कैंसर सर्जन नहीं, एक साम्प्रदायिक ट्यूमर के युग का अंत हुआ...

संपादकीय
15 अप्रैल 2018


विश्व हिन्दू परिषद के इतिहास में आधी सदी बाद चुनाव हुए, और जैसे कि उम्मीद थी, उसके अब तक के कार्यकारी मुखिया, डॉ. प्रवीण तोगडिय़ा की वहां से विदाई हो गई। वे परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष थे, और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से उनके मतभेद, मनमुटाव, और टकराव का लंबा इतिहास रहा है। जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने, तब से ही तोगडिय़ा से उनकी तनातनी चलती रही, और उस पूरे दौर में तोगडिय़ा की सारी साम्प्रदायिक दुकानदारी गुजरात के बाहर ही चल पाई। पिछले चार बरस में मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद तोगडिय़ा एक किस्म से हाशिए पर चले गए थे, और पिछले कुछ महीनों में उनकी भड़ास सार्वजनिक रूप से, मीडिया के सामने आ रही थी, जिसमें वे अपनी जान को खतरा भी बता रहे थे, और उनका सारा इशारा घूमफिरकर मोदी की तरफ ही था। ऐसे में पिछले कुछ हफ्तों में लगातार यह माना जा रहा था कि विश्व हिन्दू परिषद में अब कोई ऐसा नया अध्यक्ष बनाया जाएगा जिसके बाद तोगडिय़ा वहां से बाहर हो जाएंगे, और वही हुआ भी। 
आज मोदी के विरोधी तोगडिय़ा के अस्थायी हमदर्द हो सकते हैं, लेकिन यह समझने की जरूरत है कि प्रवीण तोगडिय़ा देश के ऐसे सबसे बड़े नफरतजीवी लोगों में से एक हैं, जिनका सारा अस्तित्व ही साम्प्रदायिक नफरत पर टिका रहा। वे पेशे से कैंसर सर्जन रह चुके हैं, लेकिन कड़वे शब्दों में अगर कहा जाए तो वे देश के साम्प्रदायिक सद्भाव में एक बहुत बड़े कैंसर-ट्यूमर थे, और उनका किसी भी किस्म की सत्ता से जाना शायद देश के हित में ही होगा। मोदी के विरोध का यह मतलब नहीं होना चाहिए कि नफरत को बढ़ावा देने की कीमत पर भी उसे जारी रखा जाए। और फिर उस तोगडिय़ा के साथ किसकी हमदर्दी हो सकती है, जिसने लगातार इस देश में मुस्लिमों या दूसरे अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसक साम्प्रदायिकता को बढ़ाने के लिए हिन्दुओं के ध्रुवीकरण को आक्रामक तरीके से बढ़ाना ही अपनी जिंदगी का अकेला मकसद बना रखा था। आज विश्व हिन्दू परिषद से बाहर हो जाने के बाद तोगडिय़ा गुजरात में बेमुद्दत भूख हड़ताल पर बैठ रहे हैं, और अब वे अपनी पुरानी घिसी-पिटी मांगों को एक बार फिर उठा रहे हैं कि राम मंदिर बनाने के लिए कानून बनाया जाए, या कश्मीर से धारा 370 खत्म की जाए, देश से बांग्लादेशी मुस्लिमों को निकाला जाए। 
खुद भाजपा और संघ परिवार के लिए तोगडिय़ा भारी पड़ रहे थे। एक व्यापक हिन्दू छतरी के नीचे अगर हिन्दुत्व के सबसे बड़े सितारे नरेन्द्र मोदी को कोई अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के चलते चुनौती देना शुरू करे, तो फिर यह वीएचपी की निर्णायक संस्था आरएसएस के लिए भी एक बेवजह परेशानी की बात थी। इसलिए तोगडिय़ा का यह अंत एक तर्कसंगत और स्वाभाविक अंत दिखता है, इसके अलावा उनका अब और कोई भविष्य संघ परिवार की छत्रछाया में बचा हुआ नहीं था। ऐसा लगता है कि संघ या भाजपा ने भी कुछ हद तक इस हकीकत को माना है कि सत्ता पर बहुमत होने के बावजूद कौन-कौन से भावनात्मक मुद्दों को सरकार पूरा नहीं कर सकती है। आज संसद में, और देश की विधानसभाओं में भाजपा और एनडीए का जिस किस्म का बहुमत है, वैसे में भाजपा अपनी तमाम भावनात्मक बातों को पूरा कर सकती है, लेकिन सत्ता भी बहुत सा सबक सिखा जाती है, इसलिए पार्टी और संघ के तमाम पुराने नारे अभी किनारे रख दिए गए हैं। जिन लोगों को लगता है कि तोगडिय़ा के जाने के बाद विश्व हिन्दू परिषद में एक युग खत्म हुआ है, उन्हें निराश होने की जरूरत नहीं है क्योंकि जिस तरह नक्सलियों के हिमायती संगठन नाम बदल-बदलकर काम करते हैं, जिस तरह पाकिस्तान में आतंकी संगठन नाम बदल-बदलकर काम करते हैं, ठीक उसी तरह भारत में भी साम्प्रदायिक संगठन नए-नए खड़े होते चलते हैं, एक-दूसरे से अलग रहने का नाटक भी करते हैं, और समय रहने पर वे पारे की बिखरी हुई बूंदों की तरह पल भर में मिलकर एक भी हो जाते हैं। इसलिए तोगडिय़ा किस शक्ल में देश की साम्प्रदायिक एकता के लिए एक नया ट्यूमर बनकर उभरेंगे इसको देखने के लिए इंतजार ही करना पड़ेगा। (Daily Chhattisgarh)
-सुनील कुमार

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