महिला पत्रकार का गाल छूकर राज्यपाल फंसे विवाद में, माफी

संपादकीय
18 अप्रैल 2018


तमिलनाडू में राज्यपाल बनवारीलाल पुरोहित ने एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाई क्योंकि वहां के एक कॉलेज में एक प्राध्यापिका पर यह आरोप लगा था कि उसने छात्राओं को फोन पर यह सुझाया कि उन्हें अगर बहुत अच्छे नंबर पाने हैं, और कुछ पैसे भी कमाने हैं, तो उन्हें शिक्षा विभाग के कुछ अफसरों को खुश रखना चाहिए। चूंकि राज्यपाल उच्च शिक्षा के प्रमुख भी होते हैं इसलिए उन्होंने इस बारे में सफाई देने के लिए मीडिया को बुलाया था। लेकिन जब एक महिला पत्रकार ने उनसे कई सवाल किए, तो उन्होंने उठते-उठते उस महिला का गाल छुआ, मानो वे तारीफ कर रहे हों या हौसला बढ़ा रहे हों, और वे चले गए। लेकिन इस पर वह महिला पत्रकार बहुत ही विचलित हुई, और उसने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया कि उसने जाकर कई बार अपने गाल धोए, लेकिन फिर भी वह सामान्य हालत में नहीं आ पाई है। यह पूरा मामला मीडिया में सार्वजनिक होने के बाद और चारों तरफ निंदा होने के बाद राज्यपाल ने चि_ी लिखकर उस पत्रकार से माफी मांगी है और यह जिक्र किया है कि वे खुद 40 बरस पत्रकारिता से जुड़े रहे, और उन्होंने यह मानते हुए तारीफ में उसका गाल छुआ था कि वह उनकी नातिन जैसी है। लेकिन उन्होंने खेद व्यक्त करते हुए माफी की चि_ी भी भेजी है। 
यहां पर हम श्री पुरोहित की सोच पर नहीं जाते, जो कि हमारा मानना है कि सही रही होगी, हम उनके बर्ताव पर जाते हैं जो कि आज के माहौल में बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है। आज पूरा देश महिलाओं के साथ बदसलूकी, बच्चियों के साथ बदसलूकी की खबरों से इतना भरा हुआ है, हवा में इतनी उत्तेजना और हिंसा भरी हुई नफरत है कि ऐसे में किसी को भी आचरण की कोई छूट नहीं लेनी चाहिए। एक वक्त था जब लोग अपने बच्चों को पड़ोस के परिवार में छोड़कर भी कई दिनों के लिए बाहर चले जाते थे, लेकिन आज का माहौल ऐसा है कि लोग अपने घर में, रिश्तेदारों के बीच में बच्चों को अकेले छोडऩे के पहले कई बार सोचते हैं। किसी भी तरह का व्यवहार या आचरण, भाषा या भाव, ये सब जगह और समय के मुताबिक चलते हैं। कुछ ऐसे देश हो सकते हैं जहां पर किसी सार्वजनिक नेता का मीडिया की किसी महिला का गाल छूना सामान्य बात हो, लेकिन भारत में इन दिनों माहौल ऐसा नहीं है, और लोगों को इससे बचना चाहिए। 
दरअसल सार्वजनिक जीवन में जो लोग ऐसे ओहदों पर बैठे हों, जिनसे बहुत से लोगों का मिलना-जुलना होता है, उन्हें अपना दफ्तर भी ऐसा पारदर्शी रखना चाहिए जिससे कि उन पर कोई तोहमत न लग सके। आज न सिर्फ हिन्दुस्तान में, बल्कि दुनिया में कई जगहों पर पुरूष डॉक्टर भी किसी महिला मरीज को देखते समय अपने साथ किसी नर्स को मौजूद रखते हैं, ताकि बाद में किसी विवाद की नौबत न आए। सभी लोगों को ऐसी सावधानी अपने हित में, और दूसरों के हित में भी रखनी चाहिए ताकि न तो तोहमत लग सके, और न ही खतरा हो सके। हालांकि बनवारी लाल पुरोहित ने एक भरी हुई प्रेस कांफ्रेंस के बीच, कैमरों के सामने महिला पत्रकार का गाल छुआ, लेकिन उन्हें भी ऐसा स्नेह दिखाने से बचना चाहिए था। ऐसे मामलों में एक पुरूष के मन की भावना पर एक महिला के मन की आपत्ति अधिक भारी पड़ती है, और भारत में जो लोग सार्वजनिक खबरों को देखते-सुनते हैं, उन्हें इस बात की अच्छी खासी समझ रहनी भी चाहिए। 
लेकिन इस मामले पर लिखने की वजह यह है कि सार्वजनिक जीवन के तमाम लोगों को मिलने-जुलने वाले लोगों के साथ एक सुरक्षित फासला बनाकर रखना चाहिए, क्योंकि दो लोगों की अलग-अलग सोच, उनकी सांस्कृतिक समझ एक नहीं हो सकती, और न ही दो लोगों की भावनाएं एक सरीखी हो सकतीं। (Daily Chhattisgarh)

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