कोरिया से निकली नसीहत

संपादकीय
29 अप्रैल 2018


एक देश से दो बने, और जंग से गुजर चुके उत्तर और दक्षिण कोरिया के मुखिया अभी मिले। उत्तर कोरिया का तानाशाह चलकर दक्षिण कोरिया में दाखिल हुआ। सरहद पर खड़े दक्षिण कोरिया के मुखिया को उसने बांह पकड़़कर अपनी सरहद में खींचा और फिर हाथ थामे दोनों ने दक्षिण कोरिया में कदम रखा। अभी कल तक उत्तर कोरिया की मिसाईलें दक्षिण कोरिया पर तनी हुई थीं। यह पैंसठ बरस बाद हुआ कि दक्षिण कोरिया का मुखिया उत्तर कोरिया पहुंचा। इससे उत्तर कोरिया की तानाशाही का लोकतांत्रिक दुनिया के साथ उठना-बैठना भी शुरू हुआ और सरहद के दोनों ओर बंट गए रिश्तेदारों ने भी शायद चैन की सांस ली होगी। लोगों को याद होगा कि इसके पहले जर्मनी के दो हो चुके हिस्से मिलकर एक हुए। अब उसी मिसाल को लोग कोरिया के बारे में सोच रहे हैं।
लेकिन वह तो दूर की बात है। हमको अपने करीब के भारत और पाकिस्तान के बारे में सोचना चाहिए। इन दो आपसी दुश्मन हो चुके देशों के एकीकरण के बारे में नहीं, महज अड़ोस-पड़ोस में चैन से जीना सीखने के लिए। आज इन दोनों देशों की सरकारों, फौजों, और राजनीतिक दलों, मीडिया के लिए एक-एक पसंदीदा दुश्मन जुटा हुआ है। जिस तरह हिंदुस्तान में लोग दशहरे पर सजाकर बनाने और फिर जलाने के लिए एक सुंदर सा रावण बनाते हैं, उसी तरह ये दोनों देश एक-दूसरे को रावण बताते हुए बारहमासी दशहरा मनाते हैं। और देश कहने का मतलब देश के तमाम लोग नहीं बल्कि गिने-चुने जंगखोर, नफरतजीवी, कुर्सीकाबिज, और बकवासी लोग। ऐसे लोग जो सरहदों से दूर बसते हैं और जो जंग के खतरों से खुदको अलग रखते हैं। ऐसे लोगों के लिए पड़ोसी को दुश्मन मानकर, बनाकर, उस पर तोहमतें जड़कर अपनी जिम्मेदारियों से बचना एक पसंदीदा शगल है। 
दरअसल लोग अपने भूतकाल के साथ चैन और सहअस्तित्व से जीना सीख नहीं पाते। भारत और पाकिस्तान ही नहीं, दुनिया की भागीदारी फर्मों को अलग हो चुके पार्टनर, टूटी हुई शादी के तलाकशुदा पति-पत्नी, राजनीतिक दल से अलग हुए नेता, इनमें से कोई भी अपने भूतकाल के साथ चैन से जीना बड़ी मुश्किल से ही सीख पाते हैं। ऐसे में भारत और पाकिस्तान के बीच नफरत और मोहब्बत का एक रिश्ता चले आ रहा है, लोगों के बीच मुहब्बत का, और बड़ों के बीच नफरत का। यह सिलसिला दोनों देश की गरीब जनता पर बड़ा भारी पड़ रहा है जिसकी जरूरतों में जंग के हथियारों की कोई जगह नहीं है। 
उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच इस ऐतिहासिक सद्भावना से दुनिया की हर तनातनी को सबक लेने की जरूरत है। एक से दो बने दो देश का फिर एक हो जाना जरूरी नहीं होता, लेकिन एक-दूसरे के साथ अगल-बगल जीना तो सीखना ही चाहिए। 
आज हिंदुस्तान और पाकिस्तान का सबसे बड़ा अकेला खर्च एक-दूसरे के खिलाफ फौजी तैयारी है। इस तनाव को निभाने में हथियार कंपनियां खरबपति होते जाती हैं और भ्रष्ट नेता अरबपति। जनता के मुंह का निवाला छिनता जाना है और जंग के सौदागरों की चर्बी बढ़ती जाती है। यह खत्म होना चाहिए। शायद पहली बार ऐसा हुआ है कि पाकिस्तानी फौज के मुखिया ने लगातार इस बात की खुली वकालत की है कि पाकिस्तान को हिंदुस्तान के साथ अमन की बात करनी चाहिए। ऐसा माहौल सरहद के दोनों तरफ बनाकर अपने-अपने भूखे बच्चों के पेट भरने चाहिए, बजाय तोप में गोले भरने के। (Daily Chhattisgarh)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें