों की फिजूलखर्ची पर कड़ाई से रोक भी लगाते थे। एक बार फिर छत्तीसगढ़ को वैसी कड़ाई की जरूरत है, और इसकी मिसाल मुख्यमंत्री को खुद ही कायम करनी पड़ेगी, तभी जाकर बाकी लोग उस पर चलेंगे।  (Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 19 दिसंबर

दीवारों पर लिक्खा है, 18 दिसंबर

भारतीय लोकतंत्र में मंत्रियों को चुनने की सीमाओं और संभावनाओं का गजब हाल

संपादकीय
18 दिसंबर 2018


चुनावी लोकतंत्र और शासन-प्रशासन में खासा फर्क होता है। अगर चुनाव न होते, और पार्टियों को महज राज्यसभा या विधान परिषद के अंदाज में लोगों को चुनने का मौका रहता, तो पार्टियां ऐसे सांसद या विधायक मनोनीत करतीं जो कि अलग-अलग काबिलीयत के लोगों को छांटकर लिया जाता, और उन्हें उनकी खूबी के मंत्रालय देकर सरकार बेहतर तरीके से चलाई जाती। लेकिन इससे सरकार तो अच्छी चलती, लोकतंत्र बैठ जाता। इसलिए कि लोकतंत्र मनोनयन का नाम नहीं है, निर्वाचन का नाम है। जब आम जनता की पसंद से लोग चुने जाते हैं तो यह जरूरी नहीं होता कि वे खूबियों वाले हों। भारत का लोकतंत्र तो ऐसा कि जिसमें मुजरिम, सजायाफ्ता, दंगाई, और कई किस्म के बुरे लोग भी चुनकर आ जाते हैं। फिर पार्टियों के पास कम से कम राज्यसभा में ऐसी गुंजाइश रहती है कि वे अपने हारे हुए, पिटे हुए, दागी लोगों को वहां भेज सके, और जनता के चुने हुए सांसदों-विधायकों की ताकत का बेजा इस्तेमाल करके राज्यसभा सदस्य बना सके। देश के एक-दो राज्यों में भी विधान परिषद बनाकर ऐसी गुंजाइश रखी गई है कि सरकार मनचाहे मंत्री बना सके। लेकिन आज जिन तीन कांगे्रसी राज्यों में, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, और राजस्थान में मंत्रिमंडल के नाम तय करने की मशक्कत चल रही है, उन राज्यों में विधान परिषद नहीं है, और लोगों को जनता के बीच से चुनकर आने पर ही मंत्री बनने की संभावना है। इसका नफा और नुकसान दोनों ही है, कोई बहुत विशेषज्ञ भी अगर जीत की संभावना नहीं रखते तो उन्हें मंत्री नहीं बनाया जा सकता, और अगर लोग जीतकर आ गए हैं, तो उनके बीच से ही कुछ लोगों के मंत्री बनने की संभावना बन जाती है, संभावना है। 
ऐसे में नाम तय करने वाली पार्टी, मुख्यमंत्री, और बाकी नेताओं की दुविधा भी गजब की रहती है। हम छत्तीसगढ़ की बात करें, तो कुछ महीनों के भीतर ग्यारह लोकसभा सीटों पर चुनाव होना है, और कांगे्रस के पास तो आज महज एक ही सीट है। इसलिए इन तमाम सीटों पर पार्टी को मंत्रिमंडल के मुताबिक भी यह साबित करना होगा कि उन्होंने हर संसदीय सीट को महत्व दिया है। मुख्यमंत्री के अलावा मंत्रियों की कुर्सियां हैं बारह, और संसदीय सीटें हैं ग्यारह! इसके बाद देखें तो राज्य दक्षिण और उत्तर के दो अलग-अलग आदिवासी इलाकों में भी बंटा हुआ है, और इन दोनों में दो दर्जन से अधिक विधायक कांगे्रस के ही जीतकर आए हैं। आदिवासी तबके के मुताबिक, और बस्तर या सरगुजा के मुताबिक इनमें से कम से कम तीन मंत्री बनाने होंगे, और सरगुजा के एक गैरआदिवासी टीएस सिंहदेव तो मंत्री हैं ही। अब बाकी जातियों के हिसाब से देखें, तो अनुसूचित जाति के आधा दर्जन कांगे्रस विधायक हैं, और उनकी भी उम्मीदें जायज हैं। राज्य के अकेले मुस्लिम विधायक और पार्टी के बड़े, धाकड़ नेता मोहम्मद अकबर अपने तबके के अकेले हैं, और उनकी मंत्री की कुर्सी तो पक्की है। लेकिन छत्तीसगढ़ी ब्राम्हण और गैरछत्तीसगढ़ ब्राम्हण भी पर्याप्त संख्या में जीतकर आए हैं, उनकी पारिवारिक ताकत से लेकर उनकी वरिष्ठता, उनका तजुर्बा, इन सबको देखें तो काम आसान नहीं लगता है कि इनमें से किसे लिया जाए, और किसे छोड़ा जाए। इसके बाद ओबीसी की दो प्रमुख जातियां हैं, साहू और कुर्मी। इनमें से कितने लोगों को लिया जाएगा, यह खींचतान बड़ी जाहिर है। इन सबके बीच में बनिया, या मारवाड़ी तबका बाकी ही है, दूसरे अल्पसंख्यक समुदाय बाकी ही हैं।
पूरी तस्वीर को एक नजर में देखें तो लगता है कि किसी मंत्रालय को चलाने की खूबी एक आखिरी पैमाना रह जाएगा किसी को मंत्री बनाने के लिए। अलग-अलग किस्म के दबावों से घिरा हुआ यह चयन सरकार को ऐसे मंत्री देगा जो कि जनता का प्रतिनिधित्व तो रहेगा, लेकिन खूबियों पर आधारित नहीं रहेगा। इसके बाद ऐसी सरकार से जनता यह उम्मीद करेगी कि ये लोग बहुत अच्छा काम करें। और यह बात महज इस सरकार, या इस पार्टी के साथ नहीं है, यह बात देश और हर प्रदेश की हर सरकार के साथ है, पूरा भारतीय लोकतंत्र इसी हिसाब से बना हुआ है, और ऐसे में मंत्रियों का साथ देने के लिए देश में अधिकारियों का जो ढांचा खड़ा किया गया है, उससे जरूर विशेषज्ञता और खूबी की उम्मीद की जाती है। इन दोनों का मिलाजुला तजुर्बा एक-दूसरे को बहुत कुछ सिखाते चलता है, और लोकतंत्र संपन्न होते जाता है।
(Daily Chhattisgarh) 

कड़ी किफायत की जरूरत, पिछले फैसलों पर अमल के पहले पुनर्विचार की भी

संपादकीय
17 दिसंबर 2018


कांग्रेस की तीन सरकारें आज राजस्थान, मध्यप्रदेश, और छत्तीसगढ़ में शपथ ले रही हैं। सोनिया गांधी और राहुल गांधी के लिए यह बरसों बाद आया हुआ खुशी का एक मौका है जिसमें खत्म मान ली गई पार्टी ने एक शानदार तरीके से वापिसी की है, और इन तीन राज्यों में पार्टी आने वाले लोकसभा चुनावों के लिए भी बेहतर तरीके से तैयार हो सकेगी। चूंकि इन विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने किसानों और दूसरे तबकों से इतने किस्म के वायदे किए हैं कि उनको पूरा करने के लिए हर जगह लंबा-चौड़ा खर्च लगेगा। और अगर इनके पूरे होने का आसार नहीं दिखेगा तो कुछ महीने बाद के लोकसभा चुनावों पर पार्टी की साख खराब होगी। इसलिए इस पार्टी को इन तीनों राज्यों में कुछ फैसले एक सरीखे लेने चाहिए जो कि नेहरू-गांधी युग की राजनीति की सादगी के मुताबिक भी होना चाहिए, और आत्महत्या करते हुए किसानों को बचाने वाले भी होने चाहिए। 

हम छत्तीसगढ़ में ही देखते हैं कि सत्ता ने पिछले बरसों में धीरे-धीरे अपने पर इतना अधिक खर्च करना शुरू कर दिया था, कि लगता ही नहीं था कि यह वह गरीब राज्य है जहां पर एक रूपए किलो चावल मिलने पर ही एक बड़ी आबादी दो वक्त खा पा रही थी। इसके अलावा नया रायपुर में सरकार ने मंत्री-मुख्यमंत्री से लेकर विधानसभा अध्यक्ष तक के बंगलों के लिए, विधानसभा के लिए, अफसरों के बंगलों के लिए सैकड़ों करोड़ रूपए की ऐसी योजनाएं बना रखी थीं, जिनसे राज्य पर अंधाधुंध बोझ पडऩे वाला था, और उसके बाद बाकी जिंदगी इनके रखरखाव में करोड़ों रूपए महीने और लगने वाले थे। इस नये ढांचे के बिना भी राज्य सरकार में बैठे ताकतवर लोग अपने पर अंधाधुंध खर्च कर ही रहे थे। ऐसी खबर थी कि विधानसभा अध्यक्ष का बंगला, जिसमें वे रहते भी नहीं थे, उसमें 50 से अधिक एयरकंडीशनर लगाए गए थे। ऐसा हाल बाकी मंत्रियों और मुख्यमंत्री तक सबके बंगलों का था, और ऐसा काम करवाने वाले अफसर अपने बंगलों पर खर्च कर रहे थे, वह तो स्वाभाविक ही था। 

हमारा ख्याल है कि कांग्रेस की सरकार को पहले दिन से एक कड़ी किफायत से काम लेना चाहिए, और इस जिम्मेदारी को सत्ता सुख का न मानकर जनसेवा की चुनौती मानना चाहिए। हमने पिछले बरसों में कई बार इसी जगह तत्कालीन सरकारों को यह सलाह दी थी कि जिलाधीश या जिला कलेक्टर जैसे पदनाम बदलकर उसे जिला जनसेवक करना चाहिए, ताकि इन कुर्सियों के साथ जुड़ा हुआ सत्ता का अहंकार कम हो, और कुर्सी के नाम से ही लोगों के दिमाग में ऐसी कार्य संस्कृति बैठे कि वे कुछ कलेक्ट करने नहीं बैठे हैं, वे मठाधीश की तरह जिलाधीश नहीं हैं, बल्कि वे जिला जनसेवक हैं। सरकार की पूरी सोच जब तक ऐसी नहीं होगी, तब तक गरीब और आम जनता के छोटे-छोटे काम भी नहीं होंगे। किफायत के साथ-साथ सरकार को अपनी कार्य संस्कृति को सत्ता के बजाय सेवा से जोडऩा चाहिए, इससे भी सरकारी खर्च कम होगा, और सरकारी अमले, ढांचे की उत्पादकता बढ़ेगी। 

नये मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को तुरंत ही राज्य सरकार की सारी खरीदी, सारे नए टेंडर, सारे नए खर्च स्थगित कर देना चाहिए क्योंकि पिछली सरकार के फैसलों के मुताबिक अब कोई काम करना नैतिक रूप से भी ठीक नहीं है, और यह नई सरकार के अधिकार का हनन भी होगा। शपथ ग्रहण के साथ ही मुख्यमंत्री को राज्य में तमाम नए खर्च रोक देने चाहिए, और नए मंत्रिमंडल को उन पर फिर से सोचना चाहिए। आज प्रदेश में हजारों करोड़ के काम मंजूर किए हुए हैं, और पुरानी मंजूरी के आधार पर आज कोई काम शुरू नहीं करना चाहिए। नए मंत्रियों और नए विधायकों की बहुत सी नई महत्वाकांक्षाएं भी होंगी, लेकिन कांग्रेस पार्टी को एक नीतिगत फैसला लेकर कड़ी किफायत बरतना चाहिए, इससे जनता के बीच उसकी साख भी अच्छी होगी। आने वाले दिनों में सरकार के कामकाज को लेकर, चुनावी घोषणापत्र के मुद्दों को लेकर बहुत सी बातों पर और चर्चा का वक्त आएगा, लेकिन फिलहाल बिना देर किए कांग्रेस को और छत्तीसगढ़ सरकार को फिजूलखर्ची रोककर किफायत पर अमल करना चाहिए। (Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 17 दिसंबर