बिना काम कमाने वाले को क्या कहते हैं सोचें सांसद..

संपादकीय
21 मार्च 2018


संसद में कामकाज ठप्प पड़ा हुआ है, और किसी न किसी मुद्दे को लेकर विपक्षी दल तरह-तरह से प्रदर्शन कर रहे हैं। खुद सत्तारूढ़ एनडीए के साथ रहे कुछ दल भी एनडीए की मुखिया भाजपा के खिलाफ चल रहे हैं, और संसद के भीतर-बाहर, राज्यसभा चुनाव के मौके पर कई पार्टियां भाजपा को आंख दिखा रही हैं। लेकिन संसद के भीतर किसी मुद्दे पर सत्तापक्ष का विरोध करते हुए विपक्ष जब भी बहिष्कार करता है, या सदन की कार्रवाई चलने नहीं देता है, तो हम हमेशा से उसका विरोध करते आए हैं। संसद और विधानसभाओं का इस्तेमाल ऐसे विरोध-प्रदर्शन में नहीं होना चाहिए जिससे वहां की कार्रवाई न चले। यह इसलिए जरूरी है कि संसद और विधानसभा में विपक्ष को ऐसे विशेषाधिकार मिले रहते हैं जो कि सदनों के बाहर नहीं रहते। वहां पर सरकार को घेरने के लिए विपक्ष मनचाही जानकारी मांग सकता है, और इस मौके को चूक कर विरोध करना लोकतंत्र में विपक्ष के लिए आत्मघाती काम रहता है। 
लोकतंत्र में विरोध दर्ज कराने के लिए बहुत सी जगहें और बहुत से मौके रहते हैं। ऐसे में सदन के गिने-चुने दिनों को बर्बाद करना ठीक नहीं है। अब तक आम जनता के बीच से यह बात उठती थी कि संसद अगर काम नहीं कर रही है तो उसके लोगों को तनख्वाह नहीं देनी चाहिए। अब सत्तारूढ़ पार्टी के दिल्ली के सांसद मनोज तिवारी ने यही मांग करते हुए लोकसभा अध्यक्ष को एक चि_ी लिखी है। हम इसे एक प्रतीकात्मक कदम मानते हैं जिससे कि नाराज जनता का दिल जीता जा सकेगा जो कि बिना काम सांसदों को तनख्वाह देना नहीं चाहती। लेकिन जब कभी जो पार्टी विपक्ष में रहती है, सदन की कार्रवाई चलने देने के खिलाफ उसका ऐसा ही रूख रहता है। इसी के चलते हुए अभी दो दिनों से सोशल मीडिया पर कुछ लोग यह मांग कर रहे हैं कि सांसदों को पन्द्रह-बीस बरस के कार्यकाल के बाद ही पेंशन का हक मिलना चाहिए, जैसा कि फौज के लोगों को मिलता है, आज तो सांसद पांच बरस के बाद भी बाकी जिंदगी पेंशन पाते हैं। सांसदों के लिए अलग से इलाज का इंतजाम खत्म होना चाहिए और उन्हें आम जनता को मिलने वाले स्वास्थ्य बीमा से ही गुजारा करना चाहिए, सांसदों द्वारा अपनी तनख्वाह को मनमाने तरीके से बढ़ाना खत्म हो जाना चाहिए, और जब केन्द्रीय वेतनमान कर्मचारियों की तनख्वाह बढ़ाता है, उसी समय उसी मुताबिक सांसदों की तनख्वाह भी बढऩी चाहिए। हम इन बातों का अभी तर्कसंगत होना या न होना तय नहीं कर रहे हैं, लेकिन जनता की भावनाएं कुछ इसी किस्म की हैं। दरअसल शब्दकोष में बिना काम किए हुए तनख्वाह या मजदूरी पाने वाले के लिए एक बड़ा ही अपमानजनक शब्द इस्तेमाल होता है, जिसे हम यहां लिखेंगे तो संसद उसे असंसदीय मानकर, अपमानजनक मानकर, विशेषाधिकार भंग होने का एक नोटिस भेजेगी। ऐसे विशेषाधिकार से लैस संसद से उलझकर अपना वक्त बर्बाद करने के बजाय हम पाठकों की कल्पनाशीलता पर यह छोड़ देते हैं कि बिना मेहनत किए कमाने वाले को क्या कहा जाता है। 
फिलहाल हम अपनी इस पुरानी राय को दुहराना चाहते हैं कि संसद और विधानसभा में विपक्ष को यह चाहिए कि वह अधिक से अधिक समय तक सत्र को चलाने की कोशिश करे, और वहां पर अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल करके सरकार से जानकारी मांगे, जवाब मांगे, और जहां गलती या गलत काम दिखे, उसे सदन की कार्रवाई में दर्ज कराकर इतिहास का हिस्सा बनाए। अगर कोई विरोध-प्रदर्शन करना है तो उसके लिए विपक्ष संसद या विधानसभाओं के अहातों में लगी गांधी प्रतिमा के पास सदन के समय के पहले और बाद एकजुट होकर प्रदर्शन कर ले। जनता के हिस्से का जो वक्त सदन में मिलता है, उसे बर्बाद करना ठीक बात नहीं है। जिस वक्त केन्द्र सरकार को एक दूसरा गठबंधन चला रहा था, और आज का सत्तारूढ़ गठबंधन उस वक्त विपक्ष में था, तब भी हमारी यही सलाह थी। केन्द्र के लिए भी, और राज्यों के लिए भी। (Daily Chhattisgarh)

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