दलबदल अब दलदल नहीं, राजनीति मुनाफे का कारोबार

संपादकीय
13 मार्च 2018


समाजवादी पार्टी छोड़कर नरेश अग्रवाल का भाजपा जाना कुछ लोगों को चौंका सकता है और कुछ लोगों को इसमें कुछ अटपटा नहीं लगेगा। ऐसा माना जा रहा है कि सपा ने उन्हें राज्यसभा में फिर से नहीं भेजना तय किया, और इसलिए वे भाजपा में चले गए। उनके बारे में आई खबरों ने याद दिलाया है कि वे पहले बसपा में थे, उसके भी पहले वे कांगे्रस के विधायक थे, फिर वे सपा में आए, और विधानसभा, लोकसभा, राज्यसभा, इन सबमें वे अलग-अलग पार्टियों से रहे। अब भाजपा शायद उनकी चौथी पार्टी रहेगी। लोगों ने इस मौके पर यह भी याद दिलाया है कि पहले वे भाजपा और संघ परिवार के खिलाफ कैसा जहर उगलते आए थे, और भाजपा-संघ परिवार के लोग नरेश अग्रवाल के खिलाफ क्या-क्या बोलते रहे हैं। लेकिन आज वक्त ऐसा आ गया दिखता है कि हर पार्टी, या कि अधिकतर पार्टियां दूसरी पार्टी के कचरे, घूरे, मुजरिम, बदनाम को तब तक लेने के लिए न महज तैयार रहती हैं, बल्कि उतावली भी रहती हैं अगर ऐसे लोगों को लेने से तुरत-फुरत कोई फायदा होते दिखता हो।
भारतीय राजनीति ने नीति और सिद्धांत के दायरे पूरी तरह खो दिए हैं। अब शायद वामपंथी दल अकेले ऐसे रह गए हैं जो कि अपनी सोच पर कायम हैं, और फिर चाहे वे सत्ता से बाहर क्यों न हो जाएं। उनके अलावा कोई पार्टी ऐसी नहीं दिखती जिसके लोग कभी किसी पार्टी में, तो कभी दूसरी पार्टी में ठीक उसी तरह जाते दिखते हैं जिस तरह की सार्वजनिक शौचालय में जब जो पखाना खाली दिखे, उसी में घुस जाएं। यह सिलसिला लोकतंत्र को महज एक फायदातंत्र में तब्दील कर चुका दिखता है, और जिस तरह जंगल का कानून रहता है जिसमें जानवर महज अपने तात्कालिक फायदे के लिए किसी भी दूसरे पर हमला करते हैं, उसे मारकर खा जाते हैं, ठीक उसी तरह अब भारतीय राजनीति के नेता पूरी तरह अपनी आत्मरक्षा को सबसे ऊपर मानते हैं, और यह आत्मरक्षा भी महज फायदे और सहूलियत को जुटाने के लिए है।
जो पार्टियां एक-दूसरे के खिलाफ नफरत की आग उगलते आई हैं, उन पार्टियों को अब उन दुश्मन-पार्टियों के लड़ाकों से कोई परहेज नहीं रह गया है। भाजपा ने कुछ बरस पहले अपनी अभूतपूर्व कामयाबी पर खुश होकर कांगे्रसमुक्त भारत बनाने की कसम खाई थी, और वह पूरी होते दिख रही है, बस उसके लिए भाजपा को खुद को कांगे्रसयुक्त बनाना पड़ा है। अब एक-एक करके सारे के सारे कट्टर भाजपा-विरोधी भाजपा में लाए जा रहे हैं, और विश्व की इस सबसे बड़ी पार्टी का चेहरा देश के बहुत से हिस्सों में बड़ा बदला हुआ दिख रहा है। आज चूंकि भाजपा ही हिंदुस्तान में बढ़ती हुई ताकत है, उगता हुआ सूरज है, इसलिए राजनीति के तमाम सूरजमुखी-फूल उसी की तरफ चेहरा किए हुए हैं। अब इस देश की राजनीति में दलबदल को दलदल भी नहीं माना जाता, और राजनीति कामयाबी का एक कारोबार रह गया दिखता है। (Daily Chhattisgarh)

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