मोदी ने श्री के सामंती पाखंड को खत्म करके ठीक किया..

संपादकीय
8 मार्च 2018


बीएसएफ ने दो दिन पहले अपने एक जवान को इस बात के लिए एक हफ्ते की वेतन-कटौती की सजा दी थी जिसने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम के सामने श्री नहीं लगाया था। वह एक नियमित एक्सरसाईज के दौरान मोदी प्रोग्राम कह रहा था। इस पर बीएसएफ ने आनन-फानन उसकी हफ्ते भर की तनख्वाह काट दी थी। लेकिन दो दिन के भीतर ही खुद प्रधानमंत्री ने इस पर नाराजगी जाहिर की, और उसकी सजा रद्द कर दी। लोगों को ध्यान होगा कि राष्ट्रपति रहते हुए प्रणब मुखर्जी ने अपने नाम के सामने या राष्ट्रपति के लिए महामहिम शब्द का इस्तेमाल बंद करवा दिया था। इसके बाद देश के राज्यपालों की यह मजबूरी थी कि वे भी इस सामंती संबोधन का मोह छोड़ें, और देश में राष्ट्रपति-राज्यपाल के लिए सामंतशाही थोड़ी सी कम हुई। 
लेकिन हम छत्तीसगढ़ जैसे गरीब और नए राज्य में देखते हैं कि यहां पर भी एक सर्किट हाऊस को तब्दील करके बनाए गए राजभवन में समारोह के लिए जो हॉल बनाया गया, उसका नाम दरबार हॉल रखा गया। इक्कीसवीं सदी के लोकतंत्र में सत्ता दरबार शब्द का मोह छोड़ नहीं पाई। इसके अलावा देश में शायद सभी राज्यपालों के साथ यह प्रथा कायम है कि वे जहां जाते हैं वहां उनके कार्यक्रम के पहले और बाद राष्ट्रगान बजाने के लिए एक बस में भरकर पुलिस बैंड चलता है, राजभवन के भीतर सलामी गारद रहती है, और सामंतशाही के बहुत से दूसरे प्रतीक भी राष्ट्रपति भवन, राजभवन, सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट, और विधानसभाओं पर अब तक लदे बैठे हैं। फिर ऐसा भी नहीं कि यह सिलसिला मुफ्त में चलता हो, यह पूरा पाखंड जनता के पैसों पर चलता है, और किसी बैंड पार्टी के लोगों की तरह की पोशाकें पहने हुए कहीं सलामी गारद के लोग वक्त बर्बाद करते बैठे रहते हैं, कहीं कोई राजदंड लेकर चलते हैं, तो कहीं खौलती गर्मी में पगड़ी और कोट पहनकर इक्कीसवीं सदी के सामंतों की सेवा करते हैं। 
फौज, पुलिस, और सत्ता के दूसरे बहुत से प्रतीक अब तक राजशाही की दिमागी हालत से बाहर नहीं आ पाए हैं। लोकतंत्र में लोगों के बीच रिश्ते परस्पर सम्मान के होने चाहिए, और काम की जिम्मेदारी या अधिकार से परे लोगों को दिखावटी सम्मान की भूख घटनी चाहिए। लेकिन वह दिखती नहीं है। पूरी दुनिया में लालबत्ती वेश्याओं के इलाके का प्रतीक रहती है, और हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के इतिहास और साहित्य में भी इसे लालबत्ती इलाका, या रेडलाईट एरिया कहा जाता है। लेकिन ऐसे बदनाम सामान को भी अपनी गाडिय़ों पर लगाकर घूमने की भूख सत्ता पर सवार तमाम लोगों के सिर पर सवार रहती है। भारत में ऐसे लोगों को देखें तो लगता है कि इन्हें अधिकार तो लोकतंत्र के चुनावी रास्ते हासिल करना है, लेकिन इन्हें झूठा और पाखंडी सम्मान सामंती पैमानों का पाने की हसरत रहती है। इस गर्म देश में सत्ता पर सवार लोग गर्मियों में भी बंद गले के पूरे कोट पहनकर चिलचिलाती धूप में एयरपोर्ट पर एक-दूसरे का स्वागत करते हैं, और कोई ऐसा न करे तो उसे नोटिस भी जारी करते हैं। छत्तीसगढ़ में ही एक कलेक्टर को ऐसा नोटिस दिया जा चुका है। नतीजा यह है कि जनता के पैसों से कार और घर-दफ्तर, सर्किट हाऊस और सभाभवनों के एयरकंडीशनर चलाकर लोग गर्मियों में भी बंद कोट के भीतर अपने को ठंडा कर लेते हैं, और फिर चाहे जनता उस बिजली के दाम चुकाते हुए दुबली होती रहे। 
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बीएसएफ के ऐसे सामंती बर्ताव का विरोध करके सही काम किया है। लेकिन यह नाकाफी है। उन्हें पूरे देश के लिए सरकारी सत्कार-नियमों में फेरबदल करके उन्हें एक गर्म देश के लायक बनाना चाहिए, और लोकतंत्र को पाखंडी स्वागत से आजादी दिलानी चाहिए। प्रधानमंत्री के स्वागत में हर दिन सैकड़ों अफसर और नेता ऐसे कपड़े पहनकर खड़े रहते हैं जैसे कि वे किसी अंग्रेज बहादुर के स्वागत में किसी ठंडे देश में खड़े हों। अंग्रेज चले गए, लेकिन अपने चीथड़े हिन्दुस्तानी लोकतांत्रिक-सामंतों के दिमाग पर लादकर गए हैं। इस देश को अपने चरित्र को लोकतांत्रिक बनाना होगा, और मोदी सरीखे लोग ऐसा कर सकते हैं क्योंकि वे जनता से जुडऩे की कोशिश करते दिखते हैं, और जिनके आगे-पीछे सामंतशाही का कोई इतिहास नहीं है। शासकीय और राजकीय कामकाज से तमाम सामंती प्रतीकों को निकालकर फेंकना चाहिए। लोगों को अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की तस्वीर याद है जिसमें वे राष्ट्रपति भवन के भीतर चलते हुए एक सफाई कर्मचारी के कंधे पर हाथ रखकर बात करते हैं, और आगे बढ़ जाते हैं। हिन्दुस्तान में सामंतशाही लोगों के दिमाग पर इतनी हावी है कि अगर कोई सफाई कर्मचारी राष्ट्रपति की आंखों के सामने भी आ जाए, तो उसकी हफ्ते भर की तनख्वाह काट दी जाए। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए।  (Daily Chhattisgarh)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें