साइबर-सक्रियता तो बढ़ गई लेकिन साइबर-जागरूकता...

संपादकीय
28 फरवरी 2018


एक भी दिन ऐसा नहीं गुजरता जब इंटरनेट या फोन, फेसबुक से कोई धोखा न खाते हों। फेसबुक पर दोस्ती करके अश्लील तस्वीरें जुटा लेना, ब्लैकमेल करना, और महंगे गिफ्ट भेजने का झांसा देकर उन्हें छुड़ाने के लिए बैंक खातों में पैसे जमा करवाना भी रोजाना कहीं न कहीं से पुलिस के पास पहुंच रहा है। बहुत सी अधेड़ महिलाएं भी अपने घरबार की फिक्र छोड़कर इंटरनेट की ऐसी दोस्ती के फेर में पड़ रही हैं कि वे लुट भी रही हैं, और ब्लैकमेलिंग का खतरा भी झेल रही हैं। दरअसल कम्प्यूटर, फोन, और इंटरनेट जैसी सहूलियतों से लोग सोशल मीडिया पर एक ऐसी जिंदगी जीने लगे हैं जिसके खतरे का उन्हें अंदाज नहीं है। मानो वे किसी अनजाने जंगल में पहुंच गए हैं, जहां पर खाने लायक फल कौन से हैं, और जहरीले कौन से हैं इसकी परख-पहचान नहीं है, लेकिन वहां लोग खूब दुस्साहस के साथ हर फल को चख रहे हैं, फेसबुक के खाते बना रहे हैं, वॉट्सऐप पर तस्वीरें और वीडियो भेज रहे हैं, और इनमें से जहां जहर साबित होगा, उसका असर दिखने तक उससे बाहर आने का वक्त निकल चुका होगा।
आज सरकार और समाज को, और सबसे अधिक, स्कूल-कॉलेज और परिवार को बच्चों-बड़ों सभी को कम्प्यूटर-फोन, नेट-सोशल मीडिया की संभावनाओं और उसके खतरों दोनों से वाकिफ कराना चाहिए। इस काम में कम्प्यूटर और फोन कंपनियां चाहे कोई मदद न करें, क्योंकि गैरजिम्मेदार ग्राहक इंटरनेट इस्तेमाल करके कंपनियों को अधिक मुनाफा देते हैं, और खतरे से डरे-सहमे ग्राहक इन तमाम सामानों और सेवाओं का कम इस्तेमाल करेंगे, लेकिन घर-समाज और सरकार को अपनी जिम्मेदारी तुरंत निभानी चाहिए। इसके लिए किसी साइबर-अपराध के विशेषज्ञों की जरूरत नहीं है, मामूली समझबूझ रखने वाले लोग भी स्कूल-कॉलेज जाकर या संगठनों-संस्थाओं की बैठक में जाकर लोगों को सूचना तकनीक के खतरों के बारे में बता सकते हैं। आज अधिकतर लोगों को इनमें से किसी बात के बारे में बड़ी कम जानकारी रहती है। लोग जिस तरह कहावत और मुहावरे में बंदर के हाथ उस्तरे की बात कहते हैं, वैसा बंदर के साथ होते तो किसी ने देखा नहीं है, इंसानों के हाथ मोबाइल फोन आने के बाद ऐसा जरूर देखने में आ रहा है।
पुलिस और अखबारों में जितने मामले पहुंच रहे हैं, उनसे हजार गुना अधिक मामले निजी ब्लैकमेलिंग तक पहुंचकर दब जाते हैं, और इससे न जाने कितने लोगों की जिंदगी तबाह होती है। जब मामला हत्या या आत्महत्या तक पहुंच जाता है, या परिवार के और लोगों की नजर में आ जाता है, तो उनमें से कुछ मामलों में लोग पुलिस तक जाने का हौसला दिखाते हैं। हमारा ख्याल है कि राज्य सरकार को साइबर-जागरूकता नाम का एक ऐसा कार्यक्रम शुरू करना चाहिए जो कि कम्प्यूटर-मोबाइल इस्तेमाल करने की उम्र शुरू होते ही लागू किया जाए, और इस उम्र से ऊपर के तमाम लोगों को उपकरणों और संचार-प्रणाली के खतरों के बारे में जागरूक किया जाए। जिस तरह लापरवाह सेक्स से एड्स का खतरा रहता है, उसी तरह लापरवाह साइबर-सक्रियता से जुर्म का शिकार होने, या ब्लैकमेल होने का खतरा बढ़ता है।
सरकार को स्कूल-कॉलेज के पाठ्यक्रम में साइबर-अपराधों से सावधान रहने पर कुछ पन्ने जरूर जोडऩे चाहिए, और पुलिस भी अपनी सामाजिक भूमिका की अच्छी छवि बनाने के लिए जगह-जगह जाकर ट्रैफिक-जागरूकता की तरह साइबर-जागरूकता पर भी लोगों को जानकारी दे सकती है। यह सब आज इसलिए भी जरूरी है कि दुनिया में हिन्दुस्तान स्मार्टफोन के मामले में सबसे तेजी से बढऩे वाली अर्थव्यवस्था है। लोगों का डेबिट और क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल बढ़ रहा है, नए-नए लोग इंटरनेट-बैंकिंग कर रहे हैं, स्मार्टफोन का इस्तेमाल बढ़ रहा है, इंटरनेट की उपलब्धता बढ़ रही है, स्पीड बढ़ रही है, लेकिन सावधानी, जागरूकता, और चौकन्नापन जरा भी नहीं बढ़ रहा है। यह नौबत लोगों को कई तरह के कानूनी खतरों में डाल सकती है, ठगी और जालसाजी के शिकार तो लोग आज भी हो रहे हैं। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 28 फरवरी

सड़कों पर सत्ताधारी गुंडागर्दी के विरोध बिना चारा नहीं

संपादकीय
27 फरवरी 2018


बिहार में अपनी गाड़ी से 9 स्कूली बच्चों को कुचलकर मारने वाले शराबी भाजपा नेता को पुलिस ने गिरफ्तार किया है। तीन दिन पहले जब यह घटना हुई, भाजपा ने इस आदमी से अपना कोई संबंध होने से ही मना कर दिया था। फिर पार्टी की तख्ती लगी हुई उसकी गाड़ी खबरों में आई तो धीरे-धीरे करके सुबूत जुटते गए और अब भाजपा ने उसे पार्टी से निलंबित किया है। इससे एक दूसरी बात खुलकर सामने आई कि पूरी शराबबंदी वाले बिहार में सत्तारूढ़ गठबंधन की भागीदार भाजपा का नेता शराब पीकर गाड़ी चला रहा था, और यह शराब जाहिर है कि बिहार की भीतर ही पी गई थी। 
एक तो गाड़ी की ताकत का नशा, और फिर सत्ता का नशा। इन दोनों के साथ दारू का नशा। इसे देखने के लिए बिहार के किसी हादसे को देखने की जरूरत नहीं है, छत्तीसगढ़ में हम अपने आसपास सत्ता के इस नशे को रात-दिन देखते हैं। और यह सत्ता महज सत्तारूढ़ पार्टी की सत्ता नहीं है, यह विपक्ष में ताकतवर ओहदों पर बैठे हुए लोगों की सत्ता का नशा भी रहता है जो कि सायरन, तख्तियों, और तरह-तरह की लाईटों से गाडिय़ों को डरावनी बनाकर दिखाया जाता है। केन्द्र सरकार से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने ऐसी चीजों के लिए बार-बार हुक्म निकाले हैं, लेकिन सत्ता की ताकत दिखाने की हवस ऐसी रहती है कि लोग सार्वजनिक जगहों पर एक हिंसक-मवाली की तरह दूसरों को कुचलने पर आमादा भी रहती है। अभी छत्तीसगढ़ विधानसभा का सत्र पूरा हो रहा है, तो प्रदेश भर से विधायक अपनी गाडिय़ों में राजधानी आए हुए हैं। चारों तरफ ऐसी गाडिय़ां दिखती हैं जिन पर नियमों के खिलाफ नाम और ओहदे की, चुनाव क्षेत्र की तख्तियां लगी हुई हैं। नियमों के खिलाफ इनमें से अधिकतर गाडिय़ों में सायरन भी लगे हुए हैं जिनका धड़ल्ले से बेजा इस्तेमाल भी किया जाता है। सरकार और राजनीति इन दोनों में ऐसी गाडिय़ों की वीडियो फिल्म बनाकर लोग अदालत को भी भेज सकते हैं, और अगली किसी चुनाव में लोग अपने-अपने विधायक या सांसद, महापौर या पार्षद, जिला पंचायत पदाधिकारी या राजनीतिक नेता के खिलाफ ताकत के ऐसे हिंसक और अश्लील प्रदर्शन के वीडियो का इस्तेमाल भी कर सकते हैं। 
एक सभ्य लोकतंत्र वह होता है जिसमें अधिक ताकतवर लोग नियमों के प्रति अधिक जवाबदेह होते हैं। छत्तीसगढ़ में हम देखते हैं कि लोग दूसरों के हक को कुचलते-रौंदते चलने में भरोसा रखते हैं, लाल-पीली बत्तियों वाली, या बिना बत्तियों वाली गाडिय़ों को सायरन बजाते चौराहों पर लालबत्ती तोड़कर पार करते रात-दिन देखा जा सकता है। मंत्रियों के काफिले खाली और सुनसान सड़कों पर भी सायरन बजाए बिना चलने के आदी नहीं रह गए हैं। सुप्रीम कोर्ट के हुक्म से गाडिय़ों पर से लालबत्तियां हट गई हैं, तो मंत्रियों ने अपने काफिले के सामने लाल-पीली बत्तियों वाली पायलट गाडिय़ों को चलाकर अपनी ताकत का प्रदर्शन जारी रखा है। 
ऐसे राज्य में जनता के बीच से एक ऐसे आंदोलन की जरूरत है जो सत्ता के लिए दिक्कत खड़ी करने वाले सवाल करे। इसके अलावा ऐसे जनसंगठन रहने चाहिए जो जनता को जागरूक करे कि उसे कुचलते हुए जो सायरन चलते हैं, वैसे नेताओं को हराने की कसम खाए। लोकतंत्र मुर्दा लोगों का तंत्र नहीं हो सकता। जागरूक जनता को ही लोकतंत्र का हक रहता है। अगर जनता के बीच जागरूकता फैल जाए, तो छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेश में पौन फीसदी वोटों से ही पिछली सरकार बनी थी। बड़े से बड़े कामयाब विधायक भी कुछ हजार वोटों के फर्क पडऩे से निपट सकते हैं। चुनाव का यह साल सत्ता के नशे में बददिमाग नेताओं को सबक सिखाने का साल भी रहना चाहिए, जो कोई सायरन बजाते पहुंचे, उसके खिलाफ वोट डालने की कसम लोगों को खानी चाहिए, तभी जाकर सत्ता जनता को कुचलना बंद करेगी। अगर बिहार में जनता में जागरूकता होती तो भाजपा का एक नेता 9 बच्चों को कुचल मारने के बाद इस तरह फरार नहीं हुआ होता। बाकी जगहों पर लोगों को लोकतंत्र की बेहतरी के लिए न सही, कम से कम अपने बच्चों को कुचलकर मारे जाने से बचाने के लिए ही सत्ता की बददिमागी पर लगाम लगानी चाहिए, और इसकी शुरूआत सड़कों पर सत्ताधारी गुंडागर्दी का विरोध करने से होनी चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

बात की बात, 27 फरवरी

दीवारों पर लिक्खा है, 27 फरवरी

पहली नजर का प्यार भी अब तय करेगा कम्प्यूटर!

26 फरवरी  2018

दुनिया में ऑनलाईन डेटिंग के कारोबार में लगी बहुत सी ऐसी कंपनियां हैं जो कि लोगों को अपनी पसंद के लोगों से मिलवाने का काम करती हैं। जिस तरह हिन्दुस्तान में लंबे वक्त से शादियां तय करवाने के काम में बहुत से वेबसाइटें लगी हैं, उसी तरह पश्चिमी दुनिया में डेटिंग एक बड़ा कारोबार है जिसमें शादी के नजरिए से देखे बिना भी लोगों को आपस में मिलवाया जाता है।
दरअसल इसकी जरूरत इसलिए बढ़ती चल रही है कि पहले तो लोग बाहर निकलते थे तो एक-दूसरे से बात करने के मौके आते भी थे। अब तो अपनी व्यस्त जिंदगी में लोग कानों में ईयरफोन लगाए हुए चलते हैं, और अगल-बगल के लोगों से बात करना घटते जा रहा है। लोग अब खरीददारी करने भी कम निकलते हैं, और वे घर बैठे ऑनलाईन शॉपिंग से काम चला लेते हैं। बाग-बगीचों या जिम में कसरत करते या दौड़ते हुए भी लोगों के कान अगल-बगल के लोगों की बात सुनने को खाली रहते नहीं हैं। ऐसे में लोगों की एक-दूसरे से मेल-मिलाप की गुंजाइश घटती चली गई है, बड़ी तेजी से।
दूसरी तरफ लोगों की उम्मीदें बढ़ती चली गई हैं क्योंकि वे पूरी दुनिया के लोगों को देखने लगे हैं, और महज आसपास के दायरे के गिने-चुने लोगों तक पसंद को सीमित रखने की बेबस मजबूरी उनके सामने नहीं रह गई है। अब लोग सोशल मीडिया पर एक-दूसरे से मिलते हैं, और वहां पर वे अपनी तमाम खामियों-कमजोरियों को छुपाकर या घटाकर भी अपनी एक बेहतर तस्वीर पेश करते हैं जिससे कि उनसे ऑनलाईन मिलने वालों की उम्मीदें बढ़ती जाती हैं।
अब ऐसे में एक सवाल यह उठता है कि बढ़ी हुई उम्मीदों और घटी हुई संभावनाओं वाले लोगों को आपस में मिलवाने का काम किस तरह किया जाए कि जिससे लोगों के बीच तालमेल की गुंजाइश अधिक रहे? लोगों की पसंद-नापसंद, उनका पेशा, उनके शौक, उनके तौर-तरीके, खानपान, रहने और काम करने के पसंदीदा इलाके, अब ऐसी सैकड़ों चीजें हो गई हैं जो लोगों को एक जटिल ढांचा बना देती हैं, और उसके मनमुताबिक, उसकी जरूरत के मुताबिक एक दूसरे जटिल ढांचे से उसका मेल-मिलाप कराना अब जहां दिखने में पहले से आसान लगता है, वह हकीकत में पहले से अधिक मुश्किल हो गया है। लोगों की अपने साथी को लेकर कल्पनाएं और जरूरतें लगातार बढ़ गई हैं, और ऐसे दो लोगों को मिलाकर एक कामयाब जोड़ा बनाना बहुत आसान बात नहीं रह गई है।
ऐसे में अमरीका की एक बड़ी कंपनी ने कम्प्यूटर के ऑर्टिफीशियल इंटेलीजेंस का इस्तेमाल करके एक ऐसा लव-एल्गोरिद्म बनाया है जो कि कामयाब जोड़े या कि कामयाब मोहब्बत का दावा करता है। इस कंपनी के लोगों का कहना है कि दो लोगों के बीच एक जोड़ा बनने की, उनके बीच मोहब्बत पनपने की, और फिर कामयाब भी होने की जैसी संभावना उनका यह एल्गोरिद्म पेश करता है, ऐसा इसके पहले कभी नहीं हुआ था।
हिन्दुस्तानी लोगों को याद होगा कि यहां के हिन्दू समाज में जन्म कुंडली मिलाने की पुरानी परंपरा रही है। लोग शादी का जोड़ा तय करते हुए किसी ज्योतिषी के पास जाते हैं जो कि दोनों की कुंडलियों के ग्रह-नक्षत्र देखकर यह तय करता है कि दोनों के कितने गुण मिलते हैं। और जितने अधिक गुण मिलें, उतनी ही अधिक संभावना उस जोड़े के सफल होने की कही जाती है। अब पता नहीं यह बात कितनी सच है, और कितनी पाखंड, लेकिन यह परंपरा सैकड़ों बरसों से तो भारत में चल ही रही है, और अभी भी मैचमेकिंग की जो वेबसाइटें हैं, वे कुंडली पूछती हैं, और यह भी पूछती हैं कि कुंडली में अगर मंगल दोष है तो उसके लिए जोड़ीदार मांगलिक चलेगा/चलेगी, या नहीं। ग्रह-नक्षत्र के रास्ते जोड़ी तय करने का काम भारत में सैकड़ों या हजारों बरस चले आ रहा है, अब वह एक अलग शक्ल में पश्चिम में सामने आया है।
अभी इसी तरह की मोहब्बत मिलवाने के कारोबार पर एक रिपोर्ट आई जिससे ऐसा लगता है कि कारोबारी दिल के फैसला लेने वाले हिस्से का काम अब कम्प्यूटरों से करने लगे हैं, जाहिर तौर पर, कमाई के लिए। एक वक्त हिन्दुस्तान में गांवों में रिश्ते सुझाने का काम नाई किया करते थे क्योंकि उनका हर घर में आना-जाना रहता था, वे बच्चों को बचपन से जानते थे, और परिवार की दूसरी बातें भी उनकी नजरों में रहती थीं। अब उसी किस्म की बहुत सी जानकारियों को लेकर कम्प्यूटरों के रास्ते यह कारोबार पनप रहा है।
अब सवाल यह उठता है कि एक वक्त जिसे पहली नजर की मोहब्बत कहा जाता था, क्या उसके दिन लद गए हैं? अब यह कारोबार किसी को पहली नजर के असर का मोहताज नहीं रहने देगा, और खुद ही पहली, दूसरी, तीसरी, और चौथी नजर बनकर लोगों को एक-दूसरे से प्रभावित करेगा? अब ऐसे कारोबारी अपने कम्प्यूटरों, और उनकी कृत्रिम बुद्धि से यह फैसला ले लेंगे कि कौन सा दिल किस दूसरे दिल को अधिक पसंद करेगा? क्या समाज में हजारों बरस से चली आ रही एक व्यवस्था को, लोगों के एक-दूसरे से मिलने को, एक-दूसरे को परखने को, एक-दूसरे को पसंद करने को जो मेहनत लगती थी, वह अब ये कम्प्यूटर पल भर में कर लेंगे, और लोगों को एक भुगतान के एवज में उनकी सबसे अच्छी और संभावित मोहब्बत से मिलवा देंगे?
अभी दुनिया के कई दूसरे देशों में कुछ सौ बरस ही हुए हैं जब नौजवान अपनी मर्जी से शादी कर रहे हैं, पहले तो परिवार ही यह काम करता था, जैसा कि हिन्दुस्तान के अधिकतर हिस्से में आज भी करता है। बीच के कुछ सौ से लेकर कुछ बरस तक का यह दौर लोगों की अपनी पसंद का हुआ, और अब ऐसा लगता है कि एक बार फिर इंसान अपनी पसंद का काम दूसरों को दे रहा है, इस बार किसी नाई और अपने माता-पिता को न देकर एक कम्प्यूटर को दे रहा है!
यह बात सुनने में पहली नजर में अच्छी और कामयाब तरकीब लगती है कि लोग अपने सपने के राजकुमार, या सपनों की राजकुमारी से जितनी उम्मीदें हैं, उसमें से अधिकतर उम्मीदें पूरी करने वाले/वाली जोड़ीदार को पा लेंगे। लेकिन दूसरी तरफ यह लगता है कि समाज में जो सिलसिला लोगों को परखते हुए जोड़ीदार तय करने का विकसित हुआ था, क्या वह एक-दो सदी के भीतर ही हाशिए पर कर दिया जा रहा है, और यह जिम्मा, यह काम कारोबारी-कम्प्यूटरों के हवाले कर दिया जा रहा है? क्या इससे उन लोगों की मोहब्बत नाकामयाब होने, और दिल टूटने के खतरे खत्म होने लगेंगे जो कि उस दौर से निकलकर उर्दू की शायरी करते हैं?
ऐसे कारोबारियों का एक बड़ा दिलचस्प तर्क है, उनका कहना है कि जैसे-जैसे इंसान की जिंदगी लंबी होती जा रही है, वैसे-वैसे उसकी अपने साथी के साथ रहने की उम्र भी लंबी होती जा रही है। अब जब लोग सौ बरस के पार जीने लगेंगे, तो हो सकता है कि उनकी शादीशुदा जिंदगी पौन सदी की हो, और ऐसा लंबा वक्त जिस जीवनसाथी के साथ गुजारना हो, उसे अच्छे से ठोक-बजाकर तय करना अधिक जरूरी होते जाएगा ताकि दिक्कत-तकलीफ अधिक लंबे वक्त का बोझ न बने। इनकी बनाई जोडिय़ां ऐसे सभी किस्म का ख्याल रखकर बनाई जाएंगी जो मोहब्बत से शादी तक और डेटिंग से डेथ तक का ख्याल रख पाएं।
इससे समाज के ढांचे पर एक बुनियादी असर पड़ सकता है क्योंकि लोगों के बीच मेलजोल के मार्फत जो घरोबा होता था, उसे पूरी तरह घटाकर एक-दूसरे को तश्तरी पर धरकर पेश कर दिया जाएगा। क्या यह कुछ उसी किस्म का होगा कि फल-सब्जी खाने के बजाय उनसे मिलने वाले विटामिन का कैप्सूल ही खा लिया जाए? अब यह तो धीरे-धीरे समझ आएगा कि बहुत महीन उम्मीदों और जरूरतों के साथ तालमेल बिठाने वाले ऐसे जोड़ीदार तलाशने का कम्प्यूटरी-दिमाग समाज की अब तक चली आ रही व्यवस्था को किस तरह तोड़मोड़ कर रख देगा? इंसान ने जब कम्प्यूटर बनाए थे उसने अपने हिस्से का कुछ काम उन पर डाला था। आज कारोबारियों में उन कम्प्यूटरों में ऐसा आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस डाल दिया है कि अब वे इंसान के दिल के हिस्से वाला काम भी करने का दावा कर रहे हैं! (Daily Chhattisgarh)

