जालसाजी-धोखाधड़ी के मामलों की जांच-सजा से परे भी देश के बैंकों में बड़े सुधार की जरूरत...

संपादकीय
31 मार्च 2018


हिन्दुस्तानी बैंकों में घोटालों का भांडाफोड़ इस रफ्तार से हो रहा है कि मानो पत्थरों को उठाते जा रहे हैं, और उनके नीचे से बिलबिलाते हुए कीड़े निकल रहे हैं। हालांकि कीड़ों में इंसानों की तरह साजिश की ताकत नहीं होती है, और उनकी मिसाल मोटे तौर पर गलत है। ताजा मामला आईसीआईसीआई बैंक की मुखिया और देश की एक बहुत ही चर्चित, महत्वपूर्ण महिला चन्दा कोचर का है जिनकी अगुवाई में बैंक ने उनके परिवार के कारोबारी हितों वाले धंधों को सवा दो हजार करोड़ का कर्ज लिया, और जो अब पूरे का पूरा डूब गया दिख रहा है। यह एक निजी क्षेत्र का बैंक है, और ऐसा माना जाता है कि निजी क्षेत्र के बैंक, राष्ट्रीयकृत बैंकों की तरह सरकार की सीधे दबाव में नहीं रहते। ऐसे में जब बैंक की एमडी और सीईओ चन्दा कोचर अपने परिवार के कारोबारी हितों से जुड़े हुए कुछ कारोबार पर कर्ज का फैसला लेती हैं, तो वे अपने आपको इससे अलग भी नहीं करती हैं। हमारे हिसाब से यह एक बहुत साफ-साफ हितों के टकराव का मामला है, और यह कुछ अविश्वसनीय बात है कि कोई भी जिम्मेदार बैंकर ऐसा गलत काम कर सकती है। 
भारत के बैंकों के डूबने जैसी नौबत आने के पीछे कुछ मुजरिम किस्म के कारोबारी तो हैं ही, खुद बैंकर भी कम नहीं हैं जिनकी भागीदारी नीरव मोदी जैसे जालसाज-कर्जदार के मामले में दिख रही है। हमारा ख्याल है कि बैंकरों की साजिश अगर साबित हो जाती है, तो उन्हें मुजरिम-कर्जदारों के मुकाबले बहुत अधिक सजा होनी चाहिए क्योंकि कर्जदार तो कारोबारी हैं, और वे तो सही-गलत सभी तरह के काम करने के लिए जाने ही जाते हैं। लेकिन बैंक के अफसर, कर्मचारी, इनकी जवाबदेही बैंकों के लिए बहुत अधिक होती है, और उस विश्वास को तोडऩे पर कड़ी सजा का इंतजाम होना चाहिए। आज ऐसा लगता है कि जितने खाते डूब रहे हैं, उनमें से कोई भी ऐसा नहीं है जिसे डूबने का मौका देने के पीछे बैंक भी शामिल न रहा हो। 
आज यह भी हैरानी की बात है कि भारत सरकार बैंकों की, और बैंकों से धोखाधड़ी-जालसाजी के मामले में सारी जिम्मेदारी रिजर्व बैंक पर डालकर अपने हाथ झाड़कर खड़ी हो गई है। दूसरी तरफ रिजर्व बैंक सार्वजनिक रूप से यह बयान देता है कि ऐसी जालसाजी रोकने के लिए उसके पास पर्याप्त अधिकार नहीं है। इस पर सरकार आरबीआई के इस बयान को गलत बताती है, और कहती है कि उसके पास पर्याप्त अधिकार हैं। जिम्मेदारी से बचने का यह सिलसिला बैंकों के भीतर भी उनके ढांचे में ऊपर से नीचे तक चले आ रहा है। पंजाब नेशनल बैंक से दसियों हजार करोड़ की धोखाधड़ी बैंक के भीतर खुद बैंक की की हुई जालसाजी से मुमकिन हो पाई, और ऐसा लगता है कि धोखेबाज कारोबारियों ने इस बैंक को अपने पास गिरवी रखा हुआ था। 
लेकिन पिछले कई हफ्तों से ये जालसाजी रोजाना ही उजागर हो रही है, इसके बावजूद सरकार, संसद, और सुप्रीम कोर्ट से अब तक जिम्मेदारी की ऐसी कोई आवाज नहीं निकली है कि बैंकों की व्यवस्था को खतरे से दूर रखने के लिए कौन से पुख्ता इंतजाम किए जा सकते हैं, किए जा रहे हैं। आज सांसदों और देश के बैंकिंग विशेषज्ञों की एक सर्वोच्च स्तरीय कमेटी के साथ सुप्रीम कोर्ट के किसी जज को बैठकर बैंक जालसाजी रोकने के इंतजाम करने चाहिए, लेकिन ऐसी चर्चा तक नहीं हो रही है। यह भी हैरानी की बात है कि भारत के संसदीय इतिहास में बिखरी हुई मिसालों को भी इस्तेमाल नहीं किया जा रहा, और ताजा बैंक घोटालों पर संसद की सर्वदलीय समिति द्वारा जांच की मांग भी नहीं उठ रही है। ये मामले अकेली धोखाधड़ी के नहीं हैं, ये मामले भारत की बैंकिंग में जालसाजी की अपार संभावनाओं के मौजूद होने के हैं, और इनके लिए अल्पकालीन और दीर्घकालीन, दोनों किस्म के इलाज ढूंढने की जरूरत है, न कि सिर्फ इन कुछ गिने-चुने मामलों की जांच करके चुप बैठ जाने के। भारत के बैंक कर्मचारियों के संगठन लंबे समय से बड़े कर्जदारों की धोखाधड़ी के खिलाफ आवाज उठाते रहे हैं, इन संगठनों को भी बैंकिंग-सुधार के लिए संसदीय पहल की मांग करनी चाहिए। इन मामलों में गुनहगारों को सजा दिलाना तो ठीक है, लेकिन आगे ऐसी जालसाजी जारी न रहे, उसे रोकना भी जरूरी है। भारत के बैंक बड़े-बड़े कर्ज देकर उनको डुबाकर, घाटे में आकर, छोटे-छोटे लोगों पर बड़े-बड़े जुर्माने लगाकर अपना घाटा पूरा करते दिख रहे हैं। आज जो हाल देश की सरकारी विमान सेवा, एयर इंडिया का हुआ है, वही हाल देश के बैंकों का न हो जाए इसके लिए फिक्र अगर नहीं की गई, तो अमरीका के बड़े-बड़े बैंकों की तरह हिन्दुस्तान के बैंक भी टाइटैनिक जहाज की तरह डूब सकते हैं। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 31 मार्च

लोकतंत्र में बढ़ता हुआ अंधेरा और कहां तक?

संपादकीय
30 मार्च 2018


देश में एकाएक कई प्रदेशों में साम्प्रदायिक हिंसा या साम्प्रदायिक तनाव की वारदातें हो रही हैं। बिहार में एक पखवाड़े में चार जिलों में यह नौबत आ गई है, और वहां एक केन्द्रीय मंत्री का बेटा साम्प्रदायिकता भड़काने के आरोप में फरार है। दूसरी तरफ जगह-जगह धर्मस्थलों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। उधर बंगाल में साम्प्रदायिक तनाव में कई मौतें हो चुकी हैं। राजस्थान में हनुमान जयंती के मौके पर इंटरनेट बंद करना पड़ा है ताकि लोग भड़काऊ संदेश इधर-उधर न भेजें। इस बीच उत्तरप्रदेश के राज्यपाल राम नाईक की कड़ी मेहनत के बाद वहां पर योगी सरकार ने सरकारी रिकॉर्ड में डॉ. बाबा साहब अंबेडकर के नाम के बीच में उनके पिता के नाम का एक हिस्सा, रामजी, जोडऩे का फैसला लिया है, और इस पर खुद भाजपा के दलित नेता भड़क गए हैं, मायावती तो भड़की ही हैं। इसके साथ-साथ पिछले कुछ दिनों से भाजपा की एक महिला सांसद की अगुवाई में उत्तर भारत के बहुत से सांसद दलित मुद्दों को लेकर भारी नाराजगी में हैं।
यह पूरा सिलसिला देश को एक निहायत ही गैरजरूरी तनाव में डालने का चल रहा है। पूरे देश में जिस तरह से धर्मान्धता और कट्टरता को बढ़ावा दिया जा रहा है, वे धर्म और जाति के मुद्दों को जिंदगी के असल और अहम मुद्दों के ऊपर लादा जा रहा है, वह बहुत खतरनाक सिलसिला है। सामाजिक रूप से भी, और आर्थिक रूप से भी। दिक्कत यह है कि यह तनाव खड़ा करने वाले लोग बिना किसी कार्रवाई के बच निकलते हैं, और एक ऐसा माहौल बन गया है कि साम्प्रदायिकता को फैलाना एक नवराष्ट्रवाद है। इस बीच कर्नाटक में राज्य सरकार ने पोस्टकार्ड नाम के एक ऐसे न्यूज पोर्टल के संपादक को साम्प्रदायिक नफरत फैलाने के जुर्म में गिरफ्तार किया है जो कि रात-दिन झूठी खबरें गढ़कर देश में नफरत फैलाने का एक अभियान सा चला रहा था। लेकिन इसके अलावा एक और बात भी दो दिन पहले सामने आई है जो कि इन सबसे अधिक फिक्र की है। देश में जलते-सुलगते असल मुद्दों की कोई कमी नहीं है, जनता बहुत बदहाली में है, लेकिन ऐसे में गैरजरूरी मुद्दों को इस तरह देश पर लाद देना देश को आगे बढऩे रोकने के बराबर है।
देश में कई सरकारों के राज में, सरकारों और पार्टियों के घपलों, साम्प्रदायिक संगठनों की साजिशों का भांडाफोड़ करने वाले एक सनसनीखेज न्यूज पोर्टल कोबरा पोस्ट ने एक लंबे स्टिंग ऑपरेशन अभियान के सुबूत सामने रखे हैं कि किस तरह देश के बड़े-बड़े नामी-गिरामी अखबार, और कई न्यूज चैनल किस तरह करोड़ों रूपए भुगतान के एवज में साम्प्रदायिकता और नफरत फैलाने के लिए एक पैर पर खड़े हुए मिले। कोबरा पोस्ट के संवाददाता ने एक हिन्दू साम्प्रदायिक बनकर खुफिया कैमरों के साथ बड़े-बड़े मीडिया घरानों के बड़े लोगों का स्टिंग ऑपरेशन किया, और वे लोग विपक्षी नेताओं को बदनाम करने के लिए भी तैयार हो गए, हिन्दू साम्प्रदायिकता फैलाने को भी तैयार हो गए, और किसी हिन्दू पार्टी की चुनावी संभावनाओं को बढ़ाने के लिए भी तैयार हो गए। किसी को ऐसी साजिश में भागीदार होने से परहेज नहीं मिला।
अब सवाल यह है कि चुनावी राजनीति में जीत हासिल करने के लिए राजनीतिक दल तो ऐसी साजिश करते आए हैं, लेकिन आज ऐसी नफरत फैलाने में देश के मीडिया के बड़े चर्चित और बड़े नाम अगर बेसब्र और उतारू दिखते हैं, और मीडिया की आत्मा को हिंसा के हथियार की तरह पेश कर रहे हैं, तो फिर लोकतंत्र में बाकी क्या है? क्यों मीडिया को कोई भी खास दर्जा दिया जाए? और क्यों न यह भी मान लिया जाए कि आज देश के कई बड़े राज्यों में जो साम्प्रदायिक हिंसा चल रही है, उसे करवाने वालों में मीडिया का ऐसा ही कोई हिस्सा शामिल है? भारतीय लोकतंत्र की यह नौबत बहुत ही खराब है। एक साम्प्रदायिक न्यूज पोर्टल बनाकर एक साजिश के तहत लगातार झूठ को पोस्ट करने पर अगर एक आदमी को गिरफ्तार किया जा रहा है, तो घंटे भर में ऐसा दूसरा न्यूज पोर्टल बनकर इसी काम को और आगे भी बढ़ाया जा सकता है, इस पर कोई रोक तब तक नहीं लग सकती जब तक कि कानून कड़ा न हो, उस पर अमल तेज रफ्तार न हो, और अदालतों का हौसला इंसाफ देने का न हो। आज तो इस बात को इसी बात पर खत्म करना वाजिब होगा कि न्यायपालिका के काम में भारत की सरकार की दखल का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट के एक जज ने मुख्य न्यायाधीश को एक चिट्ठी लिखी है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 30 मार्च

