ऐसी बददिमागी किसी ईमानदार नेता में कभी नहीं आ सकती...

संपादकीय
24 जनवरी 2018


पाकिस्तान में पिछले दिनों सात बरस की एक बच्ची लापता हुई, और बाद में घूरे में पड़ी उसकी लाश मिली जिससे पता लगा उसके साथ बलात्कार किया गया था, और फिर उसकी हत्या कर दी गई थी। इसे लेकर पूरे देश में एक अभूतपूर्व नाराजगी फैली, और जगह-जगह शहरों में लोगों ने सरकार को कोसा। अभी एक हजार से अधिक लोगों के डीएनए की जांच के बाद यह बलात्कारी हत्यारा पकड़ाया तो पता लगा कि वह परिवार का वाकिफ था, और उसका घर में आना-जाना था। अब यहां पर आगे लिखने को दो अलग-अलग पहलू हैं, और उन दोनों का एक-दूसरे से कोई लेना-देना नहीं है, इसलिए इस पल तक यह तय करना कुछ मुश्किल है कि इनमें से आगे किस पर लिखा जाए। एक तो यह कि परिवार के जानकार, करीबी लोग, जो कि आते-जाते हैं, वे भी इस तरह के बलात्कार कर सकते हैं, ऐसी हत्याएं कर सकते हैं। यह जो आदमी पकड़ाया है उसने इसके पहले भी सात और लड़कियों से बलात्कार और उनकी हत्या की थी, और अभी पकड़ाने के बाद उसका डीएनए उन पिछली सात लाशों पर मिले डीएनए से मेल खा रहा है। यह तो हुई पहली बात। और दूसरी बात है कि इस गिरफ्तारी की खबर देने के लिए पाकिस्तान के इस पंजाब प्रांत के मुख्यमंत्री शहबाज शरीफ ने एक प्रेस कांफ्रेंस की जिसमें वे सरकार के दूसरे आला लोगों के साथ बैठे और मीडिया को गिरफ्तारी बताई। इसकी एक तस्वीर पाकिस्तानी अखबारनवीसों ने पोस्ट की है जिसमें मंच पर बैठे आधा दर्जन सरकारी बड़े लोग किसी बात पर जोरों से हॅंस रहे हैं, और इसी प्रेस कांफ्रेंस में बलात्कार-हत्या की शिकार इस बच्ची का पिता भी बैठा हुआ था।
सरकार में बैठे हुए लोग सत्ता की ताकत में किस तरह मदमस्त हो जाते हैं, और संवेदनाएं खो बैठते हैं, इसकी एक बड़ी मिसाल यह हॅंसी है। और हम हिन्दुस्तान में अपने आसपास के दायरे में भी रोजाना सत्ता की ऐसी बातों को देखते हैं जिनसे लगता है कि जैसे-जैसे बाहुबल बढ़ते चलता है, दोनों बाहों के बीच का दिल संवेदना खोते जाता है। सरकार चला रहे मंत्री, और राजभवन या अदालत जैसी जगहों पर बैठे बड़े लोग सड़कों पर अपनी आवाजाही के लिए जिस अंदाज में ट्रैफिक जाम करवाते हैं, वह लोगों के मन में नफरत भरने के अलावा और कुछ नहीं करता। देश भर से ऐसी खबरें आती हैं कि कब प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, या किसी और मंत्री के काफिले के लिए रोके गए ट्रैफिक में फंसे किसी मरीज की जान किस तरह चली गई। देश में बंगाल -त्रिपुरा जैसे एकाध ही राज्य हैं जहां पर मुख्यमंत्री के लिए भी ट्रैफिक रोका नहीं जाता, क्योंकि वे अभी तक जनता से जुड़े हुए हैं। दूसरी तरफ हम अपने आसपास देखते हैं तो छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य में ऐसे मंत्री और नेता मौजूद हैं जो कि अपने ही शहर में अपने ही घर से दफ्तर आते-जाते सायरन लगी हुई गाडिय़ों के काफिलों में चलते हैं, और इसमें भी उनका चेहरा दिखता रहे, इसलिए गाड़ी के भीतर उनके चेहरे पर रोशनी डालती ट्यूबलाईट चालू रहती है। हमने इसी छत्तीसगढ़ के राजधानी के सांसद को इस बात के लिए राज्य सरकार से सार्वजनिक रूप से शिकायत करते सुना है कि उनकी गाड़ी के लिए ट्रैफिक नहीं रोका जाता। यह बात बताती है कि ताकत इंसान को जंगल के उन्हीं नियम-कायदों की ओर ले जाती है जिनके तहत सबसे ताकतवर का राज चलता है। अपने आपको सबसे अधिक ताकतवर बनाने या साबित करने की दौड़ में भी हर कदम पर उन्हें अपनी ताकत से अधिक उसकी नुमाइश की फिक्र लगी रहती है, और यह तब है जब इन तमाम लोगों को हर पांच बरस में जनता के बीच जाकर जवाब देना होता है।
दरअसल भारतीय चुनावी राजनीति में ऐसी बददिमागी की एक वजह है। ऐसे बहुत ताकतवर हो चुके लोग चुनाव लड़ते और जीतते नहीं हैं, वे चुनाव लड़ते हैं, और जीत को खरीदते हैं। जब चुनाव के नियम कुछ पन्द्रह-बीस लाख रूपए में विधानसभा चुनाव लडऩे की सीमा तय करते हैं, तो दस फीसदी से अधिक ऐसी सीटें रहती हैं जहां पर इससे सौ गुना अधिक खर्च होता है। और यह बात महज हमारी अटकल नहीं है, अभी-अभी दो-चार दिन पहले ही भारत सरकार से जुड़े एक वरिष्ठ व्यक्ति ने भी यह बात कही है कि किस तरह एक-एक विधानसभा सीट के लिए सौ-पचास करोड़ रूपए खर्च कर दिए जाते हैं। अब जाहिर है कि जिन लोगों के हाथ इस तरह की दौलत जिसे कि वे चुनाव खरीदने में खर्च करते हैं, तो उन्हें जनता को सड़क से किनारे फेंकने या कुचलते चलने में परहेज क्यों होगा? जनता की परवाह तो वहीं पर हो सकती है जहां पर जनता अपनी मर्जी से वोट देती हो। हर सरकार में कुछ मंत्री और नेता इतनी काली कमाई कर चुके होते हैं कि उनकी पार्टी जानते हुए भी उनकी टिकट नहीं काट पाती कि वे खुद तो अंधाधुंध खर्च करके एक सीट ला देंगे, लेकिन किसी और को वहां से टिकट दी गई तो उसे अपनी दौलत से आसानी से हरा देंगे। पैसे की ऐसी बददिमागी पार्टी के ऊपर ऐसे नेताओं को किस तरह हावी कर देती है यह हमने कर्नाटक में खदान माफिया रेड्डी भाईयों की शक्ल में देखा है।
यही वजह है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहे, और भ्रष्टाचार के जुर्म में हटाए गए नवाज शरीफ के भाई, और पंजाब के मुख्यमंत्री शहबाज शरीफ और उनके साथियों को बलात्कारी-हत्यारे की गिरफ्तारी बताते हुए उसकी शिकार बच्ची के पिता की मौजूदगी में हॅंसना सूझता है। यह बददिमागी उस दिन हवा हो जाएगी जिस दिन नेताओं को जनता को जवाब देकर वोट पाने होंगे। नेताओं की बददिमागी का बड़ा सीधा-सीधा रिश्ता उनकी काली कमाई की ताकत से रहता है, चाहे वह इस तरह की प्रेस कांफ्रेंस हो, चाहे वह सड़कों पर सायरन हो, चाहे वह किसी एयरपोर्ट पर बाकी मुसाफिरों को अलग करके ऐसे स्वघोषित वीआईपी को सुरक्षा-जांच से छूट हो। ऐसी बददिमागी किसी ईमानदार नेता में कभी नहीं आ सकती। (Daily Chhattisgarh)

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन राष्ट्रीय बालिका दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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