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 26 फरवरी : फोन और इंटरनेट से दुनिया के गरीबों की जिंदगी तब्दील

संपादकीय
26 फरवरी 2018


आज हिन्दुस्तान के किसी भी गांव-कस्बे से गुजरें, तो कुछ बरस पहले वहां जितने चाय-पानठेले हुआ करते थे, अब उससे कई गुना अधिक मोबाइल-फोन दुकानें हो गई हैं। इनमें से कुछ दुकानें फोन बेचती हैं, कुछ केवल सिमकार्ड-रीचार्ज करने का काम करती हैं, कुछ दुकानें फोन सुधारती हैं, और कुछ इनमें से तमाम काम करती हैं। इनकी गिनती को गांव-शहर में देखा जाए तो लगता है कि आज कारोबारी और कारीगरी के रोजगार का एक बहुत बड़ा जरिया यह बन गया है। दूसरी तरफ जिन लोगों के हाथों में फोन आ गया है, उनकी जिंदगी और उनके रोजगार पर क्या फर्क पड़ा है यह उन्हें बारीकी से देखने पर ही समझ आ सकता है। सबसे कम मजदूरी वाले मजदूर भी अब घर बैठे काम पर बुला लिए जाते हैं, एक दिन का काम पूरा होता नहीं है, और वे दूसरे दिन का काम तय कर पाते हैं। कारीगर काम पा रहे हैं, छोटे कारोबारी घरों तक सामान पहुंचा रहे हैं, और अभी 30-40 बरस पहले तक हिन्दुस्तान में टेलीफोन संपन्नता का एक सुबूत होता था, आज बेरोजगारों के हाथ में भी फोन है, सड़कों को साफ करती महिलाएं भी अपने फोन पर संगीत सुनते हुए काम करते दिखती हैं। 
इस बात पर चर्चा इसलिए जरूरी है कि छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में अगले आधे बरस के भीतर ही राज्य सरकार करीब एक चौथाई आबादी के हाथ में स्मार्टफोन थमाने जा रही है। इसमें गरीब लोग, कॉलेज के छात्र-छात्राएं होंगे, और अगर एक परिवार में चार बड़े लोग हैं, तो उन चारों को सरकार से फोन मिलने जा रहा है। दुनिया की आर्थिक समझ रखने वाले लोगों का यह नतीजा निकाला हुआ है कि किसी इलाके में आबादी के अनुपात में जैसे-जैसे फोन बढ़ते चलते हैं, वैसे-वैसे वहां का आर्थिक विकास भी बढ़ते चलता है। अभी हम आंकड़ों पर बहुत ज्यादा जाना नहीं चाहते, लेकिन अगर छत्तीसगढ़ में सरकार 55 लाख लोगों को स्मार्टफोन थमाने जा रही है, इनमें से हर किसी की जिंदगी पर कुछ न कुछ असर पड़ेगा। परिवार का काम निपटेगा, और रोजगार या कारोबार में बढ़ोत्तरी-तरक्की होगी, अब तक जो बिना फोन के हैं, वे अपने घर या रोजगार की जगह से फोन से जुड़ जाएंगे। 
अमरीकी कारोबारी अखबार द वॉल स्ट्रीट जर्नल ने आज ही एक रिपोर्ट छापी है कि किस तरह इंटरनेट दुनिया के सबसे गरीब लोगों की जिंदगी को बदल रहा है। फोन और इंटरनेट से होने वाले फायदों को हिन्दुस्तान में भी देखा गया है कि किस तरह आन्ध्र में जब मछुआरे मछली मारकर किनारे लौटते होते हैं, तो समंदर की लहरों पर से ही वे मछली बाजार के व्यापारी से सौदा कर लेते हैं, और टोकरे उठाकर उन्हें व्यापारियों के पास घूमना नहीं पड़ता। छत्तीसगढ़ में सरकार ने स्मार्टफोन बांटना तो तय कर लिया है, लेकिन फोन और इंटरनेट से सबसे गरीब लोगों की जिंदगी में किस तरह का वैल्यू-एडिशन हो सकता है, इसके लिए भी सरकार को योजना बनानी चाहिए। यह हो सकता है कि रमन सरकार का मौजूदा कार्यकाल ऐसी लंबी योजना पर अमल करने के लिए छोटा हो, लेकिन दीर्घकालीन फायदे की योजनाओं के लिए सरकारों को अपने कार्यकाल से परे की भी निरंतरता जारी रखनी चाहिए। छत्तीसगढ़ में लोगों की क्षमताओं के इस्तेमाल की भारी संभावना बाकी है, और सरकार को इसके लिए जनता से जुड़े हुए लोगों को शामिल करके योजना बनानी चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 26 फरवरी

सहवाग में बल्ले का हुनर, लेकिन बाकी समझ में वे जीरो पर आऊट...

संपादकीय
25 फरवरी 2018


दुनिया में लोग ज्ञान, हुनर, प्रतिभा, और समझ, इन सबमें बड़ा घालमेल कर बैठते हैं। किसी प्रतिभाशाली को लोग ज्ञानी मान बैठते हैं, जबकि हो सकता है कि उसकी तमाम खूबी किसी एक दायरे में हो, और बाकी दायरों में उसकी समझ शून्य हो। इसी तरह किसी एक दायरे के हुनर वाले इंसान को लोग बड़ा समझदार मान बैठें, और यह समझ दूसरे दायरों पर भी लागू मान बैठें। दुनिया में बहुत से ऐसे अच्छे लोग हुए हैं जिनकी समझ किसी एक मामले में बहुत अच्छी रही, लेकिन दूसरे मामलों में उनका ज्ञान तो रहा, लेकिन समझ नहीं रही। अब इस थोड़ी सी मुश्किल लगती बात को आसान तरीके से समझने की कोशिश करें तो कुछ मिसालों को देखना होगा। 
कल भारत के एक क्रिकेट सितारे वीरेन्द्र सहवाग ने एक ऐसा ट्वीट किया जिसे लेकर चारों तरफ से समझदार लोगों ने उन्हें उनकी नासमझी समझा दी। केरल में एक आदिवासी युवक ने पेट भरने के लिए खाने का कुछ सामान एक दूकान से चुराया, गांव के लोगों ने उसे पकड़ा और भीड़ ने मार-मारकर उसकी हत्या कर दी। वह न सिर्फ गरीब था, बल्कि उसका मानसिक संतुलन भी बिगड़ा हुआ था। और जो तस्वीरें सामने आई हैं, उनके मुताबिक मारने वाले लोगों ने उसकी हत्या करते हुए उसके साथ सेल्फी भी लीं। इस पर वीरेन्द्र सहवाग ने एक ट्वीट कर लिखा कि यह सभ्य समाज के लिए एक कलंक है। आदिवासी को मारने वाले लोगों में उन्होंने तीन आरोपियों के नाम लिखे जो कि तीनों ही मुस्लिम थे। जबकि उस मामले में जो सोलह लोग अभी तक गिरफ्तार हुए हैं उनमें हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, इन सभी धर्मों के लोग हैं। हजारों लोगों ने सहवाग को इस बात के लिए कोसा कि उन्होंने इस मामले को साम्प्रदायिक बना दिया, यह लिखकर एक आदिवासी को तीन मुस्लिमों ने मारा। भारी आलोचना के बाद अब सहवाग ने बाकी नामों को छोड़कर इन्हीं तीन नामों को पोस्ट करने के लिए माफी मांगी है और लिखा है कि उनका कोई साम्प्रदायिक नजरिया नहीं था, बाकी नाम उनसे चूक गए।
सहवाग को याद दिलाते हुए देश के एक विख्यात समकालीन इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने लिखा कि सहवाग के अपने राज्य हरियाणा में जिस तरह की हिंसा होती है, उस पर उनका मुंह नहीं खुलता, और इस मामले को उन्होंने साम्प्रदायिक रंग दिया है। दरअसल सहवाग ऐसा करने वाले अकेले खिलाड़ी नहीं है, कई और खिलाड़ी, कई और गायक, अभिनेता, और लेखक ऐसा करते हैं जो कि किसी जटिल मुद्दे के तमाम पहलुओं को समझे बिना उसके एक छोटे हिस्से को ही समझते हुए उस पर लिखते हैं, और उनकी शोहरत की वजह से उन्हें चाहने वाले या उनके फॉलोअर उनकी बात को गंभीरता से ले लेते हैं, अपनी सोच को प्रभावित कर बैठते हैं।
भारत के मध्यम वर्ग के सबसे पसंदीदा राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम की कही एक लाईन को चारों तरफ लिखा जाता है जिसमें उन्होंने कहा था कि ब्लैक रंग भावनात्मक रूप से बुरा होता है, लेकिन हर ब्लैकबोर्ड छात्रों की जिंदगी को रौशन करता है। अब दक्षिण भारतीय होने के नाते डॉ. कलाम खुद भी काले थे, लेकिन काले रंग के साथ जुड़ी हुई नकारात्मक धारणाओं के पीछे की सामाजिक-वजहों को वे न समझ पाए, और न ही वैसी धारणाओं का विरोध कर पाए। उन्होंने काले रंग के प्रति समाज की नकारात्मक सोच को महज शब्दों के खेल में इस्तेमाल किया, न कि काले रंग के साथ भेदभाव का कोई विरोध किया। अब विज्ञान और टेक्नॉलॉजी में उनका योगदान देखते हुए, उनकी ईमानदार और सादी जिंदगी को देखते हुए, गीता में दिलचस्पी रखने वाले, वीणा बजाने वाले एक मुस्लिम होने को भी ध्यान में रखते हुए एनडीए सरकार ने उन्हें राष्ट्रपति बनाया था। लेकिन रंगभेद की उनकी समझ कमजोर थी, रंगभेद का विरोध उनकी समझ से परे का था, और इसलिए काले रंग को लेकर वे महज शब्दों में उलझ गए, और उनके व्यक्तित्व की बाकी बातों की वजह से उनकी कही यह बात बड़ी इज्जत के साथ चल निकली। 
लोगों का ज्ञान बहुत हो सकता है, लेकिन हो सकता है कि उनकी समझ उनके ज्ञान के टक्कर की न हो। अभी कुछ समय पहले एक शहर में चौड़ी होती सड़क के बीच में पहुंच गए एक बहुत पुराने पेड़ को काटा गया, बहुत से ज्ञानी इससे विचलित हो गए। उन्हें पेड़ का इतिहास याद आया, और यह तो विज्ञान ने साबित किया ही है कि पेड़ से ऑक्सीजन मिलती है। लेकिन उन्होंने समझ का इस्तेमाल कुछ कम किया, और महज ज्ञान को अपने फैसले को प्रभावित करने दिया। ज्ञान ने पेड़ से मिलने वाली ऑक्सीजन तो दिखा दी, लेकिन समझ अगर इस्तेमाल की जाती, तो यह दिखाई पड़ता कि ऐसे पेड़ की वजह से सड़क संकरी होने से होने वाले टै्रफिक जाम में फंसी गाडिय़ां कितना काला धुआं उगलती हैं, और हजार पेड़ मिलकर भी उतनी ऑक्सीजन नहीं दे पाते। इसलिए यह समझ की जरूरत है कि ज्ञान तो आधी जानकारी से भी मिल सकता है, लेकिन उस ज्ञान का कोई मतलब पूरी समझ होने से ही निकाला जा सकता है। ज्ञान तो जापान पर गिराए गए हाईड्रोजन बम को बनाने में, उड़ाकर ले जाने में, और गिराने में, इन सभी में खूब इस्तेमाल हुआ था, लेकिन दसियों लाख इंसानों पर ऐसा बम गिराते हुए समझ का इस्तेमाल नहीं हुआ था। इसलिए समझ के बिना ज्ञान, हुनर, प्रतिभा, या क्षमता, इन सबका कोई खास इस्तेमाल नहीं रह जाता। जिसका हुनर बल्ला चलाने में है, और जिसकी प्रतिभा उसी जगह सीमित है, वह जब बिना समझ के जुबान चलाने लगे, या कि की-बोर्ड पर उंगलियां चलाने लगे, तो वह जानलेवा खतरनाक हो सकता है। एक अच्छा बल्लेबाज एक गैरसाम्प्रदायिक हिंसा को साम्प्रदायिक साबित करते हुए करोड़ों लोगों तक पहुंचा सकता है, पहुंचा चुका है। बाकी लोगों को ऐसी चूक से बचना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 25 फरवरी

दीवारों पर लिक्खा है, 24 फरवरी

तमिलनाडू में महिलाओं के बदन सुडौल बनाने सरकारी सर्जरी!