..तमाम लोगों को तमाम वक्त बेवकूफ नहीं बना सकते अन्ना

संपादकीय
29 मार्च 2018


दिल्ली में अन्ना हजारे एक बार फिर अनशन पर बैठे हैं, और खबर है कि उनका वजन घटते जा रहा है। महाराष्ट्र में वे भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन के आदी रहे हैं, और उनके खुद के दावे के मुताबिक उनकी वजह से कई मंत्रियों को बर्खास्त होना पड़ा है। यूपीए सरकार के वक्त अभी से पांच-छह बरस पहले उन्होंने दिल्ली में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन छेड़ा था जिसमें भांति-भांति के लोग आकर जुड़े थे, रामदेव से लेकर केजरीवाल तक। लेकिन भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए उन्होंने लोकपाल बनाने की मांग को कुछ इस तरह उठाया था कि मानो यूपीए सरकार देश के इतिहास की अकेली भ्रष्ट सरकार थी, और लोकपाल कोई रामबाण दवा है जिसके बनने से देश में भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा। उस वक्त उस आंदोलन में देश में एक लहर पैदा की थी, और उसी के बीच आम आदमी पार्टी का जन्म हुआ, और अरविंद केजरीवाल आंदोलन और अन्ना दोनों से परे चले गए। उसके बाद यूपीए सरकार ने ही 2013 में लोकपाल कानून बनाया। अब मोदी सरकार के करीब चार बरस हो जाने के बाद भी उस कानून के तहत लोकपाल नियुक्त नहीं किया गया, और अन्ना हजारे एक बार फिर अनशन पर हैं।
इस बार अन्ना के मंच के सामने लोगों की भीड़ इतनी छोटी है कि स्कूल के बच्चे भी सिरों को गिन सकते हैं। जनता की इस उदासीनता को देखकर कुछ लोग हैरान हैं, लेकिन बहुत से लोगों को अन्ना हजारे से कोई उम्मीद रह भी नहीं गई थी। वे मोटेतौर पर देशभक्ति का नाम लेकर राष्ट्रवाद की एक सोच को बढ़ावा देते आए हैं, और गांधी टोपी और खादी को इस मकसद के लिए मुखौटे की तरह इस्तेमाल भी करते आए हैं। भ्रष्टाचार को लेकर उनका हमला चुनिंदा रहते आया है कि किस पार्टी या किन नेताओं पर हमला करना है, और किन पर नहीं। अन्ना हजारे आज दिल्ली में लकड़ी की वह हांडी साबित हो रहे हैं जो कि चूल्हे पर बस एक ही बार चढ़ पाती है। अन्ना ने जिस अंदाज में यूपीए सरकार की छाती पर अपनी जिंदगी और मौत की बंदूक टिकाई थी, और लोकपाल कानून बनवाया था, उस कानून के तहत चार बरस में कोई तैनाती भी नहीं हुई, और आज अन्ना हजारे की नींद बरसों बाद तब खुल रही है जब कई प्रदेशों के चुनावों के बाद साल भर में देश के आम चुनाव भी सामने खड़े होंगे, और अन्ना के इस आंदोलन का अगर कोई असर हो सकेगा, तो हो सकता है कि वह चुनावी राजनीति का एक हिस्सा भी हो। अन्ना की विश्वसनीयता उनकी बरसों लंबी चुनिंदा चुप्पी के चलते मिट्टी में मिली हुई है। सोशल मीडिया पर कई गंभीर पत्रकारों ने एक अवांछित और खराब जुबान में अन्ना की साख के बारे में लिखा है कि इंसान की साख किसी लड़की के कौमार्य की तरह होती है, जो कि बार खो जाए, तो फिर वह लौट नहीं सकती। यह भाषा और यह मिसाल, दोनों ही गलत हैं, लेकिन अन्ना की साख पर सवाल ठीक है। कोई व्यक्ति अपने आपको सांसारिक जीवन के स्वार्थों और संबंधों से ऊपर, महज देश के लिए फिक्रमंद बताते हुए देश को लंबे समय तक बेवकूफ नहीं बना सकता। भारत में बहुत से लोग ऐसा मानते हैं कि गांधी या भगत सिंह का नाम लेकर, गांधीवादी खादी पहनकर, देशभक्ति की बातें करके, और तिरंगा झंडा फहराकर वे हिन्दुस्तानी आबादी को तांत्रिक अंगूठी बेच सकते हैं। लेकिन ऐसा होता नहीं है, अंग्रेजी में किसी ने एक वक्त समझदारी की एक लाईन लिखी थी कि आप कुछ लोगों को, कुछ समय के लिए तो बेवकूफ बना सकते हैं, लेकिन तमाम लोगों को, तमाम वक्त बेवकूफ नहीं बना सकते।
अन्ना हजारे एक पाखंड साबित हुए हैं, और चूंकि पब्लिक सब जानती है, उसने दिल्ली में अपने आपको अन्ना से परे रखा है, और मीडिया के बीच भी अन्ना की कोई अहमियत नहीं दिख रही है। अब लोगों को अन्ना की राजनीति उजागर होने का इंतजार है कि इस बार उन्होंने यह अनशन किस पार्टी या किस नेता की मदद करने के लिए किया है, और वे किसके हाथ मजबूत करने तक इसे जारी रखेंगे। अरविंद केजरीवाल तो अन्ना के मंच को छोड़कर खुलकर राजनीति में आ गए हैं, और हम उसे एक बेहतर फैसला मानते हैं कि लोगों को बेवकूफ मानकर चलने, और बेवकूफ बनाने के बजाय आंदोलनकारियों को ईमानदार बने रहना चाहिए, फिर चाहे वह भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन छोड़कर राजनीतिक दल बनाना ही क्यों न हो। अन्ना हजारे ने साख बचाए रखने का मौका पिछले बरसों में खो दिया है, और अब लोग उनकी नौटंकी देखने के लिए जाने की जहमत भी नहीं उठा रहे हैं। हमें आशंका एक ही बात की है कि अगर राजनीतिक पार्टियां और सरकारें यह तय कर लें कि वे अन्ना को मनाने नहीं जाएंगे, तो अन्ना हजारे किस बहाने से अपना अनशन खत्म करेंगे। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 29 मार्च

दीवारों पर लिक्खा है, 28 मार्च

दलबदलुओं के नई पार्टी से चुनाव लडऩे पर कुछ बरस रोक लगनी चाहिए

संपादकीय
28 मार्च 2018


कुछ दिन पहले समाजवादी पार्टी छोड़कर भाजपा में जाने वाले राज्यसभा सदस्य नरेश अग्रवाल आज संसद से विदाई पाने वाले लोगों में से एक थे। राज्यसभा में आज 40 सांसद कार्यकाल पूरा कर रिटायर हो गए हैं। इस मौके पर नरेश अग्रवाल के ताजा दल-बदल को लेकर कुछ लोगों ने मजाक किया, और कुछ ने तंज भी कसा। दल-बदल करने वाला कोई एक सांसद बहुत मायने नहीं रखता, लेकिन दल-बदल मायने रखता है। जिस लोकतंत्र में लिखित संविधान से कहीं अधिक महत्व परंपराओं का होना चाहिए, जिसकी संसदीय व्यवस्था से गरिमा की उम्मीद की जाती है, उस संसदीय लोकतंत्र में आज दल-बदल का दलदल घुटनों तक भरा हुआ है, और लोग उसमेें तैरते भी दिख रहे हैं। ऐसे में दल-बदल पर एक चर्चा जरूर होनी चाहिए, फिर चाहे देश की अधिकतर पार्टियां दल-बदल पर लार टपकाते हुए क्यों न दिखती हों। यह जरूरी तो है नहीं कि हमेशा संभावनाओं वाले विकल्प पर ही चर्चा हो, एक ऐसी काल्पनिक-सैद्धांतिक चर्चा भी तो हो सकती है जो कम से कम एक सोच की तरह दर्ज हो जाए। 
आज भारत में चुनाव सामने आते ही दल-बदल का दलदल एकाएक बढ़ते दिखता है। आज किसी पार्टी की टिकट न मिली, तो कल दूसरी पार्टी में चले गए। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। भारतीय चुनाव व्यवस्था में एक ऐसा नियम लाना चाहिए कि लोग अगर किसी एक पार्टी के निशान पर कोई चुनाव लड़ते हैं, और जीतते हैं, तो उन्हें अगला चुनाव किसी और पार्टी के निशान पर लडऩे से रोकने का इंतजाम रहना चाहिए। यह बात थोड़ी सी अटपटी लग सकती है, लेकिन ऐसा हो जाने पर मतलबपरस्त नेता रातोंरात दूसरी पार्टी से उम्मीदवार बनने की गुंजाइश तलाशना कम कर देंगे। और यह नियम कुछ दूसरे दायरों में कुछ दूसरी जगहों पर आज भी इसीलिए लागू है कि हितों का टकराव न हो। केन्द्र सरकार में, या भारतीय न्यायपालिका से रिटायर होने वाले लोगों पर कुछ किस्म की बंदिशें कुछ बरसों के लिए रहती हैं कि वे कौन-कौन से काम नहीं कर सकते। ऐसी ही रोक नेताओं पर रहनी चाहिए कि एक पार्टी छोडऩे के बाद वे दूसरी पार्टी की तरफ से लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा, या विधान परिषद कितने बरस तक नहीं जा सकते। हो सकता है कि बहुत से लोग पांच बरस की ऐसी रोक को कुछ अधिक कड़ा मानें, और कुछ नरमी बरतना चाहें, लेकिन इस बारे में सोच-विचार तो होना ही चाहिए। 
ऐसा न होने पर लोगों की अपने दल के लिए प्रतिबद्धता, उसकी नीतियों के लिए प्रतिबद्धता, विचारों की ईमानदारी, ये सब मानो मंडी में नीलाम के लिए तैयार रहती हैं, और बोली लगाकर कोई भी उन्हें खरीदकर ले जाते हैं। ऐसे में सार्वजनिक जीवन में विचारों की शुद्धता-पवित्रता चौपट हो गई है, और लोग संसदीय लोकतंत्र का सम्मान भी खत्म करते चल रहे हैं। देश की गिनी-चुनी ईमानदार पार्टियां ही शायद ऐसी सोच का साथ दें, लेकिन बाकी पार्टियों को भी इसके लिए मजबूर करना चाहिए। एक ऐसा जनजागरण अभियान चल सकता है जो कि पार्टी बदलकर उम्मीदवार बनने वाले लोगों को हराने का काम करे। आज भी देश में कुछ एनजीओ चुनावों पर निगरानी रखने, उम्मीदवारों की दौलत का विश्लेषण करने, और उनकी जुर्म की डायरी को जनता के सामने रखने का काम कर ही रहे हैं। एक अभियान ऐसा छिड़े जो कि दलबदलुओं को हराने के लिए जनता को जागरूक करे, तो लोगों की दलबदल की बेशर्मी भी घटेगी, और जिन नई पार्टियों में लोग जाएंगे, वहां भी उन्हें उम्मीदवार बनाने की हड़बड़ी नहीं रहेगी। (Daily Chhattisgarh)
-सुनील कुमार

दीवारों पर लिक्खा है, 27 मार्च

परफेक्शन की जिद पर अडऩा, उत्पादक कम, आत्मघाती अधिक

संपादकीय
27 मार्च 2018


अमरीकी राष्ट्रपतिमहाराष्ट्र के पुणे की खबर है कि वहां पर एक महिला पति से तलाक लेने अदालत पहुंची है, और उसने अपनी अर्जी में जो वजह गिनाई है वह हैरान करने वाली है। उसका कहना है कि पति इंजीनियर है, और वह रोटी का व्यास 20 सेंटीमीटर चाहता है, और अगर रोटी बिल्कुल इस आकार की न बने तो वह मारपीट करता है। खाने के पहले रोटी नापता है। वह हर बात में परफेक्शन चाहता है, और यह भी चाहता है कि दिन भर में उसने क्या-क्या काम किया है, इसे कम्प्यूटर के एक्सेल शीट पर अलग-अलग रंगों में बनाकर उसे रोज दिया जाए। ऐसा न होने पर वह हिंसक हो जाता है, गालियां देता है, और ठंडा पानी डालकर एसी कमरे में बंद कर देता है। 
अब यह मामला अपने किस्म का एक अनोखा मामला है जिसमें परफेक्शन की जिद वाला एक पति कहीं भी कमी दिखने पर हिंसा पर उतर आता है। लेकिन इससे परे भी असल जिंदगी में ऐसे कई मामले रहते हैं जिसमें लोग परफेक्शन पर अड़े हुए बहुत बर्बादी करते हैं, दूसरों को बहुत तनाव देते हैं, और खुद भी बहुत तनाव लेते हैं। जिंदगी का तजुर्बा कहता है कि परफेक्शन की जिद लोगों का नफा कम करती है, नुकसान अधिक करती है। एक सीमा से अधिक सही होने की जिद उत्पादकता के खिलाफ तो जाती ही है, इसके साथ-साथ परफेक्शन पर उतारू इंसान का सुख-चैन भी छीन लेती है, और घर-दफ्तर के लोगों से उनके संबंध भी खराब होते चलते हैं। 
दरअसल असल जिंदगी की सीमाओं को समझना भी जरूरी है। जब आपके साथ या आपके इर्द-गिर्द काम करने वाले लोगों पर काम का बोझ बहुत अधिक हो, या उनकी काबिलीयत कम हो, और उनसे उम्मीदें आसमान छूती लगा ली जाएं, तो नतीजा बर्बादी और तबाही का होता है। कई लोग कम तनख्वाह के लोगों के साथ काम करते हैं, और उनसे बहुत ही हुनरमंद लोगों सरीखा प्रदर्शन चाहते हैं। ऐसी ही नौबत के लिए बड़े-बुजुर्गों ने एक वक्त लिखा था कि मूंगफली जैसा भुगतान करने पर बंदरों की तरह के कामगार ही मिलते हैं। अब यह बात एक गलत मिसाल को लेकर जरूर लिखी गई है क्योंकि बंदर तो कम या अधिक कैसी भी तनख्वाह पर काम करते नहीं हैं, और इंसान हैं कि वे अच्छा काम भी करते हैं, और कमजोर प्रदर्शन भी दिखाते हैं। लोगों का कामकाज, या घर के भीतर उनका रहन-सहन, उनके तौर-तरीके बहुत सी बातों पर निर्भर करते हैं, और जब उनसे पूरी तरह से शानदार प्रदर्शन की उम्मीद की जाती है, तो उसके लिए उन्हें शानदार माहौल भी देने के बारे में सोचना चाहिए। 
इसके साथ-साथ यह भी समझने की जरूरत है कि किस बात में कितने परफेक्शन की जिद जायज है। अब रोटी 20 सेंटीमीटर की नहीं बनी, और 19 या 21 सेंटीमीटर की बन गई, तो न तो हाथ उसे खारिज करेंगे, न ही मुंह, और न ही पेट। एक बददिमाग इंसान ही उसे खारिज कर सकता है, और जो लोग ऐसी जिद पर आमादा रहते हैं वे अपनी खुद की जिंदगी को नर्क भी बनाने का काम करते हैं, आसपास के लोगों का तो जीना हराम करते ही हैं। लोगों को बहुत व्यवहारिक होना चाहिए कि उनकी स्थितियों में काम कितना अच्छा हो सकता है, और कितना अच्छा होना जरूरी है, और उससे अधिक की जिद आत्मघाती होती है। (Daily Chhattisgarh)
-सुनील कुमार

दीवारों पर लिक्खा है, 26 मार्च

लोगों के भीतर के हिंसक हैवान का हौसला बेहिसाब

संपादकीय
26 मार्च 2018


तमिलनाडू से एक वीडियो सामने आया है जिसमें एक बुजुर्ग महिला के हाथ-पैर बांधकर उसे समंदर में फेंकते हुए लोग दिख रहे हैं, और कुछ लोग इसका वीडियो भी बना रहे हैं। इस बूढ़ी और कमजोर महिला पर कुछ लोगों को बच्चे चुराने का शक था। इस वीडियो में कुछ लोग आवाज भी लगा रहे हैं कि उसे पानी में फेंक दो। उसे उठाकर जो समंदर में ले गया है वह उसे पानी में डालकर उसके ऊपर खड़ा हो रहा है, और कैमरे की तरफ देखकर महेन्द्र बाहुबली का फिल्मी नारा लगाते दिख रहा है। इसके पहले इस महिला को एक पेड़ से बांधे हुए भी वीडियो में दिखाया गया है। पुलिस के मुताबिक यह महिला मानसिक रूप से बीमार है। पिछले ही महीने तमिलनाडू में एक दूसरा मामला सामने आया था जिसमें एक लाश और दो बुजुर्गों को एक अस्पताल सब्जियों के साथ ढो रहा था, और उस पर ऐसे शक और आरोप थे कि वह मानव अंगों के कारोबार में लगा अस्पताल है, और इस अस्पताल को बंद करने का हुक्म दिया गया था। दो दिन पहले ही उत्तरप्रदेश का एक वीडियो सामने आया था जिसमें एक आदमी अपनी पत्नी को रस्सी से बांधकर, टांगकर, उसे घंटों तक अपने बेल्ट पीट रहा है, और अगल-बगल दर्जनों लोग घेरा बनाकर इसका मजा ले रहे हैं। इस मामले में खबर में आया था कि यह महिला किसी और आदमी के साथ चली गई थी, और लौटकर आने पर पंचायत ने उसे यह सजा सुनाई, और पति उसे इस तरह सजा दे रहा था। छत्तीसगढ़ में आज की खबर है कि कल जब नवरात्रि के समापन पर कन्याओं को भोज दिया जा रहा था, तब सरगुजा के कोरिया में 8 बरस की एक बच्ची के साथ दिल्ली के निर्भया कांड की तरह बलात्कार और हत्या का मामला सामने आया है। 
इंसान की हिंसा सिर चढ़कर सामने आती है। खासकर उन मामलों में जहां पर किसी कमजोर पर हिंसा करनी हो, चाहे वह कोई बच्ची हो, चाहे कोई महिला हो, बुजुर्ग हो, दिव्यांग हो, या फिर नीची कही जाने वाली किसी जाति के लोग हों। यह हिंसा तब और बढ़ जाती है जब हमलावर एक इंसान न होकर एक समूह हो, या कि भीड़ हो। जैसे-जैसे भीड़ में सिर बढ़ते जाते हैं, वैसे-वैसे उन सिरों से दिमाग घटते जाते हैं। नाटक पढऩे के शौकीन लोगों को याद होगा कि किस तरह विजय तेंदुलकर के एक नाटक, शांतता कोर्ट चालू आहे, में किसी एक जगह पर रात गुजारने के लिए मजबूर हुए लोग एक नाटक खेलते हैं, और उस नाटक में अदालत का सीन गढ़ा जाता है, और उसमें शामिल लोग किस तरह एक किरदार निभा रही महिला के खिलाफ हिंसक बातों पर उतर आते हैं, और समय गुजारने के लिए किया जा रहा यह मनोरंजन किस तरह हिंसक हो जाता है। यह हिंसा इंसानों का बुनियादी मिजाज है। इस मिजाज को छुपाने के लिए इंसान ने एक किरदार गढ़ा है, हैवान का। लोग हैवान की छवि इस तरह बनाते हैं कि वह इंसान से परे का कोई राक्षस, पिशाच, या दानव है। हकीकत यह है कि यह हिंसक राक्षस इंसान के भीतर ही उसी के व्यक्तित्व का, उसके दिल-दिमाग का, उसकी मानसिकता का एक अटूट हिस्सा है, और समय-समय पर मौका मिलते ही वह सामने आने लगता है। 
लेकिन एक सवाल यह उठता है कि सार्वजनिक रूप से लोगों की भीड़ जब ऐसे जुर्म करती है, तो उन मुकदमों की सुनवाई क्या ऐसी रफ्तार से नहीं होनी चाहिए कि कड़ी सजा बाकी समाज के लिए एक चेतावनी की तरह सामने आए, और ऐसी हिंसा घटे? आज तो ऐसा लगता है कि लोग अपनी हिंसा के साथ आराम से गुजर-बसर कर सकते हैं, कोई परिवार घर में बंधुआ बाल मजदूर रखकर उसे गर्म चिमटों से जला सकता है, कोई परिवार बूढ़ी मां को घर में बंद करके भूखे छोड़ जा सकता है, और कोई पति भीड़ के बीच अपनी बंधी हुई पत्नी को घंटों तक बेल्ट से पीट सकता है। हमारा ख्याल है कि ऐसे मामलों में जो लोग गवाह बने मजा लेते रहते हैं, उन सबको एक सामूहिक जिम्मेदारी के तहत सजा दी जानी चाहिए। हम बात-बात में विशेष अदालत की चर्चा तो नहीं करेंगे, लेकिन कमजोर और बेसहारा के खिलाफ होने वाली हिंसा के जिन मामलों में ऐसे वीडियो-सुबूत मौजूद रहते हैं, उन मामलों में कड़ी से कड़ी सजा और बड़ी रफ्तार से फैसला होना चाहिए, तभी जाकर समाज में लोगों के भीतर के हिंसक हैवान का हौसला कुछ पस्त होगा।(Daily Chhattisgarh)
-सुनील कुमार

