लोगों के भीतर के हिंसक हैवान का हौसला बेहिसाब

संपादकीय
26 मार्च 2018


तमिलनाडू से एक वीडियो सामने आया है जिसमें एक बुजुर्ग महिला के हाथ-पैर बांधकर उसे समंदर में फेंकते हुए लोग दिख रहे हैं, और कुछ लोग इसका वीडियो भी बना रहे हैं। इस बूढ़ी और कमजोर महिला पर कुछ लोगों को बच्चे चुराने का शक था। इस वीडियो में कुछ लोग आवाज भी लगा रहे हैं कि उसे पानी में फेंक दो। उसे उठाकर जो समंदर में ले गया है वह उसे पानी में डालकर उसके ऊपर खड़ा हो रहा है, और कैमरे की तरफ देखकर महेन्द्र बाहुबली का फिल्मी नारा लगाते दिख रहा है। इसके पहले इस महिला को एक पेड़ से बांधे हुए भी वीडियो में दिखाया गया है। पुलिस के मुताबिक यह महिला मानसिक रूप से बीमार है। पिछले ही महीने तमिलनाडू में एक दूसरा मामला सामने आया था जिसमें एक लाश और दो बुजुर्गों को एक अस्पताल सब्जियों के साथ ढो रहा था, और उस पर ऐसे शक और आरोप थे कि वह मानव अंगों के कारोबार में लगा अस्पताल है, और इस अस्पताल को बंद करने का हुक्म दिया गया था। दो दिन पहले ही उत्तरप्रदेश का एक वीडियो सामने आया था जिसमें एक आदमी अपनी पत्नी को रस्सी से बांधकर, टांगकर, उसे घंटों तक अपने बेल्ट पीट रहा है, और अगल-बगल दर्जनों लोग घेरा बनाकर इसका मजा ले रहे हैं। इस मामले में खबर में आया था कि यह महिला किसी और आदमी के साथ चली गई थी, और लौटकर आने पर पंचायत ने उसे यह सजा सुनाई, और पति उसे इस तरह सजा दे रहा था। छत्तीसगढ़ में आज की खबर है कि कल जब नवरात्रि के समापन पर कन्याओं को भोज दिया जा रहा था, तब सरगुजा के कोरिया में 8 बरस की एक बच्ची के साथ दिल्ली के निर्भया कांड की तरह बलात्कार और हत्या का मामला सामने आया है। 
इंसान की हिंसा सिर चढ़कर सामने आती है। खासकर उन मामलों में जहां पर किसी कमजोर पर हिंसा करनी हो, चाहे वह कोई बच्ची हो, चाहे कोई महिला हो, बुजुर्ग हो, दिव्यांग हो, या फिर नीची कही जाने वाली किसी जाति के लोग हों। यह हिंसा तब और बढ़ जाती है जब हमलावर एक इंसान न होकर एक समूह हो, या कि भीड़ हो। जैसे-जैसे भीड़ में सिर बढ़ते जाते हैं, वैसे-वैसे उन सिरों से दिमाग घटते जाते हैं। नाटक पढऩे के शौकीन लोगों को याद होगा कि किस तरह विजय तेंदुलकर के एक नाटक, शांतता कोर्ट चालू आहे, में किसी एक जगह पर रात गुजारने के लिए मजबूर हुए लोग एक नाटक खेलते हैं, और उस नाटक में अदालत का सीन गढ़ा जाता है, और उसमें शामिल लोग किस तरह एक किरदार निभा रही महिला के खिलाफ हिंसक बातों पर उतर आते हैं, और समय गुजारने के लिए किया जा रहा यह मनोरंजन किस तरह हिंसक हो जाता है। यह हिंसा इंसानों का बुनियादी मिजाज है। इस मिजाज को छुपाने के लिए इंसान ने एक किरदार गढ़ा है, हैवान का। लोग हैवान की छवि इस तरह बनाते हैं कि वह इंसान से परे का कोई राक्षस, पिशाच, या दानव है। हकीकत यह है कि यह हिंसक राक्षस इंसान के भीतर ही उसी के व्यक्तित्व का, उसके दिल-दिमाग का, उसकी मानसिकता का एक अटूट हिस्सा है, और समय-समय पर मौका मिलते ही वह सामने आने लगता है। 
लेकिन एक सवाल यह उठता है कि सार्वजनिक रूप से लोगों की भीड़ जब ऐसे जुर्म करती है, तो उन मुकदमों की सुनवाई क्या ऐसी रफ्तार से नहीं होनी चाहिए कि कड़ी सजा बाकी समाज के लिए एक चेतावनी की तरह सामने आए, और ऐसी हिंसा घटे? आज तो ऐसा लगता है कि लोग अपनी हिंसा के साथ आराम से गुजर-बसर कर सकते हैं, कोई परिवार घर में बंधुआ बाल मजदूर रखकर उसे गर्म चिमटों से जला सकता है, कोई परिवार बूढ़ी मां को घर में बंद करके भूखे छोड़ जा सकता है, और कोई पति भीड़ के बीच अपनी बंधी हुई पत्नी को घंटों तक बेल्ट से पीट सकता है। हमारा ख्याल है कि ऐसे मामलों में जो लोग गवाह बने मजा लेते रहते हैं, उन सबको एक सामूहिक जिम्मेदारी के तहत सजा दी जानी चाहिए। हम बात-बात में विशेष अदालत की चर्चा तो नहीं करेंगे, लेकिन कमजोर और बेसहारा के खिलाफ होने वाली हिंसा के जिन मामलों में ऐसे वीडियो-सुबूत मौजूद रहते हैं, उन मामलों में कड़ी से कड़ी सजा और बड़ी रफ्तार से फैसला होना चाहिए, तभी जाकर समाज में लोगों के भीतर के हिंसक हैवान का हौसला कुछ पस्त होगा।(Daily Chhattisgarh)
-सुनील कुमार

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