संपादकीय
24 फरवरी 2018


तमिलनाडू सरकार का यह फैसला सामने आया है कि वह महिलाओं को दुपहिया खरीदने पर सरकारी सब्सिडी देगी। यह योजना आज से ही प्रधानमंत्री के हाथों शुरू करवाई जा रही है। लेकिन राज्य के स्वास्थ्य मंत्री की एक दूसरी घोषणा भी सामने आई है कि राज्य की जो भी महिलाएं अपने वक्ष का आकार सुडौल करवाने के लिए सर्जरी करवाना चाहती हैं, उनका खर्च राज्य सरकार उठाएगी। इसके पीछे सरकार ने तर्क यह दिया है कि बहुत सी महिलाएं और लड़कियां कामकाज की जगह पर या शादीशुदा जिंदगी में भी अपने शरीर के आकार को लेकर हीनभावना की शिकार रहती हैं, और उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए अगर उन्हें ऐसा जरूरी लगता है तो केवल खूबसूरती के लिए भी सरकार उनके ऑपरेशन का खर्च उठाएगी। इस बात पर चिकित्सा से जुड़े हुए कुछ लोगों का यह कहना है कि सरकार को ऐसे कॉस्मेटिक ऑपरेशनों के बजाय जीवन रक्षक ऑपरेशनों पर खर्च करना चाहिए। 
तमिलनाडू में यह पुरानी राजनीतिक परंपरा रही है कि सरकार गरीबों को अनगिनत रियायतें और तरह-तरह के तोहफे बांटकर सत्ता पर एक ही पार्टी को जारी रखने की कोशिश करती है। जयललिता ने इस सरकारी रूख को आसमान पर पहुंचा दिया था, और अम्मा कैंटीन, अम्मा मेडिकल स्टोर्स, अम्मा पानी जैसी अनगिनत योजनाएं लागू की थीं। अभी भी जयललिता की पार्टी का ही तमिलनाडू पर राज है, और रियायतें बढ़ते-बढ़ते महिलाओं के बदन तक पहुंच गई हैं, और सरकार की इस घोषणा से कई किस्म की निजी और सामाजिक दिक्कतें भी आने वाली हैं। इससे करोड़ों लड़कियों और महिलाओं में अपने खुद के बदन को लेकर एक हीनभावना विकसित होगी कि उनका बदन तस्वीरों की तरह किसी एक खास सुडौल आकार का होना चाहिए। यह बात प्रकृति के खिलाफ है क्योंकि कुदरत ने हर किसी का बदन अलग-अलग बनाया है, और बाजार ने बदन को एक खास शक्ल में ढालने का काम किया है ताकि उस आकार के हिसाब से अपने सामान बेचे, और ऑपरेशनों से बदन को ढालने का कारोबार चले। फिल्म और फैशन उद्योग ने सुंदरता के पैमाने तय किए हैं जो कि आम लोगों के किसी भी काम के नहीं हैं। इसलिए सरकार का यह फैसला निहायत फिजूल फैसला है, और शायद दुनिया के सबसे संपन्न देशों में भी सरकार इस किस्म के सौंदर्य-ऑपरेशनों पर जनता का खर्च नहीं करती। 
यह याद रखने की जरूरत है कि यह वही तमिलनाडू और वही चेन्नई हैं जहां पर गरीबी से निपटने के लिए अपनी किडनी बेचने वालों की पूरी कॉलोनी ही बनी हुई है। जनता बहुत गरीब है, उसके पास बीमारी का इलाज कराने, अपना घर चलाने का एक बड़ा मोर्चा लगातार जारी रहता है। ऐसे में एक निहायत ही फिजूल की सर्जरी पर बड़ा मोटा पैसा खर्च करने का यह सरकारी फैसला पूरी तरह से बेवकूफी का है, और यह बाजार की सोच को बढ़ावा देने वाला है। अगर इस राज्य की सरकार की संपन्नता उसके खजाने के बाहर भी उफन रही है तो उसे अपनी लड़कियों और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का काम करना चाहिए, उनकी पढ़ाई और आगे बढ़ाने का काम करना चाहिए, उनके व्यक्तित्व विकास का काम करना चाहिए, उनका हुनर अंतरराष्ट्रीय स्तर का करना चाहिए। जहां सरकार को स्तर उठाने की जरूरत है, वहां वह जनता के पैसों पर इस तरह बदन को उठाने पर खर्च करने की बेवकूफी कर रही है। 
हमारा ख्याल है कि किसी को अदालत जाने की जरूरत है कि जनता के पैसों की इतनी बड़ी ऐसी दानवाकार और ऐसी विकराल बर्बादी रोकी जाए। कोई अदालत ही इस राज्य सरकार से यह पूछ सकती है कि उसके राज्य में क्या और किसी बीमारी से इलाज की जरूरत बच ही नहीं गई है? क्या उसके राज्य में लड़कियों और महिलाओं को और किसी किस्म की कोई मानसिक चुनौतियां बची ही नहीं हैं? यह सिलसिला बहुत ही खराब है, और हमारा ख्याल है कि देश के महिला संगठनों को भी ऐसी बाजारू सोच का विरोध करना चाहिए जिसमें एक महिला के बदन को फिल्मों और पोर्नों की सोच के मुताबिक किसी आकार में ढालने को सरकार बढ़ावा देने जा रही है, उस पर गरीब जनता के पैसे खर्च करने जा रही है। यह मामला अदालती दखल के लिए एकदम फिट है, और उसके बिना इस बेवकूफी को रोकना मुश्किल होगा। (Daily Chhattisgarh)

कुछ करने के पहले याद रखें, ऊपरवाला सब देख रहा है..

संपादकीय
23 फरवरी 2018


दिल्ली में इस वक्त मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के निवास पर पुलिस कार्रवाई चल रही है, और पुलिस वहां से सीसीटीवी कैमरे और उनकी रिकॉर्डिंग लेकर जा रही है क्योंकि राज्य के मुख्य सचिव ने यह रिपोर्ट लिखाई है कि मुख्यमंत्री निवास पर हुई बैठक में आधी रात उन पर सत्तारूढ़ विधायकों ने हमला किया, और उन्हें पीटा। पुलिस ने आज की इस जब्ती के बाद मीडिया से कहा है कि मुख्य सचिव की शिकायत के बाद मुख्यमंत्री निवास से यह रिकॉर्डिंग मांगी गई थी, लेकिन कोई जवाब न मिलने पर पुलिस ने आज सुबूत जुटाने के लिए यह कार्रवाई की। यहां यह जिक्र जरूरी है कि दिल्ली की पुलिस राज्य के मातहत नहीं होती, और वह केन्द्र सरकार के नियंत्रण में काम करती है, वरना किसी राज्य की पुलिस अपने ही मुख्यमंत्री के खिलाफ शायद किसी भी हालत में ऐसी कार्रवाई न करती। 
दिल्ली के मुख्य सचिव की शिकायत सामने आने के बाद राज्य की सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी ने इन आरोपों का खंडन किया था, और कहा था कि जनहित के मुद्दों पर विधायक महज बात करना चाहते थे, और मुख्य सचिव अपने को लेफ्टिनेंट गवर्नर के प्रति ही जवाबदेह बताते हुए वहां से जा रहे थे, उसी वक्त बहस हुई थी। पार्टी ने किसी मारपीट से इंकार किया है। और अब जब रिकॉर्डिंग जब्त की जा चुकी है, तो उम्मीद की जानी चाहिए कि इन दोनों पक्षों में से जिसकी बात झूठ होगी, उसके खिलाफ कार्रवाई होगी। जांच के नतीजे सामने आने के पहले किसी एक को कुसूरवार मानना ठीक इसलिए नहीं होगा कि अब तक सारी शिकायत दो पक्षों के एक-दूसरे के खिलाफ बयान तक सीमित है, और मुख्य सचिव की अगले दिन की गई शिकायत को लोग कुछ अटपटा भी मान रहे हैं कि अगर आधी रात उनसे मारपीट हुई थी, तो उन्होंने इसके बारे में कोई भी कार्रवाई अगले दिन क्यों की? 
खैर, हम इस मामले की सच्चाई को लेकर अटकल लगाए बिना एक दूसरे पहलू पर लिखना चाहते हैं। आज का वक्त मोबाइल फोन के कैमरों की रिकॉर्डिंग से लेकर सीसीटीवी कैमरों की रिकॉर्डिंग तक बहुत से सुबूत जुटाने का है। टेक्नालॉजी ने हर किसी के लिए यह आसान कर दिया है कि वे कई तरह के सुबूत खुद रिकॉर्ड कर लें,अ और सार्वजनिक या महत्वपूर्ण जगहों पर अब बिना कोशिश के वहां के कैमरे सब कुछ रिकॉर्ड करते चलते हैं। ऐसे में अब देश के सभी लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि अपनी हरकतों को ठीक रखना ही एक तरीका है जिससे वे महफूज रह सकते हैं। फोन पर किसी से बात करना, किसी जगह रूबरू बात करना, फोन पर संदेश भेजना, सोशल मीडिया में कुछ पोस्ट करना, सब कुछ आत्मघाती हो सकता है, अगर उसमें कोई बात गैरकानूनी है, या कि अनैतिक है। अब समय लोगों के भरोसे का नहीं रह गया है। अगर दिल्ली के मुख्य सचिव की शिकायत सही है, तो भला किसने यह सोचा था कि मुख्यमंत्री के सामने उसके विधायक राज्य के मुख्य सचिव को पीट सकते हैं? और अगर यह शिकायत झूठी है, तो भला किसने यह सोचा था कि किसी मुख्यमंत्री के खिलाफ उसका मुख्य सचिव इस तरह की झूठी तोहमत लगा सकता है? और अब बात महज गवाही, और सुबूत पर जाकर टिक गई है। इसलिए ऐसी नौबत को ध्यान में रखते हुए लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि ऊपरवाला सब देखता है, और यह ऊपरवाला कोई ईश्वर नहीं है, सीसीटीवी कैमरा है। 
आज न सिर्फ हिन्दुस्तान में, बल्कि बाकी दुनिया में भी हर कहीं बड़े-बड़े जुर्म ऐसी रिकॉर्डिंग से पकड़ में आ रहे हैं, और मुजरिमों को सजा हो रही है। अब पुलिस और दूसरी जांच एजेंसियों को सुबूत अधिक आसानी से जुट जाते हैं, और वे अदालत में महज गवाहों के मुकाबले अधिक मजबूती से खड़े भी रहते हैं। ऐसे में यह मामला बड़ा दिलचस्प होगा जिसमें दिल्ली के दो सबसे ताकतवर लोगों में से कोई एक झूठा साबित होने जा रहा है, और कोई एक सजा पाने जा रहा है। हम अपने किसी अंदाज के बिना दिलचस्पी के साथ इस बहुत ही कड़वी और अटपटी वारदात के नतीजे के इंतजार कर रहे हैं। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 फरवरी

