बीस स्टेशनों में से सत्रह पर रेलवे के नल सूखे पड़े मिले!

संपादकीय
11 मार्च 2018


मध्यप्रदेश के एक राजनीतिक कार्यकर्ता कल सतना से रायपुर तक ट्रेन से आए तो उन्होंने अपना तजुर्बा सोशल मीडिया पर लिखा कि 19 स्टेशनों पर ट्रेन रूकी, और इनमें से 17 पर पानी की सार्वजनिक टोटियां जाने कब से सूखी पड़ी थीं। लेकिन उन्हें हर स्टेशन पर 20 रूपए में मिलने वाली पानी की बोतल मौजूद दिखी। केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकार, इनकी सुविधाओं का हाल कुछ इसी तरह का रहता है। ऐसा कोई हफ्ता नहीं गुजरता जब छत्तीसगढ़ की इस राजधानी रायपुर में अखबारों में खबरें न छपती हों कि स्टेशन पर कौन-कौन सा सामान कितने-कितने अधिक दाम पर बिक रहा है, जो ब्रांड मंजूर हैं, उनके अलावा कौन से दूसरे ब्रांड का सामान जबर्दस्ती टिकाया जा रहा है, और किस तरह कार, स्कूटर-साइकिल के स्टैंड या पार्किंग पर गुंडागर्दी हो रही है। ये खबरें भी लगातार आती हैं कि पार्सल के काम में कैसे गुंडागर्दी हो रही है, कैसे मनमानी वसूली हो रही है। और रेलवे के बड़े-बड़े अफसर हैं कि वे इस बात पर लगे रहते हैं कि अंग्रेजों के वक्त से चले आ रहे शाही डिब्बों का किस-किस बहाने से बेजा इस्तेमाल किया जाए। 
दरअसल जनता के पैसों का जितना बेजा इस्तेमाल जनसुविधाओं में किया जाता है, सरकारी कामकाज में जनता के पैसों की जितनी बर्बादी देखने मिलती है, वह भी एक बड़ी वजह है कि हिन्दुस्तानी टैक्स देने से कतराते हैं। जब लोगों को यह लगता है कि उनका दिया हुआ टैक्स नेता, अफसर, ठेकेदार के घर ही जाना है, तो टैक्स देने से क्या फायदा? जब रेलवे ने तरह-तरह की तरकीबें लगाकर लोगों की जेब से अधिक पैसे निकालने का अभियान छेड़ रखा है, तब स्टेशनों पर इस गर्मी में पीने को पानी भी न रहे, तो वह महज नालायकी या निकम्मापन नहीं हो सकता, वह स्टेशन पर सामान बेचने वालों के साथ गिरोहबंदी में की गई साजिश भी रहती है ताकि लोग वहां पर पानी खरीदने को बेबस हो जाएं। जिन लोगों का वास्ता देश के अलग-अलग हिस्सों से पड़ता है, वे यह देखकर हैरान रह जाते हैं कि दक्षिण भारत में इसी भारतीय रेलवे का कामकाज उत्तर भारत या मध्य भारत के मुकाबले बहुत बेहतर रहता है, वहां सफाई अधिक रहती है, वहां स्टेशनों पर ऐसी धांधली नहीं रहती है, खाने-पीने का सामान बेहतर मिलता है, और रेलवे का स्टाफ भी सलीके से पेश आता है। लेकिन जैसे ही ट्रेन दक्षिण से बाहर निकलती है, उसे कई किस्म की बदइंतजामी से गुजरना पड़ता है। 
यह बात जरूर है कि भारत एक देश के भीतर कई देशों का एक समूह सरीखा है। उत्तर और दक्षिण के अनुशासन और तौर-तरीकों में बड़ा फर्क देखने मिलता है, और खुद रेलवे को यह देखना चाहिए कि उसके बड़े अफसर तो उत्तर और दक्षिण के बीच, पूरब और पश्चिम के बीच आते-जाते रहते हैं, रेलवे की कार्यसंस्कृति में इतना बड़ा फर्क क्यों और कैसे पड़ता है? भारतीय रेलवे को यह भी देखना चाहिए कि वह दुनिया का सबसे बड़ा ग्राहक कम्प्यूटर नेटवर्क है, लेकिन गली-गली में बैठे हुए रेलवे टिकट एजेंट किस तरह उसकी सुरक्षा में घुसपैठ करके टिकटें बुक करने में जालसाजी करते हैं, और साधारण ग्राहक कतार में खड़े रह जाते हैं। यह सिलसिला जिंदगी भर से चलते आ रहा है, और तमाम खुफिया इंतजाम, साइबर चौकसी के बावजूद रेलवे रिजर्वेशन की धांधली खत्म नहीं होती। यह सब तब है, जब रेलवे के अधिकतर बड़े कामकाज कभी जनता की नजरों में आते ही नहीं हैं। डिब्बे बनाने से लेकर पटरियां बिछाने तक, और पुल बनाने से लेकर स्टेशन बनाने तक के ठेका-टेंडर, रेलगाडिय़ों और स्टेशनों पर केटरिंग के ठेके देने तक के कामकाज में दिल्ली और क्षेत्रीय मुख्यालयों के स्तर पर जो भ्रष्टाचार होता है, वह जनता की नजरों में आ भी नहीं पाता। लेकिन रेलमंत्री अगर काबिल हो तो वे जनता की नजरों में आने वाले जनसुविधा के कामकाज को तो सुधारने की कोशिश कर ही सकते हैं। लेकिन रेलवे के अफसरों की मनमानी, और बददिमागी ऐसी रहती है कि रेलवे के सार्वजनिक पहलू की गड़बडिय़ों को गिनाने पर भी उनके माथे पर कोई शिकन नहीं आती क्योंकि उनके तबादलों के फैसले बहुत दूर और बहुत ऊपर से होते हैं, जहां तक स्थानीय शिकायतें पहुंच भी नहीं पातीं। (Daily Chhattisgarh)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें