राजनीति हो या धर्म, अधिक खतरनाक है बहुसंख्यकों की हिंसा

संपादकीय
7 मार्च 2018


भारतीय उपमहाद्वीप में एक खतरा बढ़ते चल रहा है। पहले सिर्फ पाकिस्तान के बारे में ऐसा लगता था कि वहां बहुसंख्यक आबादी के मुस्लिम, वहां की अल्पसंख्यक आबादी के हिन्दुओं और ईसाईयों पर हमले करते हैं। लेकिन इसके बाद म्यांमार में वहां की बौद्ध बहुसंख्यक आबादी में मुस्लिम अल्पसंख्यक रोहिंग्या लोगों के साथ जो हिंसा की, उसके खिलाफ आज पूरी दुनिया का जनमत खड़ा हुआ है, और संयुक्त राष्ट्र तक ने म्यांमार सरकार से विरोध दर्ज करते हुए तुरंत इन लाखों लोगों की वापिसी की मांग की है। वहां से बौद्ध समुदाय की हिंसा का शिकार होकर रोहिंग्या मुस्लिम भारत और बांग्लादेश जाकर शरणार्थी शिविरों में बसे हुए हैं। इस मुद्दे पर लिखने की दो ताजा वजहें सामने आई हैं, एक तो यह कि पिछले दो दिनों से श्रीलंका में बौद्ध और मुस्लिम समुदायों के बीच जो हिंसा चल रही है, उसके चलते देश में दस दिन की इमरजेंसी लगाई गई है। दूसरी खबर दिल्ली की है जहां पर तिब्बत के निर्वासित गुरू दलाईलामा के भारत में साठ बरस पूरे होने का समारोह दिल्ली से हटकर अब हिमाचल के धर्मशाला ले जाया जा रहा है क्योंकि भारत सरकार ने वरिष्ठ राजनेताओं और सरकारी अधिकारियों को यह निर्देश दिया है कि वे तिब्बत से जुड़े हुए कार्यक्रमों में शामिल न हो। तिब्बत के मुद्दे पर भारत और चीन के बीच तनाव को देखते हुए भारत सरकार के केबिनेट सचिव ने यह आदेश निकाला, और एक अखबार में इसके छप जाने के बाद तिब्बतियों का यह कार्यक्रम दिल्ली से हटाकर धर्मशाला ले जाया जा रहा है जहां पर कि दलाईलामा का मुख्यालय भी है। ऐसा भी माना जा रहा है कि म्यांमार में बौद्ध बहुसंख्यक आबादी ने जिस तरह मुस्लिम अल्पसंख्यक आबादी के लाखों लोगों को हिंसा के मार्फत देश छोडऩे पर मजबूर किया है, उससे बौद्ध धर्म के प्रति जनधारणा को नुकसान पहुंचा है, और तिब्बत के मुद्दे ने भी मार खाई है जो कि बौद्ध धर्म से जुड़ा हुआ सबसे बड़ा राजनीतिक आंदोलन रहा है। 
इस बात को इस नजरिए से देखने की जरूरत है कि त्रिपुरा में अभी वामपंथी सरकार के हटने के बाद नई सरकार ने काम सम्हाला भी नहीं है कि विजेता भाजपा से जुड़े लोगों ने दुनिया के एक बड़े वामपंथी नेता लेनिन की प्रतिमाओं को त्रिपुरा में गिराना शुरू कर दिया है। ऐसी सार्वजनिक हिंसा से परे दूसरी वारदातें भी हो रही हैं जिनमें त्रिपुरा के माक्र्सवादी नेताओं के घर जलाए जा रहे हैं, लेकिन वैसा टकराव माक्र्सवादियों और भाजपाईयों या संघ के लोगों के बीच केरल में भी लंबे समय से चले आ रहा है, और कुछ दूसरी जगहों पर भी। लेनिन की प्रतिमा को गिराना एक नए किस्म का सत्तारूढ़ उन्माद है जिसका असर उत्तर-पूर्व से बहुत दूर दक्षिण के तमिलनाडू में भी देखने मिला है जहां पर एक महान समाज सुधारक और तर्कवादी, नास्तिक नेता रामास्वामी पेरियार की मूर्ति को नुकसान पहुंचाया गया है। इसके अलावा बंगाल के कोलकाता में जनसंघ के संस्थापक श्यामाप्रसाद मुखर्जी की प्रतिमा तोड़ दी गई, और साथ ही प्रतिमा पर कालिख भी पोत दी गई। यहां यह चर्चा जरूरी है कि त्रिपुरा में लेनिन की प्रतिमा गिराने के बाद भाजपा के राष्ट्रीय सचिव, तमिलनाडू के नेता एच.राजा ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करके लिखा था कि लेनिन के बाद अब तमिलनाडू में पेरियार की बारी है। बाद में जब इस पोस्ट पर विवाद बढ़ा तो भाजपा नेता ने उसे डिलीट करते हुए कहा कि वह पोस्ट उनकी इजाजत के बिना एडमिन ने डाल दी थी, और पता लगते ही उन्होंने उसे हटा दिया। लेकिन तब तक पेरियार की प्रतिमा को नुकसान पहुंचाया जा चुका है। प्रधानमंत्री और भाजपाध्यक्ष ने प्रतिमाओं को गिराने की निंदा की है, और कहा कि ऐसी घटनाओं पर कार्रवाई की जाएगी। 
बहुसंख्यक धर्म की आबादी या बहुसंख्यक राजनीतिक ताकतें जब कभी अल्पसंख्यक तबकों पर हमले करती हैं, तो हिंसा कई गुना बढ़ती है। जिस तरह म्यांमार के बौद्ध लोगों की हिंसा से पूरी दुनिया में बौद्ध धर्म के प्रति जनधारणा बदली है, और शांति का प्रतीक माने जाने वाले इस धर्म का नुकसान हुआ है। भारत में बहुसंख्यक हिन्दू धर्म के नाम पर जिस तरह की हिंसक बातें हो रही हैं, जिस तरह की हिंसा हो रही है, उससे दुनिया में हिन्दू धर्म या हिन्दू दर्शन की उदारता को लेकर जो जनछवि है उसे बहुत नुकसान पहुंच रहा है। कल ही हमने इसी जगह पर एक स्वघोषित श्रीश्री, रविशंकर, की हिंसक धमकियों के बारे में लिखा था, और उस पर अदालत की खुद होकर कार्रवाई की सिफारिश की थी, उस हिंसक धमकी से भी हिन्दू धर्म की छवि को अपार नुकसान पहुंचता है। अपने आपको जीने की कला का प्रणेता बताने वाला रविशंकर जब खुलकर यह धमकी देता है कि अगर मुस्लिमों ने अयोध्या की विवादित जगह पर दावा नहीं छोड़ा तो हिन्दुस्तान सीरिया बन जाएगा, तो वह मुस्लिमों का कुछ भी नुकसान नहीं करता, वह हिन्दुओं को आईएसआईएस के कट्टर आतंकियों जैसा बताने का काम करता है। धर्म और राजनीति का घालमेल अपने आपमें खतरनाक और जहरीला होता है, और इसके बाद जब इस घोल में हिंसा का जहर भी घुल जाता है, तो मामला बेकाबू होने लगता है। इस देश में धर्मान्धता के कुछ विरोधी आलोचक हिन्दुओं को तालिबानी बनने से बचने की नसीहत देते आए थे, लेकिन रविशंकर ने तो हिन्दुओं के तालिबानी बनने की मुनादी सी कर दी। ऐसे बड़बोले और हिंसक लोग पाकिस्तान, म्यांमार, श्रीलंका से लेकर सीरिया तक, अपने देश का बुरा कर रहे हैं, और ऐसे में लेनिन की प्रतिमाओं को गिराने या पेरियार की प्रतिमाओं को तोडऩे वालों को याद रखना चाहिए कि बात निकलेगी, तो फिर दूर तलक जाएगी...। एक वक्त 1960 के दशक में नक्सलियों ने हिन्दुस्तान में गांधी की प्रतिमाओं को गिराया था, और आज नक्सली किस तरह की हिंसा में कामयाब हुए हैं यह देखने की बात है। दूसरी तरफ अफगानिस्तान के बामियान में तालिबानों ने बुद्ध की ऐतिहासिक प्रतिमाओं को गिराया था, अब त्रिपुरा के बेलोनिया में लेनिन को गिराया जा रहा है। इस पूरे मुद्दे पर सबसे दिलचस्प प्रतिक्रिया तमिलनाडू की राजनीति में उतर रहे अभिनेता कमल हासन की है जिन्होंने कहा है कि सारी प्रतिमाओं को गिरा दो, कोई कुछ नहीं कहेगा। भारत में सचमुच ही प्रतिमाओं की राजनीति खत्म होनी चाहिए क्योंकि पहले तो इनको बनाने में जनता के पैसों की बर्बादी होती है, फिर इनके रख-रखाव में, और फिर आखिर में इनकी हिफाजत में। हिफाजत ही करनी है तो सोच की की जाए, प्रतिमाओं की क्यों? लेकिन फिलहाल हमारी यह राय आज के बुलडोजरों पर प्रतिक्रिया नहीं है, इनकी धूल छंट जाने के बाद के लिए है। (Daily Chhattisgarh)

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