जशपुर के पत्थरगड़ी से ऊना के धर्मांतरण तक...

संपादकीय
30 अप्रैल 2018


हिंदुस्तान में कल करीब पौने दो हजार किलोमीटर पर बसी दो जगहों पर दो अलग-अलग बातें हो रही थीं जिनका आपस में कोई रिश्ता नहीं था। या शायद यह कहना अधिक सही होगा कि दोनों का आपस में रिश्ता ही रिश्ता था!?!?
छत्तीसगढ़ के आदिवासी अंचल सरगुजा के जशपुर जिले के गांवों में लोग शहरी लोकतंत्र के खिलाफ खड़े हुए हैं। कहा जा सकता है कि वे लोकतंत्र के खिलाफ हैं, लेकिन ऐसा कहने के पहले यह भी समझना होगा कि भारत के मौजूदा शहरी, सवर्ण संपन्न और शिक्षित रह गए लोकतंत्र में आदिवासियों की जगह क्या है? उन आदिवासियों का इस शहरी लोकतंत्र पर भरोसा कितना है, क्यों नहीं है, क्यों उन्हें शायद इसकी जरूरत भी नहीं है। लेकिन जशपुर से पौने दो हजार किलोमीटर दूर गुजरात के उना को एक नजर देख लें। उना का नाम दो बरस पहले तब खबरों में आया जब वहां के दलितों को सवर्ण हिंदू गौरक्षकों ने सरेआम बुरी तरह पीटा और उसके वीडियो दुनिया भर में फैले। वह मुद्दा देश भर में एक नई दलित उत्तेजना बनकर उभरा और एक नया ध्रुवीकरण होने के आसार दिखे। कल उसी उना में तीन सौ दलित परिवार बौद्ध हो गए कि जिस हिंदू धर्म में उन्हें इंसान भी नहीं माना जाता, वे उसमें क्यों रहें?
छत्तीसगढ़ के जशपुर और गुजरात के उना के बीच की यह बराबरी कुछ अटपटी लग सकती है, लेकिन है नहीं। ये दोनों ही तबके सवर्ण हिंदू समाज के शोषण और अत्याचार के शिकार हैं, आदिवासी शहरी लोकतंत्र के शिकार भी हैं। हिंदू समाज के सवर्ण हिस्से के हिंसक लोगों को समझना चाहिए कि अंबेडकर का बौद्ध आंदोलन इसी सवर्ण-हिंसा के खिलाफ शुरू हुआ था, और उना उस इतिहास का ताजा पन्ना है जिसकी स्याही अभी गीली है। हिंदुत्व के हमलावर और जानलेवा त्रिशूलों ने ऐसी एक भी वजह नहीं छोड़ी है कि दलित हिंदू धर्म के पांवों के तलुए बनकर हिंदू बन रहें।
ठीक इसी तरह देश के आदिवासी इलाकों की बेचैनी उन्हें लोकतंत्र के शहरी सोच वाले मॉडल के भीतर सांस नहीं लेने दे रही। यह सहज बात समझने की जरूरत है कि जहां जंगल हैं, जहां खदानें हैं, जहां कुदरत की ऐसी नेमतें हैं, आदिवासी वहीं पर बसे हुए हैं। वे जल, जंगल, जमीन से जुड़े हैं, उसी पर जिंदा हैं, और आदिवासी आंदोलन से निपटने का यह सही तरीका नहीं है। अगर अहिंसक आदिवासी आंदोलनकारियों की मांग या घोषणा संविधान से परे की है, तो इसके लिए ऐसी राजनीतिक तोड़मोड़ गलत है। भाजपा और दूसरी कई बाहरी पार्टियों के लोग दिन में हजार जगहों पर संविधान के खिलाफ बोलते हैं, खुलकर बोलते हैं, लिखते हैं, तो क्या उन सबको असहमत लोग तोड़ दें?
सत्तारूढ़ पार्टी या सरकार का ऐसा करना संवेदनाशून्य कार्रवाई है। इस मुद्दे को कानूनी नुक्तों से परे समझने की जरूरत है। देश के जल, जंगल, जमीन भी आदिवासियों की वजह से जिंदा बचे हैं। शहरों ने अपने लिए लोहा, कोयला, लकड़ी, पानी, और दूसरे खनिज जुटाने के लिए आदिवासी इलाकों तक पहुंच बनाई और स्थानीय मूल निवासियों को समझे बिना यह काम किया। नतीजा यह हुआ कि चौथाई सदी के ऐसे दोहन और शोषण के खिलाफ आदिवासी इलाकों में बेचैनी बढ़ी और नक्सलियों को जगह मिली।
छत्तीसगढ़ के जिस सरगुजा से नक्सल हिंसा कई बरस पहले खत्म हो चुकी है, उस इलाके में पत्थरगढ़ी आंदोलन शुरू हुआ है। वर्ष 2002 में अस्तित्व में आया पत्थरगड़ी आंदोलन देश के आधा दर्जन से अधिक राज्यों के उन इलाकों में हो चुका है जहां आदिवासी बसते हैं। सरगुजा से लगे झारखंड के आदिवासी बहुल इलाकों में यह जोरों पर चल रहा है। जिसमें संविधान के कुछ प्रावधानों का हवाला देते हुए बाहरी लोगों को अपने इलाके में आने से मना कर दिया है कि वे खुद अपने इलाके में शासन कर लेंगे। जिस पांचवी अनुसूची का जिक्र किया गया है सचमुच में वे संविधान में दर्ज हैं, जिसमें ग्रामसभा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। 
कुछ लोगों को यह बात असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक लग सकती है, लेकिन इस असहमति और विरोध को समझने के लिए पहले यह समझना होगा कि संविधान पांचवीं सूची के ऐसे आदिवासी इलाकों में ग्राम सभाओं को कितने और कैसे हक देता है जिनकी अनदेखी केन्द्र और राज्य सरकारें हमेशा से करते आई हैं। उस अनदेखी के खिलाफ अगर जमीन खो रहे आदिवासी विरोध के लिए संविधान की अपनी समझ से एक व्याख्या कर रहे हैं, तो उसके पीछे की वजहें को समझना होगा। यह इसलिए भी समझना जरूरी है कि छत्तीसगढ़ के इस हिस्से से दूर, दक्षिण में बसे बस्तर में सरकार की दसियों हजार जवानों की ताकत भी नक्सल हिंसा को खत्म नहीं कर पाई है। इस मोर्चे पर हजारों करोड़ रुपये साल का खर्च हो रहा है और हजारों बेकसूर आदिवासियों पर जुल्म भी हो रहा है जो उन्हें शहरी लोकतंत्र से दूर धकेल रहा है।
प्राय: प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर इलाकों पर राज्य सरकारों की नजर रहती है, इसका विरोध और आंदोलन कुचले जाते हैं। जशपुर के पास जहां आदिवासियों ने अपने स्वराज का पत्थर लगाया था, उसे उस इलाके से केन्द्रीय मंत्री बने भाजपा नेता के दौरे के दौरान उनकी सत्तारूढ़ पार्टी के लोगों ने तोड़ दिया। इस एक कोने में आदिवासी बेचैनी और दूसरे कोने में दलितों का सवर्ण हिंसा में धार्मिक विद्रोह हल्के में नहीं लेना चाहिए। सरकारों को ऐतिहासिक गलतियां या ऐतिहासिक गलत काम नहीं करने चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

कोरिया से निकली नसीहत

संपादकीय
29 अप्रैल 2018


एक देश से दो बने, और जंग से गुजर चुके उत्तर और दक्षिण कोरिया के मुखिया अभी मिले। उत्तर कोरिया का तानाशाह चलकर दक्षिण कोरिया में दाखिल हुआ। सरहद पर खड़े दक्षिण कोरिया के मुखिया को उसने बांह पकड़़कर अपनी सरहद में खींचा और फिर हाथ थामे दोनों ने दक्षिण कोरिया में कदम रखा। अभी कल तक उत्तर कोरिया की मिसाईलें दक्षिण कोरिया पर तनी हुई थीं। यह पैंसठ बरस बाद हुआ कि दक्षिण कोरिया का मुखिया उत्तर कोरिया पहुंचा। इससे उत्तर कोरिया की तानाशाही का लोकतांत्रिक दुनिया के साथ उठना-बैठना भी शुरू हुआ और सरहद के दोनों ओर बंट गए रिश्तेदारों ने भी शायद चैन की सांस ली होगी। लोगों को याद होगा कि इसके पहले जर्मनी के दो हो चुके हिस्से मिलकर एक हुए। अब उसी मिसाल को लोग कोरिया के बारे में सोच रहे हैं।
लेकिन वह तो दूर की बात है। हमको अपने करीब के भारत और पाकिस्तान के बारे में सोचना चाहिए। इन दो आपसी दुश्मन हो चुके देशों के एकीकरण के बारे में नहीं, महज अड़ोस-पड़ोस में चैन से जीना सीखने के लिए। आज इन दोनों देशों की सरकारों, फौजों, और राजनीतिक दलों, मीडिया के लिए एक-एक पसंदीदा दुश्मन जुटा हुआ है। जिस तरह हिंदुस्तान में लोग दशहरे पर सजाकर बनाने और फिर जलाने के लिए एक सुंदर सा रावण बनाते हैं, उसी तरह ये दोनों देश एक-दूसरे को रावण बताते हुए बारहमासी दशहरा मनाते हैं। और देश कहने का मतलब देश के तमाम लोग नहीं बल्कि गिने-चुने जंगखोर, नफरतजीवी, कुर्सीकाबिज, और बकवासी लोग। ऐसे लोग जो सरहदों से दूर बसते हैं और जो जंग के खतरों से खुदको अलग रखते हैं। ऐसे लोगों के लिए पड़ोसी को दुश्मन मानकर, बनाकर, उस पर तोहमतें जड़कर अपनी जिम्मेदारियों से बचना एक पसंदीदा शगल है। 
दरअसल लोग अपने भूतकाल के साथ चैन और सहअस्तित्व से जीना सीख नहीं पाते। भारत और पाकिस्तान ही नहीं, दुनिया की भागीदारी फर्मों को अलग हो चुके पार्टनर, टूटी हुई शादी के तलाकशुदा पति-पत्नी, राजनीतिक दल से अलग हुए नेता, इनमें से कोई भी अपने भूतकाल के साथ चैन से जीना बड़ी मुश्किल से ही सीख पाते हैं। ऐसे में भारत और पाकिस्तान के बीच नफरत और मोहब्बत का एक रिश्ता चले आ रहा है, लोगों के बीच मुहब्बत का, और बड़ों के बीच नफरत का। यह सिलसिला दोनों देश की गरीब जनता पर बड़ा भारी पड़ रहा है जिसकी जरूरतों में जंग के हथियारों की कोई जगह नहीं है। 
उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच इस ऐतिहासिक सद्भावना से दुनिया की हर तनातनी को सबक लेने की जरूरत है। एक से दो बने दो देश का फिर एक हो जाना जरूरी नहीं होता, लेकिन एक-दूसरे के साथ अगल-बगल जीना तो सीखना ही चाहिए। 
आज हिंदुस्तान और पाकिस्तान का सबसे बड़ा अकेला खर्च एक-दूसरे के खिलाफ फौजी तैयारी है। इस तनाव को निभाने में हथियार कंपनियां खरबपति होते जाती हैं और भ्रष्ट नेता अरबपति। जनता के मुंह का निवाला छिनता जाना है और जंग के सौदागरों की चर्बी बढ़ती जाती है। यह खत्म होना चाहिए। शायद पहली बार ऐसा हुआ है कि पाकिस्तानी फौज के मुखिया ने लगातार इस बात की खुली वकालत की है कि पाकिस्तान को हिंदुस्तान के साथ अमन की बात करनी चाहिए। ऐसा माहौल सरहद के दोनों तरफ बनाकर अपने-अपने भूखे बच्चों के पेट भरने चाहिए, बजाय तोप में गोले भरने के। (Daily Chhattisgarh)

लालकिले के बाद अब राजघाट भी गोद देंगे?

संपादकीय
28 अप्रैल 2018


दिल्ली से एक बड़ी अजीब सी खबर आई है कि लालकिले को डालमिया उद्योग ने गोद लिया है। डालमिया इसके लिए अगले पांच बरस तक लालकिले की देखरेख करेगा, और पच्चीस करोड़ रुपये खर्च करेगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश की धरोहरों को गोद देने की योजना की घोषणा की थी और इसके तहत लालकिले के लिए इंडिगो एयरलाइंस और जीएमआर जैसी कंपनियों ने भी बोली लगाई है। यह बोली जीतने के बाद अब डालमिया के मुखिया का कहना है कि वे लालकिले को पर्यटकों के बीच लोकप्रिय बनाएंगे और हर पर्यटक उनके लिए एक ग्राहक होगा जिसे वे वहां बार-बार लाने की कोशिश करेंगे।
विरासत की धरोहरों को इस तरह गोद दिया जा रहा है कि मानो वे अनाथ हों, और उन्हें पालने के लिए कोई बच न गया हो। यह बात कुछ सदमा पहुंचाती है क्योंकि लालकिला राजस्थान या दक्षिण भारत का कोई एक आम किला नहीं है। आजादी के वक्त से लालकिला आजाद  का प्रतीक बना हुआ है, और स्वतंत्रता दिवस पर हर प्रधानमंत्री यहीं से झंडा फहराते आए हैं। इसका महत्व एक इमारत से अधिक है, और वह भारतीय लोकतंत्र का एक बड़ा प्रतीक है। देश की तमाम ऐसी ऐतिहासिक इमारतों का रखरखाव केंद्र सरकार की संस्था करती है, और ऐसे में यह देखना अटपटा है कि सरकार इसके रखरखाव के लिए इसे कारोबारियों को गोद दे रही है। क्या इसके बाद राजघाट की भी बारी आएगी, और उस पर गांधी की क्या प्रतिक्रिया होगी? अगर देश के सबसे बड़े प्रतीकों  की जिम्मेदारी उठाने से भी सरकार कतराएगी, और इस जिम्मेदारी का भी निजीकरण और बाजारूकरण किया जाएगा, तो वह देश के लिए गौरव की बात बिल्कुल नहीं होगी। 
पिछले बरस मोदी सरकार की धरोहर गोद देने की योजना के तहत देश भर के सौ स्मारकों और धरोहर स्थलों को बाजार के सामने रखा गया जिसमें ताजमहल से लेकर मुंबई की बौद्ध कनेरी गुफाएं तक शामिल हैं। परंपरागत रूप से इन सबकी रखवाली और रखरखाव का काम भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण नाम की केंद्र सरकार की संस्था करते आई है और अब एकाएक इनकी मार्केटिंग तय की गई, और बाजार को उसमें शामिल किया गया। यह बात सुनने में ही तकलीफ देती है कि इस लोकतंत्र के प्रधानमंत्री जिस किले पर से आजादी का भाषण देते आए हों, अब उसका रखरखाव भी बाजार करेगा, और लालकिले को इस तरह गोद लेगा कि मानो वह कोई बेघर, अनाथ बच्चा हो। सरकार का बाजार और कारोबार से प्रेम राष्ट्रीय गौरव और उसके प्रतीकों से परे रखना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 28 अप्रैल

फौजियों के लिए गहने बेचती शिक्षिका और एक अफसर सैकड़ों करोड़ का

संपादकीय
27 अप्रैल 2018


पुणे की एक स्कूल शिक्षिका ने जब यह देखा कि भारत के सबसे बर्फीले इलाके सियाचिन में ऑक्सीजन की कमी से हिन्दुस्तानी फौजियों की मौत होती है, तो उसने यह तय किया कि वहां एक ऑक्सीजन प्लांट लगाने के लिए वह अपनी एक संस्था के माध्यम से धन जुटाएगी। परिवार में पति फौज से रिटायर्ड हैं, और बेटा अब तक फौज में है। लेकिन गृहिणी की चाह फौज के लिए और कुछ करने की है, इसलिए उसने एक करोड़ के ऑक्सीजन प्लांट के लिए दान और चंदा इक_ा करने की ठानी। इसके लिए सबसे पहले उसने अपने गहने बेचकर सवा लाख रूपए जुटाए, और अब ये और लोगों को इस संगठन में दान देने के लिए प्रेरित कर रही हैं। यह संगठन लगातार फौजियों की मदद का काम करता है। 
एक तरफ तो एक शिक्षिका अपने गहने बेचकर फौजियों के लिए कुछ कर रही है, दूसरी तरफ मध्यप्रदेश में आज एक आबकारी अफसर पर छापा पड़ा है, तो पहली खबर में उसके पास पांच सौ करोड़ की दौलत मिलने का अंदाज बताया गया है। हो सकता है कि यह आंकड़ा कई गुना बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया हो, लेकिन पांच सौ करोड़ की दौलत नहीं होगी, तो सौ-पचास करोड़ की तो होगी ही। और एक सरकारी अफसर जब एक निहायत ही बदनाम और संगठित भ्रष्टाचार वाले विभाग में काम करते हुए इतनी दौलत इक_ा कर चुका है, तब उस पर कार्रवाई हो रही है। इसी विभाग में इस दर्जे के सैकड़ों अधिकारी होंगे, और विभाग का ढर्रा ऐसा है कि उसमें से शायद अधिकतर लोग ऐसे ही भ्रष्ट हों। और छत्तीसगढ़ या मध्यप्रदेश जैसे प्रदेशों में यह अकेला भ्रष्ट विभाग नहीं है। तो फिर सरकार की बहुत सारी दौलत ऐसे भ्रष्टाचार में जाती है, और जो टैक्स या कमाई सरकार को मिलनी चाहिए, उस संभावना को भी यह भ्रष्टाचार बाजार में बेच देता है। 
यह देश विसंगतियों से इसी तरह भरा हुआ है। एक महिला अपने गहने बेचकर फौजियों के लिए कुछ कर रही है, दूसरी तरफ ऐसे अफसर हैं, नेता हैं, मंत्री और सांसद-विधायक हैं जो कि देश को जोंक की तरह चूस रहे हैं। सांसद हैं कि संसद के भीतर सवाल पूछने के लिए रिश्वत मांगते, लार टपकाते पकड़ाते हैं, बड़े-बड़े अफसर हैं जो छत्तीसगढ़ जैसे राज्य की पैदाइश हैं, और इसे लूटते-लूटते रंगे हाथों पकड़ाकर बर्खास्त हो रहे हैं। यह सिलसिला तकलीफदेह है और इससे देश का एक व्यापक नुकसान भी हो रहा है। जब आम जनता यह देखती है कि उसके दिए हुए टैक्स के पैसों से या तो सरकारी फिजूलखर्ची हो रही है, नेताओं का ऐश हो रहा है, या फिर उसे भ्रष्टाचार में सीधे-सीधे लूटा जा रहा है, तो जनता के मन में टैक्स देने की कोई इच्छा बाकी नहीं रहती, उसे लगता है कि जब नेता-अफसर-ठेकेदार मिलकर उसके दिए पैसे को लूटने वाले हैं, तो फिर वह क्यों टैक्स दे? 
मध्यप्रदेश में एक भ्रष्ट अफसर के इस तरह पकड़े जाने के मौके पर हम छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश जैसे राज्यों के लिए सिर्फ यही लिख सकते हैं कि राज्य सरकारों को भ्रष्टाचार को रोकने के लिए एक खुफिया तंत्र विकसित करना चाहिए ताकि भ्रष्टाचार होने के पहले उस पर नजर रखी जा सके, और इसके पहले की कोई अफसर सैकड़ों करोड़का आसामी हो सके, उस पर कार्रवाई हो जानी चाहिए। हमारी सामान्य जानकारी यह बताती है कि जब किसी भ्रष्ट अफसर पर छापा पड़ता है, तो उसके पहले वह अपनी अधिकतर काली कमाई को ठिकाने लगा चुका रहता है। छापामार अफसरों के हाथ उसकी काली कमाई का एक छोटा सा हिस्सा ही लग पाता है। और जब ऐसा हिस्सा ही सैकड़ों करोड़ का आंका जा रहा है, तो फिर सरकार को पूरे नुकसान का क्या अंदाज लगाया जाए? 
राज्य सरकारों में कुछ विभाग अपनी जड़ों से लेकर पत्तों तक भ्रष्ट रहते हैं। इसलिए इनकी शिनाख्त करके बड़ी आसानी से इस भ्रष्टाचार को रोका जा सकता है। जब एक के बाद दूसरी, कई सरकारें आती और चली जाती हैं, और इस भ्रष्टाचार पर कार्रवाई नहीं होती, तो उसका एक ही मतलब होता है कि नई सरकार पिछली सरकार की इस विरासत को खोना नहीं चाहती। ऐसे में यह भी सोचने की जरूरत है कि क्या जनता ऐसे भ्रष्टाचार के सुबूत जुटाकर सोशल मीडिया पर भांडाफोड़ कर सकती है? (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 27 अप्रैल

दीवारों पर लिक्खा है, 26 अप्रैल

आसाराम जैसे बड़े मुजरिमों के लिए अलग कानून जरूरी

संपादकीय
26 अप्रैल 2018


कुछ महीने पहले हरियाणा में बाबा राम रहीम नाम के एक बलात्कारी की गिरफ्तारी के लंबा-चौड़ा नाटक चला, और उस बाबा के भक्तों ने गिरफ्तारी और सजा के दौरान जो अराजकता फैलाई उसमें कई लोग मारे गए थे, उसके पहले संत रामपाल नाम के एक आदमी को जब कई गंभीर अपराधों में गिरफ्तार करने की नौबत आई तो उसके समर्थकों ने उसके किले जैसे आश्रम की ऐसी हथियारबंद मोर्चेबंदी की कि सरकार को फौजी कार्रवाई करके उसे निकालना पड़ा, और अदालत के रास्ते जेल भेजना पड़ा। कल जिस आसाराम को सजा हुई है, उसे भी जब इंदौर के आश्रम से गिरफ्तार करने की नौबत आई थी तो बड़ा हंगामा हुआ था। 
ऐसे तमाम पाखंडियों, बलात्कारियों, और भ्रष्ट चोगाधारियों के पास किसी आश्रम के नाम से या किसी ट्रस्ट के नाम से हजारों करोड़ की दौलत जुट जाती है, और उसकी ताकत से वे अपने आपमें एक संविधानेत्तर सत्ता बन जाते हैं। देश में हर बरस कहीं न कहीं ऐसा कोई धर्म-आध्यात्म से जुड़ा जुर्म सामने आता है। इसके लिए भारत के कानून में एक फेरबदल करने की जरूरत है। आज भी ऐसे बाबाओं और आश्रमों की दौलत किसी न किसी रजिस्टर्ड ट्रस्ट के नाम से रहती है। ट्रस्टों को लेकर राज्य सरकारों से लेकर केन्द्र सरकार के इंकम टैक्स तक के नियम बड़े कड़े रहते हैं, और राज्य सरकारें किसी भी ऐसे ट्रस्ट को भंग करके उस पर प्रशासक बिठा सकती हैं। एक ऐसे कानून को लाने की जरूरत है कि जब कभी किसी ट्रस्ट के मुखिया या किसी सम्प्रदाय के मुखिया को इस किस्म की सजा हो, और उसके आश्रम जुर्म का अड्डा बन जाएं, तो सरकार जनहित में ऐसे ट्रस्टों की सारी दौलत जब्त करके उसे जनता के काम में लेकर आए। क्योंकि यह दौलत जनता से ही आती है, फिर चाहे वह अंधविश्वास में डूबी हुई भक्त जनता ही क्यों न हो। 
देश में जब बड़े-बड़े मंदिरों की सम्पत्ति पर सरकार प्रशासक बिठाती है, और वहां पर सरकारी ट्रस्ट बनाकर उनकी व्यवस्था करती है, तो ऐसे तमाम आश्रमों की सम्पत्ति को जब्त करने का कानून रहना चाहिए। जब लोकतंत्र में कुछ निजी लोगों का साम्राज्य इतना बड़ा हो जाता है कि वह कानून को आंख दिखाने लगता है, सड़कों पर हिंसा और उत्पात करने लगता है, जब वह राजद्रोह से परहेज नहीं करता, तब उस पर काबू के लिए अलग कानून की जरूरत है। ये तमाम ट्रस्ट सरकार से टैक्स रियायत पाने वाले रहते हैं, इनके लिए जमीनें भी कई जगह सरकारें रियायत पर देती हैं या मुफ्त भी देती हैं। ये तमाम कानूनों को तोड़ते हुए अवैध निर्माण करते हैं। इन सब बातों को देखते हुए सरकार के पास इनके अधिग्रहण का ऐसा अधिकार रहना चाहिए कि ऐसे सारे पाखंडी और मुजरिम साधु-संत अपने साम्राज्य को लेकर अतिआत्मविश्वास से भरे हुए न रहें। 
हिन्दुस्तान में जनता की वैज्ञानिक समझ को सत्ता के लोगों ने सोच-समझकर कमजोर बनाए रखा है। ऐसे में जनता इन पाखंडियों को अपने पैसे भी देती है, और अपने घर की लड़कियां-महिलाएं भी दे देती हैं। यह सिलसिला थमना चाहिए, और चूंकि सामाजिक जागरूकता बहुत धीमी रफ्तार से आती है, इसलिए कानून बनाकर ऐसे तमाम मुजरिमों पर काबू करना चाहिए। देश में कानून में ऐसे फेरबदल की जरूरत भी है कि पाखंडी धर्मगुरूओं से परे भी अगर कोई दौलतमंद कोई जुर्म करते हैं, तो उन्हें भी कैद देने के साथ-साथ उनकी दौलत का एक हिस्सा सरकारी खजाने में ले लेना चाहिए। लोगों को लगने वाले जुर्माने की रकम तय नहीं करनी चाहिए, लोगों की आर्थिक क्षमता के मुताबिक उस अनुपात में उनसे जुर्माना लिया जाना चाहिए। एक मामूली हत्यारे को जितनी कैद होती है, एक खरबपति मनु शर्मा को भी महज उतनी ही कैद अगर होगी, तो वह इंसाफ नहीं होगा। ऐसे लोगों से उनकी संपत्ति का एक हिस्सा भी छीन लेना चाहिए। इंसाफ अंधा नहीं होना चाहिए, उसे मुजरिमों की दौलत को देखते हुए उसके एक हिस्से जितना जुर्माना लगाना चाहिए, और अगर वह दौलत कोई धार्मिक या सामाजिक ट्रस्ट है, तो वह पूरा ही ट्रस्ट सरकार को ले लेना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

आसाराम की दौलत भी जब्त करके लड़कियों में जागरूकता बढ़ाने पर खर्च करना चाहिए...

संपादकीय
25 अप्रैल 2018


हजारों करोड़ की दौलत के मालिक, और करोड़ों अनुयायियों वाले आसाराम को अदालत ने एक नाबालिग छात्रा के साथ बलात्कार का मुजरिम करार दिया है, और इस फैसले का बड़ा इंतजार किया जा रहा था। यह छात्रा मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा में आसाराम के ही एक स्कूल के हॉस्टल में रहती थी, और इस मुकदमे की जानकारी के मुताबिक उसे देह शोषण की साजिश के तहत आसाराम के पास भेजा गया था। इस छात्रा का परिवार आसाराम का भक्त था। इसके बाद पिछले कुछ बरस से आसाराम जेल में ही बंद रहा क्योंकि जमानत की हर कोशिश हर अदालत से खारिज होती चली गई। इसकी वजह शायद यह थी कि आसाराम के खिलाफ इस मुकदमे में जितने गवाह थे उनकी एक-एक कर हत्या होती गई, या रहस्यमय मौत हो गई। नतीजा यह निकला कि जेल में रहते हुए आसाराम की मदद के लिए बाहर अगर कोई ऐसा कर रहे थे, तो जेल के बाहर रहने पर आसाराम और क्या नहीं करते, शायद इसीलिए आसाराम को जमानत नहीं मिल पाई। 
इक्कीसवीं सदी के भारत को हिन्दू धर्म के सबसे बड़े जनाधार वाले लोगों में से आसाराम एक है, और वह आसाराम बापू नाम से मशहूर रहा, सत्ता से जुड़े हुए लोग उसके पैरों तले ऐसे बिछे रहते थे कि उन पैरों पर खड़े बदन के ऊपर का दिमाग बददिमाग हो जाना जायज ही है। लेकिन मामला अकेले आसाराम का नहीं था, आसाराम के बेटे नारायण सांई पर भी इसी किस्म के आरोप लगे, और गिरफ्तारी हुई। बाप-बेटे दोनों के बलात्कारी होने के मामले सामने आए, बाप के खिलाफ साबित हो गया, लेकिन इनके भक्तों का हाल यह है कि अभी कुछ दिन पहले तक वे देश भर में आसाराम की तस्वीरें लेकर रैली निकालते आए हैं, आसाराम के समर्थन में पर्चे बांटते आए हैं, और इसे पाकिस्तानी, मुस्लिम, और विदेशी साजिश करार देते आए हैं। 
नाबालिग के साथ बलात्कार की सजा अभी आसाराम को सुनाई नहीं गई है, लेकिन वह शायद दस बरस से अधिक हो। वकीलों ने आसाराम की अधिक उम्र का हवाला देते हुए सजा कम करने की मांग की है, लेकिन दोषी करार देने के बाद किसी एक जैन धर्मगुरू की प्रतिक्रिया टीवी की खबरों पर आ रही थी कि बलात्कार के वक्त भी तो आसाराम की उम्र अधिक थी, उस वक्त तो अधिक उम्र की वजह से वह हरकत नहीं टली। इस जैन धर्मगुरू ने कहा कि यह सजा दूसरे साधु-संतों और ऐसे धर्मगुरूओं के लिए एक सबक भी रहेगी। अभी कुछ महीने पहले ही एक दूसरे स्वघोषित धर्मगुरू बाबा गुरमीत राम रहीम इंसान को भी बलात्कार में सजा हुई है, और हर कुछ हफ्तों में देश में कोई न कोई ऐसा भगवा या दूसरे धर्म का रंग ओढ़ा हुआ इंसान बलात्कार में गिरफ्तार होते दिखता ही है। 
धर्म और जुर्म, न सिर्फ उच्चारण में मिलते-जुलते हैं, बल्कि इनका मेल भी बहुत दिखता है। बहुत से लोगों के जुर्म के लिए धर्म एक किस्म की बुलेटप्रूफ जैकेट की तरह काम आता है कि कानून की गोलियां उन तक पहुंच नहीं पातीं। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में विख्यात चंबल के इलाके का एक धर्मगुरू ऐसा है जिसके आश्रम से डकैतों और मुजरिमों को भाड़े पर हथियार मिलने की जानकारी आम हैं, लेकिन इस बात के लिए कुख्यात होने पर भी पुलिस और जजों के बीच खासा लोकप्रिय यह गुरू सार्वजनिक रूप से विख्यात ही बना हुआ है। धर्म का कुल मिजाज देखें, तो वह लोकतंत्र, कानून, इंसानियत कहे जाने वाले शब्द, इन सबके ठीक खिलाफ रहता है। धार्मिक रंग ओढ़े हुए लोगों के भक्तों ने जितने ताकतवर लोग जितनी संख्या में रहते हैं, उतनी ही बददिमागी उनमें आ जाती है, और उतने ही जुर्म वे करने लगते हैं। लोगों को यह बात ठीक से याद नहीं कि एक भक्त परिवार की नाबालिग छात्रा से आसाराम ने यह बलात्कार 56 महीने पहले 15 अगस्त 2013 को किया था, आजादी की सालगिरह पर। और गिरफ्तारी से लेकर अब तक उसके जुर्म के कई गवाह या तो मार डाले गए, या वे लापता हो गए। 
लेकिन इस मौके पर देश के तमाम लोगों को सावधान भी हो जाना चाहिए कि वे किसी भी बाबा या संत-पाखंडी के पास अपने परिवार के लोगों, अपने बच्चों को भेजने के पहले सावधान हो जाएं कि वहां उन पर सेक्स-हमला भी हो सकता है, उनके दिमाग को किसी साजिश में फंसाया भी जा सकता है, और उन्हें एक किस्म के सम्मोहन में फांसकर स्थायी रूप से अपना भक्त बनाकर घर-परिवार से दूर भी किया जा सकता है। लोगों को धर्म और आध्यात्म से जुड़े पाखंडियों से दूर रहना चाहिए, और अपने परिवार को भी दूर रखना चाहिए। ईश्वर अगर कहीं है, तो वह ऐसा कारोबारी तो हो नहीं सकता कि वह अपने तक लोगों को लाने के लिए दलाल तैनात करे। आसाराम को मिली सजा से पहले ही उसकी गिरफ्तारी के वक्त से उसका बापू का स्वघोषित दर्जा खत्म हो गया था, और उसका बचाखुचा करिश्मा अब कमजोर पडऩा चाहिए। जिन लोगों को इस सजा के बाद भी आसाराम में भलाई दिखती है, उन्हें लेकर देश के कानून में यह इंतजाम रहना चाहिए कि उनके बच्चों की देखरेख सरकार भी करे, सरकार भी ऐसे गैरजिम्मेदार मां-बाप के बच्चों पर निगरानी रखे, उन्हें सुरक्षित रखने के लिए। यह फैसला बहुत ही अच्छा फैसला है, और इतने ताकतवर एक बलात्कारी-पाखंडी की सारी लोकप्रियता के बावजूद जांच एजेंसियों से लेकर अदालत तक पर कोई असर न पडऩा एक बड़ी बात है। जिन पैरों पर मुख्यमंत्रियों से लेकर प्रधानमंत्री तक गिरे पड़े दिखते आए हैं, उन पैरों में बेडिय़ां लगना कानून की कामयाबी है। आसाराम के इस जुर्म के बाद उसकी दौलत के जब्त होने की संभावना भी कानून में ढूंढनी चाहिए, और ऐसा न होने पर सरकार को एक नया कानून बनाकर भी ऐसा करना चाहिए। और हजारों करोड़ की उसकी दौलत का इस्तेमाल लड़कियों में जागरूकता बढ़ाने के लिए करना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 25 अप्रैल

वक्त की लहर और बहाव के साथ तैरना सीखना जरूरी

संपादकीय
24 अप्रैल 2018


इन दिनों इंटरनेट और क्रेडिट-डेबिट कार्ड रखने वाले लोगों को सौ-दो सौ रूपए के सामान भी खरीदने होते हैं, तो वे पहले ऑनलाईन परखते हैं। वहां से मिले रेट को जब लोकल बाजार से मिलाकर देखते हैं, तो बाजार महंगा लगता है। नतीजा यह है कि लोगों की ऑनलाईन खरीदी बढ़ते चली जा रही है। लेकिन अभी भारत के ऑनलाईन शॉपिंग वालों को लेकर हुए दो सर्वे बताते हैं कि लोगों को उनके मंगाए गए सामानों में से एक तिहाई सामान नकली मिले। यह अनुपात बड़ा चौंकाने वाला है क्योंकि बड़ी-बड़ी शॉपिंग वेबसाइटें मॉल के खरे होने के बड़े-बड़े दावे भी करती हैं, और सामान वापिस करने की सहूलियत भी देती हैं। 
आज भारत ही नहीं बाकी दुनिया में भी ऑनलाईन शॉपिंग लगातार इस तरह बढ़ गई है कि ब्रिटेन की आज की खबर बताती है कि वहां पर कार के ताले तोडऩे के औजार तक इंटरनेट पर बिक रहे हैं, और पुलिस इसे रोकने की कोशिश कर रही है जो कि हो नहीं पा रहा। इंटरनेट लोगों को बेचेहरा और बेनाम रहने की एक बड़ी सहूलियत देता है जिसके चलते लोग तरह-तरह की धोखाधड़ी भी करते हैं। अब सवाल यह है कि बाजार जाने की जहमत से बचने के लिए बहुत से लोग ऑनलाईन खरीदी कर रहे हैं क्योंकि शहरों में ट्रैफिक जाम रहता है, बाजारों में गाडिय़ां खड़ी करने की जगह नहीं रहती है, और बाजार के खुलने के घंटे सरकार के काबू में रहते हैं। दूसरी तरफ इंटरनेट पर खरीददारी चौबीसों घंटे की जा सकती है, और लोग बाथरूम में बैठे हुए भी फोन से दुनिया जहां की चीज खरीद डालते हैं। 
कुछ बरस पहले जब हिन्दुस्तानी शहरों में बड़े-बड़े मॉल खुले, उनमें सुपर बाजार खुले, तो मोहल्लों की किराना दुकानों से लेकर बाजार के ब्रांडेड सामानों के शोरूम तक का धंधा कमजोर हो गया। मॉल्स में लोगों को एक साथ कई कंपनियों के सामान देखने और खरीदने मिल जाते हैं, और शहरी बाजारों की धूल-धुएं भरी धक्का-मुक्की के मुकाबले मॉल्स आरामदेह भी रहते हैं। अब भारतीय शहरों में मॉल्स आने के दस-बीस बरस के भीतर ही ऑनलाईन बाजार ने मॉल्स को पीटना शुरू कर दिया है। एक वक्त लोग जिस फास्टफूड को खाने के लिए बाजार या मॉल्स जाते थे, अब लोग उसे घर बैठे बुलाने लगे हैं। इससे कारोबार और रोजगार, इन दोनों में बड़ी रफ्तार से एक फर्क आया है, कई किस्म के रोजगार घटे हैं, वहीं घर तक सामान पहुंचाने वाले लाखों-करोड़ों रोजगार हिन्दुस्तान जैसे देश में पैदा भी हुए हैं। कुरियर कंपनियों के नौजवान ऑनलाईन खरीदी के सामानों से लेकर लोकल फास्टफूड तक पहुंचाते हुए दिखते हैं, और जहां दुकानों का धंधा मंदा हुआ है, यह एक नई नौकरी, नए किस्म का रोजगार बढ़ गया है। 
इस मुद्दे पर लिखने का मकसद यह है कि कारोबार हो या रोजगार, लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि नई टेक्नालॉजी, और बाजार के नए तरीके मिलकर जरा सी देर में किसी कारोबार को ठप्प कर सकते हैं, किसी रोजगार को बेकार कर सकते हैं। आने वाले वक्त में ड्रोन से घर-दफ्तर तक सामान पहुंचाना बढ़ते चले जाएगा, और वैसे वक्त आज के डिलीवरी ब्वॉय फिर कोई नया काम ढूंढने में लग जाएंगे। आज लोगों में इतने चौकन्नेपन की जरूरत है कि वे किसी काम के लिए, किसी कारोबार के लिए, अपने को तैयार करते हुए दस-बीस बरस का अंदाज लगाएं। टेक्नालॉजी बड़ी रफ्तार से रोजगार-कारोबार खत्म भी करती है, खड़े भी करती है। वक्त की लहर और उसके बहाव के साथ तैरना सीखना जरूरी है, आज, कल जिंदा रहने के लिए। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 24 अप्रैल

बहादुरी चाहे न रही हो, ईमानदारी तो है ही...

संपादकीय
23 अप्रैल 2018


अमरीका में एक रेस्त्रां में घुसकर अंधाधुंध गोलियां चलाकर एक गोरे नौजवान ने चार लोगों को मार डाला, और बहुत से लोगों को जख्मी कर दिया। यह नौजवान पहले से आत्मघाती मिजाज का था, और उसके परिवार ने एक बार पहले पुलिस को खबर भी की थी। पिछले बरस उसे राष्ट्रपति भवन के पास एक सुरक्षा घेरे को लांघने के जुर्म में गिरफ्तार भी किया गया था। लेकिन इसके बावजूद अमरीकी कानून के मुताबिक उसे कई तरह के हथियार रखने की छूट दी, और वह एक ऑटोमेटिक रायफल लेकर इतवार की सुबह रेस्त्रां में घुसा, और गोलीबारी की। अमरीका में हर नागरिक के पास कितने भी हथियार हो सकते हैं, और ये हथियार आत्मरक्षा के हथियार जैसे न होकर, हमला करने के हथियार भी रहते हैं, और हर कुछ दिनों में वहां गोलीबारी के बाद हथियारों पर काबू की मांग उठती है, लेकिन हथियार कंपनियां सरकार पर अपने दबाव के चलते ऐसा होने नहीं देती। अमरीका की कुख्यात गन-लॉबी बहुत सी पार्टियों, और बहुत से उम्मीदवारों को चुनाव में बहुत सा पैसा देती है, और उनके कारोबार पर रोक नहीं लग पाती। 
लेकिन आज इस गन कंट्रोल की मांग पर लिखने का मकसद नहीं है, बल्कि इस हादसे में हीरो की तरह सामने आए एक नौजवान पर लिखना है जिसने इस बंदूकबाज पर कब्जा किया, और बाकी बहुत सी जिंदगियों को बचाया। एक अश्वेत नौजवान उस वक्त जिस रेस्त्रां में ही था, और वह ठीक हमलावर की तरह 29 बरस का ही था। उसने मौका मिलते ही इस बंदूकबाज को दबोचा, उसका हथियार छीना, और उससे वहां मौजूद बाकी लोगों की जिंदगियां बचीं। लेकिन जब अमरीकी मीडिया और वहां मौजूद लोग जख्मी हो गए इस अश्वेत नौजवान को एक हीरो की तरह मानकर उसका शुक्रिया अदा कर रहे हैं, तो उसने कहा कि- सब लोग जो कह रहे हैं उसे मान लेना बहुत स्वार्थी बात होगी, मैंने जो कुछ किया वह अपने आपको बचाने की कोशिश थी, मेरे सामने एक मौका आया और मैंने हथियार छीनने की कार्रवाई की। 
अब एक नौजवान को खबरों में हीरो बनने का यह मौका बिना मांगे मिला, पुलिस से लेकर प्रेस, और पब्लिक तक लोगों ने उसे हीरो माना, और वह अपने मन की बात को उजागर करके इस तारीफ के हक को नकार रहा है। यह विनम्रता आसान नहीं है। आज दुनिया में लोग किसी तरह का सम्मान या पुरस्कार पाने के लिए सौ किस्म के झूठ गढ़ते हैं, इतिहास को बदल डालते हैं, और सम्मान को एक किस्म से खरीद लेते हैं। हमने अपने आसपास ही ऐसे पुलिस वाले देखे हैं जो कि बहादुरी के किस्से गढऩे के लिए झूठी मुठभेड़ को असली बताकर प्रदेश की राजधानी से लेकर देश की राजधानी तक जलसों में मैडल पाते हैं। कुछ लोग ऐसे भी रहते हैं जो अपने गुजर चुके मां-बाप को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी साबित करने के लिए कई तरह के किस्से गढ़ लेते हैं, और गवाह भी जुटा लेते हैं। ऐसे में अगर अमरीका में किसी अश्वेत नौजवान के सामने बहादुर कहे जाने का मौका खुद चलकर आया, और उसे वह बहादुरी नहीं, महज आत्मरक्षा कह रहा है, तो यह ईमानदारी और विनम्रता सोचने-समझने लायक बातें हैं। 
दुनिया में अधिकतर लोग ऐसे मौकों पर चुप रहकर तारीफ को ले लेते, और उनके अपने दिल-दिमाग पर यह बोझ भी नहीं रहता कि उन्होंने कुछ झूठ कहा, कुछ गलत कहकर यह सम्मान हासिल किया। लेकिन अपने खुद के तात्कालिक हितों के खिलाफ जाकर सिर्फ खुद को मालूम सच को इस तरह सामने रखने के लिए इंसान में एक महानता की जरूरत होती है। चाहे इस नौजवान ने महज अपने आपको बचाने के लिए हमलावर का हथियार छीना हो, लेकिन उसने इस तारीफ को जिस विनम्रता से नकारा है, उस विनम्रता के लिए तो वह सम्मान का अधिकारी है ही। यह बात बहुत छोटी सी है, लेकिन लोगों को यह सोचना चाहिए कि ऐसे कितने मौके उनके सामने आ सकते हैं, जब वे ऐसी ही सच्चाई और ईमानदारी से घर पहुंची शोहरत और तारीफ को विनम्रता से लौटा सकें कि वे उसके हकदार नहीं हैं। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 अप्रैल

भूली-बिसरी यादों वाला स्कूल

23 अप्रैल 2018

मेरे शहर में कुछ दिन पहले खबर आई कि सड़क के किनारे लगने वाले एक इतवारी बाजार में लगने वाली भीड़ को देखते हुए अब उसे सड़क से हटाकर उस इलाके के एक स्कूली मैदान पर लगाया जाएगा। यह स्कूल म्युनिसिपल का स्कूल है जिसमें अमूमन आसपास के इलाकों के गरीब और निम्न-मध्यम वर्ग के बच्चे ही पढ़ते हैं। इस स्कूल का मैदान पहले भी छोटा था, बाद में जिस तरह म्युनिसिपल ने अपने खर्च निकालने के लिए हर स्कूल के सामने सड़क किनारे दुकानों की चाल बनाई, इस स्कूल के सामने भी दुकानें बन गईं। बाद में इसके बगल से बहने वाली एक नहर की जगह पर एक सड़क बनाई गई, तो स्कूल की दीवार और पीछे चली गई क्योंकि सड़क को चौड़ा होना था। कुछ इमारतें स्कूल के भीतर की जगह पर और बनानी पड़ीं क्योंकि कमरे कम पड़ रहे थे, और बच्चे बढ़ रहे थे। नतीजा यह निकला कि एक छोटा सा मैदान बच गया था, और अब वहां इतवार को बाजार भरेगा।
इस स्कूल की बात इसलिए भी ध्यान खींच गई क्योंकि मैं ग्यारह बरस इसी स्कूल में पढ़ा, और मेरे पढ़ते-पढ़ते इसका नाम शहीद स्मारक स्कूल रखा गया। वे शहीद शायद 1971 की भारत-पाकिस्तान जंग के शहीद थे। उस वक्त भी इस स्कूल के मैदान पर खेलने के लिए आसपास चारों तरफ बसी हुई घनी बस्तियों के बच्चे पहुंचते थे क्योंकि पूरे इलाके में मैदान वही एक था। था तो स्कूल के बच्चों के लिए, लेकिन स्कूल के बाहर के बच्चे भी छुट्टियों के दिन में भी वहां आकर खेलते थे। पैंतालीस से अधिक बरस गुजर चुके हैं, और इस तकरीबन आधी सदी में आसपास की आबादी कम से कम दो गुना अधिक घनी तो हो ही गई होगी, और ऐसे में उसके बीच की अकेली स्कूल के अकेले मैदान को इतवार के दिन बाजार के लिए दिया जा रहा है, खेलने की गुंजाइश खत्म, और हो सकता है कि इतवार के पहले और बाद भी वहां पर कचरा और गंदगी छोड़कर जाए यह बाजार।
कुछ इसी किस्म का हाल दूसरी सरकारी स्कूलों के साथ भी हुआ है। रायपुर की एक सबसे पुरानी स्कूल, सप्रे स्कूल, वहां का मैदान सड़कों को चौड़ा करने के लिए दोनों तरफ से संकरा किया गया, और अब उसका सड़क-इस्तेमाल न होकर महज महंगी कारों के लिए पार्किंग का इस्तेमाल हो रहा है, बीच का मैदान बेशक्ल होकर किसी भी टूर्नामेंट के लायक नहीं रह गया। एक वक्त था जब इमरजेंसी के खिलाफ विजय लक्ष्मी पंडित की आमसभा इसी मैदान पर हुई थी, और देश के तमाम बड़े नेताओं ने कभी न कभी इस मैदान पर लोगों से रूबरू बात की थी, यहां लगातार खेल और टूर्नामेंट होते थे, लेकिन सड़क चौड़ी करने के नाम पर इस मैदान को खत्म कर दिया गया। यह लिखते हुए याद पड़ता है कि एक वक्त शहर के दूसरे सिरे पर रहने वाले मेरे पिता घंटे भर चलकर इसी स्कूल तक पढऩे आते थे, और लौटते हुए कपड़े की एक पुरानी बड़ी दुकान में कुछ घंटे नौकरी करते हुए लौटते थे। अब उस स्कूल का मैदान भी पहले की तरह के किसी खेल या टूर्नामेंट के लायक रह नहीं गया।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के इसी शहर में सरकार की एक सबसे पुरानी स्कूल के मैदान को सड़क चौड़ी करने के नाम पर काटकर छोटा किया गया। इसी गवर्नमेंट स्कूल में भारत के एक भूतपूर्व उपराष्ट्रपति जस्टिस हिदायतुल्लाह भी पढ़े थे, लेकिन वैसी यादें भी कि स्कूल को सरकारी नजरों से बचा नहीं पाई। शहर के तकरीबन हर सरकारी स्कूल और कॉलेज के मैदानों का यही हाल हुआ है, और लंबाई-चौड़ाई में संकरा करने के बाद अब बची हुई जगह को साल में अधिक से अधिक दिन किसी न किसी बाजारू बिक्री-प्रदर्शनी के लिए भाड़े पर दे दिया जाता है जो कि पूरे मैदान में स्थायी गड्ढे छोड़कर जाती हैं।
हिन्दुस्तान के कुछ शहरों में स्थानीय इंजीनियरों, आर्किटेक्टों, और टाऊन प्लानरों के ऐसे एक्टिविस्ट-समूह रहे हैं जिन्होंने शहर के भीतर सरकार या म्युनिसिपल के ऐसे फैसलों का विशेषज्ञता के तर्कों के आधार पर जमकर विरोध किया, अदालती दखल भी दी, और इन पर अमल रोका। लेकिन हिन्दुस्तान के जिस इलाके, छत्तीसगढ़, में मैं बसा हुआ हूं, वहां पर इस तरह की कोई जनजागरूकता नहीं है, और न ही राज्य सरकार से लेकर म्युनिसिपल तक, किसी में भी इतनी जवाबदेही है कि ऐसे फैसलों के पहले जनता से राय मांगी जाए, जानकार लोगों से सलाह ली जाए। निर्वाचित नेताओं, उनके चापलूस अफसरों, और नीतियां-प्रोजेक्ट बनाने वाले ठेकेदारों ने मिलकर स्थानीय शहरी हितों के खिलाफ एक ऐसा बरमूडा ट्रैंगल बना दिया है जिसमें सारे सार्वजनिक हित डूब जाते हैं। इन संस्थाओं पर काबिज नेताओं और अफसरों को हर बड़े प्रोजेक्ट के पीछे इतनी कमाई दिखती है कि इंच-इंच खुली जगह पर कैसे कांक्रीट की कई मंजिलें खड़ी की जाएं, इसी फिक्र में इनके पांच बरस निकल जाते हैं या इनकी पोस्टिंग निकल जाती है।
गरीब बच्चों के एक स्कूल के मैदान पर छुट्टी के दिन तो आसपास के लोग भी खेल लेते हैं, लेकिन उस पर बाजार लगाकर म्युनिसिपल उनका बुनियादी हक छीन रही है। अगर किसी के पास अदालत जाने की ताकत हो, तो ऐसा फैसला पल भर में खारिज हो जाएगा। लेकिन ऐसे फैसले तो खेल के हर मैदान को लेकर रोज लिए जा रहे हैं, रोज वहां पर किसी धर्म के लिए, किसी यज्ञ के लिए, किसी बाजार की प्रदर्शनी के लिए मैदान किराए पर दिया जा रहा है, और खेल ताक पर धर दिया जाता है। मजे की बात यह है कि राज्य सरकार के मुख्यमंत्री, बहुत से मंत्री, अफसर, मेयर, बार-बार यह घोषणा करते हैं कि खेल के मैदान का कोई भी गैरखेल इस्तेमाल नहीं होने दिया जाएगा, लेकिन रात-दिन होता यही है।
सरकार और म्युनिसिपल की दिलचस्पी बड़े-बड़े करोड़ों के स्टेडियम बनाने में रहती है जिसमें खूब कांक्रीट लगता है, खूब बड़ा बिल बनता है, खूब कमाई होती है। लेकिन सवाल यह है कि जब छोटे-छोटे बच्चों के खेलने के लिए मैदान ही नहीं रहेंगे, जब छोटे-छोटे टूर्नामेंट के लायक मैदान नहीं बचेंगे, तो बड़े-बड़े स्टेडियम के बड़े-बड़े मैच में तो बच्चे महज दर्शक होकर ही जा सकेंगे, खेल तो नहीं सकेंगे। राज्य सरकार अगर चाहे तो पूरे प्रदेश का एक सोशल ऑडिट सरकार से परे करवा सकती है कि राज्य बनने के बाद स्कूली मैदानों का आकार घटकर कितना रह गया है।  (Daily Chhattisgarh)

सीजेआई हो या कोई और, लोकतंत्र में कोई भी कैसे हो सकते हैं सवालों से परे?

संपादकीय
22 अप्रैल 2018


देश में संसद ठप्प पड़ी है, सरकार पर संसद से परे और तो कोई काबू रहता नहीं है सिवाय न्यायपालिका के। लेकिन इन दिनों न्यायपालिका को लेकर जिस तरह से जनता का विश्वास हिल गया है, वह लोकतंत्र के लिए एक बड़ी खतरनाक नौबत है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ आधा दर्जन राजनीतिक दलों के साथ मिलकर कांग्रेस पार्टी एक महाभियोग लेकर आ रही है, उसने राज्यसभा के सभापति को इसका प्रस्ताव दिया है, और इसे लेकर सत्तारूढ़ पार्टी के साथ खासी खींचतान के आसार दिख रहे हैं। लेकिन इस बीच एक दूसरी बात यह हुई है कि सुप्रीम कोर्ट के कुछ जजों ने मुख्य न्यायाधीश के तौर-तरीकों और विवेक के उनके फैसलों पर सवाल उठाते हुए उन्हें अदालत की साख कम करने वाला ठहराया। और इसी तरह की सोच रखने वाले कुछ वकीलों ने मुख्य न्यायाधीश के अधिकारों को चुनौती देते हुए एक याचिका लगाई जो कि खारिज कर दी गई। इसी दौर में सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने एक मामले की सुनवाई करते हुए यह कहा कि मुख्य न्यायाधीश अपने आपमें एक संस्था होते हैं, और उस पर शक या सवाल नहीं उठाए जा सकते।
इसी न उठाए जा सकने को लेकर आज हम यहां पर लिखना चाहते हैं कि लोकतंत्र में किसी को भी सार्वजनिक ओहदे पर रहते हुए जवाबदेही से परे क्यों होना चाहिए? राष्ट्रपति हो, या प्रधानमंत्री, या सुप्रीम कोर्ट के कोई जज, जहां तक उनके कामकाज को लेकर सवाल पूछे जाते हैं, उन पर संदेह खड़ा होता है, तो उन्हें पारदर्शिता के साथ तथ्यों को सामने रखकर एक जवाब देना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट पहले भी अपने जजों की सम्पत्ति की जानकारी सूचना के अधिकार में देने से मना कर चुका है, और सरकारी कर्मचारियों से सरकार को जितने किस्म की जानकारियां मिलती है, उस तरह की जानकारी देने से भी जज मना करते रहे हैं। जजों ने अपनी एक अलग दुनिया बना रखी है जिसमें अपने लिए सम्मान जुटाते हुए वे बहुत किस्म के पाखंडी काम करते हैं। पिछले दिनों हमने इसी जगह लिखा भी था कि जब सरकारी विज्ञापनों से मुख्यमंत्री तक की तस्वीरों को बाहर कर दिया गया था, तब भी सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में मुख्य न्यायाधीश की तस्वीर विज्ञापनों में देने की छूट दी थी। 
अब सवाल यह उठता है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को अखबारों के इश्तहार में अपनी तस्वीर क्यों देनी चाहिए? जब जनता के पैसों की बर्बादी मानते हुए विज्ञापनों में मुख्यमंत्रियों-मंत्रियों और केन्द्रीय मंत्रियों तक की तस्वीरें रोक दी थीं, तब भी मुख्य न्यायाधीश की तस्वीर को छूट दी गई थी। जजों के बाकी अंदाज अगर देखें, तो सफर के दौरान, सार्वजनिक जगहों पर, दूसरे शहरों में ठहरने पर उनके इंतजाम करने वाले लोग एक किस्म से दहशत में आए हुए दिखते हैं, और सड़कों को भी बड़े जजों के लिए आम जनता के ट्रैफिक से खाली कराया जाता है। 
हम मुख्य न्यायाधीश को लेकर उठे बाकी सवालों के न्यायोचित होने या न होने पर कुछ नहीं कह रहे हैं, लेकिन हम इस बात के खिलाफ हैं कि मुख्य न्यायाधीश को एक संस्था मान लिया जाए, और उस संस्था को सवालों से परे कर दिया जाए। लोकतंत्र में जिस किसी को सवालों से परे किया जाता है, वहां पर भ्रष्टाचार पनपने का खतरा खड़ा हो जाता है। जो अदालत देश में तमाम लोगों को जानकारी देने के लिए बेबस कर सकती है, वह अदालत अपने खुद के मामलों में लुकाछिपी करते अच्छी नहीं लगती। हमारा ख्याल है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को उन पर लग रहे तमाम आरोपों को देखते हुए अपने आपको कुछ किस्म के मामलों से अलग कर लेना चाहिए। ऐसा तो देश में कई बार होता है कि किसी एक जज के फैसले कुछ पार्टियों को पसंद न आएं, लेकिन हर वक्त हर जज को हटाने की बात नहीं होती है। आज के मुख्य न्यायाधीश को लेकर पहले से भी कुछ अप्रिय विवाद चलते आए हैं, और अब तो उनके खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव आया है। ऐसे में उनको सावधानी से अपने आपको विवादास्पद मामलों से अलग रखना चाहिए जिनको लेकर उन पर और अधिक तोहमतें लग सकती हैं। (Daily Chhattisgarh)

बलात्कार पर फांसी की सजा करने से हत्या की भी गारंटी

संपादकीय
21 अप्रैल 2018


पिछले महीनों में एक-एक करके कई राज्यों में यह तय किया है कि बारह बरस या उससे कम उम्र की लड़कियों से बलात्कार करने पर, या किसी भी उम्र की महिला से सामूहिक बलात्कार करने पर मौत की सजा दी जा सके। इसके लिए वहां की सरकारें विधानसभा में कानून का प्रस्ताव ला चुकी हैं, या ला रही हैं। इसके साथ-साथ महिलाओं के साथ बाकी किस्म के अपराधों पर भी कड़ी सजा का इंतजाम किया जा रहा है। जब इस प्रस्तावित सजा पर चर्चा हो रही थी, कुछ लोगों ने यह राय रखी थी कि इस सजा का एक खतरा यह रहेगा कि लोग बलात्कार के बाद बलात्कार की शिकार को मार ही डालेंगे क्योंकि सजा तो हत्या जितनी ही बलात्कार की भी मिलेगी, ऐसे में सुबूत या गवाह को क्यों छोड़ा जाए?
हम इसके पहले भी कई बार यह बात लिख चुके हैं कि भारत को एक सभ्य लोकतंत्र के रूप में मौत की सजा खत्म करनी चाहिए। दुनिया के बेहतर देशों में एक-एक करके इसे खत्म किया जा रहा है, खासकर उन देशों में जहां पर लोकतंत्र के बारीक पहलुओं को महत्व दिया जाता है। अमरीका में भी कई राज्यों में यह सजा खत्म हो चुकी है, और तकरीबन हर राज्य में इसका बड़ा विरोध होता है। इस आधार पर भी भारत में अधिक किस्म के अपराधों पर मौत की सजा का विस्तार करना एक गलत सिलसिला है। दूसरी बात यह है कि अधिक कड़ी सजा से किसी अपराध में कमी आती हो ऐसा जुर्म के इतिहास के इतिहास में कहीं स्थापित नहीं है। बलात्कारियों को मौत की सजा दी जाए, या नहीं, इसका फैसला करते हुए सरकारों के सामने जब सड़कों और चौराहों पर भीड़ चीखती होती है, तब वोटों से चुनी गई सरकारें आमतौर पर कड़वे फैसले नहीं ले पातीं। लेकिन हमारा मानना है कि कानून का फेरबदल भीड़ के सिरों को गिनकर नहीं होना चाहिए, बल्कि इस नजरिए से होना चाहिए कि उसके असर से जुर्म कम हों। जो लोग बलात्कार के लिए मौत की सजा मांग रहे हैं, उनको यह समझने की जरूरत है कि आज तो बलात्कारी पांच-सात बरसों में छूटकर बाहर आ जाते हैं। कल जब उनको पता होगा कि बलात्कार की सजा भी फांसी होगी, तो सुबूत खत्म करने के लिए उनके पास सबसे आसान तरीका होगा, बलात्कार की शिकार का कत्ल कर देना। न सुबूत, न गवाह, और न फांसी। इसलिए कानून में फांसी जोड़ देने से बलात्कार तो कम नहीं होंगे, सजा मिलना तो नहीं बढ़ेगा, कत्ल और बढ़ जाएंगे।
दरअसल जो सरकारें मौजूदा कानून को कड़ाई से लागू नहीं कर पाती हैं, वे अपनी नालायकी, और अपने निकम्मेपन को छुपाने के लिए कानून को और कड़ा करके यह जाहिर करती हैं कि वे सचमुच कुछ कर रही हैं। जबकि भारत के किसी भी राज्य में अगर सरकारें लड़कियों और महिलाओं को सामाजिक सुरक्षा दे पातीं, उनको बलात्कारियों से, छेडख़ानी करने वालों से बचा पातीं, तो फांसी की इस नई सजा का इंतजाम करने की नौबत भी नहीं आती। मध्यप्रदेश में सरकार बच्चियों से बलात्कार पर फांसी का विधेयक लाकर विधानसभा में पास करवा चुकी है। लेकिन आज भी इस राज्य में देश के बाकी राज्यों के मुकाबले बलात्कार का अनुपात बहुत अधिक है। मध्यप्रदेश में दलितों पर अत्याचार भी बहुत अधिक है, और जहां-जहां दलित आदिवासी पर जुल्म अधिक होते हैं, वहां-वहां उनकी महिलाओं पर ऐसे जुल्म और जुर्म अनुपात से अधिक होते ही हैं। यह नौबत बदलने के लिए सरकार को कानून को कड़ा करने के बजाय मुजरिमों पर रोकथाम को कड़ा करने की जरूरत है। रसोई में अगर खाना जल गया है, तो गैस सिलेंडर को खुले में ले जाकर जला देना किसी बात का समाधान नहीं हो सकता। मध्यप्रदेश की राजधानी में ही कुछ महीने पहले पुलिस मां-बाप की बेटी सामूहिक बलात्कार के बाद 20 घंटे से अधिक भटकती रहे, थाने में रपट दर्ज कराने, और उसके बाद सरकारी डॉक्टर एक फर्जी मेडिकल रिपोर्ट बनाए कि उस लड़की के साथ कोई बलात्कार नहीं हुआ है, उसने अपनी सहमति और मर्जी से सेक्स किया है। जिस प्रदेश में सरकार में बैठे लोगों का महिलाओं के साथ यह रूख है, वहां पर मध्यप्रदेश सरकार मुजरिमों से यह उम्मीद करती है कि वे अधिक कड़ी सजा से डर-सहम जाएंगे।
समाज और सरकार, संसद और अदालत, अपनी नालायकी को छुपाने के लिए कानून को अधिक लायक बनाने में जुट जाते हैं। अगर चौकीदार सो रहा है, तो उसकी लाठी की जगह बंदूक, या मामूली बंदूक की जगह मशीनगन दे देने से क्या फर्क पड़ेगा? अगर कोई बच्चा पढऩे में दिलचस्पी नहीं रखता, तो उसे एक किताब की जगह दस किताबें दे देने से क्या फर्क पड़ेगा? दरअसल कड़े कानून की कड़ी-कड़ी बातें, लोगों के मुंह को अपने निकम्मेपन की कड़वाहट से बचा लेती हैं। यह सिलसिला बहुत घातक है। जहां समाज में महिला को पैदा होने के पहले से ही बराबरी के हक से परे कर दिया जाए, पेट में ही मार दिया जाए, या पैदा होते ही घूरे पर फेंक दिया जाए, ट्रेन में छोड़ दिया जाए, या पटक-पटककर मार दिया जाए, जहां कदम-कदम पर उससे शारीरिक और मानसिक बलात्कार हो, जहां उसे घर में बराबरी का खाना न मिले, दहेज की कमी से जिसे प्रताडऩा मिले या मर जाने पर मजबूर होना पड़े, जहां उसके साथ हुए बलात्कार की पुलिस जांच देश के आम निकम्मेपन की वजह से कमजोर हो, जहां पर अदालतें एक-एक पीढ़ी लगा दें फैसला करने में, जहां पर आखिरी अदालत के फैसले के बाद भी बच्चियों के बलात्कारी-हत्यारों को  राष्ट्रपति  माफ कर दे, उनको फांसी से बचा ले, वहां पर बलात्कारियों को फांसी की सजा का इंतजाम करने से क्या हो जाएगा? अपने काम को ठीक से न करने वाली लोकतांत्रिक संस्थाएं, और उनको हांकने वाले, उन पर काबिज लोग कड़े-कड़े कानूनों की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। यह सिलसिला बहुत खतरनाक है और अपने आपको धोखा देने का है। कड़े कानून के झांसे में उन लोगों को आना चाहिए जो कि नर्म कानून को असरदार होते देख चुके हों। आज देश में बलात्कारियों में से अधिकतर, और बाकी किस्म के जुर्मों में भी अधिकतर मुजरिम जब अदालत से छूट जाते हैं, उनमें से अधिकतर बाइज्जत बरी होते हैं, तो नया और कड़ा कानून क्या खाकर किसी को सजा दिला देगा? (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 21 अप्रैल

