दलित-आदिवासी मुद्दे आज एकदम सड़क पर, फोकस में

संपादकीय
2 अप्रैल 2018


देश में दलित और आदिवासी तबकों के समर्थन में आज हिन्दुस्तान की एक बड़ी आबादी विचलित है। इन तबकों के अलावा जो लोग सामाजिक न्याय के महत्व को समझते हैं, उनका भी आज के भारत बंद को समर्थन है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक ताजा फैसले में देश में चल रहे एससी-एसटी एक्ट के कई प्रावधानों को खारिज कर दिया है, और इससे ऐसा लग रहा है कि इन दबे-कुचले और शोषित तबकों को विशेष सुरक्षा और संरक्षण देने के लिए जो कानून बनाया गया था, वह अब असरदार नहीं रह जाएगा। देश के बहुत से राजनीतिक दल सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ खड़े हैं, और खुद केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की है। केन्द्र सरकार का कहना है कि वह सुप्रीम कोर्ट के फैसले से इत्तफाक नहीं रखती, और इस फैसले को लागू करने से दलित-आदिवासी तबकों की हिफाजत कमजोर पड़ जाएगी। 
यह एक बड़ा मुद्दा है, और देश में आबादी का एक बड़ा हिस्सा इसकी वजह से अपने को खतरे में पा रहा है। यह तबका देश के सबसे कमजोर लोगों का है, और सबसे संगठित लोगों का भी है। इन तबकों के ऊपर पिछले बरसों में सरकार और बाजार दोनों की तरफ से कई तरह के हमले हुए हैं। बाजार में उनकी जमीनें छीनने का काम किया है, और दूसरी तरफ सरकार ने दलित-आदिवासी लोगों के खानपान, उनकी संस्कृति, उनके धर्म और रीति-रिवाज, इन सब पर बड़े हमले किए हैं। सरकार के अलावा देश के सवर्ण तबके ने भी अपना खानपान इन पर लादने के लिए हिंसा तक की है, और इन तबकों का रोजगार भी छीना है। जब किसी कमजोर से उसकी कमाई का जरिया छीन लिया जाए, उसकी जमीन छीन ली जाए, जंगल पर से उसका हक छीन लिया जाए, जब उसका खानपान छीन लिया जाए, और ुउसकी आस्था के रीति-रिवाज छीनकर उसे एक हिन्दू धर्म में रंगने की कोशिश की जाए, तो जाहिर है कि इन तबकों के बीच बेचैनी भी बढ़ती है, और सरकार से लेकर समाज तक के खिलाफ इनके मन में बगावत भी खड़ी होती है। 
जो सामाजिक और आर्थिक शोषण सदियों से इनके खिलाफ चले आ रहा है, वह आज भी किस तरह जारी है यह देखना हो तो कल ही राजस्थान की खबर थी कि घोड़ा रखने वाले एक दलित को ऊंची कही जाने वाली जातियों के लोगों ने मार डाला। कल ही उत्तर भारत की एक खबर थी कि एक दलित को गांव की उन बस्तियों से बारात निकालने की इजाजत नहीं दी गई थी जहां पर ऊंची कही जाने वाली जातियों के लोग बसे हैं। दलितों को बलात्कार और हत्या का सामना करना पड़ रहा है, सामाजिक भेदभाव और छुआछूत तो उनके खिलाफ जारी है ही। सुप्रीम कोर्ट का रूख भी इस देश में सवर्ण, शहरी, शिक्षित, संपन्न, और कुलीन है। बड़े जज, और बड़े वकील, इनके बीच दलित-आदिवासियों की गिनती बहुत ही कम है। इसलिए अदालत इस तरह का एक फैसला ले बैठी है जो कि देश के सबसे कमजोर और इतने बड़े तबकों से हिफाजत को छीनने वाला है। 
यह तो केन्द्र सरकार को मामले की गंभीरता समझ आ गई, और उसने पुनर्विचार याचिका का फैसला लिया। उसके पास इसके अलावा कोई विकल्प भी नहीं था क्योंकि सहयोगी दलों के अलावा खुद भाजपा के मंत्री और सांसद भी खुलकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ खड़े हो गए हैं। ऐसे में जरूरत हो तो संसद को सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटकर दलित-आदिवासी तबकों को हिफाजत देना जारी रखना चाहिए, और इसके अलावा इस देश में और कोई विकल्प भी नहीं है। आज भी इस मुद्दे पर संसद के भीतर एक बहुत साफ-साफ बहुमत जुट जाएगा जो कि सुप्रीम कोर्ट को कहेगा कि उसकी सोच से संसद सहमत नहीं है। हम इसको भी एक अच्छी नौबत मानते हैं कि आज सुप्रीम कोर्ट के बहाने इस देश में दलित-आदिवासी मुद्दों पर बहस केन्द्र में आ गई है, इस बहस को आगे बढ़ाना भी जरूरी है, सामाजिक न्याय के लिए भी, और लोकतंत्र के लिए भी। जो राजनीतिक ताकतें इसकी गंभीरता को नहीं समझेंगी, वे अपना बाहुबल खो बैठेंगी। (Daily Chhattisgarh)

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