वक्त की लहर और बहाव के साथ तैरना सीखना जरूरी

संपादकीय
24 अप्रैल 2018


इन दिनों इंटरनेट और क्रेडिट-डेबिट कार्ड रखने वाले लोगों को सौ-दो सौ रूपए के सामान भी खरीदने होते हैं, तो वे पहले ऑनलाईन परखते हैं। वहां से मिले रेट को जब लोकल बाजार से मिलाकर देखते हैं, तो बाजार महंगा लगता है। नतीजा यह है कि लोगों की ऑनलाईन खरीदी बढ़ते चली जा रही है। लेकिन अभी भारत के ऑनलाईन शॉपिंग वालों को लेकर हुए दो सर्वे बताते हैं कि लोगों को उनके मंगाए गए सामानों में से एक तिहाई सामान नकली मिले। यह अनुपात बड़ा चौंकाने वाला है क्योंकि बड़ी-बड़ी शॉपिंग वेबसाइटें मॉल के खरे होने के बड़े-बड़े दावे भी करती हैं, और सामान वापिस करने की सहूलियत भी देती हैं। 
आज भारत ही नहीं बाकी दुनिया में भी ऑनलाईन शॉपिंग लगातार इस तरह बढ़ गई है कि ब्रिटेन की आज की खबर बताती है कि वहां पर कार के ताले तोडऩे के औजार तक इंटरनेट पर बिक रहे हैं, और पुलिस इसे रोकने की कोशिश कर रही है जो कि हो नहीं पा रहा। इंटरनेट लोगों को बेचेहरा और बेनाम रहने की एक बड़ी सहूलियत देता है जिसके चलते लोग तरह-तरह की धोखाधड़ी भी करते हैं। अब सवाल यह है कि बाजार जाने की जहमत से बचने के लिए बहुत से लोग ऑनलाईन खरीदी कर रहे हैं क्योंकि शहरों में ट्रैफिक जाम रहता है, बाजारों में गाडिय़ां खड़ी करने की जगह नहीं रहती है, और बाजार के खुलने के घंटे सरकार के काबू में रहते हैं। दूसरी तरफ इंटरनेट पर खरीददारी चौबीसों घंटे की जा सकती है, और लोग बाथरूम में बैठे हुए भी फोन से दुनिया जहां की चीज खरीद डालते हैं। 
कुछ बरस पहले जब हिन्दुस्तानी शहरों में बड़े-बड़े मॉल खुले, उनमें सुपर बाजार खुले, तो मोहल्लों की किराना दुकानों से लेकर बाजार के ब्रांडेड सामानों के शोरूम तक का धंधा कमजोर हो गया। मॉल्स में लोगों को एक साथ कई कंपनियों के सामान देखने और खरीदने मिल जाते हैं, और शहरी बाजारों की धूल-धुएं भरी धक्का-मुक्की के मुकाबले मॉल्स आरामदेह भी रहते हैं। अब भारतीय शहरों में मॉल्स आने के दस-बीस बरस के भीतर ही ऑनलाईन बाजार ने मॉल्स को पीटना शुरू कर दिया है। एक वक्त लोग जिस फास्टफूड को खाने के लिए बाजार या मॉल्स जाते थे, अब लोग उसे घर बैठे बुलाने लगे हैं। इससे कारोबार और रोजगार, इन दोनों में बड़ी रफ्तार से एक फर्क आया है, कई किस्म के रोजगार घटे हैं, वहीं घर तक सामान पहुंचाने वाले लाखों-करोड़ों रोजगार हिन्दुस्तान जैसे देश में पैदा भी हुए हैं। कुरियर कंपनियों के नौजवान ऑनलाईन खरीदी के सामानों से लेकर लोकल फास्टफूड तक पहुंचाते हुए दिखते हैं, और जहां दुकानों का धंधा मंदा हुआ है, यह एक नई नौकरी, नए किस्म का रोजगार बढ़ गया है। 
इस मुद्दे पर लिखने का मकसद यह है कि कारोबार हो या रोजगार, लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि नई टेक्नालॉजी, और बाजार के नए तरीके मिलकर जरा सी देर में किसी कारोबार को ठप्प कर सकते हैं, किसी रोजगार को बेकार कर सकते हैं। आने वाले वक्त में ड्रोन से घर-दफ्तर तक सामान पहुंचाना बढ़ते चले जाएगा, और वैसे वक्त आज के डिलीवरी ब्वॉय फिर कोई नया काम ढूंढने में लग जाएंगे। आज लोगों में इतने चौकन्नेपन की जरूरत है कि वे किसी काम के लिए, किसी कारोबार के लिए, अपने को तैयार करते हुए दस-बीस बरस का अंदाज लगाएं। टेक्नालॉजी बड़ी रफ्तार से रोजगार-कारोबार खत्म भी करती है, खड़े भी करती है। वक्त की लहर और उसके बहाव के साथ तैरना सीखना जरूरी है, आज, कल जिंदा रहने के लिए। (Daily Chhattisgarh)

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