दीवारों पर लिक्खा है, 25 मार्च

यह संन्यासी-योगी तो बोलता है बंदूक और गोलियों की जुबान

संपादकीय
25 मार्च 2018


एक संन्यासी-योगी के मुख्यमंत्री रहते हुए उत्तरप्रदेश में जिस तरह पुलिस मुठभेड़-हत्याओं में जुटी है, उस पर भगवा रंग होने से हैरानी नहीं होनी चाहिए क्योंकि योगी आदित्यनाथ खुद भी अपने पास लाइसेंसी हथियार रखते हैं, उनके पास रिवाल्वर और रायफल दोनों ही हैं। अभी पिछले महीने ही उन्होंने यह कहा था कि जो लोग हथियारों पर भरोसा रखते हैं उनको हथियारों से ही जवाब देना चाहिए। वे उत्तरप्रदेश के अपराधियों या संदिग्ध अपराधियों के बारे में बात कर रहे थे। अब कल की खबरें हैं कि पिछले बारह घंटों में उत्तरप्रदेश की पुलिस ने दो अलग-अलग मुठभेड़ें की हैं जिनमें एक ईनामी बदमाश को मारने का दावा किया गया है, और एक को गोली लगी है। एक योगी के मुख्यमंत्री बनने पर उम्मीद तो यह की जानी चाहिए थी कि वे अपराधियों को सुधारने का काम करेंगे, लेकिन वे योगी नहीं, योगी आदित्यनाथ हैं। 
अभी पांच हफ्ते पहले ही इसी जगह हमने लिखा था कि उत्तरप्रदेश में पुलिस ने घोषित और संदिग्ध मुजरिमों पर हमला बोला है, और पिछले महीने-दो महीने में 40 लोगों को मुठभेड़ में मार डाला। अब वहां हालत यह है कि जिन लोगों के खिलाफ कुछ मुकदमे चल रहे हैं, वे लोग तख्तियां लेकर घूम रहे हैं कि वे सुधर जाएंगे, उन्हें न मारा जाए। यह पूरा नजारा महाराष्ट्र में कई साल पहले के एक दौर की याद दिलाता है जब वहां माफिया किस्म के संगठित अपराध करने वाले मुजरिमों को पुलिस एनकाऊंटर में मारती थी और ऐसा करने वाले अफसरों के किरदार पर फिल्में भी बनी थीं। अब तक 56 जैसे नाम वाली फिल्म में जिस असली पुलिस अफसर पर किरदार बनाया गया था, उसे बाद में जमीन के धंधे में माफिया अंदाज में शामिल हो जाने के जुर्म में पकड़ा भी गया था, और सरकार को उसे हटाना पड़ा था। वह बात तो पुरानी हो गई लेकिन अभी हाल ही में फिलीपींस में वहां के राष्ट्रपति ने नशे का कारोबार करने के शक से घिरे हुए लोगों को मारने का हुक्म दिया, और सड़कों पर पुलिस ने इस कदर खूनखराबा किया कि वहां सरकार के मुताबिक 4 हजार और विदेशी जांच समूहों के मुताबिक 14 हजार से अधिक लोगों को पिछले एक बरस से कम समय में सड़कों पर ही मार दिया गया। 
जैसा कि हमने मुंबई की फिल्म का जिक्र किया है, सड़क और फुटपाथ पर तेज रफ्तार इंसाफ का यह सिलसिला किसी फिल्म की तरह ही दिलचस्प लगता है, और लोग इसे देखकर वाहवाही भी करते हैं, तालियां भी बजाते हैं। लेकिन दुनिया का इतिहास इस बात का गवाह है कि एक वक्त उत्तर-पूर्व में मिजोरम रहा हो, या कि बाद के बरसों में आतंक के दिनों का पंजाब रहा हो, या छत्तीसगढ़ का बस्तर रहा हो, जहां कहीं भी वर्दीधारी फौज या पुलिस को ऐसी खुली छूट मिलती है, वह ज्यादती पर उतर ही आती है। और धीरे-धीरे खुद इंसाफ करने और खुद ही सजा दे देने की बददिमागी उसी तरह वर्दी के सिर पर चढ़कर बोलने लगती है जिस तरह की आज बस्तर में नक्सली जनसुनवाई में किसी को भी पुलिस का मुखबिर करार देते हैं, और मौके पर ही उसका गला रेत देते हैं। सड़क पर इंसाफ का यह सिलसिला बहुत से लोगों को इसलिए भी सुहाता है कि भारत जैसे लोकतंत्र में अदालतों में फैसला होने में जिंदगी गुजर जाती है, और फिर भी दस में से नौ मामलों में गुनहगार छूट भी जाते हैं। इसीलिए एक वक्त था कि मुंबई का एक माफिया डॉन, हाजी मस्तान अपने घर पर सुनवाई करता था, और लोग वहां पर रहम और इंसाफ की भीख मांगते पहुंचते थे, और माफिया की बंदूकों से इंसाफ तय कर दिया जाता था। 
उत्तरप्रदेश में जो हो रहा है, वह लोकतंत्र के ठीक खिलाफ है। लोकतंत्र एक लचीली और खर्चीली, और खासी धीमी प्रक्रिया है जिसमें कोई शॉर्टकट नहीं रहते। लोकतंत्र में हर मुजरिम को सजा भी नहीं मिल पाती क्योंकि अदालतों में उनके गुनाह साबित नहीं हो पाते। ऐसे में सड़क पर इंसाफ और मुठभेड़-हत्या एक बड़ा लुभावना विकल्प लग सकता है, लेकिन तभी तक जब तक कि ऐसी पुलिस की बंदूकों का निशाना दूसरों की तरफ हो। जिस दिन ऐसी बंदूकें किसी बेकसूर की तरफ तन जाएं, उस दिन उस बेकसूर और उसके कुनबे को ताली बजाना भूल जाएगा। हैरानी की बात यह है कि उत्तरप्रदेश की योगी सरकार का यह बहुप्रचारित और स्वघोषित कारनामा न तो वहां के मानवाधिकार आयोग का ध्यान खींच रहा है, न ही उत्तरप्रदेश की लंबी-चौड़ी हाईकोर्ट इसका नोटिस ले रही है, और न ही राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग इस पर कुछ बोल रहा है। और तो और, उत्तर भारत के इस भयानक खूनी सिलसिले को लेकर दिल्ली में बसा राष्ट्रीय कहलाने वाला मीडिया भी कुछ नहीं कर रहा है। ऐसा लगता है कि यह लोकतंत्र थका हुआ है, इसके पैरों में अब इंसाफ के लंबे सफर की ताकत बची नहीं है, या फिर जो छोटे-छोटे मुजरिम मारे जा रहे हैं, उनका कोई महत्व नहीं है। हमारा ऐसा ख्याल है कि मारे गए इन 40 मुजरिमों ने कुल मिलाकर कुछ करोड़ रूपए का ही कोई अपराध किया होगा जिससे 11 हजार करोड़ अधिक का अपराध करके एक हीरा कारोबारी देश छोड़कर जा चुका है। इस लोकतंत्र में जिंदा रहने के लिए, और जेल से बचने, देश छोडऩे के लिए बड़ा मुजरिम होना जरूरी है, छोटे मुजरिम को इसी तरह सड़क पर मार दिया जाएगा, और उसकी गिनती को जोड़कर एक और फिल्म बन जाएगी, अब तक सत्तावन। (Daily Chhattisgarh)
-सुनील कुमार 

ट्रांसजेंडरों पर अमरीका से लेकर भारत तक का रूख

संपादकीय
24 मार्च 2018


अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वहां के ट्रांसजेंडर्स को बीमारी का शिकार बताते हुए उन्हें अमरीकी सेना के लिए अनफिट बताया है। उन्होंने जो आदेश जारी किया है उसमें यह भी कहा गया है कि ट्रांसजेंडर एक प्रकार की बीमारी से पीडि़त होते हैं, और उन्हें सही इलाज की जरूरत होती है। ऐसे में इन्हें मिलिट्री सर्विस के लिए अयोग्य माना जाता है। अमरीकी राष्ट्रपति की ओर से यह भी कहा गया है कि ऐसा इतिहास रखने वाले लोग मिलिट्री के लिए खतरा हो सकती हैं। ट्रंप राष्ट्रपति बनने के बाद से ट्रांसजेंडर लोगों के खिलाफ लगातार कुछ न कुछ बोलते आ रहे थे, और उन्होंने इन पर पूरी तरह रोक लगाने के लिए बयान दिए थे। 
दुनिया में ट्रांसजेंडरों के अलावा भी जितनी किस्म के दूसरे यौन प्राथमिकताओं वाले लोग रहते हैं, उनके खिलाफ एक परंपरागत माहौल चले आ रहा है। भारत में भी समलैंगिक लोगों के खिलाफ समाज से लेकर सरकार तक, और सड़क से लेकर संसद तक एक नापसंदगी का माहौल दिखता है। हालांकि हिन्दुस्तान के इतिहास में सैकड़ों बरस से ट्रांसजेंडर लोग जो कि पहले हिजड़े कहे जाते थे, और फिर कम अपमानजनक वैकल्पिक शब्द, किन्नर, कहे जाने लगे, उन्हें तरह-तरह से सामाजिक अपमान झेलना पड़ता है। लेकिन छत्तीसगढ़ देश के ऐसे गिने-चुने राज्यों में से रहा जिसने ट्रांसजेंडर या थर्डजेंडर कहे जाने वाले लोगों के लिए सामाजिक-आर्थिक पुनर्वास की नीति बनाई, और उनको बढ़ावा दिया। नतीजा यह निकला कि अभी पिछले हफ्ते गुजरात से ट्रांसजेंडर लोगों का एक प्रतिनिधि मंडल छत्तीसगढ़ यह देखने के लिए आया कि इस राज्य की नीतियों को गुजरात में किस तरह लागू किया जा सकता है, और इस तबके के कल्याण कार्यक्रम वहां कैसे लागू हो सकते हैं। 
दरअसल हिन्दुस्तान सहित दुनिया के बहुत बड़े हिस्से में सामान्य कहे जाने वाले आदमी और औरत के अलावा तमाम लोगों को असामान्य कहा और माना जाता है। भारत में समलैंगिकता को एक बीमारी माना जाता है, और इससे छुटकारा पाने के लिए इलाज सुझाया जाता है। कानून में इसके लिए सजा का इंतजाम है, और सुप्रीम कोर्ट तक ने कुछ अरसा पहले इस मामले में बड़ा ही दकियानूसी रूख दिखाया था, जिसे बाद में बदला। लोकतंत्र के भीतर भी सेक्स की पसंद और अपने आपको किसी भी यौन-प्राथमिकता वाले तबके में रखने की पसंद को समाज का बहुमत वाला हिस्सा कुचलकर रख देता है। लोकतंत्र के भीतर अपने से परे दूसरे किस्म के लोगों के लिए बर्दाश्त विकसित होने में भी वक्त लगता है, और जिस अमरीका में बराबरी के अधिकार अधिकतर मामलों में लागू होते चल रहे हैं, वहां भी राष्ट्रपति ट्रंप जैसे दकियानूसी और कट्टर आदमी की सरकार आने के बाद सभ्यता घटती चल रही है। 
अपनी पसंद से परे जीने की आजादी दूसरों को देना कोई आसान बात नहीं है, और इसमें लोगों की सहिष्णुता अधिक रहना जरूरी है, उनकी सोच वैज्ञानिक होना जरूरी है, उनके बीच समानता के अधिकार का सम्मान होना जरूरी है। देश की संसद और सुप्रीम कोर्ट पर देश की जनता की सोच का भी असर पड़ता है। इसलिए भारत में लोगों के बीच सभी किस्म के यौन-अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए बर्दाश्त बढ़ाने की जरूरत है। (Daily Chhattisgarh)
-सुनील कुमार

भारत की साइबर और बैंक नीति पर फिर से सोच-विचार जरूरी..

