क्या इतना कहने का हौसला जुट सकेगा?

संपादकीय
1 अप्रैल 2018


बंगाल के आसनसोल में पिछले कुछ दिनों से साम्प्रदायिक हिंसा चल रही हैं। एक मुस्लिम लड़के का कत्ल कर दिया गया। बाप मस्जिद में इमाम है। उसने कैमरों के सामने बयान देकर लोगों से अपील की कि इस मौत का बदला लेने के लिए कोई हरकत न करें। उसने अपनी बिरादरी के लोगों से कहा कि वह तीस बरस से लोगों के लिए इमाम का काम कर रहा है, और अगर किसी ने इस मौत पर बदले में कुछ किया, तो वह शर्मिंदगी में शहर छोड़कर चला जाएगा। 
बड़प्पन और महानता की बातें किताबों में तो भली लगती हैं, लेकिन जब बेटे की लाश कंधों पर हो, तब भी महानता से दरियादिली और भाईचारे की बात आसान नहीं होती है। लेकिन ऐसी महानता खबरों में बस एक झलक की तरह आकर चली गई, और हिन्दुस्तानी टीवी-मीडिया ने इस पर शायद कोई लंबी चर्चा नहीं की। कोई एक नेता किसी कमीनगी की बात करता है, तो उस शाम यह गारंटी हो जाती है कि अधिकतर टीवी चैनलों पर उस बयान की उसी तरह चीरफाड़ होगी, जिस तरह बायोलॉजी पढऩे वाले बच्चे ट्रे में मोम पर ठोंके गए मेंढक की करते हैं। लेकिन भलमनसाहत की बातें आती हैं और चली जाती हैं, क्योंकि उनके पीछे की नीयत शाम के टीवी पर जगह पाना नहीं होती। भलमनसाहत दिल से निकलती है, फिर चाहे वह एक बाप का फटा हुआ दिल ही क्यों न हो, चाहे कंधों पर बेटे की लाश भी क्यों न हो। दूसरी तरफ हिंसा और नफरत की, धमकी और कमीनगी की बातें सोच-समझकर की जाती हैं, और वे भी अपना मकसद पूरा करती हैं, वे आग को दूर तक ले जाती हैं, वे नफरत को भड़काती हैं। आसनसोल की इस इमाम की बातें यह उम्मीद बंधाती हैं कि देश में लगाई जा रही आग और उस पर छिड़के जा रहे पेट्रोल के बावजूद भलमनसाहत कायम है, बड़प्पन कायम है, और उस पर चर्चा भी जरूरी है। 
एक दिक्कत यह है कि भले लोग अपनी भलमनसाहत के साथ चुप रहना बेहतर समझते हैं कि दंगाईयों और नफरतजीवियों के मुंह क्यों लगा जाए? तकरीबन तमाम लोग ऐसे होते हैं जो कि दंगाईयों से मुकाबला कर नहीं पाते, इसलिए भी वे चुपचाप घर बैठ जाते हैं। लेकिन पल भर को यह सोचें कि साम्प्रदायिक हिंसा में बेटे को खोने वाला इमाम भी अगर चुप रह जाता, और उस बात पर शहर जल उठता, तो वह चुप्पी कितनी महंगी पड़ती? लोगों को याद रखना चाहिए कि आजादी के पहले और बाद जब-जब देश में साम्प्रदायिक हिंसा ने सिर उठाया, तब-तब गांधी ने अपनी जान की बाजी लगाकर लोगों को समझाने की कोशिश की, उनको रोका। हिन्दुस्तान जैसे लोकतंत्र में चुप्पी की कीमत और मुंह खोलने का महत्व, इन दोनों को समझने की जरूरत है। देश के बड़े लोग जब बड़ी-बड़ी हिंसा के बीच अपने बड़े-बड़े शब्दों को मुंह के भीतर रखकर तमाशबीन बने रहते हैं, तब वे चुप्पी के मुजरिम होते हैं। जुर्म करने के लिए अपने हाथ से कत्ल करना जरूरी नहीं रहता, जब खुलकर कुछ कहने से कुछ जिंदगियों के बच जाने की संभावना रहती है, तब भी चुप्पी को ओढ़े रहना एक जुर्म होता है। गांधी की मिसालों को देखें तो कदम-कदम पर उन्होंने मुंह खोला, चेतावनी दी और धमकी भी दी, जान दे देने की धमकी भी दी, और इससे उन्होंने लोगों को जान ले लेने से रोका। इसमें दो बातें शामिल रहीं, एक तो गांधी की साख, और दूसरा वक्त रहते, मौके पर, खुलकर कहना, और अपने साथ के लोगों को भी फटकारना, झिड़कना। 
आज हिन्दुस्तान में बहुत से बड़े-बड़े नेता, ऐसे लोग भी जो कि सरकारी जिम्मेदारियों के ओहदों पर काबिज हैं, उनके पास जलते-सुलगते शहरों को देखते हुए भी कहने को दो शब्द नहीं रहते, या उन्हें दो शब्द सूझते तब हैं जब पूरी बस्ती जल चुकी होती है, और अमूमन उस वक्त भी उनके मुंह से निकलता यही है कि कानून अपना काम करेगा। अब लोगों को यह बात भी मालूम है कि जिस तरह किसी थाने में तैनात सिपाही काम किसी अफसर के घर करता है, उसी तरह लोगों को यह बात भी मालूम है कि जज किस तरह काम करते हैं। ऐसे में छोटे-छोटे और आम लोगों को मुंह खोलना होगा, हौसला दिखाना होगा, उम्मीद रखनी होगी कि अंतहीन दिखती और लगती अंधेरी सुरंग के आखिर में भी रौशनी होगी जरूर। अपने आपको कुछ देर के लिए आसनसोल के उस इमाम की जगह रखकर यह सोचना होगा कि अपनी औलाद इस तरह हिंसा में खोने के बाद भी क्या इतना कहने का हौसला जुट सकेगा? (Daily Chhattisgarh)

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