नक्सल मोर्चे के शहीदों को सलामी तो ठीक है, लेकिन...

संपादकीय
27 जनवरी 2018


छत्तीसगढ़ के बस्तर में पिछले एक बरस में सौ-पचास सुरक्षा जवान नक्सल मोर्चे पर मारे गए हैं। बुरी तरह जख्मी होने के बाद में अस्पताल में मारे जाने वाले लोगों की गिनती इसके अलावा हो सकती है। इसके अलावा वह गिनती भी हो सकती है कि जो जवान बुरी तरह से जख्मी होकर बाकी जिंदगी बुरे हाल में गुजारने के लिए मजबूर हुए हों। मारे जाने वाले जवानों को सरकार और समाज दोनों शहीद कहते हैं, और उनके परिवारों को मुआवजे का अच्छा-खासा इंतजाम है। लेकिन हर नक्सल-मुठभेड़ के बाद, हर नक्सल-हमले के बाद हम यह देख रहे हैं कि घायल सुरक्षा कर्मचारियों को, और नक्सलियों को भी राज्य सरकार तरह-तरह के हेलीकॉप्टरों से रायपुर लेकर आती है, और यहां के बड़े अस्पतालों में उनकी जान बचाने की कोशिश होती है। पुलिस के जानकार लोगों का यह मानना है कि जख्मी को रायपुर के अस्पताल तक पहुंचाने में कम से कम डेढ़ घंटे का समय लग जाता है, और पुलिस रिकॉर्ड में ऐसे मामले हैं जिनमें घायलों ने रास्ते में दम तोड़ा है। ऐसे में एक सवाल यह उठता है कि बस्तर के नक्सल मोर्चे पर जहां यह जाहिर है कि सुरक्षा कर्मचारी बड़ी संख्या में और बुरी तरह जख्मी होंगे ही होंगे, वहां उनकी जान बचाने के लिए मुठभेड़ के इलाकों के करीब किसी जगह ऐसा अस्पताल क्यों नहीं बनाया जाता जहां पर रायपुर के अस्पताल की बराबरी की सहूलियतें हों और लोगों की जिंदगी बच सके? और सवाल महज सुरक्षा कर्मचारियों को बचाने का नहीं है, घायल नक्सलियों को भी सरकार ही इलाज के लिए अस्पताल लाती है, और बस्तर से रायपुर के बीच के लंबे सफर में वे भी मारे जाते होंगे, या फिर यहां पहुंचकर उनकी मौत होती होगी क्योंकि इलाज में देर हुई है।
बस्तर में हजारों सुरक्षा कर्मचारी लगे हुए हैं, और हजारों करोड़ रूपए साल का खर्च उन पर हो रहा है। ऐसे में क्या वजह है कि उनको एक खतरनाक और जानलेवा मोर्चे पर तो झोंक दिया गया है, लेकिन जान जा रही हो, तो भी उनको इलाज के लिए डेढ़ घंटे के हवाई सफर पर ले जाना पड़ता है? दूसरा सवाल यह है कि राजधानी रायपुर में भी प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल, मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल के बजाय एक निजी अस्पताल में घायल लोगों को ले जाया जाता है, जिससे जाहिर है कि सरकार के पास प्रदेश के अपने सबसे बड़े अस्पताल में भी जान बचाने की वो सहूलियत नहीं है जो कि एक निजी अस्पताल में है। अब नक्सल मोर्चा कोई नया नहीं है, राज्य बनने के पहले से बस्तर में नक्सल-हिंसा चली आ रही है। ऐसे में एक जख्मी को जान बचाने के लिए जिस इलाज की जरूरत रहती है, उसमें वक्त भी बहुत मायने रखता है। मेडिकल जुबान में इसे गोल्डन ऑवर कहा जाता है, सोने जैसा कीमती घंटा। किसी घायल को तुरंत इलाज मिले, या दो घंटे बाद मिले, उससे जिंदगी बचने, उसके बदन के अलग-अलग हिस्से बचने की संभावना में बहुत बड़ा फर्क पड़ता है। इसलिए हमें इस बात से हैरानी होती है कि हजारों करोड़ साल के खर्च वाले बस्तर के नक्सल मोर्चे पर शहादत को घटाने के लिए, जिंदगियों को बचाने के लिए अब तक सरकार ऐसा कोई अस्पताल वहां क्यों नहीं बना पाई जिससे जिंदगियां बच सकें?
आज देश की सरहद पर अगर फौज तैनात रहती है, तो फौज के अपने अस्पताल तैनाती की जगहों के इतने करीब रहते हैं कि वे हर किस्म के जख्मी को बचा भी सकें, कम से कम अस्पताल तक पहुंचा सकें। आज ऐसे इंतजाम के बिना अगर राज्य और केन्द्र सरकार ने अपने हजारों सुरक्षा कर्मचारियों को बस्तर में तैनात किया है, तो यह एक फिक्र की बात है, और दोनों सरकारों से यह जायज सवाल तो बनता ही है कि ऐसी नौबत प्रदेश में क्यों है? ऐसा भी नहीं कि इस प्रदेश में बजट की कोई कमी हो। प्रदेश में चारों तरफ बड़ी-बड़ी योजनाओं पर ऐसा खर्च हो रहा है, ऐसी-ऐसी योजनाओं पर खर्च हो रहा है कि जिनके बिना काम चल सकता है। इसलिए यह नहीं माना जा सकता कि बस्तर में शहीद होने वाले लोगों में से बहुतों की जिंदगी बचाने के लिए सरकार वहां पर एक अस्पताल नहीं बना सकती थी। कहने के लिए बस्तर के कई जिलों में अस्पताल बेहतर हो गए हैं, लेकिन जाहिर है कि बुरी तरह से जख्मी लोगों के इलाज की सहूलियत वहां नाकाफी है, और इसीलिए घायलों को हेलीकॉप्टर से रायपुर लाया जाता है। आज छत्तीसगढ़ में मौजूदा सरकार के चौदह बरस पूरे हो गए हैं, और इस कार्यकाल का आखिरी बरस चल रहा है। इसलिए यह सोचना भी मुश्किल है कि यह सरकार अपने इस कार्यकाल में यह काम नहीं कर पाई, और शायद चौथे कार्यकाल में इसे कर सके। जब हर कुछ हफ्तों या महीनों में मुख्यमंत्री को जाकर अस्पताल में जख्मी सुरक्षा कर्मचारियों को देखना होता है, उनके ताबूतों को सलामी देनी होती है, तो यह हैरानी की बात है कि राज्य सरकार बस्तर में रायपुर के निजी अस्पताल के टक्कर की सुविधा क्यों उपलब्ध नहीं कराती? केन्द्र और राज्य सरकार के साधन अपार हैं, और बिना देर किए इस जानलेवा मोर्चे के करीब एक ऐसा अस्पताल बनना चाहिए जिससे शहीद होने वाले लोग बच सकें। शहीद को सलाम एक रस्म होती है, लेकिन सुरक्षा बलों की शहादत को रोकने की कोशिश में अगर कोई कमी होती है, तो फिर ऐसी रस्म अदायगी फिजूल होती है। (Daily Chhattisgarh)

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन भारत भूषण और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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