संपादकीय
23 मार्च 2018


एक तरफ दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक, फेसबुक पर से दुनिया की सबसे बड़ी डेटा-चोरी सामने आई है, और दूसरी तरफ भारत के सुप्रीम कोर्ट में आधार कार्ड के खिलाफ चल रही एक सुनवाई में आधार कार्ड परियोजना के मुखिया ने कहा है कि यह तकनीक पूरी तरह परफेक्ट नहीं है। इन दो बातों से परे भी यह समझ में आ रहा है कि जिस रफ्तार से भारत को डिजिटल, ऑनलाईन, कैशलेस बनाने की कवायद चल रही है वह खतरे से खाली नहीं है। हर पीएम, सीएम, या डीएम का यह हक तो होता है कि वे अपने कार्यकाल में मील के कुछ पत्थर लगाकर जाएं, लेकिन सवाल यह है कि कार्यकाल तो पांच बरस का होता है, और लोगों की जानकारी जिंदगी भर के लिए होती है। ऐसे में सरकार को अपने ही साइबर सुरक्षा सलाहकार के चार-छह दिन पहले आए एक बयान को देख लेना चाहिए जिसमें उन्होंने कहा है कि वे ऑनलाईन बैंकिंग कम से कम करते हैं, नहीं के बराबर। और इसके लिए वे एक खाते में 25 हजार रूपए अलग से रखते हैं, अपने मुख्य खाते से वे ऑनलाईन बैंकिंग नहीं करते। सरकार को यह भी समझने की जरूरत है कि जिस रफ्तार से देश को कैशलेस बनाने की कोशिशें चल रही हैं वे जनता पर कितनी भारी पड़ रही हैं। 
यहां पर दो बातें बिल्कुल अलग-अलग हैं, लेकिन ये दोनों ही बातें सरकार की डिजिटल और साइबर महत्वाकांक्षाओं से जुड़ी हुई हैं। जब दुनिया में फेसबुक जैसी बड़ी कंपनी भी अपने डेटा की हिफाजत नहीं कर पा रही है, तो भारत सरकार को भी यह मानना चाहिए कि उसका डेटा पूरी तरह सुरक्षित शायद न भी हो। और ऐसे में लोगों की बायोमैट्रिक जानकारी को इक_ा करके उसे देश-विदेश के सर्वर पर डालकर रखने से लोगों की निजी जिंदगी खतरे में पड़ रही है। आज भी दुनिया में ऐसी तकनीक मौजूद है जिससे लोगों के फिंगर प्रिंट को लेकर उसका बेजा इस्तेमाल किया जा सके। और भारत में तो तकरीबन पूरी आबादी के फिंगर प्रिंट, उनकी आंखों के भीतर की जानकारी, सब कुछ सरकार के पास है, और सब कुछ बहुत बुरी तरह के खतरे में भी है। लगे हाथों सरकारी महत्वाकांक्षा के एक दूसरे पहलू पर भी चर्चा जरूरी है। मोदी सरकार ने देश से नगदी कारोबार को कम से कम करने के लिए नोटबंदी की, और उसके बाद बैंक से नगद निकालने पर भी सौ तरह की रोकटोक लागू की। लेकिन अभी यह तथ्य सामने आया है कि बैंक किसी एटीएम कार्ड के हर इस्तेमाल पर चार्ज लगा रहे हैं, चाहे उससे पैसा निकला हो, या न निकला हो। बैंक उसे उसी तरह गिनकर चल रहे हैं कि मानो कोई चेक बाऊंस हो गया हो, और उस पर जुर्माना लग रहा हो। अगर सरकार सचमुच ही कैश का लेन-देन घटाना चाहती है, तो उसे एटीएम कार्ड के इस्तेमाल को इतना महंगा नहीं करना चाहिए। ऐसा लगता है कि बैंक अपने बड़े कर्जों पर जो हजारों करोड़ रूपया अपनी ही जालसाजी से खो रहे हैं, उसकी भरपाई वे आम जनता से कर रहे हैं। यह सिलसिला लोगों का भरोसा बैंकों पर से घटा रहा है, और लोगों को इस बात के लिए मजबूर भी कर रहा है कि वे एक बार में ही जरूरत से अधिक नगदी निकालकर रख लें क्योंकि बाद में हर ट्रांजेक्शन पर बैंक वसूली-उगाही करेगा, जुर्माना लगाएगा। 
भारत सरकार को अपनी साइबर नीति, अपनी आधार नीति, और अपनी बैंक नीति इन सबके बारे में फिर से सोचना चाहिए क्योंकि जिंदगी की निजता को खतरे में डालना अलोकतांत्रिक बात है, और इसी तरह गरीब जनता पर ऐसी कैशलेस व्यवस्था लादना भी अलोकतांत्रिक है जिसमें उसे हर बार भुगतान या जुर्माना देना पड़े। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 मार्च

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का दीवारों पर लिक्खा है, 22 मार्च


दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 22 मार्च : पानी के लिए युद्ध हो, उसके पहले जागने की जरूरत...

संपादकीय
22 मार्च 2018


दुनिया में आज जल दिवस मनाया जा रहा है। लोगों का अंदाज है कि पानी की ऐसी कमी आने वाली है कि आने वाले विश्व युद्ध शायद पानी के लिए लड़े जाएं। दुनिया के अलग-अलग देशों में कई शहरों में पानी खत्म हो चला है, और अरबों लोगों को साफ पानी मिलने की दिक्कत भी हो रही है, और पानी कम भी पड़ रहा है। दूसरी तरफ कुदरत की दी हुई इस एक सबसे अधिक जीवनरक्षक चीज पर सब लोगों का बराबरी से जो हक होना चाहिए, वह सबसे अधिक अलोकतांत्रिक बंदरबाट होकर रह गया है। अब बंदर तो किसी चीज को बांटने में ऐसी बेइंसाफी करते नहीं हैं, लेकिन मनमाने बंटवारे के लिए चली आ रही इस बात को हम बंदर से माफी मांगते हुए लिख रहे हैं। आज हाल यह है कि दर्जनों देशों में अरबों महिलाओं को कई किलोमीटर दूर से पानी ढोना पड़ता है, और साफ पानी फिर भी न मिलने से गंदे पानी की वजह से अरबों लोगों को बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है। जिस धरती का एक बड़ा हिस्सा पानी के समंदरों से बना है, उस धरती पर पानी की कमी होना, और उसका बढ़ते चलना कोई रहस्य नहीं है, यह एक खुली किताब की तरह की हकीकत है जिसे जानते सब हैं, लेकिन जिम्मेदारी को मानते कोई नहीं हैं। 
कुदरत की नेमतों का बराबरी का बंटवारा न मानने का नतीजा यह है कि दुनिया के रईस लोग निजी स्वीमिंग पूल रखते हैं, उनके गोल्फ खेलने के लिए मीलों के इलाके पर घास को पानी से सींचा जाता है, और लोग कारों को धोने में इतना पानी लगा देते हैं जितना गरीबों के एक पूरे कुनबे को रोजमर्रा के तमाम काम के लिए भी नसीब नहीं होता। जैसे-जैसे टेक्नालॉजी ने लोगों को जमीन के भीतर से पानी निकालकर मशीनों से उसे तेजी से खर्च करने की ताकत दी है, लोग इस फौलादी ताकत से जमीन के नीचे कुदरत की टंकी खाली किए जा रहे हैं। दूसरी तरफ बारिश के पानी को सुरक्षित तरीके से धरती के भीतर वापिस डालने की तकनीक बड़ी आसान और सस्ती होने के बावजूद उसका इस्तेमाल नहीं हो रहा है। एक साधारण समझबूझ से देखें तो यह साफ दिखता है कि बारिश के मौसम में नदियों तक इतना पानी पहुंचता है कि उनमें बाढ़ आ जाती है, बाढ़ में दुनिया के दर्जनों देशों के दसियों हजार लोग हर बरस मरते हैं, समुद्र के बारे में कहा जाता है कि उसके पानी की सतह ऊपर आती जा रही है, और कई देशों के कई शहर आने वाले वक्त में समंदर के पानी में डूबने जा रहे हैं। अब यह समझने की जरूरत है कि धरती के भीतर से पानी को निकालकर इस्तेमाल करके उसे भेजा तो समंदर में ही जाता है, लेकिन धरती के भीतर की टंकी को भरा नहीं जा रहा है। लेकिन टेक्नालॉजी की ताकत है कि हर बरस 25-50 फीट और गहराई तक पंप उतार दिया जाता है, और इंसान ने मानो यह कसम खाकर रखी है कि वह कुदरत का पेट खाली करके ही मानेंगे। 
बारिश के पानी को नदियों तक पहुंचने के पहले अगर सुरक्षित तरीके से ग्राऊंडवाटर रीचार्जिंग में इस्तेमाल किया जाए तो उससे तीन खतरे एक साथ घटेंगे। धरती के भीतर भूजल स्तर गिरना थमेगा, नदियों में बाढ़ आना थमेगी, और समुद्र का जल स्तर बढऩा भी शायद इससे थमेगा। एक वक्त था जब हिन्दुस्तान के गांवों जैसी जगहों पर बड़े-बड़े तालाब हुआ करते थे, और उनका पानी रिस-रिसकर धरती के भीतर जाते रहता था। बिजली के पंप से धरती का पानी उलीचने की रफ्तार सीमित थी, और शहरीकरण भी सीमित था। लेकिन अब इंसान ने बहुत ही आक्रामक तरीके से मानो कुदरत से दुश्मनी निकालना शुरू किया है, बिना यह सोचे हुए कि वह खुद अपने लिए प्यास से मौत का रास्ता तैयार कर रहे हैं। ग्राऊंडवाटर रीचार्जिंग एक ऐसी प्राकृतिक तकनीक से होने वाला काम है जिसमें न बिजली लगना है, न ही कोई मशीन लगनी है। बल्कि धरती के भीतर पानी जाएगा तो वह पंप की बिजली को बचाएगा। लेकिन लोगों की समझ इतनी तंगदिली का शिकार हो चुकी है कि उन्हें बिजली का खर्च घटाने की गारंटी भी नहीं दिखती, और उन्हें आज पानी को धरती में डालने पर बहुत मामूली सा खर्च भी गैरजरूरी लगता है। दिक्कत यह है कि ग्राऊंडवाटर रीचार्जिंग एक सार्वजनिक-सामूहिक जिम्मेदारी है, और हिन्दुस्तान जैसे देश में सामूहिक संपत्ति तो हर किसी के बेजा इस्तेमाल का सामान रहती है, सामूहिक जिम्मेदारी कुछ भी नहीं होती है। 
ऐसे में सरकार को ही बड़े पैमाने पर बंजर और सुनसान जगहों पर भी, जरूरत हो तो आबादी से दूर की जगहों पर भी, किसी भी रोजगार योजना से जोड़े बिना केवल धरती के लिए, किसी भी निस्तारी की जरूरत से जोड़े बिना केवल कुदरत के लिए ग्राऊंडवाटर रीचार्जिंग को बहुत बड़े पैमाने पर तुरंत शुरू करना चाहिए। इसके लिए चाहे मशीनों से ही, ऐसे बड़े-बड़े तालाब ऐसी जगहों पर बनाने चाहिए जहां पर से नदियों तक जाने वाले पानी को मोड़ा और रोका जा सके। एक बार ऐसे बड़े-बड़े और गहरे तालाब, और उन तक पानी को लाने के लिए नहर-नालियां भी बना दी जाएंगी, तो वे अगले सौ-पचास बरस तक भी धरती में पानी डालती रहेंगी, और एक दिन ऐसा भी आ जाएगा जब ट्यूबवेल के पंप उतनी गहराई तक नहीं डालने पड़ेंगे। लेकिन यह सब उस दिन के पहले करना पड़ेगा जिस दिन पानी के लिए दो देशों के बीच हथियारबंद युद्ध शुरू हो जाए। जल दिवस पर लोगों को सूखी धरती पर जल मरने की नौबत से बचना चाहिए क्योंकि पानी के बिना कुछ भी बचने वाला नहीं है, और पानी रहेगा तो बंजर जमीन पर भी धीरे-धीरे जंगल और फसल सब कुछ पनपने लगेंगे। 
- सुनील कुमार 

बिना काम कमाने वाले को क्या कहते हैं सोचें सांसद..

संपादकीय
21 मार्च 2018


संसद में कामकाज ठप्प पड़ा हुआ है, और किसी न किसी मुद्दे को लेकर विपक्षी दल तरह-तरह से प्रदर्शन कर रहे हैं। खुद सत्तारूढ़ एनडीए के साथ रहे कुछ दल भी एनडीए की मुखिया भाजपा के खिलाफ चल रहे हैं, और संसद के भीतर-बाहर, राज्यसभा चुनाव के मौके पर कई पार्टियां भाजपा को आंख दिखा रही हैं। लेकिन संसद के भीतर किसी मुद्दे पर सत्तापक्ष का विरोध करते हुए विपक्ष जब भी बहिष्कार करता है, या सदन की कार्रवाई चलने नहीं देता है, तो हम हमेशा से उसका विरोध करते आए हैं। संसद और विधानसभाओं का इस्तेमाल ऐसे विरोध-प्रदर्शन में नहीं होना चाहिए जिससे वहां की कार्रवाई न चले। यह इसलिए जरूरी है कि संसद और विधानसभा में विपक्ष को ऐसे विशेषाधिकार मिले रहते हैं जो कि सदनों के बाहर नहीं रहते। वहां पर सरकार को घेरने के लिए विपक्ष मनचाही जानकारी मांग सकता है, और इस मौके को चूक कर विरोध करना लोकतंत्र में विपक्ष के लिए आत्मघाती काम रहता है। 
लोकतंत्र में विरोध दर्ज कराने के लिए बहुत सी जगहें और बहुत से मौके रहते हैं। ऐसे में सदन के गिने-चुने दिनों को बर्बाद करना ठीक नहीं है। अब तक आम जनता के बीच से यह बात उठती थी कि संसद अगर काम नहीं कर रही है तो उसके लोगों को तनख्वाह नहीं देनी चाहिए। अब सत्तारूढ़ पार्टी के दिल्ली के सांसद मनोज तिवारी ने यही मांग करते हुए लोकसभा अध्यक्ष को एक चि_ी लिखी है। हम इसे एक प्रतीकात्मक कदम मानते हैं जिससे कि नाराज जनता का दिल जीता जा सकेगा जो कि बिना काम सांसदों को तनख्वाह देना नहीं चाहती। लेकिन जब कभी जो पार्टी विपक्ष में रहती है, सदन की कार्रवाई चलने देने के खिलाफ उसका ऐसा ही रूख रहता है। इसी के चलते हुए अभी दो दिनों से सोशल मीडिया पर कुछ लोग यह मांग कर रहे हैं कि सांसदों को पन्द्रह-बीस बरस के कार्यकाल के बाद ही पेंशन का हक मिलना चाहिए, जैसा कि फौज के लोगों को मिलता है, आज तो सांसद पांच बरस के बाद भी बाकी जिंदगी पेंशन पाते हैं। सांसदों के लिए अलग से इलाज का इंतजाम खत्म होना चाहिए और उन्हें आम जनता को मिलने वाले स्वास्थ्य बीमा से ही गुजारा करना चाहिए, सांसदों द्वारा अपनी तनख्वाह को मनमाने तरीके से बढ़ाना खत्म हो जाना चाहिए, और जब केन्द्रीय वेतनमान कर्मचारियों की तनख्वाह बढ़ाता है, उसी समय उसी मुताबिक सांसदों की तनख्वाह भी बढऩी चाहिए। हम इन बातों का अभी तर्कसंगत होना या न होना तय नहीं कर रहे हैं, लेकिन जनता की भावनाएं कुछ इसी किस्म की हैं। दरअसल शब्दकोष में बिना काम किए हुए तनख्वाह या मजदूरी पाने वाले के लिए एक बड़ा ही अपमानजनक शब्द इस्तेमाल होता है, जिसे हम यहां लिखेंगे तो संसद उसे असंसदीय मानकर, अपमानजनक मानकर, विशेषाधिकार भंग होने का एक नोटिस भेजेगी। ऐसे विशेषाधिकार से लैस संसद से उलझकर अपना वक्त बर्बाद करने के बजाय हम पाठकों की कल्पनाशीलता पर यह छोड़ देते हैं कि बिना मेहनत किए कमाने वाले को क्या कहा जाता है। 
फिलहाल हम अपनी इस पुरानी राय को दुहराना चाहते हैं कि संसद और विधानसभा में विपक्ष को यह चाहिए कि वह अधिक से अधिक समय तक सत्र को चलाने की कोशिश करे, और वहां पर अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल करके सरकार से जानकारी मांगे, जवाब मांगे, और जहां गलती या गलत काम दिखे, उसे सदन की कार्रवाई में दर्ज कराकर इतिहास का हिस्सा बनाए। अगर कोई विरोध-प्रदर्शन करना है तो उसके लिए विपक्ष संसद या विधानसभाओं के अहातों में लगी गांधी प्रतिमा के पास सदन के समय के पहले और बाद एकजुट होकर प्रदर्शन कर ले। जनता के हिस्से का जो वक्त सदन में मिलता है, उसे बर्बाद करना ठीक बात नहीं है। जिस वक्त केन्द्र सरकार को एक दूसरा गठबंधन चला रहा था, और आज का सत्तारूढ़ गठबंधन उस वक्त विपक्ष में था, तब भी हमारी यही सलाह थी। केन्द्र के लिए भी, और राज्यों के लिए भी। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 21 मार्च

चुनौतियों वाले मौकों पर चुप रह जाने या नदारत रहने वाले राहुल

संपादकीय
20 मार्च 2018


अभी कांग्रेस का राष्ट्रीय अधिवेशन हुआ तो उसमें राहुल गांधी के भाषण में देश के मोदी और भाजपा विरोधियों को उम्मीद दिखाई दी। कुछ लोगों ने राहुल गांधी की बातों में एक नई परिपक्वता देखी, तो कुछ लोगों ने मोदी सरकार पर भ्रष्टाचार की राहुल की तोहमतों को खासा तेज हमला माना। लेकिन राहुल गांधी के व्यक्तित्व और उनकी सोच में अगर कोई बदलाव आया है, और वह अहमियत रखता है, तो उसे समझते हुए आज की एक ट्वीट को देखना भी जरूरी है। एक पत्रकार ने लिखा है- राहुल गांधी का भाषण बताता है कि पप्पू बड़ा हो गया है, तब तक, जब तक कि वे योरप की अगली फ्लाईट न पकड़े।
अब राहुल गांधी के साथ दिक्कत यह है कि उनकी जवाबदेही बहुत ही कम है। अपनी पार्टी के भीतर उनका राज किसी काबिलीयत की वजह से नहीं है, अपने डीएनए की वजह से है। और इसमें भी कोई बहुत अटपटी बात नहीं है, हिंदुस्तान में आज शायद तीन-चौथाई पार्टियां लोकतंत्र के बजाय डीएनए पर चल रही हैं, और कांगे्रस शायद उनमें सबसे बड़ी पार्टी है, इसलिए वह कुनबापरस्ती की तोहमतों में एक बड़े हिस्से की, सबसे बड़े हिस्से की, हकदार भी है। लेकिन आज यहां इस मुद्दे पर लिखने का मकसद कांगे्रस की कुनबापरस्ती को गिनाना नहीं है, वह बात अब आई-गई हो गई, अब भारतीय लोकतंत्र में कांगे्रस के सामने जो चुनौतियां खड़ी हैं, उन पर कांगे्रस पार्टी और उसकी लीडरशिप का रूख एक मुद्दा है जो सोचने-विचारने के लायक है। 
राहुल गांधी समंदर में आए ज्वारभाटा की लहरों सरीखे रहते हैं, कभी वे कोई ऊंचा और आक्रामक बयान देते हैं, तो कभी वे सतह से मिलने की हद तक सपाट लहर बन जाते हैं। जब देश में कोई बड़ा मुद्दा होता है, जब जलती-सुलगती कोई बात होती है जिस पर हर पार्टी और हर नेता से जनता उनका रूख उजागर होने की उम्मीद करती है, तो ऐसे बहुत से मौकों पर राहुल गांधी विदेश में छुट्टियां मनाते रहते हैं। और आज का वक्त तो ऐसा भी नहीं है कि दूसरे देश में रहते हुए लोग अपने देश की हलचल को जान न सकें, उस पर कुछ बोल न सकें। लेकिन राहुल गांधी ठीक अपनी मां सोनिया गांधी की तरह देश की जनता और अपनी पार्टी की उम्मीदों से ऐसे अछूते नेता हैं जो कि वन-वे टै्रफिक वाली सड़क के एक सिरे पर बैठे और बसे हुए हैं। उनको जब और जो कहना ठीक लगता है, उनकी पार्टी और उनके वोटरों को उसे ही काफी मानना होता है। उससे अधिक इस कुनबे से कुछ पाना नहीं हो पाता।
भारत की तरह का चुनावी लोकतंत्र चुनिंदा मौकों पर चुनिंदा बातें बोलकर चुनौतियों के मौकों पर चुप रह जाने या नदारत रहने जैसा लोकतंत्र नहीं है। एक तरफ नरेन्द्र मोदी किस्म के नेता हैं जो कि घर-बार से दूर, अकेले और आजाद, अठारह घंटे तक रोज काम करने के आदी हैं जिन्होंने छुट्टियां शायद कभी देखी नहीं है। इसलिए जब चुनावी मुकाबला ऐसे लीडर से हो, तो जनता दूसरे लीडर को भी देखती है और उसकी तुलना किए बिना भी नहीं रहती। ऐसे में चुनौती के वक्त अदृश्य रहने वाले गैरमौजूद नेता की राह आसान नहीं हो सकती। अगर राहुल गांधी को देश के विपक्ष की राजनीति में प्रासंगिक बने रहना है, तो उन्हें अपने वक्त पर अपने निजी हक का तौर-तरीका छोड़कर देश और जनता के प्रति अधिक जवाबदेह होना होगा। आज भी अधिकतर मोदी-विरोधी लोग राहुल को एक नॉनसीरियस, गैरगंभीर नेता मानते हैं, और उन्हें इस जनधारणा को बदलने के लिए खासी मेहनत करनी पड़ेगी, तब कहीं जाकर वे जनमत को बदलने की स्थिति में आ पाएंगे। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 20 मार्च

शंकराचार्य की कही बात और उसमेंं छुपे हुए गहरे मतलब...

19 मार्च  2018

छत्तीसगढ़ पहुंचे हुए एक शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने कहा कि आदिवासी हिन्दू नहीं है क्योंकि वे दूसरे धर्म को अपना लेते हैं। उन्होंने कहा कि जो हिन्दू हैं वे कभी दूसरा धर्म नहीं अपना सकते। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि भारत के लिए आज सबसे बड़ा खतरा संस्कृति की रक्षा न करना है। लोगों को चूंकि इस देश की संस्कृति का ज्ञान नहीं है इसलिए महिलाओं के साथ अत्याचार, चोरी, भ्रष्टाचार, कत्ल, जैसे पाप हो रहे हैं। जिस दिन संस्कृति का ज्ञान हो जाएगा देश से खतरा हट जाएगा।
शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती के छत्तीसगढ़ में बड़े भक्त हैं, और वे हर कुछ महीनों में यहां आते ही हैं। धर्म की गद्दी पर रहते हुए भी उनकी एक राजनीतिक विचारधारा बड़ी मुखर है, और कई लोग उन्हें कांग्रेसी शंकराचार्य भी कहते हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह कि देश में कई दूसरे स्वघोषित संत या साधू के चोगे में घूमते लोग खुलकर भाजपा का साथ देते हैं। लेकिन राजनीतिक रूझान किसी की सोच को पूरी तरह तब्दील कर दे ऐसा भी नहीं होता। आदिवासियों के बारे में शंकराचार्य ने जो कहा है उसका एक सामाजिक और राजनीतिक पहलू भी है, जिसे समझने की जरूरत है।  स्वरूपानंद सरस्वती ने मिसाल तो आदिवासियों की दी है, लेकिन यह भी कह दिया है कि जो लोग दूसरा धर्म अपनाते हैं, वे हिन्दू नहीं हो सकते।
जैसा कि धर्म की गद्दी पर काबिज किसी भी दूसरे हिन्दू ब्राम्हण से उम्मीद की जाती है, स्वरूपानंद सरस्वती ने भी दलितों और आदिवासियों के बारे में ही मोटे तौर पर यह बात कही है क्योंकि ये ही दो तबके हिन्दू धर्म छोड़कर दूसरे धर्म अपनाने की तोहमत पाते हैं। यहां यह याद रखने की जरूरत है कि आदिवासियों के अपने धार्मिक रीति-रिवाज हिन्दू धर्म के पैदा होने के भी दसियों हजार साल पहले से चले आ रहे हैं, और एक वक्त उनको हिन्दू मानकर उनका शोषण करने की कोशिश हुई थी, और आज जब वे हिन्दू धर्म को न मानकर ईसाई बन रहे हैं, या कोई दूसरा धर्म अपना रहे हैं, तो शंकराचार्य ने गैरहिन्दू करार देकर यह साबित करने की कोशिश की है कि हिन्दू अगर कोई होता तो वह धर्म बदलता ही नहीं।
उनकी इस बात ने हमको धर्म छोडऩे या धर्म अपनाने पर चर्चा का सामान जुटा दिया है। जब हिन्दुओं को अपनी गिनती बढ़ाने की जरूरत लगी, और एक ऐसे तबके की जरूरत हुई जो कि धर्म की मशीन का पुर्जा बना देने पर उसके बोझ को ढोने के लिए एकदम माकूल दिख रहा था, तो उन्होंने दलितों और आदिवासियों को हिन्दू मान लिया। हिन्दू के अलावा हिन्दू धर्म के भीतर जो जाति व्यवस्था का हिंसक ढांचा था, उसने दलितों और आदिवासियों को पैरों के जूते बनाकर जूते बनाने और जूते ढोने के काम में लगा दिया। धर्म को ताकतवर तबके के हाथों कमजोर तबके के शोषण के औजार के रूप में ही गढ़ा गया था, और धर्म के ढांचे में, धर्म के दायरे में इनको लाए बिना इनका शोषण मुमकिन नहीं था। इसलिए इनको हिन्दू माना गया, और दबाकर, कुचलकर इनको सवर्ण होने का दावा करने वाली दूसरी जातियों का बोझ, और उनका मैला ढोने में भी लगाया गया।
आजाद भारत में जब कानून ने दलितों और आदिवासियों को थोड़े से कागजी हक दिए, तो दलितों ने बौद्ध होना शुरू किया, कहीं-कहीं वे मुस्लिम भी हुए। इसके पहले अंग्रेजों के यहां आने पर बहुत से आदिवासी ईसाई बने, और चूंकि राजा का धर्म ही परंपरागत रूप से प्रजा का धर्म माना जाता है, इसलिए मुगलों के वक्त भी बहुत से दलित मुगल बन गए। इसकी एक और बड़ी वजह यह थी कि हिन्दू धर्म के सनातनी और मनुवादी ढांचे में दलितों और आदिवासियों के लिए इज्जत की कोई जगह नहीं थी, इसलिए जब मुस्लिम और ईसाई शासकों ने दलितों को अछूत नहीं माना, तो उसने शायद पहली बार इस तबके को एक गौरव का मौका दिया, एक हीनभावना से उबरने का मौका दिया, और अपने आपको इंसान पाने का एक एहसास कराया।
लेकिन अब जो दलित या आदिवासी दूसरे धर्म में जा रहे हैं, उनको शंकराचार्य हिन्दू मानने से ही इंकार कर रहे हैं, जाने के बाद में ही, जाने के पहले से ही। धर्म की गद्दी से सामाजिक हकीकत और इंसाफ की कोई उम्मीद वैसे भी नहीं की जा सकती, इसलिए शंकराचार्य की बात सुनकर अधिक हैरानी नहीं होती। लेकिन खुद हिन्दू धर्म के हितों के यह बात खिलाफ जाती है कि उसके भीतर सबसे दबकर रहने वाले, और उसकी गिनती खासी बढ़ाने वाले समुदायों को अब हिन्दू धर्म से परहेज होने लगा है, चाहे वे कभी उसने औपचारिक रूप से रहे हों, या न रहे हों, और महज उसमें गिने गए हों।
दलित या आदिवासी का हिन्दू धर्म से परे किसी दूसरे धर्म में जाना धर्मांतरण हो या न हो, वह किसी न किसी गैरहिन्दू धर्म की गिनती और उसकी ताकत बढ़ाने की बात तो है ही। हिन्दू धर्म को जो लोग महज सनातनी, सवर्णी, और ब्राम्हणवादी बनाकर चलना चाहते हैं, वे दूसरे धर्मों के हाथ मजबूत कर रहे हैं। इसमें हमको कोई नुकसान नहीं दिखता क्योंकि जो धर्म एक साजिश के तहत ऐसा करता हो कि जिनको अपना गिने उन्हीं को कुचले, तो वह धर्म धिक्कार और धक्के के लायक ही है, और आज हिन्दू धर्म अपने आपको ऐसा ही साबित कर रहा है। हिन्दू गद्दियों पर बैठे हुए लोग, हिन्दू रंग को पहने हुए अपने आपको साधू-संत कहते हुए लोग, इन लोगों ने हजारों बरस से दलित-आदिवासियों के चले आ रहे रीति-रिवाजों को कुचलने की जो कोशिश की है, उसके बाद ये तबके अगर अपने आपको हिन्दू धर्म से परे का कहना और मानना शुरू नहीं करेंगे, तो यह उनका ही नुकसान होगा। ऐसा धर्म जो संगठित रूप से लगातार किन्हीं तबकों का शोषण करे, वह धर्म उन तबकों की निष्ठा और आस्था का हकदार भी नहीं हो सकता। इसलिए यह बात अच्छी ही है कि शंकराचार्य जैसे लोग अपनी सोच को खुलकर, और अधिक मौकों पर बता रहे हैं। इससे दलितों और आदिवासियों को अपनी आस्था के संगठन चुनने की जरूरत भी महसूस भी होगी, और आसानी भी होगी।
अत्याचारी शोषक को झटका देने के लिए सामाजिक जागरूकता की जरूरत होती है। महाराष्ट्र में दलितों ने एकमुश्त बौद्ध होकर यह दिखाया है। दक्षिण के कई राज्यों में दलित मुस्लिम बने हैं, और ईसाई भी। आदिवासियों ने भी देश भर में बहुत सी जगहों पर ईसाई बनकर यह जाहिर कर दिया है कि वे या तो कभी हिन्दू थे ही नहीं, या फिर उन्होंने हिन्दू धर्म को छोड़ दिया है। दलित-आदिवासी का गैरहिन्दू धर्म अपनाना, हो सकता है कि किसी दिन जाकर हिन्दू गद्दियों को अक्ल दे सके, उन्हें सामाजिक हकीकत का अहसास करा सके। लेकिन अगर ऐसा न हो सका, तो जिस तरह हिन्दुस्तान में सबसे पुरानी और सबसे बड़ी कांग्रेस पार्टी सिमटते हुए अब जरा सी रह गई है, उसी तरह सबसे पुराना और सबसे बड़ा हिन्दू धर्म भी सीमित रह जाएगा। हो सकता है कि इसमें हजार-पांच सौ बरस लग जाएं, लेकिन लोकतंत्र और शहरीकरण के विकास के साथ, टेक्नालॉजी के विकास के साथ अब जुल्म और ज्यादती से कोई धर्म चल नहीं सकता। धर्म का ढांचा वैसे तो अलोकतांत्रिक ही होता है, लेकिन लोगों की विकसित होती राजनीतिक समझ, और उनकी लोकतांत्रिक-अधिकारों की चाह उन्हें ऐसे तमाम धर्मों से दूर ही ले जाएगी। कुल मिलाकर यह कि दूसरे धर्मों में जाने वाले आदिवासियों को शंकराचार्य अगर यह कह रहे हैं कि वे कभी हिन्दू थे ही नहीं, तो वे आज इक्कीसवीं सदी में भी पिछले सैकड़ों या हजारों बरस के शोषण को समझने-मानने से इंकार ही कर रहे हैं। यह बात उनके अपने धार्मिक शिक्षण-प्रशिक्षण के हिसाब से एकदम सही है क्योंकि वे शोषण के एक ढांचे का एक हिस्सा हैं, सबसे ऊपर का हिस्सा। (Daily Chhattisgarh)

छोटे पुलिस कर्मचारियों के तन-मन ठीक रखने के लिए

संपादकीय
19 मार्च 2018


छत्तीसगढ़ में कल पुलिस में प्रमोशन के लिए हो रही एक दौड़ में एक सिपाही की मौत हो गई। पिछले बरस भी ऐसा ही हुआ था। पचास बरस की उम्र में किसी सिपाही को हवलदार बनने के लिए अगर अपने फिटनेस की परीक्षा देनी हो, और उसके लिए दौड़ के नियम तय हों, तो हो सकता है कि हर कोई उसके लायक तैयार न हों, और ऐसा हादसा हो जाए। अब कल हुए इस हादसे के साथ एक दूसरी बात यह भी जुड़ी हुई है कि ऐसे शारीरिक परीक्षण के दौरान किसी डॉक्टर या इलाज का इंतजाम नहीं था। लेकिन इस छोटी जानकारी से परे यह समझने की जरूरत है कि पुलिस विभाग के छोटे कर्मचारी किस हाल में रहते हैं, और उनसे अचानक फिटनेस की ऐसी उम्मीद किस वजह से गलत है। 
जो लोग पुलिस के काम को रोजाना देखते हैं, वे जानते हैं कि छोटे कर्मचारियों का अधिकांश हिस्सा जेल से कोट-कचहरी, या थाने से अस्पताल, या एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर कैदी और फाईलों को लेकर आने-जाने का काम करते हैं। पुलिस की जांच में भी किसी तरह की दौड़-भाग की जरूरत नहीं पड़ती है। एक बहुत छोटा सा हिस्सा जो कि कानून-व्यवस्था बनाने में लगे रहता है, उसे ही सड़कों पर प्रदर्शन या भीड़भाड़ से निपटने के लिए ताकत और फिटनेस की जरूरत पड़ती है। नतीजा यह होता है कि इस विभाग के अधिकतर लोग प्रमोशन के वक्त किसी दौड़-भाग के लायक बचते भी नहीं है। फिर यह भी है कि बीस बरस की नौकरी में कभी ऐसी दौड़-भाग न करनी पड़े, और फिर एकाएक प्रमोशन के वक्त उनसे ऐसा करवाया जाए, तो उनकी सेहत के लिए खतरे की बात रहती ही है। पुलिस के छोटे कर्मचारियों की जिंदगी में शायद ही ऐसा समय निकलता हो कि वे कसरत करके तंदुरूस्त रह सकें क्योंकि उनकी ड्यूटी दिखाई कहीं भी जाए, उनमें से बहुत से लोग बड़े ओहदों पर बैठे हुए लोगों के बंगलों पर चपरासियों की तरह इस्तेमाल किए जाते हैं, और बच्चों से लेकर कुत्तों तक को घुमाने में काम लाए जाते हैं। ऐसा सब काम करते हुए, कपड़े धोते हुए, खाना पकाते हुए, या लॉन सींचते हुए, उनका मनोबल भी टूट चुका होता है, और उन्हें लगता है कि पुलिस का काम सेवा-चाकरी करना ही है। 
हम विभागीय पदोन्नति के लिए बनाए गए पैमानों के खिलाफ नहीं हैं, वे तो होने ही चाहिए, लेकिन इसके साथ-साथ छोटे पुलिस कर्मचारियों की तकलीफों, काम के उनके बुरे हालात, और उनके मनोबल के बारे में भी सोचने की जरूरत है जिस पर देश में बहुत सी कमेटियों और आयोगों की रिपोर्ट पड़ी हुई हैं। लेकिन हम पुलिस के कामकाज के हालात सुधारने के लिए सरकार में एक ईमानदारी और गंभीरता को काफी मानते हैं। अगर सरकार यह तय कर ले कि किसी पुलिस कर्मचारी को मंत्रियों और अफसरों के बंगलों पर, और यहां तक कि रिटायर्ड अफसरों के घरों पर, काम पर नहीं लगाया जाएगा, पुलिस से पुलिस का काम ही करवाया जाएगा, तो भी जनता के पैसे की बर्बादी थमेगी, और पुलिस कर्मचारियों को अपने काम में गौरव भी हासिल हो सकेगा। दूसरी बात यह कि जिस तरह राज्य सरकार बाग-बगीचों में, और सड़कों के किनारे कसरत की मशीनें लगा रही है, हर थाने के अहाते में ऐसी मशीनें लगानी चाहिए जिसका इस्तेमाल पुलिस कर्मचारी भी कर सकें, और आसपास के लोग भी। इससे पुलिस की एक जनकल्याणकारी तस्वीर भी लोगों के मन में बनेगी, और पुलिस में भी अपनी सेहत ठीक रखने का उत्साह होगा। 
लेकिन जब तक यह सब न हो जाए तब तक पुलिस की फिटनेस परीक्षा को अचानक ही कर्मचारियों पर लादने के बजाय हर बरस उनकी फिटनेस ठीक रखने का अभियान चलाना चाहिए, और इसे महज प्रमोशन का पैमाना बनाकर दस-बीस बरस की चर्बी के ऊपर एकदम से नहीं डालना चाहिए। यह एक छोटी सी बात लग रही है, लेकिन पुलिस के तन-मन को बचाने के लिए, बनाए रखने के लिए जरूरी बात भी है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 19 मार्च

टेक्नालॉजी से अधिक लोकतंत्र या लोकतंत्र गुलाम हो चला?

संपादकीय
18 मार्च 2018


डाटा विश्लेषण करने वाली एक कंपनी अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के चुनाव प्रचार के लिए फेसबुक पर से पांच करोड़ से अधिक अमरीकी मतदाताओं की निजी जानकारी चोरी की थी, और शुरुआती जानकारी से ही यह साफ जाहिर हो रहा है कि उसका इस्तेमाल ट्रंप के चुनाव अभियान के लिए किया गया था। अमरीका में करीब साढ़े 23 करोड़ वोटर हैं, और इस चोरी का मतलब उनमें से 20 फीसदी से अधिक लोगों को प्रभावित करने की कोशिश।
समाचार बताता है कि डाटा विश्लेषण करने वाली फर्म कैंब्रिज एनालिटिका ने अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के 2016 के चुनाव प्रचार में समर्थन तकनीक तैयार करने के लिए पांच करोड़ फेसबुक यूजरों की निजी जानकारी चुराई थी। समाचार प्रकाशित होने के बाद मैसाचुसेट्स की अटार्नी जनरल ने कहा कि उनके कार्यालय ने जांच शुरू कर दी है। फेसबुक ने शुक्रवार को कहा था कि डाटा प्राइवेसी नीति का उल्लंघन पाने के बाद उसने कैंब्रिज एनालिटिका को निलंबित कर दिया है। इसे फेसबुक के इतिहास में सबसे बड़ी डाटा चोरी कहा गया है।
जिन लोगों को यह लगता है कि टेक्नालॉजी में दुनिया में लोकतंत्र को बढ़ाने का काम किया है, और सबसे कमजोर तबके को भी आज इंटरनेट और कम्प्यूटर की वजह से कई किस्म के हक मिले हैं, उनकी बात टेक्नालॉजी के असर का एक पहलू भर है। इसका दूसरा पहलू यह है कि कम्प्यूटर और सोशल मीडिया, इन दोनों पर लोगों की जो निजी जानकारी दर्ज है, उसका बाजारू या जुर्म के लिए इस्तेमाल होने का खतरा भी खड़ा हो गया है। ट्रंप के चुनाव के दौरान ही यह पुख्ता बात सामने आ गई थी कि उनकी विरोधी उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन की ईमेल चोरी करके रूस के हैकरों ने वहां की सरकार के रास्ते उन्हें शायद ट्रंप के लोगों तक पहुंचाया था, और हिलेरी को बदनाम करने में उनका इस्तेमाल हुआ था। इसके बाद से योरप के कई देशों ने रूस की ऐसी हरकत और किसी देश के चुनाव में विदेशी दखल के खिलाफ बड़ी नाराजगी जाहिर की थी।
बात महज विदेशी दखल की नहीं है, फेसबुक की जानकारी चोरी करके वोटरों को प्रभावित करने की रणनीति बनाकर ट्रंप के लोगों ने अमरीका के भीतर ही यह जुर्म किया है, और आज जो टेक्नालॉजी अमरीका में इस्तेमाल हो रही है, वह दुनिया के किसी भी दूसरे हिस्से में काम लाई जा सकती है। कल के दिन भारत के चुनावों में लोगों के ईमेल बॉक्स की जानकारी उन्हें बदनाम करने में इस्तेमाल हो सकती है, लोगों के टेलीफोन कॉल डिटेल्स उजागर किए जा सकते हैं, और लोगों को ब्लैकमेल किया जा सकता है। आज सुप्रीम कोर्ट में आधार कार्ड की अनिवार्यता का जो विरोध चल रहा है, उसके पीछे एक तर्क यह भी है कि इससे सरकार के हाथ में लोगों की निजी जिंदगी की गोपनीयता आ जाएगी और कोई भी सरकार इसके बेजा इस्तेमाल का लुभावना मोह छोड़ नहीं पाएगी। भारत में सरकार जिस बड़े पैमाने पर आधार कार्ड की अनिवार्यता को लादने में लगी हुई है, और जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल थोड़ी सी रोक लगाई है, उसके बहुत खतरनाक नतीजे हो सकते हैं। हमने यह देखा है कि भारत में सुरक्षित माने जाने वाले बैंकों को किस तरह लूट लिया गया, और बैंकों के सारे निगरानी के इंतजाम, उनके कम्प्यूटर की जांच का इंतजाम सब धरा रह गया। आज आधार कार्ड की वजह से लोगों की आवाजाही, उनकी खरीददारी, उनका बैंक से लेन-देन, उनके फोन, उनके इंटरनेट, उनके ट्रेन और प्लेन के रिजर्वेशन, उनके टैक्स की जानकारी, यह सब कुछ सरकार के हाथ में है, और काफी अरसे से एक लतीफा चल रहा है जो कि लतीफा कम हकीकत अधिक है। एक आदमी पीजा मंगाने के लिए फोन करता है, तो वहां से जवाब मिलता है कि आप हर बार जो पसंद करते हैं क्या वही भेजना है? हैरान आदमी पूछता है कि तुम्हें कैसे मालूम? तो जवाब मिलता है कि पिछले पन्द्रह बार आपने इस किस्म का पीजा मंगाया था। इस बार भी वही भेजने के लिए कहने पर सलाह मिलती है कि क्या आप अधिक सब्जियों वाला पीजा बेहतर नहीं समझेंगे? तो ग्राहक ने कहा कि नहीं मुझे सब्जियां नापसंद हैं। इस पर टेलीफोन पर ऑर्डर लेने वाले ने कहा कि आपका कोलेस्ट्रॉल बढ़ा हुआ है। हैरान आदमी ने पूछा कि तुम्हें कैसे मालूम? तो जवाब मिला- हमारे पास आपके पिछले सात बरस के सारे ब्लड टेस्ट की रिपोर्ट है क्योंकि आपने जिस कार्ड से भुगतान किया था, वह आधार से जुड़ा हुआ है। इस पर डरे-सहमे आदमी ने कहा लेकिन मैं तो बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल के लिए दवा ले रहा हूं। इस पर टेलीफोन पर जवाब मिला कि आपने चार महीनों में दवा नियमित रूप से नहीं ली है, और कुल 30 गोलियां ऑनलाईन खरीदी हैं। उसने कहा कि मैंने एक दवा दुकान से बाकी गोलियां खरीदी थीं। तो टेलीफोन पर कहा गया कि यह तो आपके क्रेडिट कार्ड पर दिख नहीं रहा है। उसने कहा कि मैंने नगद भुगतान किया था, तो फोन पर जवाब मिला कि आपका बैंक खाता इतनी नगदी निकालना दिखा नहीं रहा है। उसने कहा कि मेरे पास नगद पैसे आने का एक दूसरा जरिया है, तो फोन पर कहा गया कि आपके टैक्स रिकॉर्ड में तो ऐसी किसी नगद कमाई का जिक्र नहीं है...।
बातचीत का यह सिलसिला भयानक है कि एक आधार कार्ड के चलते लोगों की निजी जिंदगी नंगी हो चुकी है। लेकिन अमरीका की ताजा खबर बताती है कि बिना आधार कार्ड के फेसबुक से निजी जानकारियां निकाली जा सकती हैं। इसी को लेकर कई बरस पहले अमरीका में एक नया लतीफा बना कि सरकार ने वहां सीआईए का बजट एक चौथाई कर दिया कि फेसबुक के बाद अब जासूसी पर अधिक मेहनत तो करनी नहीं पड़ती। फिलहाल लतीफों के बीच यह सोचें कि निजी जिंदगी की गोपनीयता तो रह नहीं गई है, इसलिए निजी जिंदगी को ही साफ-सुथरा रखना समझदारी होगी। (Daily Chhattisgarh)