मोदी ने एक गलती टाली

संपादकीय
3 अप्रैल 2018


कर्नाटक में एक बड़ी फेक न्यूज वेबसाईट के संपादक की गिरफ्तारी के बाद यह सवाल उठा कि यह आदमी कैसे इतने वक्त तक तमाम झूठी खबरों को गढ़कर नफरत फैलाने में लगा था, और उसके साथ एक विचारधारा, एक पार्टी, और एक मकसद के लोग जुड़े हुए थे। इन सवालों के बीच ही केंद्र सरकार के सूचना प्रसारण मंत्रालय ने कल कुछ नए नियम जारी किए जिनके मुताबिक केंद्र सरकार से अधिमान्यता प्राप्त पत्रकारों में से किसी को अगर फेक न्यूज, यानी झूठी खबरें, फैलाते हुए पाया जाएगा, तो पहले तो उसकी अधिमान्यता निलंबित होगी, और फिर दुबारा या तिबारा उसकी अधिमान्यता खत्म भी कर दी जाएगी। यह गाईडलाईन चौंकाने वाली इसलिए थी कि आज फेक न्यूज फैलाने में लगे हुए लोग न तो केंद्र सरकार से अधिमान्यता प्राप्त हैं, और न ही झूठ को फैलाने के लिए आज किसी सरकारी इजाजत की जरूरत होती। कुछ सौ रुपये में एक वेबसाईट का नाम रजिस्टर हो जाता है, और कुछ हजार रुपये में वेबसाईट पर खबरें, तस्वीरें और फिल्में डालने के लिए जगह मिल जाती है। इसके बाद तो झूठ फैलाने में जिसका जितना हौसला हो, जितना उत्साह हो, नफरत फैलाने में जिसका जितना समर्पण हो, वह उतना ही आग को फैला भी सकता है। 
लेकिन सूचना प्रसारण मंत्रालय का आदेश आते ही जो जनधारणा बनी, उसे देखते हुए प्रधानमंत्री ने सीधी सार्वजनिक दखल दी, और आज दोपहर तक यह घोषणा आ गई कि यह गाईडलाईन वापिस ली जा रही है, और प्रधानमंत्री की ओर से कहा गया कि फेक न्यूज या ऐसी दूसरी शिकायतों को पे्रस काउंसिल देखेगा। प्रधानमंत्री का यह फैसला एकदम वक्त पर लिया गया सही फैसला है क्योंकि पत्रकारों पर बंदिश लगाने की कोशिशों का इस देश में बड़ा बुरा तजुर्बा रहा है। जिस किस्म के पत्रकारों पर रोक के नाम पर ऐसी बंदिशें लाई जाती हैं, उस किस्म के लोगों को छोड़कर ईमानदार, और सत्ता से असहमत लोगों पर इनका इस्तेमाल होता है। आज फेक न्यूज बनाकर उनसे नफरत की आग लगाने का काम इतना खुलकर हो रहा है कि केंद्र सरकार या राज्य सरकारें अगर चाहें, तो उनके खिलाफ सीधी कानूनी कार्रवाई हो सकती है। और आज पहली नजर में जो तथ्य दिखते हैं, उनके मुताबिक नफरतजीवी फेक न्यूज वेबसाईटें केंद्र सरकार या किसी राज्य सरकार की अधिमान्यता की मोहताज तो बिल्कुल नहीं हैं। 
यह एक दुर्लभ मौका रहा है जब प्रधानमंत्री ने एक गलत फैसले पर पल भर में सही फैसला लिया, और उसे खारिज कर दिया। भारत में मीडिया के गलत काम पर कार्रवाई के लिए एक संवैधानिक संस्था प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया है जिसके अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के कोई रिटायर्ड जज ही होते हैं। यह मीडिया के गलत कामों की जांच करने में सक्षम संस्था है, फिर चाहे उसके पास कार्रवाई के अधिक अधिकार क्यों न हों। ऐसे में सरकार को अपने हाथ में मीडिया पर निगरानी रखने का काम नहीं लेना चाहिए था क्योंकि इससे इसी मकसद के लिए बनाई गई एक संवैधानिक संस्था के कार्यक्षेत्र में दखल हो जाती। यह फैसला इस बात को सोचे बिना भी लिया गया दिखता है कि लोकतंत्र में मीडिया पर कड़ी कार्रवाई करते दिखने वाली सरकार सचमुच में नफरत फैलाते लोगों पर कोई भी कार्रवाई नहीं कर रही है। किसी भी सरकार को ऐसी नासमझी से बचना चाहिए, फिलहाल पेशेवर गंभीर पत्रकारों पर से एक खतरा टला है, लेकिन आज बड़ा सवाल यह है कि सरकार की नीयत नफरत फैलाने वाले मुजरिमों के बारे में क्या है वह उसे साफ करना चाहिए।(Daily Chhattisgarh)

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