फौजी अफसरों के बयान अब साम्प्रदायिक और राजनीतिक भी

संपादकीय
22 फरवरी 2018


भारतीय थलसेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत एक बार फिर अपने एक बयान को लेकर सुर्खियों और विवाद में हैं। उन्होंने असम के एक राजनीतिक संगठन एआईयूडीएफ का नाम लेकर कहा कि यह संगठन तेजी से आगे बढ़ रहा है, और जनसंघ के दिनों से लेकर आज तक भाजपा जिस रफ्तार से आगे बढ़ी है, उसके मुकाबले ऑल इंडिया यूनाईटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट नाम का यह संगठन आगे बढ़ा है। असम में यह संगठन मुस्लिमों की आवाज उठाता है। और जनरल रावत ने यह पूरी चर्चा इस संदर्भ में की कि पड़ोसी देशों से जिस तरह कश्मीर में अशांति फैलाने के लिए आतंकी भेजे जाते हैं, उसी तरह उत्तर भारत में अशांति फैलाने के लिए अवैध आबादी को भारत में भेजा जाता है। उनके इस बयान के बाद भारत की सबसे बड़ी मुस्लिम पार्टी एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने कड़ी आलोचना करते हुए कहा है कि सेना प्रमुख को राजनीतिक मामलों में दखल नहीं देना चाहिए, उनका काम किसी राजनीतिक पार्टी पर कमेंट करना नहीं है, लोकतंत्र और संविधान में सेना हमेशा जनता द्वारा निर्वाचित सरकार के तहत काम करती है। 
यह पहला मौका नहीं है जब एक बड़े फौजी अफसर ने राजनीतिक या विदेश नीति से जुड़े बयान दिए हैं। बल्कि कुछ दिनों पहले कश्मीर में आतंकी हमलावरों के हमले से शहीद होने वाले हिन्दुस्तानी सैनिकों में बड़ी संख्या में मुस्लिम सैनिक थे, और जब ओवैसी ने उनकी शहादत की चर्चा करते हुए कहा था कि भारत में मुस्लिमों के देशप्रेम को शक की नजर से देखा जाता है, और वे इस तरह देश के लिए शहादत देते हैं। इस पर थलसेना के एक दूसरे अफसर ने तुरंत ओवैसी के बयान पर प्रतिक्रिया जाहिर की थी कि सेना साम्प्रदायिक नजरिए से चीजों को नहीं देखती है, और जो लोग सेना के कामकाज, तौर-तरीकों को नहीं जानते हैं, वे ही ऐसी बातें कह सकते हैं। ओवैसी का यह बयान बड़ा साफ था, और वह किसी भी तरह से साम्प्रदायिक नहीं था। वह बयान भाजपा के और हिन्दू संगठनों के कुछ नेताओं के कुछ दिन पहले के ही बयानों को लेकर था जिसमें यह कहा गया था कि मुस्लिमों के लिए पाकिस्तान बनाया गया था, और उन्हें भारत छोड़कर पाकिस्तान या बांग्लादेश चले जाना चाहिए। इस घोर साम्प्रदायिक बयान के जवाब में जब ओवैसी ने हिन्दुस्तान के लिए मुस्लिमों की शहादत की चर्चा की, तो उसका जवाब एक फौजी अफसर की तरफ से आना केन्द्र सरकार की बहुत ही बड़ी चूक थी। केन्द्र सरकार कभी पाकिस्तान को कोई संदेश देने के लिए भारत के थलसेना या वायुसेना प्रमुख से विदेश नीति और फौजी तैयारियों के बयान दिलवा रही है, और अब तो देश के भीतर के धार्मिक, साम्प्रदायिक, और राजनीतिक मामलों पर ये अफसर खुलकर बोलने लगे हैं। 
भारतीय लोकतंत्र को जो लोग गहराई से नहीं समझते हैं, वे ही ऐसी चूक कर सकते हैं, या ऐसा गलत काम कर सकते हैं। यह सिलसिला बहुत खतरनाक है, और किसी भी मजबूत लोकतंत्र को अपनी फौज को बैरकों में ही रखना चाहिए, और सरहद पर भी इन फौजों को केवल सरकार के हुक्म और फैसले से जाना चाहिए, न कि अपनी मर्जी से। इसके साथ-साथ पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देश के साथ एक नाजुक फौजी संबंध के चलते हुए इस रिश्ते को लेकर कोई बयान फौजी अफसरों की तरफ से नहीं आना चाहिए। आज देश का माहौल ऐसा लग रहा है, कि वर्दीधारी फौजी अफसर भी देशप्रेम और राष्ट्रप्रेम के नाम पर सरकार और सत्तारूढ़ दल की तरफ से बयानबाजी कर सकते हैं, या कि देश की बहुसंख्यक हिन्दू आबादी के नजरिए से बयान दे सकते हैं। यह पूरा सिलसिला बहुत ही गलत, और बहुत ही खराब है। भाजपा या दूसरी राजनीतिक पार्टियों के पास लोकतांत्रिक या अलोकतांत्रिक तरीके से बयानबाजी करने के लिए बहुत से लोग मौजूद हैं, और उनका काम किसी फौजी अफसर से करवाना, या कि उन्हें करने देना लोकतंत्र के लिए बड़ी घातक नौबत है। आज देश में राष्ट्रवाद के नाम पर जिस तरह का उन्माद बढ़ाया जा रहा है, उसमें फौजी अफसरों की ऐसी बातों को उनकी फौजी जिम्मेदारियों का ही एक विस्तार मान लिया जाएगा, और यह देश की जनता में लोकतांत्रिक प्रशिक्षण की कमी का सुबूत भी है। हमाराख्याल है कि देश की भलाई के लिए, लोकतंत्र की भलाई के लिए फिक्रमंद लोगों को ऐसी गैरजरूरी और नाजायज बयानबाजी का खुलकर विरोध करना चाहिए ताकि आम जनता को यह समझ पड़ सके कि यह गलत है। लोकतंत्र में अलग-अलग किस्म की जिम्मेदारियों के अधिकार और किरदार दोनों बंटे हुए हैं। न तो राजनीतिक लोगों को सरहद पर जाकर गैरफौजियों के लिए जंग के फतवे देने चाहिए, और न ही फौजी लोगों को राजनीतिक या साम्प्रदायिक बातें करनी चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 22 फरवरी

फिल्म के गाने के खिलाफ देश भर में कानूनी मुहिम

संपादकीय
21 फरवरी 2018


केरल की एक मलयालम फिल्म के कुछ सेकेंड के एक सीन से दुनिया भर में छा गई एक अभिनेत्री प्रिया प्रकाश और फिल्म के खिलाफ भारत में जगह-जगह मुस्लिम समाज के कुछ लोगों ने रिपोर्ट लिखाना शुरू किया कि इस गाने में मोहम्मद पैगंबर का अपमान हुआ है। ऐसी रिपोर्ट देश भर में बिखरे हुए इतनी अलग-अलग जगहों पर की गई कि इन लोगों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई कि अलग-अलग राज्यों की ऐसी रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट भी एक साथ सुने। इस पर अदालत ने राज्य सरकारों को आदेश दिया है कि फिल्म में यह गाना गाते हुए दिखने वाली इस अभिनेत्री और फिल्म के निर्देशक के खिलाफ अब इसे लेकर और कहीं एफआईआर दर्ज न की जाए। फिल्म के डायरेक्टर का कहना है कि केरल का मुस्लिम समुदाय 40 बरस से इस गाने को गाते आ रहा है, और यह शादी के जलसों में गाया जाने वाला एक बेहद आम गाना है, इसमें आपत्तिजनक कुछ भी नहीं है। लोगों को याद होगा कि अभी-अभी इस फिल्म के गाने में यह अभिनेत्री एक स्कूली छात्रा के किरदार में आंख मारते दिखती है, और कुछ सेकेंड का वह हिस्सा दुनिया भर में सबसे तेजी से मशहूर होने वाला वीडियो क्लिप बन चुका है। ऐसी चर्चा में आने के बाद इस तरह की फिल्मों खिलाफ अदालत तक दौड़ लगाने की कई वजहें हो सकती हैं, इनमें से एक वजह यह हो सकती है कि ऐसी पिटीशन लगाकर लोग खुद खबरों में आना चाहते हैं, एक दूसरी वजह यह हो सकती है कि फिल्म के निर्माता ही फिल्म को खबरों में बनाए रखने के लिए किसी से ऐसी पिटीशन लगवाएं, लेकिन इनके अलावा और भी वजहें हो सकती हैं। 
सुप्रीम कोर्ट ने आज ही पीएनबी घोटाले को लेकर दायर की गई एक पब्लिक इंटरेस्ट पिटीशन को देखकर कहा है कि यह पब्लिक इंटरेस्ट नहीं, पब्लिसिटी इंटरेस्ट पिटीशन दिख रही है। अदालत के इस रूख के अलग-अलग कम से कम दो किस्म के असर हो सकते हैं। पहला तो यह कि जनहित याचिका लेकर लोग अदालत तक कम जाएं, और जनहित के मुद्दे ऐसे में छूट भी सकते हैं। दूसरा असर यह हो सकता है कि जो लोग किसी बदनीयत को पीआईएल की खाल पहनाकर अदालत का वक्त खराब करते हैं, वैसे लोगों का हौसला पस्त भी हो सकता है। इस मलयालम फिल्म को लेकर दो बातें सामने आती हैं। एक तो यह कि कोई मासूम सी हरकत किस तरह लोगों को छू सकती है, मशहूर हो सकती है। और दूसरी बात यह कि लोगों का बर्दाश्त कितना कम हो चला है कि मोहम्मद पैगंबर के लिए जो गाना दशकों से गाया जा रहा है, वह आज लोगों को अपमानजनक लगने लगा है, या लोग कम से कम ऐसा कह रहे हैं। जब देश भर में अलग-अलग जगह सैकड़ों या हजारों अदालतों में किसी मुद्दे को लेकर रिपोर्ट लिखाई जा सकती है, तो ऐसे में उसके खिलाफ किसी तरह की राहत महज सुप्रीम कोर्ट से ही मिल सकती है। फिल्म उद्योग से जुड़े हुए संपन्न लोग तो ऐसी दौड़ लगा सकते हैं, लेकिन अगर यह सोचें कि किसी छोटे अखबार या किसी छोटे लेखक के खिलाफ इसी तरह का अभियान धर्मान्धता या साम्प्रदायिकता के तहत छेड़ दिया जाए, तो वैसे लोग तो सुप्रीम कोर्ट तक दौड़ लगाने की ताकत भी नहीं रखते जहां आने-जाने का खर्च ही बहुत होता है, और वकीलों की फीस भी भारी-भरकम होती है। इसलिए लोकतंत्र में ऐसी मुकदमेबाजी के मुकाबले बेहतर नौबत तो यह रहती कि लोग कुछ तो अपना बर्दाश्त बढ़ाते, और कुछ ऐसा सामाजिक रास्ता भी निकलता जो कि मुकदमेबाजी से नीचे लोगों के टकराव को सुलझा सके। लोकतंत्र में जहां हर किसी को अदालत तक दौड़ लगाने की आजादी है, वहां पर हमारी यह बात कागजी अधिक लगेगी, लेकिन जिंदगी और दुनिया को बेहतर बनाने वाली हर सूझबूझ शुरूआत में कागजी ही लगती है, शायद कागजी ही रहती है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 21 फरवरी

दिल्ली सीएम की बैठक में सीएस पर हमला?

संपादकीय
20 फरवरी 2018


दिल्ली सरकार में वैसे तो अरविन्द केजरीवाल के मुख्यमंत्री बनने से लेकर अब तक लगातार केंद्र सरकार और एक विशेष दर्जे के इस राज्य में अधिक अधिकारों से संपन्न लेफ्टिनेंट गवर्नर के साथ उनका टकराव चलते आ रहा है, लेकिन कल रात जो हुआ वह आजाद हिंदुस्तान के इतिहास में शायद पहली बार हुआ है। मुख्य सचिव के आरोप के मुताबिक मुख्यमंत्री के घर रात में एक बैठक में उनकी पार्टी के विधायकों ने उनसे न सिर्फ बदसलूकी की, बल्कि उनसे हाथापाई भी की। यह आरोप लगाते हुए राज्य के तमाम आईएएस अफसर हड़ताल पर चले गए, और आम आदमी पार्टी ने इस आरोप को गलत बताया है कि उसके विधायकों ने मुख्य सचिव पर कोई हमला किया। अब इस तनातनी के बीच यह बात उठ रही है कि मुख्यमंत्री-निवास पर लगे सीसीटीवी कैमरों की रिकॉर्डिंग की जांच की जाए। मुख्यमंत्री निवास की रिकॉर्डिंग जारी की गई है जिसमें मुख्य सचिव इत्मीनान से निकलकर जाते दिख रहे हैं। इस एक घटना को लेकर दोनों पक्षों के अलग-अलग बयान हैं, जिनकी हकीकत अधिक जांच से साबित हो सकेगी, लेकिन एक दूसरा मुद्दा जो सामने है वह यह कि मुख्यमंत्री, मंत्री, या विधायकों के सवालों का जवाब देने से मुख्य सचिव ने मना कर दिया था, और कहा था कि वे केवल लेफ्टिनेंट जनरल के प्रति जवाबदेह हैं, और उन्हें ही रिपोर्ट करेंगे। ऐसा कहा जा रहा है कि इसके बाद वे बैठक से उठकर जाने लगे और सत्तारूढ़ विधायक उन्हें रोकने लगे, तो जो स्थिति बनी उसे मुख्य सचिव ने हाथापाई बताया और उसकी रिपोर्ट की।
दिल्ली सरकार का बुनियादी ढांचा ऐसा है कि वहां के अधिकतर स्थानीय काम निर्वाचित म्युनिसिपलों के मार्फत होते हैं, वहां की पुलिस केंद्र सरकार के मातहत है, वहां शहरी ढांचे के कई बड़े प्रोजेक्ट केंद्र सरकार के तहत आते हैं, और सुप्रीम कोर्ट तक टकराहट पहुंचने पर भी यही स्थापित हुआ है कि दिल्ली की निर्वाचित सरकार को दूसरे राज्यों की तरह पूरे अधिकार हासिल नहीं हैं। ऐसे में जब केंद्र सरकार और उसके मनोनीत एलजी के साथ राज्य सरकार और उसके मुख्यमंत्री के वैचारिक मतभेद लगातार चलते हों, तो यह एक राज्य की व्यवस्था चलने लायक नौबत नहीं कही जा सकती। यह टकराहट केजरीवाल के मुख्यमंत्री बनने के पहले दिन से चली आ रही है, और इसका कोई भी अंत उसी दिन होते दिखता है जब दिल्ली की पूर्ण राज्य के दर्जे की लंबे समय से चली आ रही मांग पूरी हो। दिक्कत यह है कि जो पार्टी दिल्ली सरकार में रहती है, वह तो यह मांग करती है, लेकिन जब वही पार्टी केंद्र में चली जाती है तो वह दिल्ली पर से अपना काबू छोडऩे के लिए राजी नहीं होती। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। इतने टकराव के साथ कोई राज्य काम नहीं कर सकता, और दिल्ली के खास हालात गिनाते हुए उसके हक केंद्र अपने पास बनाए रखे, उसका भी कोई जायज तर्क नहीं बनता। यह कहना कि देश की राजधानी की पुलिस राज्य के काबू में नहीं छोड़ी जा सकती, ठीक नहीं है। केंद्र और दिल्ली में चाहे जिन पार्टियों की सरकारें रहें, दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलना ही चाहिए, और दिया ही जाना चाहिए। फिलहाल कल रात की घटना को लेकर मुख्य सचिव और आम आदमी पार्टी के बयानों में से सच्चाई किसमें है, इसकी जांच के लिए मुख्यमंत्री निवास पर लगे कैमरों की सारी रिकॉर्डिंग जब्त कर लेनी चाहिए। अगर सच में ऐसा हमला हुआ है, तो वह बहुत शर्मनाक बात है, और इसे लेकर न केवल हमलावर विधायकों की तुरंत गिरफ्तारी होनी चाहिए, बल्कि उनकी विधानसभा की सदस्यता बर्खास्त भी होनी चाहिए। और अगर यह आरोप झूठा है, तो ऐसी ही कार्रवाई आरोप लगाने वाले अफसर या अफसरों के खिलाफ भी की जानी चाहिए। फिलहाल हम इस मामले की सच्चाई पर दूर बैठकर कोई अटकल लगाना नहीं चाहते, और इसकी ईमानदारी से जांच होनी चाहिए। और आगे ऐसी नौबत न आए उसके लिए फिलहाल कड़ी कार्रवाई के साथ-साथ आगे के लिए दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा भी देना चाहिए। यह भी हैरानी की बात है कि आमतौर पर बड़बोले रहने वाले केजरीवाल इतने गंभीर आरोपों के कई घंटे बाद भी चुप्पी साधे हुए हैं, जबकि हालात का तकाजा है कि वे अपने घर की, अपनी बुलाई हुई बैठक पर लगाए गए इतने गंभीर आरोपों पर तुरंत सामने आकर सब कुछ साफ करें। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 20 फरवरी

जनता का कोंच-कोंचकर पांच बरस मजाक उड़ाना!

19 फरवरी  2018

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश की जनता के बीच अच्छे दिन लाने और आने का वायदा करते हुए इस कुर्सी तक पहुंचने का रास्ता साफ किया था। इसके बाद कुछ अरसा गुजरा और उनके एक बड़े सहयोगी ने यह साफ कर दिया कि देश के लोगों की मोदी से उम्मीदें एक जुमले पर टिकी हैं, और यह जायज नहीं है। उन्होंने कहा कि मोदी की वह बात महज एक जुमला थी, हकीकत बदलने का वायदा नहीं। तब से अब तक मोदी के अनगिनत साथी देश के लोगों को अच्छे दिनों से और अधिक दूर ले जाने का काम करने में लगे हुए हैं। और अब सवाल यह उठता है कि पंजाब नेशनल बैंक के इस ताजा घोटाले के बाद अच्छे दिन आए किसके हैं?
रोजगार तो यह भी है, लेकिन क्या ये अच्छे दिन भी हैं?
चुनाव के दौरान बहुत से नारे लगते हैं जिनका हकीकत से अधिक लेना-देना नहीं रहता, लेकिन इन नारों को भुला देना तो ठीक है, लोगों से यह उम्मीद रखना कि वे भी चुनावी वायदों को भूल जाएं, यह भी जायज है क्योंकि हिन्दुस्तानी लोकतंत्र कुछ इसी किस्म का फरेबी-चुनावी लोकतंत्र है। लेकिन लोगों को कोंच-कोंचकर यह एहसास कराना कि वे अच्छे दिनों को भूल जाएं क्योंकि अच्छे दिन महज गिने-चुने पसंदीदा लोगों के लिए आए हैं, आ रहे हैं, और कायम रहेंगे, यह कोंचना कुछ ज्यादती है। लोकतंत्र ऐसी ज्यादती के खिलाफ कोई कानून तो नहीं सुझाता है, लेकिन जनता के मन में ऐसा कोंचना छाप जरूर छोड़ जाता है, और वह छाप आसानी से मिटती नहीं है।
अच्छे दिनों की बात लोग धीरे-धीरे भूलने लगते, अगर खुद नरेन्द्र मोदी खुद होकर यह नहीं कहते कि पकौड़ा बेचना भी एक रोजगार है। इस बात में गलत कुछ भी नहीं है कि यह न सिर्फ एक रोजगार है, बल्कि एक मुनाफे का रोजगार भी है, और इसमें किसी पशु-पक्षी की जिंदगी भी नहीं ली जाती, शराब या तम्बाखू जैसा कोई नुकसानदेह सामान भी नहीं बेचा जाता, और लोगों को खाने को कुछ अच्छा बेचकर भी अपने घर-परिवार के लिए खाना जुटाया जा सकता है। लेकिन मोदी के राजपथ और उनके जनपथ के किनारे बैठकर अच्छे दिनों के आने की राह तकते थके हुए लोगों के लिए यह बात कुछ चुभने वाली थी, और लोग इससे आहत हुए।
पकौड़ा बेचना एक रोजगार तो है, लेकिन रोजगार तो देश में बहुत किस्म के हैं।  नाली और गटर साफ करते हुए उसके भीतर तकरीबन हर कुछ दिनों में दम तोडऩे वाले लोगों का रोजगार भी रोजगार है, और ऐसे सफाईकर्मी उन्हीं नाली और गटर के भीतर से मानो अपने घर-परिवार के लिए रोटी निकालकर लाते हैं। अब कल के दिन कोई कहे कि नाली साफ करना भी रोजगार है, तो उसमें जाहिर तौर पर तो कुछ गलत नहीं है, लेकिन अच्छे दिनों के सपने दिखाकर वोट हासिल करने वालों से नाली साफ करके कुछ नोट हासिल करने को लोग अच्छे दिन शायद न भी गिनें।
लेकिन बात मानो मोदी की इस नई बात पर खत्म करना उनके आसपास के लोगों को ठीक नहीं लगा, तो फिर लोगों ने उसे एक नए जुमले की तरह आगे बढ़ाना शुरू किया, बिना यह कहे या माने हुए कि यह एक और जुमला है, असल नीयत से कही बात नहीं है। देश भर में मोदी के लोगों ने जगह-जगह पकौड़े बेचने की बात को आगे बढ़ाया, जो कि मोदी को तो खुश कर सकती है, लेकिन इन लोगों ने यह नहीं सोचा है कि क्या अच्छे दिनों की उम्मीद में बैठी जनता को भी अपनी औलाद को पकौड़े बेचने वाला बनाना अच्छा लगेगा?
हमको पकौड़े बेचने का काम अच्छा लगता है, इज्जत का लगता है, लेकिन जहां तक जनता का नजरिया है तो हिन्दुस्तान में मेहनत करके रोजी-रोटी कमाने को इज्जत का काम नहीं माना जाता। हमारे सरीखे गैरजुमलेबाज लोग तो लोगों को सुझा सकते हैं कि रिश्वत देकर सरकारी नौकरी पाने के बजाय चाय-पकौड़े बेचकर अपनी मर्जी के मालिक रहना बेहतर है, लेकिन जो लोग चुनावी-राजनीति में हैं, उनको जनधारणा और जनभावना को तौले बिना महज जुमलेबाजी नहीं करना चाहिए।
फिर मोदी को खुश करने पर उतारू उनके लोगों ने बात को आगे बढ़ाया, और यह साबित करने की कोशिश की कि पकौड़े बेचने से और नीचे का काम भी अच्छे दिनों में ही गिनाएगा। भाजपा से जुड़े हिन्दू संगठन आरएसएस के एक बड़े नेता इन्द्रेश कुमार ने कहा पकौड़े तलना देश के पन्द्रह करोड़ से ज्यादा लोगों का व्यवसाय है, और भीख मांगना भी देश के बीस करोड़ लोगों का रोजगार है। यह छोटा काम नहीं है। उन्होंने वैसे तो पकौड़े तलने को हीन काम न मानने की वकालत करते हुए यह बात कही लेकिन अगर इस देश की पन्द्रह फीसदी से अधिक आबादी भीख मांगकर जिंदा है, तो यह किस तरह के अच्छे दिन कहे जाएंगे?
लोगों को याद होगा कि हिन्दुस्तान में जगह-जगह बड़े-बड़े नेता बलात्कार को लेकर लोगों के जख्मों पर नमक-मिर्च छिड़कने जैसे काम करते हैं, बयान देते हैं, और अब अच्छे दिनों को लेकर, पकौड़े बेचने को लेकर बात को भीख मांगने तक पहुंचा दिया गया है। लोकतंत्र इतना लचीला रहता है कि वह लोगों को अलग-अलग किस्म की सोच को सामने रखने का मौका देता है, आजादी देता है। लेकिन जो लोग किसी पार्टी, संगठन, या विचारधारा से जुड़े रहते हैं, उनका मुंह खोलना उनके संगठन या उनकी विचारधारा को भी बताता है। ऐसे में लोगों के मुंह से अगर नमक-मिर्च ही झरना तय है, तो फिर वे मुंह बंद क्यों नहीं रख सकते?
लोकतंत्र में जनता किसी एक सरकार, पार्टी, और नेता के बारे में अपनी सोच पांच बरस में एक बार ही जाहिर कर पाती है, इसके पहले, इसके बीच में होने वाले चुनावों में किसी दूसरी सरकार, और किन्हीं दूसरे उम्मीदवारों को वोट देने की नौबत आ सकती है, लेकिन उसकी तुलना पिछले चुनाव से नहीं की जा सकती। ऐसे में लोग अगर उन्हें कुर्सी तक पहुंचाने वाली जनता के सब्र को इतना अधिक नहीं आजमाना चाहिए कि वह टूट ही जाए। एक कानूनी बहस और नुक्ताचीनी की शक्ल में जुमलेबाज यह भी सही ठहरा सकते हैं कि पखाना साफ करना भी रोजगार है। लेकिन ऐसी बातों से लोगों को बार-बार कोंच-कोंचकर यह याद दिलाना समझदारी नहीं है कि उन्होंने पिछला वोट जुमलों के झांसे में दिया था, और इसलिए अब कुर्सी पर बैठे लोगों को यह हक मिल जाता है कि वे पांच बरस तक लोगों को उन तमाम किस्मों के रोजगार सुझाएं जो कि जनता की नजरों में इक्कीसवीं सदी के अच्छे दिन में नहीं गिनाते।  (Daily Chhattisgarh)

बारातों के सामने बेबस शासन-प्रशासन का हाल

संपादकीय
19 फरवरी 2018


छत्तीसगढ़ के कई शहरों में कल शादियों की भरमार थी। सड़कों पर इतनी बारातें थीं, कि शहर आरपार कर लें, तो भी लाउडस्पीकर और भयानक रौशनी फेंकने वाली लाईटों से पार पाना मुमकिन नहीं था। राजधानी रायपुर में शादी के हर महूरत की तरह कल भी कुछ इलाकों में घंटों ट्रैफिक जाम था। और यह सब तब था जब शोरगुल के खिलाफ न सिर्फ सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट बड़े कड़े हुक्म दे चुके हैं, बल्कि राज्य सरकार का पर्यावरण विभाग भी बार-बार अफसरों को चेता चुका है। दूसरे लोगों की जिंदगी बर्बाद करते हुए जब लोग अपने घर की खुशी के मौके पर ऐसी गुंडागर्दी दिखाते हैं, तो उनका बावलापन तो समझ में आता है कि उनका पैसा और उनकी ताकत सिर चढ़कर बोल रहे हैं, लेकिन यह समझ नहीं पड़ता है कि पुलिस और प्रशासन को कानून तोडऩे वालों के साथ ऐसी रियायत की नरमी क्यों सूझती है? बात-बात पर एक-एक गरीब ठेले को मशीनों से उठाकर फेंक देने वाले अफसर ताकतवर बारातों को छू भी नहीं पाते, और ताकतवर विवाहस्थलों को चेतावनी देते-देते जिंदगी गुजार देते हैं। कल ही राजधानी से लगे हुए दुर्ग जिले में एक महिला पुलिस अफसर ने जब सड़क पर लाउडस्पीकरों के साथ होते हंगामे को रोका, तो घराती-बाराती थाने पहुंच गए, वहां बड़ी-बड़ी राजनीतिक धमकी दीं, गालियां दीं, और पूरा थाना सिर पर उठा लिया। आज सुबह की खबरें हैं कि ऐसा हंगामा करने वालों को छुड़वाने के लिए बड़े ताकतवर मंत्री, सांसद, दूसरे नेता सभी जुट गए, और उनकी ताकत को देखते हुए पुलिस ने उन्हें जाने भी दिया। इस मौके की जो वीडियो रिकॉर्डिंग बाहर आई है, उसमेंं नशे में धुत्त लोग सूटबूट में मुख्यमंत्री को गालियां देते दिख रहे हैं, और पुलिस ऐसे लोगों को छोड़ रही है। 
हिन्दुस्तान में लोग जब तक अकेले रहते हैं, तब तक वे इंसान की तरह बर्ताव करते हैं, एक से दो हुए तो वे मनमानी करने वाली टोली हो जाते हैं। दो से चार हुए तो उनका बर्ताव गुंडों के गिरोह जैसा हो जाता है, और अगर ऐसे लोग किसी बारात, किसी शवयात्रा, किसी धार्मिक या राजनीतिक जुलूस में हैं, तो वे एक अराजक और हिंसक तेवर अख्तियार कर लेते हैं। और तो और, जब पुलिस या फौज के लोग ट्रेन में सफर करते हैं, तो उनकी गिनती अधिक होने पर उनका बर्ताव भी बाकी मुसाफिरों के साथ मवालियों जैसा हो जाता है। भीड़ के बारे में जो बात कही जाती है कि उसमें सिर तो बहुत होते हैं, दिमाग कोई नहीं होता, कुछ उसी किस्म का हाल हिन्दुस्तानियों के किसी छोटे जत्थे के साथ भी रहता है, और अगर जत्था बड़ा हो गया, मौका सुख या दुख का हुआ, तो फिर बात ही क्या है। 
दूसरी बात यह कि जिन लोगों के पास खूब सारा कालाधन होता है, और जो शादी-ब्याह या दूसरे किस्म के जलसों पर उसे उड़ाने पर उतारू रहते हैं, उनकी बददिमागी इन पैसों की वजह से आसमान पर पहुंची हुई रहती है। और फिर ऐसे कालेधन वालों में जो लोग प्रशासनिक या राजनीतिक ताकत वाले होते हैं, वे गुंडागर्दी, मनमानी, और अराजकता को अपनी शान दिखाने के लिए बहुत ही जरूरी भी समझते हैं। बददिमागी का यह पूरा सिलसिला कमजोर सरकार और मजबूत मुजरिमों का एक ऐसा मेल है जिसमें अफसर गुंडागर्दी का मुंह देखते रह जाते हैं क्योंकि किसी को छूने का मतलब अपनी वर्दी उतरवाना भी होता है। किसी भी प्रदेश की राजधानी में ऐसी बददिमागी का घनत्व उसी अनुपात में कई गुना हो जाता है जिस अनुपात में वहां सत्ता की ताकत वाले लोग रहते हैं। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर इसकी एक उम्दा मिसाल है जहां पर सरकार आए दिन कोलाहल के खिलाफ बड़े कड़े हुक्म निकालती रहती है, जहां छोटे से राज्य का हाईकोर्ट कई तरह के हुक्म देते रहता है, और लोगों की जिंदगी लाउडस्पीकरों की वजह से, आतिशबाजी और पटाखों की वजह से हराम रहती है। 
छत्तीसगढ़ सरकार में पर्यावरण सचिव अमन सिंह देश के सबसे ताकतवर आधा दर्जन अफसरों में गिने जाते हैं, सरकार पर उनकी मजबूत पकड़ से सब वाकिफ हैं, और उनकी काम करने की क्षमता के सब कायल भी हैं। लेकिन पूरे प्रदेश में लाउडस्पीकरों का प्रदूषण लगातार बढ़ते चल रहा है, आतिशबाजी पर रोक बेअसर है, धर्मस्थलों पर चौबीसों घंटे लाउडस्पीकर बजते हैं, इतना जरूर है कि मंत्रियों और अफसरों के इलाके, राजभवन और जजों के बंगले ऐसे शोरगुल से अलग रखे जाते हैं, यानी शोरगुल को इन चुनिंदा जगहों पर दूर रखा जाता है। इस प्रदेश में सड़कों और सार्वजनिक जगहों पर शोरगुल और बाराती-रौशनी के अंधाधुंध प्रदूषण की चुनौती सामने है, और हम यहां पर पर्यावरण सचिव का जिक्र इसीलिए कर रहे हैं कि सरकार के एक सबसे प्रमुख अफसर के नाते यह पूरी तरह उनकी सीमा में है, वे ध्यान दें तो सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के अनगिनत आदेशों पर अमल हो सकता है, और लोगों की जिंदगी बर्बाद होना थम सकता है। पूरे प्रदेश में ऐसा प्रदूषण तुरंत कड़ाई से रोकने की जरूरत है, और ऐसा करने में लगे कारोबारियों, गाडिय़ों, सामानों को जब्त करके गुनहगारों को जेल भेजना शुरू होगा, तो यह सिलसिला थम जाएगा। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 19 फरवरी

इंसानियत को रौंदते हुए हैवानियत का जुलूस

संपादकीय
18 फरवरी 2018


जम्मू-कश्मीर के जम्मू इलाके में एक बंजारा बच्ची के साथ बलात्कार हुआ, और उसकी हत्या कर दी गई। जब उसकी तलाशी जारी थी तब ढूंढने वाली पुलिस ने एक पुलिस कर्मचारी शामिल था, और बाद में उसे पुख्ता सुबूतों के आधार पर गिरफ्तार किया गया। यहां तक तो बात ठीक थी, लेकिन दीपक खजूरिया नाम के इस पुलिस वाले की गिरफ्तारी के खिलाफ जम्मू में हिन्दू एकता मंच और भाजपा के नेताओं ने जुलूस निकाला, और उसे तुरंत रिहा करने की मांग की। इस जुलूस में बड़े-बड़़े तिरंगे झंडे लेकर लोग चल रहे थे, और नारे लगा रहे थे। यह नजारा देखकर कश्मीर में भाजपा की भागीदारी में राज्य सरकार चला रहीं मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती हैरान और हक्का-बक्का रह गईं, और उन्होंने ट्विटर पर पोस्ट किया कि राष्ट्रीय ध्वज का ऐसा इस्तेमाल देखकर वे भयभीत हैं। 
अब इस देश में एक हत्यारे और बलात्कारी को भी बचाने के लिए धर्म और राष्ट्रीय झंडे का इस्तेमाल शुरू होते दिख रहा है। फिर एक हिन्दू संगठन के साथ-साथ इस प्रदर्शन में राज्य भाजपा के महासचिव शामिल थे, और उन्होंने खुलकर इस आरोपी की रिहाई की मांग की है। जिस प्रदेश में सत्ता में भाजपा की भागीदारी है, जिस सरकार में भाजपा के मंत्री हैं, वहां पर अगर एक हत्यारे-बलात्कारी की गिरफ्तारी से असहमत होकर राष्ट्रीय ध्वज लेकर हजारों लोग सड़कों पर हैं, तो सवाल यह उठता है कि कानून अपना काम कैसे करेगा? और यह बात महज जम्मू तक सीमित नहीं रहेगी, यह बात धीरे-धीरे दूसरे प्रदेशों में भी जोर पकड़ेगी, और भाजपा इसे लेकर देश के प्रति आज ही जवाबदेही झेल रही है। 
अभी दो दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार को इस बात के लिए फटकारा है कि उसने बलात्कार की शिकार को साढ़े 6 हजार रूपए का मुआवजा दिया। अदालत ने सदमे में आकर सरकार से पूछा है कि क्या वह भीख दे रही है? अब इस तरह के सरकारी बर्ताव के साथ-साथ अगर किसी देश-प्रदेश में सत्तारूढ़ पार्टी एक बच्ची के बलात्कार और हत्या के बाद अगर किसी गिरफ्तारी का ऐसा विरोध करती है, तो फिर कानून के राज की कोई जगह बचती नहीं है। दूसरी बात यह भी है कि हिन्दुओं के नाम पर कोई संगठन अगर ऐसी हरकत करता है, तो यह बाकी हिन्दू समाज के लिए भी जिम्मेदारी दिखाने का एक मौका है कि कौन-कौन इस हरकत से असहमत हैं। भाजपा को एक राष्ट्रीय पार्टी के रूप में भी तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए, और उसके जम्मू-कश्मीर संगठन की वेबसाइट पर जो महासचिव दिख रहे हैं, वे अगर ऐसे जुलूस की लीडरशिप कर रहे हैं, तो पार्टी को अपना घर सुधारना चाहिए। गनीमत यह है कि यह मामला अभी तक साम्प्रदायिक नहीं दिख रहा है, और जिस बच्ची के साथ बलात्कार के बाद उसकी हत्या की गई है, वह भी एक हिन्दू बंजारा लड़की है जो कि गरीब भी है, और कमउम्र भी है। कोई भी संगठन, कोई भी पार्टी ऐसे मौके पर अगर अपना साफ रूख जाहिर न करे, तो उसकी चुप्पी दर्ज हो जाती है। जिस प्रदेश में भाजपा सत्ता में भागीदार है, जहां पर उसकी बड़ी भागीदार मुख्यमंत्री महबूबा इस प्रदर्शन को लेकर अपने आपको डरा-सहमा बता रही हैं, वहां पर माहौल सचमुच बहुत खराब दिख रहा है। ऐसा लग रहा है कि राष्ट्रीयता के झंडे तले, धर्म के झंडे तले इंसानियत को रौंदते हुए हैवानियत का जुलूस निकला है। लोगों को चाहिए कि इस जुलूस के उसी जगह कुचल दिया जाए, ताकि यह बाकी देश में आग न लगा सके। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 18 फरवरी

एक और फिल्म बन जाएगी, अब तक सत्तावन

संपादकीय
17 फरवरी 2018


उत्तरप्रदेश में पुलिस ने घोषित और संदिग्ध मुजरिमों पर हमला बोला है, और पिछले महीने-दो महीने में 40 लोगों को मुठभेड़ में मार डाला। अब वहां हालत यह है कि जिन लोगों के खिलाफ कुछ मुकदमे चल रहे हैं, वे लोग तख्तियां लेकर घूम रहे हैं कि वे सुधर जाएंगे, उन्हें न मारा जाए। यह पूरा नजारा महाराष्ट्र में कई साल पहले के एक दौर की याद दिलाता है जब वहां माफिया किस्म के संगठित अपराध करने वाले मुजरिमों को पुलिस एनकाऊंटर में मारती थी और ऐसा करने वाले अफसरों के किरदार पर फिल्में भी बनी थीं। अब तक 56 जैसे नाम वाली फिल्म में जिस असली पुलिस अफसर पर किरदार बनाया गया था, उसे बाद में जमीन के धंधे में माफिया अंदाज में शामिल हो जाने के जुर्म में पकड़ा भी गया था, और सरकार को उसे हटाना पड़ा था। वह बात तो पुरानी हो गई लेकिन अभी हाल ही में फिलीपींस में वहां के राष्ट्रपति ने नशे का कारोबार करने के शक से घिरे हुए लोगों को मारने का हुक्म दिया, और सड़कों पर पुलिस ने इस कदर खूनखराबा किया कि वहां सरकार के मुताबिक 4 हजार और विदेशी जांच समूहों के मुताबिक 14 हजार से अधिक लोगों को पिछले एक बरस से कम समय में सड़कों पर ही मार दिया गया। 
जैसा कि हमने मुंबई की फिल्म का जिक्र किया है, सड़क और फुटपाथ पर तेज रफ्तार इंसाफ का यह सिलसिला किसी फिल्म की तरह ही दिलचस्प लगता है, और लोग इसे देखकर वाहवाही भी करते हैं, तालियां भी बजाते हैं। लेकिन दुनिया का इतिहास इस बात का गवाह है कि एक वक्त उत्तर-पूर्व में मिजोरम रहा हो, या कि बाद के बरसों में आतंक के दिनों का पंजाब रहा हो, या छत्तीसगढ़ का बस्तर रहा हो, जहां कहीं भी वर्दीधारी फौज या पुलिस को ऐसी खुली छूट मिलती है, वह ज्यादती पर उतर ही आती है। और धीरे-धीरे खुद इंसाफ करने और खुद ही सजा दे देने की बददिमागी उसी तरह वर्दी के सिर पर चढ़कर बोलने लगती है जिस तरह की आज बस्तर में नक्सली जनसुनवाई में किसी को भी पुलिस का मुखबिर करार देते हैं, और मौके पर ही उसका गला रेत देते हैं। सड़क पर इंसाफ का यह सिलसिला बहुत से लोगों को इसलिए भी सुहाता है कि भारत जैसे लोकतंत्र में अदालतों में फैसला होने में जिंदगी गुजर जाती है, और फिर भी दस में से नौ मामलों में गुनहगार छूट भी जाते हैं। इसीलिए एक वक्त था कि मुंबई का एक माफिया डॉन, हाजी मस्तान अपने घर पर सुनवाई करता था, और लोग वहां पर रहम और इंसाफ की भीख मांगते पहुंचते थे, और माफिया की बंदूकों से इंसाफ तय कर दिया जाता था। 
उत्तरप्रदेश में जो हो रहा है, वह लोकतंत्र के ठीक खिलाफ है। लोकतंत्र एक लचीली और खर्चीली, और खासी धीमी प्रक्रिया है जिसमें कोई शॉर्टकट नहीं रहते। लोकतंत्र में हर मुजरिम को सजा भी नहीं मिल पाती क्योंकि अदालतों में उनके गुनाह साबित नहीं हो पाते। ऐसे में सड़क पर इंसाफ और मुठभेड़-हत्या एक बड़ा लुभावना विकल्प लग सकता है, लेकिन तभी तक जब तक कि ऐसी पुलिस की बंदूकों का निशाना दूसरों की तरफ हो। जिस दिन ऐसी बंदूकें किसी बेकसूर की तरफ तन जाएं, उस दिन उस बेकसूर और उसके कुनबे को ताली बजाना भूल जाएगा। हैरानी की बात यह है कि उत्तरप्रदेश की योगी सरकार का यह बहुप्रचारित और स्वघोषित कारनामा न तो वहां के मानवाधिकार आयोग का ध्यान खींच रहा है, न ही उत्तरप्रदेश की लंबी-चौड़ी हाईकोर्ट इसका नोटिस ले रही है, और न ही राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग इस पर कुछ बोल रहा है। और तो और, उत्तर भारत के इस भयानक खूनी सिलसिले को लेकर दिल्ली में बसा राष्ट्रीय कहलाने वाला मीडिया भी कुछ नहीं कर रहा है। ऐसा लगता है कि यह लोकतंत्र थका हुआ है, इसके पैरों में अब इंसाफ के लंबे सफर की ताकत बची नहीं है, या फिर जो छोटे-छोटे मुजरिम मारे जा रहे हैं, उनका कोई महत्व नहीं है। हमारा ऐसा ख्याल है कि मारे गए इन 40 मुजरिमों ने कुल मिलाकर कुछ करोड़ रूपए का ही कोई अपराध किया होगा जिससे 11 हजार करोड़ अधिक का अपराध करके एक हीरा कारोबारी देश छोड़कर जा चुका है। इस लोकतंत्र में जिंदा रहने के लिए, और जेल से बचने, देश छोडऩे के लिए बड़ा मुजरिम होना जरूरी है, छोटे मुजरिम को इसी तरह सड़क पर मार दिया जाएगा, और उसकी गिनती को जोड़कर एक और फिल्म बन जाएगी, अब तक सत्तावन। (Daily Chhattisgarh)