..तमाम लोगों को तमाम वक्त बेवकूफ नहीं बना सकते अन्ना

संपादकीय
29 मार्च 2018


दिल्ली में अन्ना हजारे एक बार फिर अनशन पर बैठे हैं, और खबर है कि उनका वजन घटते जा रहा है। महाराष्ट्र में वे भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन के आदी रहे हैं, और उनके खुद के दावे के मुताबिक उनकी वजह से कई मंत्रियों को बर्खास्त होना पड़ा है। यूपीए सरकार के वक्त अभी से पांच-छह बरस पहले उन्होंने दिल्ली में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन छेड़ा था जिसमें भांति-भांति के लोग आकर जुड़े थे, रामदेव से लेकर केजरीवाल तक। लेकिन भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए उन्होंने लोकपाल बनाने की मांग को कुछ इस तरह उठाया था कि मानो यूपीए सरकार देश के इतिहास की अकेली भ्रष्ट सरकार थी, और लोकपाल कोई रामबाण दवा है जिसके बनने से देश में भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा। उस वक्त उस आंदोलन में देश में एक लहर पैदा की थी, और उसी के बीच आम आदमी पार्टी का जन्म हुआ, और अरविंद केजरीवाल आंदोलन और अन्ना दोनों से परे चले गए। उसके बाद यूपीए सरकार ने ही 2013 में लोकपाल कानून बनाया। अब मोदी सरकार के करीब चार बरस हो जाने के बाद भी उस कानून के तहत लोकपाल नियुक्त नहीं किया गया, और अन्ना हजारे एक बार फिर अनशन पर हैं।
इस बार अन्ना के मंच के सामने लोगों की भीड़ इतनी छोटी है कि स्कूल के बच्चे भी सिरों को गिन सकते हैं। जनता की इस उदासीनता को देखकर कुछ लोग हैरान हैं, लेकिन बहुत से लोगों को अन्ना हजारे से कोई उम्मीद रह भी नहीं गई थी। वे मोटेतौर पर देशभक्ति का नाम लेकर राष्ट्रवाद की एक सोच को बढ़ावा देते आए हैं, और गांधी टोपी और खादी को इस मकसद के लिए मुखौटे की तरह इस्तेमाल भी करते आए हैं। भ्रष्टाचार को लेकर उनका हमला चुनिंदा रहते आया है कि किस पार्टी या किन नेताओं पर हमला करना है, और किन पर नहीं। अन्ना हजारे आज दिल्ली में लकड़ी की वह हांडी साबित हो रहे हैं जो कि चूल्हे पर बस एक ही बार चढ़ पाती है। अन्ना ने जिस अंदाज में यूपीए सरकार की छाती पर अपनी जिंदगी और मौत की बंदूक टिकाई थी, और लोकपाल कानून बनवाया था, उस कानून के तहत चार बरस में कोई तैनाती भी नहीं हुई, और आज अन्ना हजारे की नींद बरसों बाद तब खुल रही है जब कई प्रदेशों के चुनावों के बाद साल भर में देश के आम चुनाव भी सामने खड़े होंगे, और अन्ना के इस आंदोलन का अगर कोई असर हो सकेगा, तो हो सकता है कि वह चुनावी राजनीति का एक हिस्सा भी हो। अन्ना की विश्वसनीयता उनकी बरसों लंबी चुनिंदा चुप्पी के चलते मिट्टी में मिली हुई है। सोशल मीडिया पर कई गंभीर पत्रकारों ने एक अवांछित और खराब जुबान में अन्ना की साख के बारे में लिखा है कि इंसान की साख किसी लड़की के कौमार्य की तरह होती है, जो कि बार खो जाए, तो फिर वह लौट नहीं सकती। यह भाषा और यह मिसाल, दोनों ही गलत हैं, लेकिन अन्ना की साख पर सवाल ठीक है। कोई व्यक्ति अपने आपको सांसारिक जीवन के स्वार्थों और संबंधों से ऊपर, महज देश के लिए फिक्रमंद बताते हुए देश को लंबे समय तक बेवकूफ नहीं बना सकता। भारत में बहुत से लोग ऐसा मानते हैं कि गांधी या भगत सिंह का नाम लेकर, गांधीवादी खादी पहनकर, देशभक्ति की बातें करके, और तिरंगा झंडा फहराकर वे हिन्दुस्तानी आबादी को तांत्रिक अंगूठी बेच सकते हैं। लेकिन ऐसा होता नहीं है, अंग्रेजी में किसी ने एक वक्त समझदारी की एक लाईन लिखी थी कि आप कुछ लोगों को, कुछ समय के लिए तो बेवकूफ बना सकते हैं, लेकिन तमाम लोगों को, तमाम वक्त बेवकूफ नहीं बना सकते।
अन्ना हजारे एक पाखंड साबित हुए हैं, और चूंकि पब्लिक सब जानती है, उसने दिल्ली में अपने आपको अन्ना से परे रखा है, और मीडिया के बीच भी अन्ना की कोई अहमियत नहीं दिख रही है। अब लोगों को अन्ना की राजनीति उजागर होने का इंतजार है कि इस बार उन्होंने यह अनशन किस पार्टी या किस नेता की मदद करने के लिए किया है, और वे किसके हाथ मजबूत करने तक इसे जारी रखेंगे। अरविंद केजरीवाल तो अन्ना के मंच को छोड़कर खुलकर राजनीति में आ गए हैं, और हम उसे एक बेहतर फैसला मानते हैं कि लोगों को बेवकूफ मानकर चलने, और बेवकूफ बनाने के बजाय आंदोलनकारियों को ईमानदार बने रहना चाहिए, फिर चाहे वह भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन छोड़कर राजनीतिक दल बनाना ही क्यों न हो। अन्ना हजारे ने साख बचाए रखने का मौका पिछले बरसों में खो दिया है, और अब लोग उनकी नौटंकी देखने के लिए जाने की जहमत भी नहीं उठा रहे हैं। हमें आशंका एक ही बात की है कि अगर राजनीतिक पार्टियां और सरकारें यह तय कर लें कि वे अन्ना को मनाने नहीं जाएंगे, तो अन्ना हजारे किस बहाने से अपना अनशन खत्म करेंगे। (Daily Chhattisgarh)

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