एक मिसाल, यह सीखने कि क्या-क्या नहीं करना चाहिए

संपादकीय
20 अप्रैल 2018


पिछले कुछ महीनों से लगातार बुरी बातों की वजह से खबरों में बने रहने वाले एक वक्त के मशहूर और लोकप्रिय कॉमेडियन कपिल शर्मा के बारे में जब-जब ऐसा लगा कि उनके बारे में सबसे बुरी खबर आ चुकी है, और अब वे वापिस सुधार के रास्ते पर दिखेंगे, तब-तब उन्होंने और घटिया हरकत करके अपने प्रशंसकों को निराश किया है, और बाकी लोगों के सामने भी एक मिसाल रखी है कि किस तरह कामयाबी और शोहरत लोगों के सिर पर चढ़कर नंगा नाचने लगती हैं, और लोग समझदारी छोड़कर आत्मघाती गलतियां करने लगते हैं। 
आज जब फोन और टेक्नालॉजी के नमूने के रूप में रोजाना ही किसी न किसी की बातचीत की रिकॉर्डिंग मीडिया में छाई रहती है, तब कपिल शर्मा ने किसी पत्रकार से गंदी बातें कहने और धमकाने का एक नया रिकॉर्ड कायम किया है। उन्होंने जो गालियां दीं, उन्हें न छापा जा सकता, और न ही टीवी पर सुनाया ही जा सकता। उनकी जुबान से निकले शब्द बीच-बीच में दूसरे निशान लगा-लगाकर ही कहीं पोस्ट किए गए हैं, और कहीं छापे गए हैं। एक पूरी तरह से नाकामयाब हो चुका कॉमेडियन इतना बड़ा मुद्दा नहीं है कि उस पर हम यहां लिखें, लेकिन इस मिसाल पर लिखना जरूरी लग रहा है कि कामयाबी और शोहरत की ताकत के बीच अपने दिमाग को काबू में रखना कितना जरूरी होता है। जो ऐसा नहीं कर पाते, उनका बेकाबू दिमाग उन्हें कहां ले जाकर पटकता है, यह देखना हो तो कपिल शर्मा सामने है जो अपने टीवी शो की रिकॉर्डिंग करने की हालत में भी नहीं बचे हैं। 
शोहरत और कामयाबी का नशा शराब जैसे नशे के मुकाबले भी अधिक खतरनाक होता है, और राजनीति से लेकर कारोबार तक बहुत सी जगहों पर आसमान पर पहुंचे लोग इस नशे में जमीन पर आ गिरते हैं। इसीलिए बुजुर्गों ने दिमाग को काबू में रखने के लिए अनगिनत कहावतें और मुहावरे गढ़े हैं, और सयाने लोग आसपास के लोगों को ऐसी मुफ्त नसीहत भी बांटते रहते हैं। ऐसी नौबत से बचने के लिए लोगों को अपने आसपास कुछ ऐसे लोगों को रखना चाहिए जिनके लिए कहा गया था कि निंदक नियरे राखिए। दिक्कत यह है कि कामयाबी और ताकत में आसपास चापलूसों की भीड़ खींच लेने की अद्भुत ताकत होती है। लोग अपने मुसाहिबों के मुंह से अपनी तारीफ सुन-सुनकर अपने को खुदा मान बैठते हैं, और ऐसे लोगों के लिए किसी ने एक वक्त लिखा था कि तुमसे पहले वो जो इक शख्स यहां तख्त नशीं था, उसको भी अपने खुदा होने पे इतना ही यकीं था।
मनोरंजन की दुनिया से दूर, खासकर सत्ता की राजनीति में ऐसी बददिमागी बहुत अधिक दिखती है जब ताकतवर नेता पेशाब करने को जाते हुए भी सायरन बजाते हुए जाने की जिद पर अड़े रहते हैं। उन तमाम लोगों को चापलूसी से परे यह भी देख लेना चाहिए कि उनके पहले के नेताओं का क्या हाल हुआ है। हो सकता है कि उन्होंने एक वक्त लालू-कुनबे जैसी कमाई कर ली हो, लेकिन उनको आज लालू-कुनबे जैसी सजा और कोर्ट-कचहरी भी देखना पड़ रहा है। कपिल शर्मा की मिसाल सिर्फ मनोरंजन के कारोबार की मिसाल नहीं है, यह इंसान की बददिमागी की मिसाल है, और उसे देखकर लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि इंसान को क्या-क्या नहीं करना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

वयस्क जरूरतों की अनदेखी से भी बढ़ रहे हैं भारतीय बलात्कार

संपादकीय
19 अप्रैल 2018


न चाहते हुए भी आज फिर बलात्कार के मुद्दे पर लिखना पड़ रहा है। क्योंकि चारों तरफ से हिन्दुस्तानी इंसानों की इसी एक हरकत की खबर सबसे अधिक विचलित कर रही है। थोड़ी बहुत भावनाएं रखने वाले लोग यह कहते मिल जाएंगे कि ऐसी खबरों को छापना ही नहीं चाहिए क्योंकि इन्हें पढ़कर लोगों को ऐसे कामों के लिए बढ़ावा मिलता है। लेकिन हकीकत यह है कि किसी भी किस्म के जुर्म की खबर को छुपाकर वैसे जुर्म को कम नहीं किया जा सकता। और भारत को लेकर दुनिया के बहुत से देशों की सरकारें अपने नागरिकों को ऐसा मशविरा जारी कर चुकी हैं कि भारत में जाने वाले पर्यटकों को सेक्स-अपराधों से सावधान रहना चाहिए। अभी जम्मू-कश्मीर में एक बच्ची के साथ जिस तरह गैंगरेप हुआ और जिस तरह उसकी हत्या हुई, और जिस तरह हत्यारों को बचाने के लिए राष्ट्रीय झंडा लेकर लोग सड़कों पर आए, मंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया, वकीलों ने जांच एजेंसी को अदालत में चार्जशीट दायर करने जाने से रोका, उसे देखकर दुनिया के कई देशों में लोग टी-शर्ट पर इस बलात्कार की बात लिखकर महिलाओं को भारत जाने से रोक रहे हैं। इस मुद्दे पर लिखने का एक और समाचार अभी-अभी आया है कि एक बारात में गए दूल्हे के दोस्त ने दूल्हे की बहन से बलात्कार करके उसकी हत्या कर दी और लाश फेंक दी। आज उत्तर भारत की एक खबर आई है जिसमें एक बाप ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर अपनी ही बेटी से बलात्कार किया है। अब इसके बाद क्या बचता है, कौन किस पर भरोसा कर सकते हैं?
किसी देश में बलात्कार करने वालों को कैसे रोका जाए इस पर कुछ चर्चा की जा सकती है, फिर चाहे वह सही नतीजे पर पहुंचे, या महज जुबानी जमा-खर्च होकर खत्म हो जाए। दुनिया के जिन देशों में पोर्नोग्राफी रोक नहीं है, सेक्स-खिलौनों पर रोक नहीं है, वेश्यावृत्ति पर रोक नहीं है, वहां पर सेक्स-अपराध कम हैं। इनके कम होने के पीछे और भी सामाजिक वजहें हो सकती हैं, लेकिन कम से कम एक वजह यह होनी चाहिए कि जिन लोगों को सेक्स की जरूरत है, उन्हें सेक्स उपलब्ध है। महज देखने के लिए, महज देह सुख के लिए, या फिर सेक्स के लिए। ऐसे देशों में बलात्कार कम होते हैं, और कई देशों के आंकड़े ऐसा बताते हैं। भारत एक कुंठित समाज होकर रह गया है, जहां लड़के-लड़कियों को मिलने से भी रोकने की कोशिश होती है, फैशन पर रोक लगती है, वयस्क मनोरंजन की कोई संभावना नहीं है, पोर्नोग्राफी या सेक्स-खिलौनों पर जुर्म दर्ज हो जाता है, और धड़ल्ले से चलने वाली वेश्यावृत्ति को कानूनी दर्जा हासिल नहीं है। 
इन तमाम बातों से लोगों की सेक्स की जरूरत पूरी होने की गुंजाइश बहुत बुरी घट जाती है, नतीजा यह होता है कि वे अपनी उत्तेजना के मौकों पर कोई गलत काम कर बैठते हैं। हिन्दुस्तान में सदियों पहले नगरवधुओं की परंपरा थी, वेश्यावृत्ति कोई जुर्म नहीं था, लेकिन बाद में जो सामाजिक पाखंड बढ़ा, उसके चलते इस बात को गैरकानूनी करार दे दिया गया। उससे यह धंधा बंद नहीं हुआ, बल्कि नेता, अफसर, पुलिस, और मवालियों के कारोबार की एक नई संभावना निकल आई जो कि वेश्या की कमाई में अपना हिस्सा वसूलते हैं, और इस धंधे को सुरक्षा देते हैं। आज भारत में हालत इतनी खराब है कि हर बरस दसियों हजार नाबालिग बच्चियों को वेश्यावृत्ति में धकेल दिया जाता है, और देश के महानगरों में जहां पर सरकार बसती है, वहां पर बड़े-बड़े चकलाघर धड़ल्ले से चलते हैं, पूरे-पूरे इलाके इसी काम के लिए बदनाम है, और सरकार इसकी अनदेखी करके मानो यह साबित करने की कोशिश करती है कि इस देश में यह धंधा नहीं होता। 
एक व्यवहारिक नजरिया अपनाने के बजाय देश की सरकार लोगों पर नाजायज काबू करने में लगी रहती है, और इसकी आदी हो चुकी है। आज जवान लड़के-लड़कियों को उनकी जरूरत के लिए होटल में कमरा नहीं मिलता, और गैर शादीशुदा लड़के-लड़कियों के साथ रहने पर वेश्यावृत्ति का जुर्म कायम हो जाता है। यह पूरा ढकोसला खत्म होना चाहिए और समाज को अपने इंसानों की हकीकत को समझना चाहिए। ऐसा होने पर बलात्कार खत्म चाहे न हों, उनकी गिनती बहुत कम हो जाएगी। और सरकार लोगों की वयस्क जरूरतों पर हर तरफ से रोक लगाकर बलात्कारों को बढ़ाने का काम ही करती है। इस जुर्म के और भी बहुत से पहलू हैं, और यही अकेली बात इसे तय नहीं करतीं, लेकिन वयस्क जरूरतों को मान्यता देना एक बड़ा मुद्दा जरूर है।  (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 19 अप्रैल

महिला पत्रकार का गाल छूकर राज्यपाल फंसे विवाद में, माफी

संपादकीय
18 अप्रैल 2018


तमिलनाडू में राज्यपाल बनवारीलाल पुरोहित ने एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाई क्योंकि वहां के एक कॉलेज में एक प्राध्यापिका पर यह आरोप लगा था कि उसने छात्राओं को फोन पर यह सुझाया कि उन्हें अगर बहुत अच्छे नंबर पाने हैं, और कुछ पैसे भी कमाने हैं, तो उन्हें शिक्षा विभाग के कुछ अफसरों को खुश रखना चाहिए। चूंकि राज्यपाल उच्च शिक्षा के प्रमुख भी होते हैं इसलिए उन्होंने इस बारे में सफाई देने के लिए मीडिया को बुलाया था। लेकिन जब एक महिला पत्रकार ने उनसे कई सवाल किए, तो उन्होंने उठते-उठते उस महिला का गाल छुआ, मानो वे तारीफ कर रहे हों या हौसला बढ़ा रहे हों, और वे चले गए। लेकिन इस पर वह महिला पत्रकार बहुत ही विचलित हुई, और उसने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया कि उसने जाकर कई बार अपने गाल धोए, लेकिन फिर भी वह सामान्य हालत में नहीं आ पाई है। यह पूरा मामला मीडिया में सार्वजनिक होने के बाद और चारों तरफ निंदा होने के बाद राज्यपाल ने चि_ी लिखकर उस पत्रकार से माफी मांगी है और यह जिक्र किया है कि वे खुद 40 बरस पत्रकारिता से जुड़े रहे, और उन्होंने यह मानते हुए तारीफ में उसका गाल छुआ था कि वह उनकी नातिन जैसी है। लेकिन उन्होंने खेद व्यक्त करते हुए माफी की चि_ी भी भेजी है। 
यहां पर हम श्री पुरोहित की सोच पर नहीं जाते, जो कि हमारा मानना है कि सही रही होगी, हम उनके बर्ताव पर जाते हैं जो कि आज के माहौल में बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है। आज पूरा देश महिलाओं के साथ बदसलूकी, बच्चियों के साथ बदसलूकी की खबरों से इतना भरा हुआ है, हवा में इतनी उत्तेजना और हिंसा भरी हुई नफरत है कि ऐसे में किसी को भी आचरण की कोई छूट नहीं लेनी चाहिए। एक वक्त था जब लोग अपने बच्चों को पड़ोस के परिवार में छोड़कर भी कई दिनों के लिए बाहर चले जाते थे, लेकिन आज का माहौल ऐसा है कि लोग अपने घर में, रिश्तेदारों के बीच में बच्चों को अकेले छोडऩे के पहले कई बार सोचते हैं। किसी भी तरह का व्यवहार या आचरण, भाषा या भाव, ये सब जगह और समय के मुताबिक चलते हैं। कुछ ऐसे देश हो सकते हैं जहां पर किसी सार्वजनिक नेता का मीडिया की किसी महिला का गाल छूना सामान्य बात हो, लेकिन भारत में इन दिनों माहौल ऐसा नहीं है, और लोगों को इससे बचना चाहिए। 
दरअसल सार्वजनिक जीवन में जो लोग ऐसे ओहदों पर बैठे हों, जिनसे बहुत से लोगों का मिलना-जुलना होता है, उन्हें अपना दफ्तर भी ऐसा पारदर्शी रखना चाहिए जिससे कि उन पर कोई तोहमत न लग सके। आज न सिर्फ हिन्दुस्तान में, बल्कि दुनिया में कई जगहों पर पुरूष डॉक्टर भी किसी महिला मरीज को देखते समय अपने साथ किसी नर्स को मौजूद रखते हैं, ताकि बाद में किसी विवाद की नौबत न आए। सभी लोगों को ऐसी सावधानी अपने हित में, और दूसरों के हित में भी रखनी चाहिए ताकि न तो तोहमत लग सके, और न ही खतरा हो सके। हालांकि बनवारी लाल पुरोहित ने एक भरी हुई प्रेस कांफ्रेंस के बीच, कैमरों के सामने महिला पत्रकार का गाल छुआ, लेकिन उन्हें भी ऐसा स्नेह दिखाने से बचना चाहिए था। ऐसे मामलों में एक पुरूष के मन की भावना पर एक महिला के मन की आपत्ति अधिक भारी पड़ती है, और भारत में जो लोग सार्वजनिक खबरों को देखते-सुनते हैं, उन्हें इस बात की अच्छी खासी समझ रहनी भी चाहिए। 
लेकिन इस मामले पर लिखने की वजह यह है कि सार्वजनिक जीवन के तमाम लोगों को मिलने-जुलने वाले लोगों के साथ एक सुरक्षित फासला बनाकर रखना चाहिए, क्योंकि दो लोगों की अलग-अलग सोच, उनकी सांस्कृतिक समझ एक नहीं हो सकती, और न ही दो लोगों की भावनाएं एक सरीखी हो सकतीं। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 18 अप्रैल

खाली पड़े एटीएम सरकार की विश्वसनीयता खाली कर रहे

संपादकीय
17 अप्रैल 2018


देश के बहुत बड़े हिस्से में एटीएम खाली पड़े हैं। लोग दर्जन-दर्जन भर जगहों पर धक्के खा रहे हैं, और अब तो बैंकों ने एटीएम पर यह नोटिस लगाने की जहमत भी उठाना बंद कर दिया है कि कैश नहीं है। कुछ ही दिन पहले हमने रिपोर्ट छापी थी कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की कैश मशीनें बैंक एटीएम से ही निकले हुए नए और असली नोटों को भी नहीं ले रही हैं, और 40 हजार रूपए जमा करने के लिए एसबीआई की आधा दर्जन मशीनों तक जाकर 21 बार कोशिश करनी पड़ी, तब उतनी रकम जमा हो पाई। आज पूरे देश में नोटबंदी के दिनों जैसी हड़कंप है, और लोगों के खाते में पैसा है लेकिन एटीएम खाली है। दूसरी तरफ वित्तमंत्री का कहना है कि देश में पर्याप्त से अधिक नोट चलन में हैं, और कुछ जगहों पर अधिक रकम निकालने से एटीएम खाली हुए हैं जो कि अगले कुछ दिनों में सामान्य हो जाएंगे। 
यह नौबत दो वजहों से खराब है। एक तो इससे सरकार की और बैंकों की साख चौपट हो रही है जो कि तरह-तरह की जालसाजी और धोखाधड़ी में बैंकों की भागीदारी साबित होने पर वैसे भी मिट्टी में मिली हुई है। दूसरी बात यह कि नोटबंदी के भयानक दिनों को जनता अब तक भूली नहीं है, और एक बार फिर उसे डर लग रहा है कि कहीं यह दो हजार रूपए वाले नोटों को बंद करने की तैयारी तो नहीं है। जब लोग मेहनत से की गई अपनी बचत को अपनी जरूरत के समय न निकाल सकें, तो सरकार और बैंकों के ये तमाम आंकड़े फिजूल हैं कि देश में कितने नोट चलन में हैं। हम पिछले कई दिनों से इस बारे में लिख रहे थे कि मशीनें काम नहीं करती हैं, जहां काम करती हैं वहां नोट नहीं रहते। और यह नौबत अब बढ़ते-बढ़ते देश के बहुत से प्रदेशों में आ गई है। 
गैस सिलेंडरों से लेकर एटीएम तक, और बैंकों तक जब आम जनता की लंबी-लंबी कतारें लगती हैं, तो ऐसा लगता है कि सरकार की नजर में आम जनता के वक्त और उसकी उत्पादकता की कोई कीमत नहीं है। जब किसी को कुछ हजार रूपए निकालने के लिए आधा दर्जन एटीएम तक धक्का खाना पड़ता है, तो छोटे लोगों का बड़ा वक्त बर्बाद होता है। बड़े लोगों को तो कोई फर्क नहीं पड़ता, और वे तो अपने क्रेडिट कार्ड से भुगतान कर लेते हैं, या पूरे के पूरे बैंक को अपने क्रेडिट कार्ड की तरह इस्तेमाल करके दूसरे देश जा बसते हैं। लेकिन गरीब जनता को घर में नोट रखने में भी डर है कि कब कौन सा नोट बंद हो जाए, दूसरी तरफ बैंकों में रखने में भी डर है कि वक्त -जरूरत निकल पाए या नहीं। पिछले कुछ महीनों से यह बात भी चर्चा में है कि मोदी सरकार संसद में एक ऐसा कानून लाने जा रही है जिसमें किसी बैंक के डूबने की नौबत आने पर बैंक उसमें लोगों की जमा रकम का इस्तेमाल करके अपने आपको बचा सकेगा। यह बात महज अफवाह नहीं थी, और संसद में लाए जा रहे विधेयक में इस तरह की बात थी, जिसे सरकार को हटाना पड़ा। फिर हर बार एटीएम इस्तेमाल करने पर कुछ बार के बाद बैंक एक चार्ज वसूलने लगती है, और वह भी गरीबों पर बड़ा भारी पड़ता है। कुल मिलाकर ऐसा लगता है कि बैंकों की शक्ल में मुगल-ए-आजम अनारकली से कह रहे हैं कि सलीम तूझे मरने नहीं देगा, और हम तुझे जीने नहीं देंगे। 
देश की जनता में आत्मविश्वास का इतना टूटना लोकतंत्र के लिए घातक और खतरनाक है। दूसरी तरफ सरकार की साख का इतने बड़े पैमाने पर चौपट होना सत्तारूढ़ पार्टी या गठबंधन के राजनीतिक-चुनावी हितों के खिलाफ भी है। (Daily Chhattisgarh)

बात की बात, 17 अप्रैल