बच्चों से बलात्कार रोकना आसान नहीं, इसलिए घर, समाज भी चौकन्ना रहें...

संपादकीय
31 जनवरी 2018


बलात्कार कोई ऐसा मुद्दा नहीं है जिस पर बार-बार लिखा जाए और अच्छा लगे, यह भी हम जानते हैं कि बार-बार इस मुद्दे पर लोग पढऩा भी नहीं चाहते। कुछ दिन पहले ही हमने यह लिखा था कि इस मुद्दे पर सिर्फ पुलिस से हर उम्मीद करना गलत होगा और समाज को अपने बारे में सोचना होगा, खुद भी कुछ करना होगा। और इसके बाद कल दिल्ली की एक भयानक खबर आई कि पड़ोस का एक लड़का आठ महीने की बच्ची को खिलाने के लिए ले गया, और उससे बलात्कार करते पकड़ाया। अब ऐसी किसी मामले को पुलिस या सरकार भला कैसे रोक सकते हैं? ऐसी रोकथाम तो परिवार के लोग, पड़ोस के लोग या समाज के लोग ही सावधानी बरतकर कर सकते हैं।
आज हम भारत में बलात्कार को लेकर एक छोटे पहलू पर बात करना चाहते है, बच्चों को लेकर। बच्चों से बलात्कार जैसी दिल दहलाने वाली, दिल बैठा देने वाली वारदातें सामने आई हैं, वे खबरों में छप रही हैं, उनके बारे में यहां पर जानकारी लिखने की जरूरत नहीं है, लेकिन इस बारे में देश को क्या करना चाहिए यह चर्चा बहुत जरूरी है। बच्चों से बलात्कार तो खबरों में आ जाते हैं, लेकिन हम लगातार जिस मामले को उठाते हैं, वे हैं बच्चों के देह शोषण के। बच्चों के साथ इतने किस्म के यौन अपराध उन्हीं के परिवार के लोग, परिवार के आस-पास के लोग, पड़ोस के लोग, स्कूलों के शिक्षक-प्रशिक्षक करते हैं कि उन पर भरोसा भी मुश्किल होता है। भारत का अनुभव यह है कि यह देश अपने भीतर की बुराईयों को अनदेखा करने पर भरोसा रखता है, और अपनी हर बुराई को पश्चिम पर थोपकर खुद हो लेता है कि इसकी अपनी संस्कृति बुराईयों से और विकृतियों से आजाद है। यह देश अपने लोगों की शारीरिक और मानसिक जरूरतों को भी मानने से इंकार कर देता है, अपने इतिहास को मानने से इंकार कर देता है। आज के भारत में संस्कृति के ठेकेदारों का तो तबका बात-बात पर डंडे-झंडे लेकर सड़कों पर रहता है, उसे इस देश के इतिहास और पुराण को लपेटकर अलग रख दिया है, और इंसानों की तन-मन की जरूरतों को नकारने को यह तबका भारतीय संस्कृति मानता है। इसलिए इस देश में बच्चों के यौन शोषण को लेकर कोई बात नहीं हो सकती, और जब ऐसा शोषण करने वाले लोग अपने जुर्म को दबा-छुपाकर ऐसी हरकतों को जारी रख पाते हैं, तो उनमें से कुछ लोग बलात्कारी होते हैं। छोटे बच्चों से बलात्कार, और उसके साथ-साथ उनसे दिल दहला देने वाली हिंसा, रातों-रात पैदा होने वाली नीयत नहीं है। यह धीरे-धीरे मौका पाकर बढ़कर इस हद तक पहुंचने वाली हिंसा और विकृति है। इसलिए अगर समाज जल्द इस पर रोक नहीं लगा सकता, तो इसका बढ़ते जाना तय भी रहता है। देश के बच्चों को सेक्स अपराधों से बचाना इसलिए जरूरी है कि एक तो यह हिफाजत उनका बुनियादी हक है, दूसरा यह कि ऐसे जख्म उनकी जिंदगी के आखिर तक भर नहीं पाते, और देश के भविष्य में उनका उतना योगदान नहीं हो पाता जितना कि इन जख्मों के बिना हुआ रहता। इसलिए एक बच्चे को तबाह करने से, उस समाज का भविष्य भी तबाह होता है।
भारतीय समाज को पुलिस और सरकार का मुंह देखने के बजाय अपने बच्चों की हिफाजत खुद करने की सारी कोशिशें पहले कर लेनी चाहिए, सारी सावधानी पहले खुद बरत लेनी चाहिए, और उसके बाद जाकर सरकार से, पुलिस से कोई उम्मीद जायज मानी जा सकती है। जब परिवार के पहचान के लोग घर के भीतर बलात्कार करें, तो इस हिंसा के शिकार बच्चों को बचाने के लिए पुलिस पहले तो पहुंच ही नहीं सकती। बाद में भी पुलिस का दखल तभी हो सकता है जब इन बच्चों की बातों पर भरोसा करके घर वाले पुलिस तक पहुंचें। इसलिए हर घर को, हर मोहल्ले और इमारत को, हर स्कूल और टीम को, अपने बच्चों की हिफाजत के बारे में पहले खुद सोचना होगा, बच्चों को समझदार बनाना होगा, और पाखंडी शुद्धतावादियों के झंडे-डंडों से डरे बिना बच्चों को स्कूलों में सावाधानी के लायक शारीरिक शिक्षा देनी होगी। छत्तीसगढ़ में पिछले बरसों में बहुत ही गरीब और बेजुबान आदिवासी बच्चियों के आश्रमों और हॉस्टलों में जिस तरह के सामूहिक बलात्कार हुए, जिस तरह के लगातार बलात्कार हुए, उससे सबक लेकर आगे की रोकथाम के लिए जिस तरह की बचाव-तैयारी की हम उम्मीद कर रहे थे, राज्य स्तर पर वैसी कोई तैयारी दिख नहीं रही, और जो मामले सामने आए, उन्हीं के मुजरिमों पर मुकदमे पर आकर बात थम गई है। राज्य स्तर पर समाज के भीतर जैसी हलचल होनी चाहिए थी, वैसा कुछ भी दिखाई नहीं पड़ा।
आखिर में एक बात और, वर्दी में मौजूद पुलिस अपनी कई किस्म की खामियों के चलते एक बहुत आसान, सहूलियत वाला, और हर मौके पर मौजूद निशाना बन जाती है। लेकिन दशहरे के रावण को जला देने से जितनी बुराईयां जलती हैं, उतने ही खतरे किसी एक खराब पुलिस को निशाना बनाने से टल सकते हैं। ऐसे लुभावने नारे लगाकर राजनीति और सामाजिक आंदोलन के लोग टीवी कैमरों पर जगह तो पा सकते हैं, लेकिन इससे समाज के भीतर का खतरा कम नहीं होगा। सिर्फ पुलिस को हर मर्ज की दवा मान लेना, और हर हादसे पर पुलिस को सजा दिलवा देने की जिद करना, असल मर्ज को अनदेखा करना होगा। भारत के आंदोलनकारियों को एक संतुलन और अनुपात भी समझना होगा कि किस बात के लिए समाज खुद जिम्मेदार है, और किस बात के लिए सरकार या पुलिस, और किस हद तक। एक मामूली बीमारी के लिए इन दिनों कई किस्म की जांच होती है, और तब जाकर इलाज तय होता है। बलात्कार जैसे विचलित कर देने वाली वारदातों के बाद बिना सोचे-समझे सिर्फ सत्ता पर, सिर्फ पुलिस पर हमलों से समाज अपने भीतर की खामियों को भी नहीं समझ पाएगा, और अपनी बीमारी का इलाज भी नहीं पा सकेगा। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 31 जनवरी

वरूण गांधी की नेक सलाह संपन्न सांसद वेतन छोड़ें

संपादकीय
30 जनवरी 2018


कुछ बरस पहले यह सोचना मुश्किल था कि सांसद वरूण गांधी की कही किसी बात की तारीफ में इस जगह पर लिखना पड़ेगा। नेहरू-गांधी वंश के कांगे्रस के बाहर के नेता, भाजपा की मेनका गांधी के भाजपा सांसद बेटे वरूण गांधी ने कुछ बरस पहले एक आमसभा में मुस्लिमों के बारे में अपमानजनक और साम्प्रदायिक-हिंसक फतवे देकर, उनके हाथ काटने का नारा लगाकर एक वीडियो की शक्ल में देश भर में बदनामी पाई थी, लेकिन फिर वे शायद सुबूतों की कमी से उस मामले में बच निकले। लेकिन उसके बाद से वे अपनी भाजपा से कुछ तिरछे-तिरछे चलने के लिए जाने गए, और भाजपा के भीतर के युवा तुर्क की तरह वे पार्टी लाइन से परे की बातें भी करने लगे। अभी उन्होंने लोकसभाध्यक्ष को एक चि_ी लिखकर यह अपील की है कि वे एक अभियान शुरू करें कि संपन्न सांसद अपना वेतन छोड़ें।
वरूण गांधी की यह सोच काबिले तारीफ है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब देश के मध्यमवर्ग से भी यह उम्मीद करते हैं कि वह रसोई गैस की रियायत को छोड़े, रेल मंत्रालय लोगों से उम्मीद करता है कि वे रेल टिकट पर रियायत छोड़ें, तो सांसदों को भी यह चाहिए कि वे जरूरत न हो तो संसद से वेतन न लें। अब भारत की संसद का जहां तक सवाल है, तो यहां पर कुख्यात विजय माल्या को भी सांसद बनाकर पार्टियों ने देश के उच्च सदन में भेजा था। हेमा मालिनी, जया भादुड़ी, सचिन तेंदुलकर, बिड़ला, जैसे अनगिनत अरबपति-खरबपति संसद में भेजे गए, और आज देश की संसद में तकरीबन हर कोई करोड़पति हैं। ऐसे में यह सोच अच्छी है कि जिन लोगों को वेतन की जरूरत न हो, वे संसद से वेतन न लें। लोकसभाध्यक्ष सुमित्रा महाजन ऐसे एक इतिहास रचने में मददगार भी हो सकती हैं अगर वे वरूण गांधी की इस सोच को आगे बढ़ाएं। जब देश में अमीर और गरीब के बीच असमानता की खाई इतनी गहरी और इतनी चौड़ी हो चुकी है कि भारत में एक प्रतिशत अमीर लोग देश की कुल संपदा के 60 फीसदी के मालिक हैं। वर्ष 1930 में 21 फीसदी लोगों के पास इतनी संपदा थी। भारत में 84 अरबपतियों के पास देश की 70 फीसदी संपदा है।
दरअसल संसद देश के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की देश की सबसे बड़ी पंचायत होती है, और उससे यह उम्मीद की जाती है कि वह कई किस्म की मिसालें कायम करे। वरूण ने यह भी याद दिलाया है कि 1949 में नेहरू कैबिनेट ने देश के आर्थिक हालत को ध्यान में रखकर यह फैसला लिया था कि उनकी पूरी कैबिनेट तीन महीने तक वेतन नहीं लेगी। हमारा ख्याल है कि वरूण गांधी एक सांसद के रूप में संसद में एक अशासकीय संकल्प या अशासकीय विधेयक ला सकते हैं जो संपन्न सांसदों से इस त्याग की मांग करे। और इस पर बाकी सांसदों के रूख से यह भी साफ हो जाएगा कि गरीबों के इस देश में गरीबों के हक को संसद के रास्ते पाने की चाहत किन करोड़पतियों में है। लोकसभा में प्रति सांसद संपत्ति 14.61 करोड़ रुपये हैं और राज्यसभा में प्रति सांसद संपत्ति 20.12 करोड़ है। सोलहवीं लोकसभा में 440 सांसद ऐसे हैं जिनकी संपत्ति करोड़ रुपये हैं। लोगों को अच्छी तरह याद होगा कि सोशल मीडिया इन खबरों से किस कदर पटा हुआ है कि सांसद कितना रियायती खाना पाते हैं, कितने बड़े मकान मुफ्त पाते हैं, और जब देश में कुछ सौ रुपये में सभी तरह की मोबाइल सुविधा मुफ्त है, तो सांसद किस तरह हजारों रुपये टेलीफोन सहूलियत का पाते हैं। लोगों के मन में सांसदों को लेकर कई वजहों से बड़ी नाराजगी बनी हुई है, जिनमें से एक इस बात के लिए भी है कि संसद में काम न करने के बावजूद सांसद देश पर इतना बड़ा बोझ बने हुए हैं। रेखा और सचिन जैसे सांसदों को लेकर खर्च की ओछी बातें भी लिखी जाती हैं।
अगर देश की संसद ऐसी मिसाल कायम करेगी तो प्रदेशों की विधानसभाओं में भी कुछ लोग ऐसी शुरूआत कर सकते हैं। जिन लोगों को अपना घर-परिवार चलाने के लिए, अपने चुनाव क्षेत्र के लोगों के बीच काम करने के लिए संसद और विधानसभाओं के वेतन-भत्तों और सहूलियतों की जरूरत न हो, उन्हें एक मिसाल कायम करनी चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 30 जनवरी

जौहर करने, सती होने के हक की कैद को समझने की जरूरत

29 जनवरी  2018

अभी कुछ दिन पहले हिन्दुस्तानी गहनों के एक ब्रांड के इश्तहार में छपी एक लाईन को लेकर बड़ी बहस छिड़ी। इसमें एक लड़की यह कहते दिखती है कि मुझे अपना पति तो पसंद करने नहीं मिला, लेकिन मैं अपने गहने पसंद कर सकती हूं। यह इश्तहार मुंबई की बसों पर देखने मिला, और लोगों ने इसे महिला की आजादी का मखौल बनाने वाला बताया। एक महिला ने ट्विटर पर इसके बारे में लिखा कि गहने पसंद करने को कब से महिलाओं की आजादी करार दिया जाने लगा है?
समाज में, और महज हिन्दुस्तानी समाज नहीं सभी समाजों में, औरत का दर्जा शुरू से गैरबराबरी का रहा है। इसकी कुछ वजहें समाज बनने के पहले से इंसानी बदन से जुड़ी हुई दिखती हैं कि महिला के शरीर में एक पुरूष शरीर से सीधे लडऩे के लिए ताकत कम दिखती है, फिर चाहे महिला का शरीर लंबे दौर में एक पुरूष के शरीर से अधिक मजबूत ही क्यों न हो। इसी तरह एक औरत के बदन में कुदरत की दी हुई कुछ दिक्कतें ऐसी रहती हैं कि वह कुछ वक्त, अपनी माहवारी के दिनों से लेकर अपने गर्भ के दिनों तक पुरूष से सीधे हाथापाई की बराबरी करने के लायक नहीं रहती, और शायद यह भी पुरूष के दबदबे की एक वजह रही होगी।
उसी वक्त से शुरू हुई गैरबराबरी पुरूष प्रधान समाज में बनाई गई सामाजिक व्यवस्थाओं, रीति-रिवाजों, और परंपराओं में गहरे बैठाई गईं, और औरत को लगातार कुचला जाता रहा। तब से लेकर अब तक यह गैरबराबरी बुरी तरह और पूरी तरह जारी है, और एक कोई दिन ऐसा नहीं गुजरता कि दुनिया के किसी न किसी कोने में कोई न कोई ताकतवर मर्द किसी न किसी औरत को कुचलते न पकड़ाता हो। अभी जब यह लिखा जा रहा है, उसी वक्त अमरीका से एक खबर आई है कि किस तरह वहां रिपब्लिकन पार्टी के एक बड़े नेता और बड़े पदाधिकारी को महिला के शोषण के आरोपों के सामने आने के बाद इस्तीफा देना पड़ा है। और इसी वक्त यह खबर भी टीवी की स्क्रीन पर है कि किस तरह वहां पर महिला खिलाडिय़ों के देह शोषण के सौ से अधिक मामलों में एक कोच को 175 बरस कैद की सजा सुनाई गई है।
इसलिए एक महिला का शोषण घर के बाहर, घर के भीतर, और जन्म के पहले से अपनी मां के पेट में भी होते ही चलता है, और इसलिए गहनों का यह इश्तहार बहुत से लोगों को तो, या अधिक सही यह कहना होगा कि अधिकतर लोगों को आपत्तिजनक लगेगा ही नहीं, और इसे एक महिला को गहने चुनने के अधिकारों से जोड़कर देखा जाएगा। अब महिला के चुनने के अधिकारों को देखें तो इन दिनों हिन्दुस्तान के मीडिया पर छाई हुई फिल्म पद्मावत को देखना होगा या उसकी कहानी को पढऩा होगा कि किस तरह एक राजपूत महिला को किसी गैर मर्द के हाथों से अपने को बचाने के लिए आग में कूदकर जलकर मर जाने का अधिकार दिया गया था। इससे थोड़ा ही अलग एक दूसरा अधिकार सती होने का था जो कि एक महिला के पति के गुजर जाने पर उसकी चिता में कूदकर जान देने का हक था। कहने को ये दोनों बातें एक महिला का हक या उसकी जिम्मेदारी बताती हैं, लेकिन यह एक किस्म से महिला पर लादा गया एक सामाजिक बोझ था कि उसे अगर अपनी देह को किसी पराए मर्द से बचाना मुश्किल हो, तो उसे आग में कूदकर जान दे देनी चाहिए। मतलब यह कि उसकी देह की अहमियत इतनी अधिक बताई गई कि कोई दूसरा मर्द उसे छू भी पाए, उसके पहले वह उस बदन को ही खत्म कर दे। इसी तरह किसी महिला के सती होने की जो परंपरा रही, वह भी इसी किस्म से रही कि जब पति ही नहीं रहा, तो उसकी विधवा कही जाने वाली पत्नी के बदन का इस धरती पर और क्या इस्तेमाल है? इन दोनों ही बातों में औरत की सारी इज्जत को उसके बदन से जोड़ दिया गया, और उसके पति से जोड़ दिया गया। यह एक अलग बात रही कि ऐसी महिलाओं के पिता रहे हों, या कि पति, इनमें से बहुत से ऐसे रहे जो कि मुगलों के गुलाम बनकर सहूलियत का राजपाट जारी रखने के लिए उनके ताबेदार बनकर रहे, और उनमें से बहुतों ने अपनी बहन-बेटी को मुगलों को सौंपकर उनसे रिश्तेदारी की, और सरकारी हक पाए।
हिन्दुस्तान में अपनी आन, बान, और शान के नारे लगाने वाले ऐसे बहुत से समाज रहे जिन्होंने अपनी बहन-बेटी की कीमत पर विधर्मी या विदेशी शासकों से समझौते किए, उनके सामने हथियार डाले, उनकी जूतियां उठाईं, और इस पूरे सिलसिले में अपनी बहन-बेटियों का इस्तेमाल सामान की तरह किया, जानवरों की तरह उनकी रस्सी अपने घर से खोलकर मुगलों के घर बांध दी थी। आज ऐसे लोग जौहर को महिमामंडित करते हुए सड़कों पर तलवारें भांज रहे हैं, और एक ऐसे गौरव के इतिहास का दावा कर रहे हैं जो कि औरत के जिस्म को आग में झोंककर रौशन होता था।
इसी तरह सतीप्रथा को देखें तो पति के गुजर जाने के बाद पत्नी को, जिंदा पत्नी को लकड़ी के एक सूखे ल_े की तरह चिता में झोंक देने का मर्दाना हक जिन लोगों को गौरव दिलाता है, उन लोगों को आज भी इस बात में गौरव हासिल हो सकता है कि वे अपनी बहन-बेटी के लिए पति तो खुद ढूंढें, लेकिन उसे गहने पसंद करने की आजादी दें। अब यह आजादी कुछ उसी किस्म की है जिस किस्म की आजादी मुस्लिम रीति-रिवाजों में बुर्का पहनने, या हिजाब बांधने की होती है। आज जब योरप के एक के बाद एक कई देशों में मुस्लिम औरतों के बुर्के के खिलाफ कानून बन रहे हैं, और इस पोशाक पर रोक लग रही है, तो मुस्लिम समाज के कई लोग इसे मुस्लिम औरत की पसंद और आजादी पर हमला बता रहे हैं। मर्द तो मर्द, मुस्लिम औरत भी इसे अपनी आजादी पर हमला मान रही हैं, क्योंकि आजादी की उनकी समझ और जरूरत को मर्दाना सोच से लदे मुस्लिम रीति-रिवाजों में हमेशा ही बुर्के के भीतर कैद करके रखा हुआ है। आज बुर्का हट जाना जिन महिलाओं को मुस्लिम महिला की आजादी में दखल और खलल लग रहा है, वे कुछ उसी किस्म की सोच की शिकार महिलाएं हैं जिनको पदमावती के दिनों में जौहर करने से रोकना दखल लगता, या कि राजस्थान में पति की चिता पर सती होने वाली महिला को रोकना उसे उसके हक से रोकना लगता।
दरअसल सदियों से चली आ रही सामाजिक परंपराओं से उबरना बड़ा मुश्किल होता है। और ऐसे में कई बार गुलाम मानसिकता के शिकार समाज, लोग, या कि महिलाएं उस गुलामी के भीतर ही अपनी हिफाजत महसूस करते हैं। जिन लोगों ने मनोविज्ञान कुछ पढ़ा होगा, वे जानते हैं कि मास्टर और स्लेव मेंटलिटी, यानी मालिक और गुलाम मानसिकता के शिकार लोग एक-दूसरे को ढूंढ लेते हैं, और एक-दूसरे के साथ अपने को महफूज महसूस करते हैं। अभी कुछ अरसा पहले तक इंटरनेट पर एमएसएन के बहुत से ऐसे चैट ग्रुप थे जिसमें लोग एक-दूसरे के पूरक बने हुए जोड़ी बना लेते थे, फिर चाहे वे दुनिया के अलग-अलग कोनों में बसे हुए गुमनाम और बेचेहरा लोग ही क्यों न हों। ऐसे मालिकों के साथ कुछ लोग खुद होकर अपनी मर्जी से गुलाम बनकर शब्दों में उनके तलुए चाटते थे, उनके सामने घुटनों पर रहते थे, और उनके मालिक उन्हें कोड़े लगाते थे।
दुनिया के बहुत से समाज ऐसे हैं जहां पर लोग गुलाम मानसिकता के शिकार हैं। इसमें भारत के कई समाज भी शामिल हैं जिनमें ऐसी औरतों की बहुतायत है जो कि जौहर करने और सती होने को अपना गौरव समझती हैं, आज भी उस परंपरा को, या कम से कम उसके इतिहास को, पूजती हैं, और उसकी गौरव-रक्षा के लिए तलवार लेकर सड़कों पर उतरने को तैयार रहती हैं। आज जब वर्तमान में ही गुलाम मानसिकता को तोडऩा एक मुश्किल काम हो रहा है, तो भूतकाल और इतिहास में जाकर उसे तोडऩा और भी मुश्किल काम है, और ऐसे में भविष्य या आने वाले कल में भी ऐसी गुलाम मानसिकता से आजादी आसान नहीं दिखती है।
इसलिए घूंघट हो, गैरबराबरी हो, विधवा जैसा शब्द हो, या कि पोशाक की किसी और किस्म की गुलामी हो, बोलचाल की वह भाषा हो जिसमें औरत की जगह न हो, जिसमें शेर-चीते भी महज नरभक्षी, आदमखोर, मैनईटर होते हों, मानो उन्हें औरत को खाने से भी परहेज हो, ऐसी तमाम भाषा के खिलाफ लडऩा होगा। जिन लोगों ने औरत के हक को महज गहनों की पसंद तक कैद रखने के इश्तहार का विरोध किया है, उन्होंने इस सीमित पसंद से खुश औरतों को भी झकझोरा है, और ऐसा कोई भी मौका छोडऩा नहीं चाहिए, चूकना नहीं चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

शिक्षाकर्मियों का मुद्दा जारी सरकार का जिम्मा बाकी

संपादकीय
29 जनवरी 2018


छत्तीसगढ़ में शिक्षाकर्मियों का आंदोलन पिछले महीनों में लंबा चला, और उस वक्त रायपुर के कलेक्टर-एसपी ने इसी तरह मध्यस्थता करके जेल के भीतर उस हड़ताल को खत्म करवाया था। लेकिन आज फिर शिक्षाकर्मियों का मुद्दा खबरों में आ गया है क्योंकि मध्यप्रदेश ने शिक्षाकर्मियों का संविलियन कर दिया है। छत्तीसगढ़ सरकार ने हड़ताल खत्म होते समय भी यह साफ कर दिया था कि संविलियन नहीं किया जाएगा, और बाकी मांगों पर विचार किया जाएगा। लेकिन राज्य भर में अभी जब लोक सुराज के लिए जनता से मांगों की अर्जियां ली जा रही थीं, तब उसमें संविलियन की बात भी पूछी गई थी, और उससे एक बार फिर बखेड़ा शुरू हुआ। इसके बाद कल भाजपा के एक नेता के बयान पर विवाद शुरू हुआ जिसमें उन्होंने एक टीवी चैनल पर शिक्षाकर्मियों को मजदूर कह दिया। अब तीसरी बात इससे जुड़ी हुई सुप्रीम कोर्ट में सामने आई है जहां पर बिहार सरकार को इसी किस्म के शिक्षकों के मामले में बड़ी फटकार लगाई गई है कि सामान काम के लिए सामान वेतन क्यों नहीं दिया जा रहा?
छत्तीसगढ़ में शिक्षाकर्मी हड़ताल खत्म करवाते समय राज्य सरकार ने अपना पक्का इरादा जाहिर कर दिया है कि वह किन शर्तों पर ही बात करेगी। करीब पौने दो लाख शिक्षाकर्मी राज्य की प्राथमिक शालाओं में पढ़ाने के लिए सबसे बड़ी ताकत हैं, और वे बुनियादी रूप से जिला पंचायत के कर्मचारी हैं। उनकी नौकरी भी जिला स्तर की रहती है, और राज्य सरकार उनकी नियोक्ता नहीं है। ऐसे में एक सवाल यह भी उठता है कि निर्वाचित जिला पंचायतों के नियुक्त किए गए शिक्षाकर्मियों की मांगों पर कोई फैसला हो, या कि उन्हें बर्खास्त करने का फैसला हो, राज्य सरकार का अधिकार क्षेत्र कितना है, उसकी जिम्मेदारी कितनी है, और जिला पंचायत का दायरा कितना है। कुछ जानकारों का यह मानना है कि राज्य सरकार इस मामले में कोई दखल नहीं दे सकती है और न ही उसकी कोई जिम्मेदारी बनती है। यह बारीक कानूनी मुद्दा हो सकता है कि बर्खास्तगी के खिलाफ किसी के अदालत जाने पर तय हो, लेकिन फिलहाल तो सरकार ने बैठकें करके और बातचीत करके इसे अपनी जिम्मेदारी मान ही लिया है।
हम अभी पलभर के लिए शर्तों की बारीकियों पर न जाकर सिर्फ यह सोचते हैं कि प्राथमिक शिक्षा को लेकर सरकार का क्या रूख होना चाहिए तो लगता है कि शिक्षा के जिस स्तर पर सबसे अधिक मेहनत होनी चाहिए, वह छत्तीसगढ़ में सबसे उपेक्षित है। पिछले दिनों नीति आयोग के उपाध्यक्ष छत्तीसगढ़ आए थे और उन्होंने शिक्षा और चिकित्सा इन दो मुद्दों पर सबसे अधिक मेहनत की जरूरत बताई थी। अब छत्तीसगढ़ में प्राथमिक शिक्षा का शिक्षा विभाग से भी लेना-देना है, और पंचायत विभाग से भी लेना-देना है। इन दोनों की जिम्मेदारियों को तय करना हमारा मकसद नहीं है, लेकिन हम यह बात जोर देकर कहना चाहते हैं कि प्राथमिक शिक्षा को अधिक महत्व देने की जरूरत है, उस पर शहरीकरण की खूबसूरती से कहीं अधिक खर्च करने की जरूरत है, उस पर सड़कों के ढांचों से अधिक खर्च करने की जरूरत है। अगर सरकार प्राथमिक शिक्षा को राज्य के ढांचे का विकास नहीं मानती है, तो यह गलती होगी। शिक्षाकर्मियों की मांगों से परे भी राज्य की प्राथमिक शिक्षा को भी तरह-तरह के भ्रष्टाचार से बचाने की जरूरत है, क्योंकि कोई ऐसी स्कूल नहीं है जहां पर एक-दो कमरे टूटे-फूटे फर्नीचर से भरे हुए न हों। इसके अलावा भी तरह-तरह की गड़बडिय़ां समय-समय पर सामने आते रहती हैं, यह राज्य शिक्षकों का इंतजाम भी नहीं कर पा रहा है, और उनके लिए जगह-जगह अलग-अलग कई विषयों में आऊटसोर्सिंग से शिक्षक नियुक्त करने जैसी नौबत भी सामने आ चुकी है। छत्तीसगढ़ को अपनी नींव के पत्थर मजबूत करने के लिए प्राथमिक शिक्षा को मजबूत करना होगा। कल स्कूल शिक्षा मंत्री ने शिक्षाकर्मियों को अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की विरासत में दी हुई समस्या बताया है। किसी भी राज्य सरकार के लिए चौदहवें बरस के जश्न के मौके पर डेढ़ दशक पहले की सरकार को कोसना शोभा नहीं देता। छत्तीसगढ़ को बिना देर किए प्राथमिक शिक्षा की हालत सुधारना होगा। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 29 जनवरी

उत्तरप्रदेश से उठती साम्प्रदायिकता बाकी देश को भी झुलसाएगी...

संपादकीय
28 जनवरी 2018


उत्तरप्रदेश के कासगंज में गणतंत्र दिवस के दिन शुरू हुई हिंसा का तनाव अब तक जारी है। वहां पर हिन्दू और मुस्लिम समुदायों के बीच जवाबी तोडफ़ोड़ और आगजनी चल रही है, और पुलिस की गोली से एक हिन्दू नौजवान की मौत के बाद अस्पताल में उसकी मौत का तनाव भी कायम है। हिन्दू समाज ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मांग की है कि इस नौजवान को शहीद का दर्जा दिया जाए। जिले के पुलिस एसपी सुनील सिंह का कहना है कि कुछ लोग बाईक पर तिरंगा रैली कर रहे थे, और एक खास जगह पहुंचने के बाद उन्होंने कुछ भड़काऊ नारेबाजी की, इसके बाद बात बढ़ी। अलग-अलग समाचारों में यह कहा जा रहा है कि तिरंगे और भगवे झंडे लेकर एक हिन्दू संगठन से जुड़े सौ नौजवान मोटरसाइकिलों पर तिरंगा रैली निकाल रहे थे, जब यह रैली एक मुस्लिम इलाके में पहुंची तो वहां पर वंदे मातरम कहना होगा के नारे लगाए गए। इसके बाद दोनों पक्षों में तनाव की खबर है, और फिर पथराव हुआ, पुलिस को गोली चलानी पड़ी।
इस तनाव को देखते हुए यह लगता है कि राज्य सरकार अपने इलाके में कानून कायम नहीं रख पा रही है। किसी मुहल्ले में पहुंचकर इस तरह की नारेबाजी सत्ता से जुड़े हुए संगठन के लोग करते हैं, तो इसे महज एक संगठन की जिम्मेदारी नहीं कहा जा सकता। सत्ता चलाने वाले लोगों पर अपने लोगों को काबू करने का जिम्मा भी रहता है। जब देश के आधा दर्जन से अधिक राज्यों में एक फिल्म को लेकर सत्ता से जुड़े संगठन हिंसा और आगजनी कर रहे थे, तब छत्तीसगढ़ कुछ तस्वीरों को सुलगाने से परे पूरी तरह शांत रहा, इसलिए कि सत्ता ने किसी संगठन को हिंसा की छूट नहीं दी। उत्तरप्रदेश में आज भगवाकरण के सैलाब के चलते हालत यह है कि एक साम्प्रदायिक तनाव लगातार बना हुआ है। वहां ऐसा माहौल है कि हज हाऊस के हरे रंग को भी भगवा कर दिया गया, और विवाद बढऩे पर सरकार को इसे दुबारा हरा करवाना पड़ा। ऐसे माहौल में सम्प्रदायों के बीच, जातियों के बीच तनाव बढ़ते चल रहा है, नफरत पैदा की जा रही है, सत्ता में बैठे लोग ऐसी जुबान बोल रहे हैं कि उत्तरप्रदेश मानो एक धर्मराज्य बन गया है। ऐसे माहौल के चलते सत्ता को नापसंद दूसरे धर्म के लोग अपने आपको दूसरे दर्जे का नागरिक भी मानने लगते हैं, और ऐसे माहौल में तनाव को भड़कने में अधिक वक्त नहीं लगता।
गणतंत्र दिवस के दिन जब देश में संविधान के लागू होने की सालगिरह मनाई जा रही थी, तब किसी अल्पसंख्यक मुस्लिम मुहल्ले में पहुंचकर भड़काऊ नारेबाजी करने का नतीजा हिंसा शुरू होने में होना ही था। यह सिलसिला देश को बांटकर रख देगा, अगर इसे बाकी राज्यों में भी बढ़ावा दिया जाएगा। लोकतंत्र में इस बात को समझने की जरूरत है कि बहुसंख्यक वर्ग की साम्प्रदायिकता के बाद लोकतंत्र में किसी तरह की अमन बाकी नहीं रह सकतीं। सत्ता के साथ जो जिम्मेदारी आती है उसे योगी आदित्यनाथ को सीखना और समझना होगा। आज उत्तरप्रदेश को भगवा तो रंगा जा सकता है, लेकिन ऐसे तनाव के चलते उस प्रदेश का कोई विकास नहीं हो सकता। आखिर में जाकर योगी आदित्यनाथ के नाम पर आर्थिक विकास के आंकड़े दर्ज होंगे कि उन्होंने प्रदेश को किस तरह के बदहाल में लाकर छोड़ा है। और इस प्रदेश से उठने वाली साम्प्रदायिकता बाकी देश को भी झुलसाएगी। इस बारे में भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर सोचना चाहिए, और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी सोचना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 28 जनवरी

नक्सल मोर्चे के शहीदों को सलामी तो ठीक है, लेकिन...

संपादकीय
27 जनवरी 2018


छत्तीसगढ़ के बस्तर में पिछले एक बरस में सौ-पचास सुरक्षा जवान नक्सल मोर्चे पर मारे गए हैं। बुरी तरह जख्मी होने के बाद में अस्पताल में मारे जाने वाले लोगों की गिनती इसके अलावा हो सकती है। इसके अलावा वह गिनती भी हो सकती है कि जो जवान बुरी तरह से जख्मी होकर बाकी जिंदगी बुरे हाल में गुजारने के लिए मजबूर हुए हों। मारे जाने वाले जवानों को सरकार और समाज दोनों शहीद कहते हैं, और उनके परिवारों को मुआवजे का अच्छा-खासा इंतजाम है। लेकिन हर नक्सल-मुठभेड़ के बाद, हर नक्सल-हमले के बाद हम यह देख रहे हैं कि घायल सुरक्षा कर्मचारियों को, और नक्सलियों को भी राज्य सरकार तरह-तरह के हेलीकॉप्टरों से रायपुर लेकर आती है, और यहां के बड़े अस्पतालों में उनकी जान बचाने की कोशिश होती है। पुलिस के जानकार लोगों का यह मानना है कि जख्मी को रायपुर के अस्पताल तक पहुंचाने में कम से कम डेढ़ घंटे का समय लग जाता है, और पुलिस रिकॉर्ड में ऐसे मामले हैं जिनमें घायलों ने रास्ते में दम तोड़ा है। ऐसे में एक सवाल यह उठता है कि बस्तर के नक्सल मोर्चे पर जहां यह जाहिर है कि सुरक्षा कर्मचारी बड़ी संख्या में और बुरी तरह जख्मी होंगे ही होंगे, वहां उनकी जान बचाने के लिए मुठभेड़ के इलाकों के करीब किसी जगह ऐसा अस्पताल क्यों नहीं बनाया जाता जहां पर रायपुर के अस्पताल की बराबरी की सहूलियतें हों और लोगों की जिंदगी बच सके? और सवाल महज सुरक्षा कर्मचारियों को बचाने का नहीं है, घायल नक्सलियों को भी सरकार ही इलाज के लिए अस्पताल लाती है, और बस्तर से रायपुर के बीच के लंबे सफर में वे भी मारे जाते होंगे, या फिर यहां पहुंचकर उनकी मौत होती होगी क्योंकि इलाज में देर हुई है।
बस्तर में हजारों सुरक्षा कर्मचारी लगे हुए हैं, और हजारों करोड़ रूपए साल का खर्च उन पर हो रहा है। ऐसे में क्या वजह है कि उनको एक खतरनाक और जानलेवा मोर्चे पर तो झोंक दिया गया है, लेकिन जान जा रही हो, तो भी उनको इलाज के लिए डेढ़ घंटे के हवाई सफर पर ले जाना पड़ता है? दूसरा सवाल यह है कि राजधानी रायपुर में भी प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल, मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल के बजाय एक निजी अस्पताल में घायल लोगों को ले जाया जाता है, जिससे जाहिर है कि सरकार के पास प्रदेश के अपने सबसे बड़े अस्पताल में भी जान बचाने की वो सहूलियत नहीं है जो कि एक निजी अस्पताल में है। अब नक्सल मोर्चा कोई नया नहीं है, राज्य बनने के पहले से बस्तर में नक्सल-हिंसा चली आ रही है। ऐसे में एक जख्मी को जान बचाने के लिए जिस इलाज की जरूरत रहती है, उसमें वक्त भी बहुत मायने रखता है। मेडिकल जुबान में इसे गोल्डन ऑवर कहा जाता है, सोने जैसा कीमती घंटा। किसी घायल को तुरंत इलाज मिले, या दो घंटे बाद मिले, उससे जिंदगी बचने, उसके बदन के अलग-अलग हिस्से बचने की संभावना में बहुत बड़ा फर्क पड़ता है। इसलिए हमें इस बात से हैरानी होती है कि हजारों करोड़ साल के खर्च वाले बस्तर के नक्सल मोर्चे पर शहादत को घटाने के लिए, जिंदगियों को बचाने के लिए अब तक सरकार ऐसा कोई अस्पताल वहां क्यों नहीं बना पाई जिससे जिंदगियां बच सकें?
आज देश की सरहद पर अगर फौज तैनात रहती है, तो फौज के अपने अस्पताल तैनाती की जगहों के इतने करीब रहते हैं कि वे हर किस्म के जख्मी को बचा भी सकें, कम से कम अस्पताल तक पहुंचा सकें। आज ऐसे इंतजाम के बिना अगर राज्य और केन्द्र सरकार ने अपने हजारों सुरक्षा कर्मचारियों को बस्तर में तैनात किया है, तो यह एक फिक्र की बात है, और दोनों सरकारों से यह जायज सवाल तो बनता ही है कि ऐसी नौबत प्रदेश में क्यों है? ऐसा भी नहीं कि इस प्रदेश में बजट की कोई कमी हो। प्रदेश में चारों तरफ बड़ी-बड़ी योजनाओं पर ऐसा खर्च हो रहा है, ऐसी-ऐसी योजनाओं पर खर्च हो रहा है कि जिनके बिना काम चल सकता है। इसलिए यह नहीं माना जा सकता कि बस्तर में शहीद होने वाले लोगों में से बहुतों की जिंदगी बचाने के लिए सरकार वहां पर एक अस्पताल नहीं बना सकती थी। कहने के लिए बस्तर के कई जिलों में अस्पताल बेहतर हो गए हैं, लेकिन जाहिर है कि बुरी तरह से जख्मी लोगों के इलाज की सहूलियत वहां नाकाफी है, और इसीलिए घायलों को हेलीकॉप्टर से रायपुर लाया जाता है। आज छत्तीसगढ़ में मौजूदा सरकार के चौदह बरस पूरे हो गए हैं, और इस कार्यकाल का आखिरी बरस चल रहा है। इसलिए यह सोचना भी मुश्किल है कि यह सरकार अपने इस कार्यकाल में यह काम नहीं कर पाई, और शायद चौथे कार्यकाल में इसे कर सके। जब हर कुछ हफ्तों या महीनों में मुख्यमंत्री को जाकर अस्पताल में जख्मी सुरक्षा कर्मचारियों को देखना होता है, उनके ताबूतों को सलामी देनी होती है, तो यह हैरानी की बात है कि राज्य सरकार बस्तर में रायपुर के निजी अस्पताल के टक्कर की सुविधा क्यों उपलब्ध नहीं कराती? केन्द्र और राज्य सरकार के साधन अपार हैं, और बिना देर किए इस जानलेवा मोर्चे के करीब एक ऐसा अस्पताल बनना चाहिए जिससे शहीद होने वाले लोग बच सकें। शहीद को सलाम एक रस्म होती है, लेकिन सुरक्षा बलों की शहादत को रोकने की कोशिश में अगर कोई कमी होती है, तो फिर ऐसी रस्म अदायगी फिजूल होती है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 27 जनवरी

जिस वक्त संविधान लागू हुआ था, उस वक्त हिंदुस्तान में कानून की आज से अधिक इज्जत थी

संपादकीय
25 जनवरी 2018


आज जब हिन्दुस्तान का मीडिया देश और हर प्रदेश की राजधानियों में गणतंत्र दिवस परेड की तैयारियों से भरा हुआ है, तब देश में आज सड़कों पर ऐसी ठोस वजह मौजूद है कि यह गणतंत्र दिवस नाकामयाब करने की एक राष्ट्रविरोधी साजिश है। आधा दर्जन से अधिक प्रदेशों में दर्जनों शहरों में सड़कों पर सुप्रीम कोर्ट का मखौल बनाते हुए अपने आपको राजपूत कहने वाले लोग एक फिल्म को देखे बिना उसका ऐसा हिंसक विरोध कर रहे हैं कि स्कूल बसों पर भी हमला कर रहे हैं। जिस राजपूती आन, बान, और शान के लिए लोग सिर कटाने और सिर काट लेने के फतवे दे रहे हैं, सिनेमाघरों वाले मॉल जला रहे हैं, गाडिय़ों को जला रहे हैं, बसों को जला रहे हैं। और यह सब तब हो रहा है जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दावोस में पूरी दुनिया के नेताओं और कारोबारियों, पूंजीनिवेशकों और मीडिया को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि भारत किस तरह चीजों को  शांतिपूर्वक सुलझाता है। और आज हाल यह है कि जिन राज्यों में सबसे अधिक उत्पात हो रहा है, सुप्रीम कोर्ट के साफ-साफ और बार-बार के आदेश के बावजूद जहां पर एक अनदेखी फिल्म के खिलाफ, अनसुने इतिहास की कहानी से बिना किसी रिश्ते वाले सिनेमा के खिलाफ हिंसा चल रही है, उन तमाम जगहों पर मोदी की भाजपा का राज है। ऐसे में पहली बात जो सूझती है वह यह है कि क्या महज भाजपा के राज्यों में ऐसा होना एक संयोग या दुर्योग ही है?
कल गणतंत्र दिवस मनाने का क्या औचित्य है अगर यह देश धीरे-धीरे एक अराजकता की ओर बढ़ते चल रहा है, केंद्र सरकार के मंत्री संविधान को बदल डालने का बयान दे रहे हैं, सत्ता से जुड़े संगठन लगातार ये फतवे दे रहे हैं कि धर्म संविधान से ऊपर है। गणतंत्र दिवस देश का संविधान लागू होने की सालगिरह है, और अब ऐसा लगता है कि यह इस संविधान की हेठी करने का जलसा बनकर रह जा रहा है। ऐन इस जलसे के वक्त देश में जो माहौल बना हुआ है वह संविधान के लिए हिकारत का है, लोकतंत्र के लिए नफरत का है, और जाति-धर्म की हिंसा के बोलबाले का है। ऐसे में गणतंत्र दिवस मनाने जा रही है केंद्र सरकार की तरफ से क्या देश में चल रही और फैलाई जा रही अराजकता के खिलाफ एक लफ्ज भी किसी केंद्रीय मंत्री ने या किसी केंद्रीय सचिव ने कहा है? क्या प्रधानमंत्री की ओर से देश भर में हिंसा के खिलाफ कोई ट्वीट किया गया है? देश भर में जिन राज्यों में जाति के एक गौरव का नाम लेकर हिंसा की जा रही है, उन राज्यों के मुख्यमंत्रियों में से किसने इस हिंसा के खिलाफ कुछ कहा है?
आज ऐसा लगता है कि खाप पंचायतें देश की सड़कों पर राज कर रही हैं, और राजनीतिक ताकतें दुबकी पड़ी हैं, इक्का-दुक्का पार्टियों को छोड़कर बाकी की बोलती बंद है। मध्यप्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री और कांगे्रस के एक बड़े नेता दिग्विजय सिंह पिछले कई महीनों से पार्टी से छुट्टी लेकर नर्मदा परिक्रमा पर हैं, वे राजनीति पर कुछ बोल नहीं रहे हैं, वे आमतौर पर साम्प्रदायिकता के खिलाफ एक हमलावर तेवर के लिए जाने जाते हैं, लेकिन आज सुबह उनका बयान साफ-साफ दकियानूसी लोगों की खुली आलोचना से बचता हुआ था, और वह फिल्मकारों को सिखा रहा था कि ऐतिहासिक विषयों पर फिल्म बनाते हुए किसी जाति या धर्म की भावनाओं को आहत करने से बचना चाहिए। अब उनकी इस बात में और किसी साम्प्रदायिक नेता की बात में शब्दों का ही फर्क रह गया है, बाकी तो दोनों ही किसी कला, साहित्य, या फिल्म को जाति और धर्म की भावनाओं को आहत न करने की सलाह दे रहे हैं। साम्प्रदायिक लोग जो चेतावनी दे रहे हैं, साम्प्रदायिकता-विरोधी दिग्विजय सिंह वह सलाह दे रहे हैं। हम इसके पीछे की वजहों को देखने के लिए इतने नीचे गिरना भी नहीं चाहते कि उनके इस बयान को उनके राजपूत होने से जोड़कर देखें, लेकिन बहुत से लोग ऐसा देखेंगे, और बहुत से लोग यह भी देखेंगे कि किस तरह कांगे्रस पार्टी का एक नेता एक नाजुक मौके पर एक फिल्मकार की आजादी के खिलाफ बयान दे रहा है।
गणतंत्र दिवस के मौके पर इस बार देश में पहली बार एक से अधिक विदेशी मेहमानों को न्यौता दिया गया है। बहुत से देशों के प्रमुख कल भारत में गणतंत्र दिवस की परेड देखेंगे। लेकिन वे होटलों के अपने कमरों में टीवी पर यह देखेंगे कि संविधान को किस तरह सड़कों पर जलाया जा रहा है। आज के हालात देखकर यह लगता है कि जिस वक्त संविधान लागू हुआ था, उस दिन शायद हिंदुस्तान में कानून की आज के मुकाबले अधिक इज्जत थी। (Daily Chhattisgarh)

ऐसी बददिमागी किसी ईमानदार नेता में कभी नहीं आ सकती...

संपादकीय
24 जनवरी 2018


पाकिस्तान में पिछले दिनों सात बरस की एक बच्ची लापता हुई, और बाद में घूरे में पड़ी उसकी लाश मिली जिससे पता लगा उसके साथ बलात्कार किया गया था, और फिर उसकी हत्या कर दी गई थी। इसे लेकर पूरे देश में एक अभूतपूर्व नाराजगी फैली, और जगह-जगह शहरों में लोगों ने सरकार को कोसा। अभी एक हजार से अधिक लोगों के डीएनए की जांच के बाद यह बलात्कारी हत्यारा पकड़ाया तो पता लगा कि वह परिवार का वाकिफ था, और उसका घर में आना-जाना था। अब यहां पर आगे लिखने को दो अलग-अलग पहलू हैं, और उन दोनों का एक-दूसरे से कोई लेना-देना नहीं है, इसलिए इस पल तक यह तय करना कुछ मुश्किल है कि इनमें से आगे किस पर लिखा जाए। एक तो यह कि परिवार के जानकार, करीबी लोग, जो कि आते-जाते हैं, वे भी इस तरह के बलात्कार कर सकते हैं, ऐसी हत्याएं कर सकते हैं। यह जो आदमी पकड़ाया है उसने इसके पहले भी सात और लड़कियों से बलात्कार और उनकी हत्या की थी, और अभी पकड़ाने के बाद उसका डीएनए उन पिछली सात लाशों पर मिले डीएनए से मेल खा रहा है। यह तो हुई पहली बात। और दूसरी बात है कि इस गिरफ्तारी की खबर देने के लिए पाकिस्तान के इस पंजाब प्रांत के मुख्यमंत्री शहबाज शरीफ ने एक प्रेस कांफ्रेंस की जिसमें वे सरकार के दूसरे आला लोगों के साथ बैठे और मीडिया को गिरफ्तारी बताई। इसकी एक तस्वीर पाकिस्तानी अखबारनवीसों ने पोस्ट की है जिसमें मंच पर बैठे आधा दर्जन सरकारी बड़े लोग किसी बात पर जोरों से हॅंस रहे हैं, और इसी प्रेस कांफ्रेंस में बलात्कार-हत्या की शिकार इस बच्ची का पिता भी बैठा हुआ था।
सरकार में बैठे हुए लोग सत्ता की ताकत में किस तरह मदमस्त हो जाते हैं, और संवेदनाएं खो बैठते हैं, इसकी एक बड़ी मिसाल यह हॅंसी है। और हम हिन्दुस्तान में अपने आसपास के दायरे में भी रोजाना सत्ता की ऐसी बातों को देखते हैं जिनसे लगता है कि जैसे-जैसे बाहुबल बढ़ते चलता है, दोनों बाहों के बीच का दिल संवेदना खोते जाता है। सरकार चला रहे मंत्री, और राजभवन या अदालत जैसी जगहों पर बैठे बड़े लोग सड़कों पर अपनी आवाजाही के लिए जिस अंदाज में ट्रैफिक जाम करवाते हैं, वह लोगों के मन में नफरत भरने के अलावा और कुछ नहीं करता। देश भर से ऐसी खबरें आती हैं कि कब प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, या किसी और मंत्री के काफिले के लिए रोके गए ट्रैफिक में फंसे किसी मरीज की जान किस तरह चली गई। देश में बंगाल -त्रिपुरा जैसे एकाध ही राज्य हैं जहां पर मुख्यमंत्री के लिए भी ट्रैफिक रोका नहीं जाता, क्योंकि वे अभी तक जनता से जुड़े हुए हैं। दूसरी तरफ हम अपने आसपास देखते हैं तो छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य में ऐसे मंत्री और नेता मौजूद हैं जो कि अपने ही शहर में अपने ही घर से दफ्तर आते-जाते सायरन लगी हुई गाडिय़ों के काफिलों में चलते हैं, और इसमें भी उनका चेहरा दिखता रहे, इसलिए गाड़ी के भीतर उनके चेहरे पर रोशनी डालती ट्यूबलाईट चालू रहती है। हमने इसी छत्तीसगढ़ के राजधानी के सांसद को इस बात के लिए राज्य सरकार से सार्वजनिक रूप से शिकायत करते सुना है कि उनकी गाड़ी के लिए ट्रैफिक नहीं रोका जाता। यह बात बताती है कि ताकत इंसान को जंगल के उन्हीं नियम-कायदों की ओर ले जाती है जिनके तहत सबसे ताकतवर का राज चलता है। अपने आपको सबसे अधिक ताकतवर बनाने या साबित करने की दौड़ में भी हर कदम पर उन्हें अपनी ताकत से अधिक उसकी नुमाइश की फिक्र लगी रहती है, और यह तब है जब इन तमाम लोगों को हर पांच बरस में जनता के बीच जाकर जवाब देना होता है।
दरअसल भारतीय चुनावी राजनीति में ऐसी बददिमागी की एक वजह है। ऐसे बहुत ताकतवर हो चुके लोग चुनाव लड़ते और जीतते नहीं हैं, वे चुनाव लड़ते हैं, और जीत को खरीदते हैं। जब चुनाव के नियम कुछ पन्द्रह-बीस लाख रूपए में विधानसभा चुनाव लडऩे की सीमा तय करते हैं, तो दस फीसदी से अधिक ऐसी सीटें रहती हैं जहां पर इससे सौ गुना अधिक खर्च होता है। और यह बात महज हमारी अटकल नहीं है, अभी-अभी दो-चार दिन पहले ही भारत सरकार से जुड़े एक वरिष्ठ व्यक्ति ने भी यह बात कही है कि किस तरह एक-एक विधानसभा सीट के लिए सौ-पचास करोड़ रूपए खर्च कर दिए जाते हैं। अब जाहिर है कि जिन लोगों के हाथ इस तरह की दौलत जिसे कि वे चुनाव खरीदने में खर्च करते हैं, तो उन्हें जनता को सड़क से किनारे फेंकने या कुचलते चलने में परहेज क्यों होगा? जनता की परवाह तो वहीं पर हो सकती है जहां पर जनता अपनी मर्जी से वोट देती हो। हर सरकार में कुछ मंत्री और नेता इतनी काली कमाई कर चुके होते हैं कि उनकी पार्टी जानते हुए भी उनकी टिकट नहीं काट पाती कि वे खुद तो अंधाधुंध खर्च करके एक सीट ला देंगे, लेकिन किसी और को वहां से टिकट दी गई तो उसे अपनी दौलत से आसानी से हरा देंगे। पैसे की ऐसी बददिमागी पार्टी के ऊपर ऐसे नेताओं को किस तरह हावी कर देती है यह हमने कर्नाटक में खदान माफिया रेड्डी भाईयों की शक्ल में देखा है।
यही वजह है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहे, और भ्रष्टाचार के जुर्म में हटाए गए नवाज शरीफ के भाई, और पंजाब के मुख्यमंत्री शहबाज शरीफ और उनके साथियों को बलात्कारी-हत्यारे की गिरफ्तारी बताते हुए उसकी शिकार बच्ची के पिता की मौजूदगी में हॅंसना सूझता है। यह बददिमागी उस दिन हवा हो जाएगी जिस दिन नेताओं को जनता को जवाब देकर वोट पाने होंगे। नेताओं की बददिमागी का बड़ा सीधा-सीधा रिश्ता उनकी काली कमाई की ताकत से रहता है, चाहे वह इस तरह की प्रेस कांफ्रेंस हो, चाहे वह सड़कों पर सायरन हो, चाहे वह किसी एयरपोर्ट पर बाकी मुसाफिरों को अलग करके ऐसे स्वघोषित वीआईपी को सुरक्षा-जांच से छूट हो। ऐसी बददिमागी किसी ईमानदार नेता में कभी नहीं आ सकती। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 24 जनवरी

पोप के पाखंडी आंसू

संपादकीय
23 जनवरी 2018


पोप फ्रांसिस ने चिली में गिरजाघरों के पादरियों द्वारा दुष्कर्म और यौन शोषण के शिकार बच्चों से मुलाकात की और उनकी आपबीती सुनी। दर्दभरी दास्तां सुनते समय पीडि़त बच्चों के साथ पोप भी रो पड़े। बाद में उन्होंने कहा, यह पीड़ा और शर्म का विषय है। पोप ने बच्चों के कल्याण के लिए प्रार्थना की। चर्च पदाधिकारियों के उत्पीडऩ की घटनाओं से चिली में भारी गुस्सा है। सोमवार को पोप का दौरा शुरू होने से पहले लोगों ने विरोध स्वरूप दो चर्चों में आगजनी भी की। दौरे में यौन शोषण के शिकार लोगों से पोप की यह दूसरी मुलाकात है। इससे पहले 2015 में फिलेडेल्फिया की यात्रा में पोप फ्रांसिस यौन शोषण के शिकार लोगों से मिले थे। पोप की इस ताजा मुलाकात पर अर्जेटीना के बिशप की ओर से अटपटी टिप्पणी आई है। उन्होंने कहा, पोप हमेशा चर्च पदाधिकारियों के यौन शोषण की चर्चा करते हैं। वह राजनीतिज्ञों के ऐसे ही आचरण पर कभी नहीं बोलते।
अब सवाल यह उठता है कि क्या पोप के ऐसे आंसुओं की कोई कीमत है? जब तक किसी देश के कानून के खिलाफ जुर्म करने वाले ऐसे पादरियों को पुलिस, अदालत और जेल का सामना न करना पड़े, तब तक उनसे जख्मी हुए बच्चों के लिए आंसू बहाना एक फिजूल का पाखंड है। यह मामला अपने किस्म का अकेला नहीं है, और वेटिकन के तहत आने वाले ईसाई संगठनों में स्कूलों, हॉस्टलों, और चर्चों में पहले भी ऐसा होते आया है, और ऐसे हर बलात्कारी को चर्च बचाते भी आया है। अभी-अभी लंदन में कुछ मदरसों में बच्चियों के साथ ऐसा हुआ, और किसी धार्मिक संगठन ने उसके खिलाफ कुछ नहीं किया। लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले भारत के बाहर सबसे मशहूर हिन्दू संगठन इस्कॉन के हॉस्टलों में इसी तरह बच्चों का यौन शोषण सामने आया था, और उस वक्त शायद इस संगठन ने सैकड़ों करोड़ का हर्जाना देकर अदालत के बाहर उस मामले को खत्म करवाया था। अमरीकी कानून इस तरह के जुर्म पर भी रूपयों से समझौता अदालत के बाहर करने देता है, लेकिन दुनिया के बहुत से देश ऐसे हैं जहां पर यौन शोषण को हर्जाना देकर छोड़ा नहीं जा सकता।
हमारा यह मानना है कि पोप सरीखे दुनिया के सबसे अधिक अनुयायियों वाले अकेले धार्मिक मुखिया को इंसानियत और कानून इन दोनों के लिए कुछ अधिक सम्मान दिखाना चाहिए था। यह सिलसिला गलत है कि धर्म का चोगा पहनने वाले बलात्कारियों को अफसोस जाहिर करके और आंसू बहाकर छोड़ दिया जाए। इससे इस धर्म के बाकी संस्थानों में भी यह संदेश जाता है कि वे कुछ भी करके बच सकते हैं। ऐसे लोगों को पूरी जिंदगी के लिए धार्मिक संस्थानों से बाहर तो करना ही चाहिए, उन्हें कानून के हवाले भी तुरंत ही करना चाहिए।
भारत में हम लगातार देख रहे हैं कि धर्म और आध्यात्म से जुड़े हुए संगठनों ने तरह-तरह के बाबा और बापू लोग नाबालिग बच्चियों से बलात्कार को एक आदतन हरकत बनाकर चल रहे हैं, और यौन शोषण की भयानक कहानियां सामने आ रही हैं। यह सिलसिला थमना चाहिए, और हमाराख्याल है कि जिस धर्म या आध्यात्म के संगठन या मुखिया ऐसे जुर्म करते पकड़ाते हैं, उनकी संस्थानों की दौलत जब्त करने का भी कानून बनाना चाहिए। फिलहाल पोप के आंसुओं पर महज रोया जा सकता है, क्योंकि वे एक पाखंड के अलावा कुछ नहीं हैं। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 जनवरी

रिश्तों की मजबूती की गारंटी

22 जनवरी  2018

पिछले कुछ दिनों से अपने बिल्कुल ही आसपास परिवार के भीतर हिंसा की असल जिंदगी की वारदातों को देखकर दिल हिला हुआ है। कभी-कभी तो किसी अखबार के एक ही पन्ने पर अगल-बगल तीन-तीन खबरें इसी इलाके की ऐसी छप रही हैं जिनमें एक में बाप ने दो बेटों को मार डाला, दूसरी खबर में मां ने बेटे को मार दिया, और तीसरी खबर में बेटे ने मां को मार डाला। ये खबरें देश के कुछ हिस्सों में चल रहीं उन ऑनर किलिंग से अलग हैं जिनमें परिवार के मर्जी के खिलाफ शादी करने पर लड़के-लड़कियों को बाप-भाई-चाचा मार डालते हैं। अभी की जो वारदातें दिल-दिमाग को हिला रही हैं, वे वारदातें सामाजिक प्रथाओं से परे, खालिस निजी हिंसा की हैं।
इसके साथ-साथ कुछ दूसरे किस्म की हिंसा और आत्मघाती वारदातों की खबरें भी अनायास बढ़ गई दिख रही हैं। स्कूल की एक लड़की स्कूल के ही छोटे बच्चे को इसलिए चाकू मार रही है कि स्कूल में छुट्टी हो जाए। ठीक ऐसी ही वारदात साल भर पहले भी, या कि कुछ महीने पहले भी आई थी जिसमें स्कूल की बड़ी क्लास के एक लड़के ने छोटी क्लास के एक लड़के का कत्ल कर दिया था, ताकि छुट्टी हो जाए। आज ही सुबह खबर है कि मेरे शहर के पास ही एक शादीशुदा, और बच्चों के बाप आदमी ने एक नाबालिग लड़की से प्रेम, या जैसे भी संबंध हों, के बाद शादी की संभावना न देखकर उसके साथ आत्महत्या की कोशिश की, वह लड़की मर गई, और यह आदमी फंदे पर झूलने के बाद भी बच गया। दो-तीन दिन पहले की ही खबर थी कि एक प्रेमी जोड़े ने एक साथ फांसी लगाई, और उसमें दोनों ही टंगे-टंगे मर गए।
ऐसी बहुत सी वारदातों को एक साथ देखने के बाद यह समझ पड़ता है कि परिवार का ढांचा उतना मजबूत शायद नहीं है जितना कि बाहर से दिखता है। ये तो मरने और मारने की कुछ ऐसी वारदातें हैं जो कि खबरों में आती हैं, लेकिन जो खबरों में नहीं आ पातीं, वैसी भी असल जिंदगी की अनगिनत भयानक कहानियां रहती हैं जो कि घर के किवाड़ों के भीतर ही दफन हो जाती हैं। परिवार के भीतर बच्चों के यौन शोषण, वयस्क लोगों के बीच अवैध कहे जाने वाले संबंध लोगों की कल्पना के मुकाबले अधिक आम हैं, और इन पर भरोसा करने को लोगों का दिल नहीं करता है, इसलिए इनको हकीकत मानने से इंकार कर दिया जाता है।
आज ही सुबह मेरे शहर के बगल के दो मामले सामने आए, इनमें से एक मामले में दस बरस पहले प्रेम-विवाह करने वाली एक महिला अपनी दो छोटी बच्चियों और पति को छोड़कर किसी एक ऐसे बदनाम मवाली किस्म के आदमी के पास चली गई जिससे कि वह रात-रात जागकर फोन और सोशल मीडिया में चैट किया करती थी, पति के समझाने के बावजूद। अब यह कल्पना करना लोगों को थोड़ा सा मुश्किल होगा कि दस बरस पहले का प्रेम-विवाह दो बच्चियों के होने के बाद ऐसा नाकामयाब क्यों हो रहा है कि एक महिला जानते-बूझते हुए एक शादीशुदा, मुजरिम, और मवाली के पास चली जा रही है, और वहां से अपने पति को धमकी दिलवाकर बच्चों को मांग रही है। एक दूसरा मामला इसी सुबह ऐसा आया है जिसमें एक धर्म की लड़की ने दूसरे धर्म के लड़के से तब शादी की, जब उस लड़की की सगाई हो चुकी थी। और अब वह आदमी उसे रोज पीट रहा है, और प्रताडि़त कर रहा है। कुछ महीनों के भीतर ही प्रेम या झांसा इस तरह हिंसा में तब्दील हो गया है।
ऐसे मामलों में परिवार, समाज, और पुलिस से लेकर अदालत तक का बहुत सा सरकारी वक्त जाया होता है, और सरकार का खर्च भी होता है। तो ऐसे मामलों से बचने के लिए आखिर क्या किया जाए? क्या परिवारों के और समाज के परंपरागत रीति-रिवाजों के तहत मां-बाप को शादियां तय करने दी जाएं? या फिर लोग अपनी मर्जी से शादी करें, और समाज के बंधनों को किनारे कर दें? ऐसी वारदातों को देखें तो इनमें एक बात उभरकर सामने आती है कि लोगों के बीच परिवार के ढांचे को तोड़कर निकलने की हिम्मत नहीं रहती, और लोग घुट-घुटकर भी परिवार के भीतर ही बने रहते हैं। चाहे वह आल-औलाद मां-बाप के साथ रहती हो, या फिर पति-पत्नी एक-दूसरे को ढोते हों।
संयुक्त परिवार से अलग होने कई किस्म की दिक्कतों और खतरों का एक ईलाज हो सकता है, और न पटने पर पति-पत्नी का अलग होना बहुत किस्म की हिंसा को टाल सकता है। लेकिन देश और समाज भी सांस्कृतिक और सामाजिक सोच परिवार के विघटन को बुरा मानती है। शादी के तुरंत बाद अगर बेटा-बहू अलग रहने लगते हैं, तो यह मान लिया जाता है कि बहू ने आती ही बेटा छीन लिया। दूसरी तरफ पति-पत्नी अगर अलग होते हैं तो उसे एक सामाजिक दाग मान लिया जाता है, और जिंदगी में आगे उनके दुबारा घर बसाने में दिक्कतें होती हैं, या कि मान लिया जाता है कि दिक्कतें होंगी।
अभी यह लिखा ही जा रहा है कि मेरे शहर ही की एक खबर आ रही है कि एक बूढ़ी मां को घर में कैद करके इमारत के चौकीदार को चाबी देकर उसके बेटे अपने नए घर में रहने चले गए।
दरअसल हिन्दुस्तान में दिक्कत इस सोच की है कि लोगों का अलग रहना परिवार के ढांचे का कमजोर होना होता है। बहुत से मामलों में होता यह है कि लोग कुछ दूर रहने लगते हैं, अलग रहने लगते हैं, तो उनकी जिंदगी कुछ बेहतर भी हो सकती है। लोगों को यह समझना होगा कि हिंसक टकराव के साथ एक साथ रहने के बजाय बेहतर यह होता है कि लोग बिना टकराव दूरी पर रहें, और आड़े वक्त एक-दूसरे के काम आ सकें। ऐसा तनाव से गुजरने वाले पति-पत्नी भी कर सकते हैं, प्रेमी-प्रेमिका भी कर सकते हैं, और परिवार की दो पीढिय़ां तो कर ही सकती हैं। लेकिन लोगों के बीच सामाजिक दबाव के चलते जब ऐसी जिद हावी रहती है, या ऐसी मजबूरी रहती है कि उन्हें साथ रहना है, तो ऐसी नौबत हिंसा तक पहुंचने का एक बड़ा खतरा रहता है।
शादी-शुदा लोगों के अवैध कहे जाने वाले विवाहेतर संबंधों के बारे में यह समझने की जरूरत है कि ऐसे संबंध आम इंसानी मिजाज के मुताबिक ही हैं, उनसे अलग नहीं हैं। सामाजिक परंपराएं लोगों को एक ही जीवन-साथी के साथ बंधे रहने को बेबस सा करती हैं, लेकिन हकीकत में इंसान एक जीवन-साथी से हमेशा बंधा रहे, ऐसा जरूरी नहीं रहता, ऐसा कई मामलों में हो नहीं पाता है। इसलिए ऐसी तमाम नौबतों के बारे में सोचकर लोगों को दो बातें करनी चाहिए, पहली बात तो यह कि ऐसी आशंका को नकारना बंद कर देना चाहिए, और दूसरी बात यह कि ऐसी आशंका की सोचकर अपनी तैयारी भी रखनी चाहिए। जो महिलाएं अधिक आत्मनिर्भर होती हैं, आर्थिक रूप से सक्षम होती हैं, वे अपने साथ होने वाली ऐसी किसी बेइंसाफी को अधिक दूर तक झेल पाती हैं, उनसे उबर पाती हैं। लेकिन जो महिलाएं आत्मनिर्भर नहीं होतीं, उनके साथ बड़ी बुरी गुजरती है।
ऊपर की तमाम बातें अलग-अलग किस्म की कतरा-कतरा बातें हैं, लेकिन इनमें एक बात एक सरीखी है कि परिवार और समाज, आपसी रिश्तों के ढांचे को फौलाद सरीखा मजबूत मानना एक बड़ी चूक होती है। दूसरी बात यह कि एक दूसरे का दम घोंटते हुए साथ रहने के नुकसान के बजाय लोगों को अलग रहने के नफे समझने चाहिए। तीसरी बात यह कि लोगों को अपने भले के लिए अपने मर्जी के कुछ काम करने का हौसला भी जुटाना चाहिए। लेकिन ये बातें जटिल सामाजिक तनाव के इलाज के लिए कोई रामबाण दवा नहीं हैं, ये महज एक चर्चा है जिससे कि लोग अपनी-अपनी जिंदगी, और अपने-अपने दायरे के तनावों को समझ सकें, और उससे बचने, उससे निपटने के रास्ते सोच सकें।
लोगों को रिश्तों और जिंदगी को हमेशा के लिए मजबूत मानकर नहीं चलना चाहिए, और ऐसे में ही लोग आत्मनिर्भर हो पाएंगे, और अपना इंतजाम अधिक सुरक्षित कर सकेंगे। जैसे-जैसे लोगों के अपने निजी इंतजाम अधिक सुरक्षित हो सकेंगे, वैसे-वैसे उनके रिश्ते तनाव कम झेलेंगे। बहुत से तनाव खड़े ही इसलिए हो पाते हैं क्योंकि उन्हें झेलने वाले लोग उसके लायक तैयार नहीं होते। इसलिए यह समझने की जरूरत है कि आत्मनिर्भरता बहुत किस्म के रिश्तों की मजबूती की गारंटी भी रहती है। (Daily Chhattisgarh)

निजी फायदे, निजी अस्तित्व, और राष्ट्रीय जिम्मेदारियां...

संपादकीय
22 जनवरी 2018


दिल्ली में आम आदमी पार्टी के बीस विधायकों को संसदीय सचिव का दर्जा पाने की वजह से चुनाव आयोग ने विधायकी से अपात्र घोषित कर दिया, और आयोग के इस फैसले को राष्ट्रपति ने मंजूरी भी दे दी। इसलिए फिलहाल जब तक, और अगर, कोई कानूनी राहत नहीं मिलती है, तो आम आदमी पार्टी विधानसभा में बीस सदस्य खो चुकी है। और ऐसे मौके पर दिल्ली की कांग्रेस पार्टी ने आम आदमी पार्टी पर एक हमला भी बोला है। नतीजा यह है कि दिल्ली राज्य की तस्वीर में अब आम आदमी पार्टी एक तरफ है, और कांग्रेस-भाजपा दोनों ही अलग-अलग सही, लेकिन दोनों ही आप के खिलाफ हैं। वैसे तो यह एक राज्य का मामला है, लेकिन इससे देश की राजनीति में कांग्रेस का एक रूख भी उजागर होता है कि उसके सामने आज चुनौती भाजपा को शिकस्त देने के बजाय अपने हस्ती को बनाए रखने की अधिक है।
इस बात को समझने की कोशिश करें तो आज पूरे देश में भाजपा और उसके सहयोगी दल एक तरफ हैं, और बाकी तमाम पार्टियां एक तरफ हैं। एनडीए की बाहर की पार्टियों का साफ मानना है कि देश को भाजपा की नीतियों से बचाना है, लेकिन भाजपा को साम्प्रदायिक कहने वाली इन पार्टियों के बीच आपस में जितने किस्म के तनाव और मतभेद चल रहे हैं, उन्हें देखते हुए यह बात बहुत आसान नहीं लग रही है कि ये पार्टियां अपने-अपने निजी अस्तित्व को कुछ देर के लिए भूलकर एक व्यापक वैचारिक-सैद्धांतिक गठबंधन के लिए साथ आ पाएंगी। कहने को यह भी कहा जा सकता है कि अभी आम चुनावों में खासा वक्त बाकी है, और ऐसा गठबंधन चुनाव के करीब ही उभर पाता है। लेकिन आज दिल्ली को अगर देखें तो यह बात साफ है कि आम आदमी पार्टी की मुसीबत की इस घड़ी पर अगर कांग्रेस पार्टी उसके ऊपर हमलावर बनी रहेगी, तो आगे जाकर गैरभाजपाई किसी गठबंधन की संभावनाएं कमजोर ही होंगी।
यह कांग्रेस या किसी दूसरी पार्टी की राजनीति में कोई नई या अनोखी बात नहीं है क्योंकि महाराष्ट्र में हम रात-दिन यह देख रहे हैं कि किस तरह सत्ता में भागीदार और एनडीए गठबंधन की हिस्सेदार शिवसेना लगातार भाजपा पर हमलावर बनी रहती है, और दोनों के बीच रिश्ते कई बार टूटते दिखते हैं, और फिर वे टूटते-टूटते बचते भी दिखते हैं। ऐसा ही कांग्रेस के कुछ गठबंधनों के साथ भी हो सकता है, लेकिन आज देश में भाजपा के तेवर ऐसे हैं कि वे दूसरी पार्टियों और दूसरे गठबंधनों में पैदा होने वाले किसी भी तनाव को अपने पक्ष में भुनाने में एक महारथ हासिल कर चुकी है। कई प्रदेशों में उसने ऐसा कर दिखाया है, कहीं नीतीश कुमार लालू को छोड़कर भाजपा के साथ आ गए, तो कहीं कांग्रेस छोड़कर बड़े-बड़े नेता सीधे भाजपा जा रहे हैं। ऐसे माहौल में कांग्रेस को अगर देश की सबसे पुरानी पार्टी होने के अपने दावे को प्रासंगिक बनाए रखना है, और भारतीय-चुनावी राजनीति में हाशिए पर जाने से बचना है, तो उसे एक राष्ट्रव्यापी और बड़ी पार्टी होने की जिम्मेदारी निभानी होगी। जब एक मुखिया की तरह कोई जिम्मेदारी पूरी करनी रहती है, तो कई बार निजी नुकसान झेलकर भी बिरादरी का मुखिया बनने का जिम्मा पूरा करना पड़ता है। कांग्रेस को आज अगर पूरे देश में भाजपा के खिलाफ, साम्प्रदायिकता के खिलाफ, अलोकतांत्रिक ताकतों के खिलाफ कोई एक व्यापक वैचारिक गठबंधन तैयार करना है, तो उसे छोटी पार्टियों और दूसरे नेताओं की मुसीबत में उनका साथ देने की भी सोचना होगा। हो सकता है कि किसी एक राज्य में कांग्रेस की किसी दूसरी पार्टी से अस्तित्व की लड़ाई चल रही हो, लेकिन जब देश भर में भाजपा-एनडीए के मुकाबले एक विकल्प बनने या बनाने की बात करनी होगी, तो कांग्रेस को तंगदिली और तंगनजरिया छोडऩा होगा। दिल्ली कांग्रेस के नेता अजय माकन का पूरा अस्तित्व आम आदमी पार्टी के विरोध पर जिंदा हो सकता है, लेकिन क्या देश भर में कांग्रेस पार्टी अपने क्षेत्रीय छत्रपों के अस्तित्व का ख्याल रखते हुए अपनी राष्ट्रीय जिम्मेदारी पूरी कर पाएगी?
हालांकि हम जो बात कह रहे हैं उसके खिलाफ भी बहुत सी मिसालें भारतीय राजनीति में हैं, और इनमें से कुछ तो हाल के बरसों में भाजपा ने ही पेश की हैं कि जब, जहां जीत के लिए जरूरत हो, किसी भी पार्टी या नेता को लाकर, अपने पुराने लोगों को दरकिनार करके एक चुनाव जीत लिया जाए। लेकिन कांग्रेस-यूपीए में न तो आज इस तरह की क्षमता दिख रही है, और न ही ऐसी संभावना फिलहाल बाकी दिख रही है। इसलिए एक विचार के रूप में देश के गैरभाजपाई दलों को हमारी आज की बात पर सोचना चाहिए कि क्या अपने थोड़े-थोड़े निजी फायदों को किनारे धरकर वे एक व्यापक गठबंधन या व्यापक तालमेल बना सकते हैं?  (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 22 जनवरी

म्युनिसिपल का हमला किसी बड़े पर नहीं, महज गरीबों पर

संपादकीय
21 जनवरी 2018


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में नए पुलिस कप्तान के आने के बाद ट्रैफिक को सुधारने की जोरदार कोशिश शुरू हुई है। इसमें म्युनिसिपल भी हिस्सा ले रही है, और जैसा कि आमतौर पर होता है, सड़कों के किनारे से अवैध कब्जे हटाने के नाम पर जो अभियान चल रहा है, उसका पहला और अकेला हमला उन ठेले-खोमचे वालों पर हो रहा है जिनका पूरा कारोबार महज एक ठेले जितनी जगह पर चल रहा था, और अब मशीनों से उन ठेलों को ले जाकर उनकी रोजी-रोटी खत्म कर दी गई है। दूसरी तरफ बाजार में सड़कों के किनारे बड़ी-बड़ी दुकानों का सामान दूर तक सजाकर रखा जाता है, और ऐसा करने वाले वे कारोबारी हैं जिनके पास खासी बड़ी जगह अपने धंधे के लिए है। इसके बावजूद वे बाहर इतनी जगह घेरकर रखते हैं जितने पर ठेले-खोमचे वाले अपना पूरा रोजगार चलाते हैं। दरअसल यह सोच एक ऐसी अफसरशाही है जो कि जमीन से बिल्कुल ही जुड़ी हुई नहीं है। और जो निर्वाचित नेता म्युनिसिपल में पार्षद हैं, या तो उनकी कुछ चलती नहीं है, या उन्हें भी अब धीरे-धीरे करके, महंगे चुनाव लड़कर, महंगी गाडिय़ों में चलकर बड़े दुकानदारों की ही फिक्र बाकी रह गई है।
एक तरफ तो देश में लोगों को स्वरोजगार के लिए बढ़ावा दिया जा रहा है, और दूसरी तरफ जो गरीब जरा सी जगह पर बिना किसी कब्जे के रोज का कारोबार करते हैं, उनको बेदखल किया जा रहा है, बिना किसी दूसरे इंतजाम के। अफसरों की यह सोच भयानक है, और दुनिया के किसी भी सभ्य और विकसित देश में म्युनिसिपल अपने स्थानीय लोगों को इस तरह से कुचलते हुए नहीं चलती हैं। सड़कों के किनारे से कब्जे हटाने की शुरूआत जब करनी हो, तो सबसे पहले उनके कब्जे हटाने चाहिए जिनके पास खुद की बाकी जगह है, लेकिन जिनकी नीयत अपने शटर के भीतर तक सीमित नहीं रह पाती। शहर के हर बड़े बाजार, हर व्यस्त सड़क पर बड़ी दुकानों के ऐसे कब्जे आम बात हैं, और उन पर पिछले बरसों में कोई जुर्माना भी हुआ हो, ऐसा पढऩे में नहीं आता।
इसी शहर में बाजार में ऐसे बड़े-बड़े अवैध निर्माण धड़ल्ले से हुए हैं जिनमें सड़क किनारे की जमीन पर कई मंजिलों की इमारत खड़ी कर दी गई हैं। म्युनिसिपल इनको आखिरी नोटिस तक दे चुकी है, लेकिन इसके बाद कार्रवाई उन पर कुछ नहीं होती। ऐसे में रोज कमाकर खाने वाले करीब ठेले-खोमचे वालों पर म्युनिसिपल की मशीनों की ऐसी फौलादी कार्रवाई पूरी तरह अलोकतांत्रिक है, और जनविरोधी है। यह नौबत स्थानीय शासन में निर्वाचित लोगों की भूमिका खत्म हो जाने का एक बड़ा सुबूत भी है चाहे उसे अफसर खत्म कर रहे हों, चाहे उसे निर्वाचित प्रतिनिधि खुद ही छोड़कर फायदे के दूसरे कामों में लग रहे हों। जनकल्याणकारी सरकार में किसी कमाते-खाते मेहनतकश गरीब को बिना दूसरे इंतजाम के बेदखल नहीं करना चाहिए, और बेदखली का सिलसिला उन बड़े लोगों से शुरू होना चाहिए जिनकी दुकानों के पुतले और सामान सड़कों को दूर तक घेरकर रखते हैं।
ट्रैफिक को सुधारना या सड़कों को चौड़ा खाली रखना दोनों ही अच्छी बातें हैं, लेकिन यह काम बड़े लोगों से शुरू होना चाहिए, उन गरीब लोगों से नहीं जिनकी कमाई का पूरा जरिया ही सरकारी ट्रकों पर लादकर ले जाकर फेंक दिया जा रहा है। ऐसा लगता है कि राज्य में प्रदेश स्तर के मंत्रियों या सांसद-विधायकों में भी गरीबों के लिए दर्द अब बाकी नहीं रह गया है, वरना ऐसी बेदखली की तस्वीरें देखकर सरकार लोगों का रोजगार छीनने से परहेज करती। जिस किसी शहर में महज गरीबों को निशाना बनाकर अवैध कब्जा हटाने की बात कही जा रही है, उसका जमकर विरोध होना चाहिए। लोगों को बेरोजगार बनाकर कोई शहर सुविधा-संपन्न या सुंदर नहीं हो सकता। शहर को स्मार्ट बनाने के लिए लोगों की रोजी-रोटी छीनना एक कमअक्ली का काम है, और गरीब जनता आने वाले किसी भी चुनाव में जनप्रतिनिधियों से इसका हिसाब चुकता जरूर करेगी। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 21 जनवरी

हिंसक फतवों पर सरकारें चुप, सुप्रीम कोर्ट सीधे दखल दे...

संपादकीय
20 जनवरी 2018


राजस्थान में राजपूत महिलाओं के एक संगठन ने धमकी दी है कि अगर देश में कहीं भी पद्यावत फिल्म रिलीज होती है, तो वे चित्तौडग़ढ़ के किले में जाकर जौहर का इतिहास दुहराएंगी। इतिहास या कहानी के मुताबिक इस किले में राजपूत महिलाओं ने आग में कूदकर जान दी थी, जिसे उस वक्त की प्रथा के मुताबिक जौहर कहा जाता है। अब देश के सुप्रीम कोर्ट ने इस फिल्म को पूरे देश में रिलीज होने देने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर डाली है, और कहा है कि कानून व्यवस्था को सम्हालना उनकी जिम्मेदारी है, और इस पर किसी भी तरह की रोक लगाने से इंकार कर दिया है। दूसरी तरफ राजस्थान में राजपूतों के एक संगठन ने कहा है कि इस फिल्म को इजाजत देने वाले सेंसर बोर्ड के चेयरमैन को जयपुर साहित्य महोत्सव में आने पर राजस्थान में ही घुसने नहीं दिया जाएगा। इधर छत्तीसगढ़ में भी एक राजपूत संगठन की यह चेतावनी सार्वजनिक रूप से सामने आई है कि अगर इस फिल्म को रिलीज किया जाता है तो सिनेमाघरों और मॉल में आग लगा दी जाएगी।
हमारा ख्याल है कि यह देश धर्म और जाति के नाम पर एक ऐसी कट्टरता की तरफ बढ़ रहा है जिस पर काबू पाने का हौसला अदालत के अलावा और किसी जिम्मेदार संवैधानिक संस्था में दिख नहीं रहा है। संसद देश के जलते-सुलगते मुद्दों को लेकर बेअसर हो गई है, और वहां पर सत्ता और विपक्ष की गिनती के बीच एक पंजा-कुश्ती सी चलती रहती है। टीवी चैनलों पर अलग-अलग पार्टियों और संगठनों के लोग कानून को चुनौती देते हुए देश में आग लगाने और फैलाने के बयान देते हैं, और उन पर उनसे जुड़े राजनीतिक दल भी कुछ नहीं कहते, उनसे जुड़े नेता भी कुछ नहीं कहते। इन सबके चलते हुए देश एक ऐसी कट्टरता में गहरे धंसते जा रहा है जो कि शायद उस इतिहास में भी न रही हो जिसके हकीकत होने का दावा करते हुए आज बहुत सी जातियों और बहुत से धर्मों के संगठन अपनी ठेकेदारी कायम करने में लगे हुए हैं।
आज देश में जो माहौल बन रहा है उसमें सुप्रीम कोर्ट को सीधे दखल देने की जरूरत है। लोगों को याद होगा कि उत्तरप्रदेश के एक बड़बोले समाजवादी पार्टी नेता आजम खान ने बलात्कार की शिकार एक महिला के बारे में गंदी जुबान से एक बयान दिया था, और इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें कटघरे में खड़ा करके उनके उगले गए हिंसक शब्द वापिस निगलने पर मजबूर किया था। आज प्रदेशों की सरकारें अगर अपने-अपने इलाकों में हिंसा के फतवे देने वाले लोगों पर कोई कार्रवाई करने की इच्छा ही नहीं रखती हैं, कोई कार्रवाई कर ही नहीं रही हैं, तो अब जिम्मेदारी केवल अदालत पर आ जाती है। हिंसा के फतवे जारी करने वाले लोगों को गिरफ्तार करने का आदेश सुप्रीम कोर्ट सीधे भी दे सकता है, और राज्य सरकारों को भी कटघरे में खड़ा कर सकता है कि ऐसे सार्वजनिक-हिंसक बयानों के बावजूद सरकार ने अपनी जिम्मेदारी पूरी क्यों नहीं की? वोटरों के तलुए सहलाने के फेर में सत्ता पर काबिज राजनीतिक पार्टियां कोई कड़ी कार्रवाई नहीं करती हैं। ऐसे में देश में कानून का राज कायम करवाने का जिम्मा अदालत का है, और चूंकि राज्यों के हाईकोर्ट भी ऐसे हिंसक फतवों पर कोई कार्रवाई नहीं करते हैं, इसलिए सुप्रीम कोर्ट को खुद होकर दखल देनी चाहिए, और आत्मदाह या जौहर सरीखे आत्मघाती फतवों पर भी कार्रवाई करनी चाहिए, और दूसरों के साथ हिंसा की धमकियों पर भी।
आज बहुत से बकवासी-ठेकेदारों को मीडिया में बने रहकर अपनी हस्ती बचाए रखने की बड़ी फिक्र रहती है, लेकिन वे ऐसा करके देश में हिंसा और नफरत का, अराजकता का एक ऐसा माहौल बनाते हैं जिसका इस्तेमाल दूसरे समुदायों के लोग भी करते हैं। इसलिए हमारा ख्याल है कि अदालत को ऐसे सिलसिले को खत्म करना चाहिए, ऐसी हिंसक बकवास करने वाले लोगों को सीधे कटघरे में खड़ा करना चाहिए, और सामाजिक अराजकता फैलाने के जुर्म में सीधे जेल में डालना चाहिए। यह एक तकलीफ की बात है कि हिन्दुस्तान कुछ बरस पहले एक बेहतर लोकतंत्र था, और उसमें इतने फतवों की जगह नहीं थी, लेकिन हाल के बरसों में इसमें अराजक और साम्प्रदायिक हिंसा का माहौल बढ़ गया है, जिसे तुरंत कुचलना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 20 जनवरी

दीवारों पर लिक्खा है, 19 जनवरी

धर्म और आतंक को जोडऩे का नतीजा विज्ञान का अंत

संपादकीय
19 जनवरी 2018


पाकिस्तान में बच्चों को पोलियो ड्रॉप्स पिलाने के काम लगीं मां-बेटी को आतंकियों ने गोली मारकर मार डाला। इसके पहले भी इस्लामी आतंकी इस अभियान में लगे हुए स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को कई बार मार चुके हैं। उनका तर्क है कि पोलियो के टीके से मुस्लिम बच्चों की प्रजनन शक्ति खत्म हो जाएगी, और यह एक पश्चिमी साजिश है जिसे वे पूरा नहीं होने देंगे। जाहिर है कि धर्म के आधार पर जो आतंक चलता है, उसका विज्ञान या अक्ल से कोई लेना-देना तो हो नहीं सकता। लेकिन हम सबसे पहले इस मां-बेटी के हौसले को सलाम करना चाहेंगे जो कि पोलियो-कार्यकर्ताओं की आतंकी-हिंसा के लंबे पाकिस्तानी इतिहास के बावजूद इस काम में लगी हुई थीं। अड़तीस बरस की सकीना, और सोलह बरस की रिजवाना इन दोनों को मारकर पाकिस्तान के इस्लामी-आतंकियों ने अपने देश के लाखों बच्चों को पोलियो के खतरे के हवाले कर दिया है। इसके बाद लोगों के बीच न तो पोलियो ड्रॉप्स देने की हिम्मत आसानी से आएगी, और न ही मां-बाप अपने बच्चों को ऐसा टीका दिलवाने की हिम्मत आसानी से कर पाएंगे।
पाकिस्तान दुनिया के उन तीन देशों में से एक है जिसने पोलियो को रोकने में कामयाबी नहीं पाई है। अफ्रीका का नाइजीरिया, पाकिस्तान के पड़ोस का अफगानिस्तान, और खुद पाकिस्तान। इन्हीं तीन देशों में पोलियो बाकी है, और यहां से अड़ोस-पड़ोस के देशों तक इसका जाने का खतरा भी बने रहता है। कल की इस हिंसा के सिलसिले में यह भी याद रखने की जरूरत है कि पाकिस्तान में जनवरी 2015 में एक टीकाकरण केन्द्र में आत्मघाती बमबारी से पन्द्रह लोगों को मार डाला गया था, और पाकिस्तानी तालिबानी ऐसे कई हमलों की जिम्मेदारी ले चुके हैं। लेकिन पाकिस्तान के सिलसिले में हम एक दूसरी बात को भी याद करना चाहेंगे कि अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में पाकिस्तान में ओसामा-बिन-लादेन की तलाश करने के लिए सीआईए ने टीकाकरण कर्मचारियों की शक्ल में जासूसी करवाई थी, और उस वक्त भी हमने यह लिखा था कि ऐसा करना टीकाकरण जैसे जरूरी स्वास्थ्य कार्यक्रम की साख को चौपट करना है, और यह एक अंतरराष्ट्रीय जुर्म से कम कुछ नहीं है। खैर, वह बात तो आई-गई हो गई, लेकिन हमारा अभी भी यह मानना है कि जिस तरह किसी युद्ध के बीच भी एम्बुलेंस का फौजी-इस्तेमाल एक युद्ध अपराध माना जाता है, और पूरी दुनिया के सभ्य देशों के बीच ऐसा समझौता भी है कि रेडक्रॉस की एम्बुलेंस पर कोई भी फौज हमला नहीं करेगी, उसी तरह यह भी एक घोषित समझौता होना चाहिए कि टीकाकरण कार्यक्रम का कोई इस्तेमाल सेहत से परे के किसी काम के लिए नहीं किया जाएगा।
अब हम इस मुद्दे पर आएं कि किसी धर्म से जुड़े हुए आतंकी संगठनों को बढ़ावा देने का क्या नतीजा होता है। यह बात महज पाकिस्तान तक सीमित नहीं है, हिन्दुस्तान में भी कई धर्मों से जुड़े हुए लोग अलग-अलग वक्त पर, अलग-अलग जगहों पर आतंक से भी जुड़े रहे हैं, और आतंक का पता नहीं कोई धर्म होता है या नहीं, किसी धर्म का कोई विज्ञान तो बिल्कुल नहीं होता। और जिस धर्म के लोग अपने बच्चों को टीकाकरण जैसी जरूरी चीज से दूर रख रहे हैं, वे लोग कुल मिलाकर अपने ही धर्म का बड़ा नुकसान भी कर रहे हैं। जहां कहीं भी धर्म को लेकर कट्टरता, उन्माद, धार्मिक नफरत, और पाखंड को बढ़ावा दिया जाता है, वहां पर वैज्ञानिकता पूरी तरह खत्म हो जाती है, और आज हिन्दुस्तान में हिन्दुओं के बीच भी अंधविश्वास को विज्ञान के विकल्प की तरह फैलाया और बढ़ाया जा रहा है। जब टीवी चैनलों पर बहस के दौरान भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा जैसे विज्ञान पढ़े हुए लोग यह कहते हैं कि गोमूत्र से सोना निकाला जाता है, तो वे इस देश में गाय से जुड़े हुए लोगों की भावनाओं का शोषण करते हुए इस देश की वैज्ञानिक सोच को खत्म करने का काम भी करते हैं। संबित पात्रा खुद तो डॉक्टरी पढ़े हुए इंसान हैं, लेकिन लोगों के बीच में वैज्ञानिकता खत्म करने के काम में लगे हुए हैं। उनकी मास्टर ऑफ सर्जरी ऐसी ही काम आ रही है। लेकिन यह महज एक मिसाल है, हमने विज्ञान को छोड़कर धर्मान्धता और कट्टरता को फैलाते हुए और भी बहुत से लोगों को देखा है। आज खबरों में बने हुए डॉ. प्रवीण तोगडिय़ा पेशे से कैंसर सर्जन हैं, लेकिन देश में पूरे वक्त वे साम्प्रदायिकता के कैंसर को फैलाने में लगे हुए दिखते हैं। इसलिए धर्म और आतंक को जोडऩे का क्या नतीजा होता है यह पाकिस्तान में कल सामने आया है, और हिन्दुस्तान को भी इससे सबक लेना होगा। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 18 जनवरी

केजरीवाल स्कूलों को बिग बॉस बना रहे, मां-बाप घर बैठे देखेंगे

संपादकीय
18 जनवरी 2018


दिल्ली सरकार तीन महीने में सरकारी स्कूलों में सीसीटीवी कैमरे लगाने जा रही है। सीएम अरविंद केजरीवाल का कहना है कि  सभी माता-पिता अपने फोन पर वास्तविक समय में बच्चों को कक्षा में पढ़ते हुये देख सकेंगे। इससे पूरी प्रणाली पारदर्शी और जवाबदेह बनेगी। इससे बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी। उन्होंने कहा कि इससे बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी। दिल्ली सरकार के इस फैसले से परे आज भी ऐसी सहूलियत टेक्नालॉजी ने मुहैया करा दी है जिससे कि लोग अपने छोटे बच्चों को किसी आया के साथ छोड़ते हुए उस कमरे में कैमरा लगाकर अपने फोन से उस कैमरे की रिकॉर्डिंग देख सकते हैं। कई लोग घर या कारोबार की हिफाजत के लिए भी इस तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। 
अब जहां तक बच्चों को उनके क्लासरूम में देखने की सुविधा घर बैठे मां-बाप को देने का फैसला है, तो यह कुछ अटपटा है। यह मान लिया गया है कि छोटे बच्चों को किसी निजी जीवन का हक नहीं है, और उनके बड़े हो जाने तक मां-बाप उनके पल-पल पर नजर रख सकते हैं। यह तरीका जापान में बरसों से चल रहा है कि वहां पर मां-बाप बच्चों के स्कूल बैग में एक ट्रांसमिटर लगा देते हैं, और फिर अपने फोन पर यह सुनते रहते हैं कि बच्चे कहां हैं, किनसे और क्या बात कर रहे हैं? अब क्लासरूम में अपने बच्चों को पढ़ते देखने का लालच बहुत से मां-बाप को उलझाकर रख सकता है। आज अपने मोबाइल फोन पर लोग जिस चीज को देख सकते हैं, उस चीज को टीवी के परदे पर भी देख सकते हैं, और उसे रिकॉर्ड करके भी रख सकते हैं। फिर क्लासरूम में बच्चे किन बच्चों के साथ उठ-बैठ रहे हैं, किनके साथ बात कर रहे हैं, इन सबको देखना, और पूरे वक्त देखने की सहूलियत बहुत से मां-बाप को एक बेचैनी से भर सकती है, और बच्चों का, मां-बाप का, टीचर का सबका जीना हराम हो सकता है। आज भी मां-बाप छोटे-छोटे बच्चों के लंबे-लंबे स्कूली घंटों के बाद भी उनकी ट्यूशन के लिए लाठी लिए उनके पीछे लगे रहते हैं। स्कूली बच्चे के परिवार को ऐसे निरंतर तनाव और बेचैनी से भरना एक बीमार समाज बनाकर छोड़ेगा।
अगर इसके सबसे करीब की मिसाल देखनी हो, तो टीवी पर एक बेहूदे रियलिटी शो, बिग बॉस, को देख सकते हैं जिसमें एक घर बनाकर उसमें जगह-जगह कैमरे लगाए गए हैं, और लोग माइक्रोफोन टांगकर चलते हैं। महीनों तक चलने वाले इस शो में हिस्सा लेने वालों पर पल-पल नजर रखी जाती है, और बिग बॉस हर किसी की निगरानी करते चलता है। स्कूल के क्लासरूम में माइक्रोफोन या कैमरा लगाकर अगर प्रिंसिपल पढ़ाई पर नजर रखे, तो भी बात समझ में आती है, घर बैठे मां-बाप या दफ्तर में काम करते हुए मां-बाप इस तरह की नजर रखने लगें, तो यह उन बच्चों की जिंदगी को पूरी तरह तबाह करना होगा जिन पर उनके मां-बाप वैसे ही पूरा काबू रखते हैं। आज भी अधिकतर बच्चे मां-बाप की मनमानी, जिद, और उनके फैसलों को ढोते ही हैं, भारी-भरकम स्कूल बैग के अलावा। अब इस कैमरेबाजी से बच्चे इस तनाव में घर पहुंचेंगे कि वहां मां-बाप से क्लास की किस बात के लिए लताड़ पड़ेगी। 
हिन्दुस्तान में लोगों की निजी जिंदगी पर किसी का भरोसा नहीं है। हर कोई दूसरों पर काबू पाने के लिए बावले रहते हैं, जिसे कंट्रोल-फ्रीक कहा जाता है। इस काबूपने को और बढ़ाना बिल्कुल ही समझदारी नहीं होगी। आज जब दिल्ली, बेंगलुरू, और बाकी भी बहुत से शहरों में स्कूली बच्चों पर तरह-तरह के सेक्स-हमले हो रहे हैं, और दूसरे तरह के हमले हो रहे हैं, तो सरकारें कुछ करती हुईं दिखना भी चाहती हैं। और इसी चाहत के चलते वे ऐसा कुछ करने की चूक भी कर सकती हैं कि जिससे नफा कुछ न हो, और नुकसान बहुत हो जाए। बच्चों के स्वाभाविक विकास के लिए उन्हें जिस तरह का एक माहौल चाहिए, घर बैठे मां-बाप की लगातार निगरानी में वैसा माहौल उन्हें मिल नहीं पाएगा। और हो सकता है कि दस-बीस बरस बाद जाकर ऐसे निगरानीशुदा बच्चों की एक ऐसी पीढ़ी तैयार हो जो पूरे समय इस फोबिया के साथ जीने लगे कि उनकी निगरानी कर रहे हैं। पहली नजर में मां-बाप को यह इंतजाम आकर्षक और लुभावना लग सकता है कि उनके बच्चों पूरे वक्त उनकी नजरों के सामने रहें, लेकिन इससे बच्चों के व्यक्तित्व विकास पर भी बहुत बुरा असर पड़ेगा, और मां-बाप घर बैठे तय करने लगेंगे कि उनके बच्चे किन बच्चों के साथ उठे-बैठें, और यह सिलसिला बहुत नुकसानदेह और खतरनाक होगा। (Daily Chhattisgarh)
-सुनील कुमार