अपने खिलाफ अनायास जुटने वाली एकजुटता की भी सोचें...

संपादकीय
4 अप्रैल 2018


भारत जैसे चुनावी लोकतंत्र में, और ऐसी विविधता वाले देश में तमाम सरकारों और राजनीतिक दलों को यह याद रखना चाहिए कि सब कुछ उनके काबू में नहीं रहता। वे मेहनत कर सकते हैं, लेकिन कई बार अनायास ऐसी नौबत आ जाती है कि उनका किया-कराया धरा रह जाता है और नौबत बेकाबू हो जाती है। मोदी सरकार लगातार अंबेडकर के नाम को लेकर अपनी कोशिशों का एहसास देश के लोगों, और खासकर दलित लोगों को कराते आ रही थी। फिर एकाएक सुप्रीम कोर्ट का एक ऐसा फैसला आया जिसने दलित-आदिवासी लोगों की खास हिफाजत के लिए बनाए गए कानून के कुछ प्रावधानों को हल्का कर दिया, और इन तबकों की शिकायतों पर कार्रवाई अब बड़ी मुश्किल हो गई है। यह फैसला मोदी सरकार का नहीं है, लेकिन देश की जनता चाहे किसी भी मुद्दे पर नाराज हो, उसकी नाराजगी सरकार की तरफ मुड़ ही जाती है। और फिर मोदी सरकार के अब तक के कार्यकाल मेें बहुत सी ऐसी वजहें रही हैं जिनकी वजह से दलित-आदिवासी तबके लगातार तनाव और निराशा में डूबे हुए हैं। इसलिए इस मामले को लेकर भी इनकी नाराजगी सरकार के खिलाफ भड़क उठी है। सरकार के तरफ से चूक यह हुई है कि सुप्रीम कोर्ट के एससी-एसटी फैसले के आने के बाद उसे अपना रूख जाहिर करने में वक्त लग गया, और वह रूख जरूरत के मुताबिक मजबूत रूख भी नहीं था। नतीजा यह हुआ कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका तो दायर कर दी, लेकिन इन तबकों की नाराजगी मोदी सरकार और उसके मुखिया भाजपा के खिलाफ कायम रही। 
भारत जैसे जटिल लोकतंत्र का हाल एक ऐसी सड़क जैसा रहता है जिसमें आप अपनी खुद की गाड़ी तो सम्हालकर चला रहे हैं, लेकिन आगे-पीछे, दाएं-बाएं की बाकी गाडिय़ां भी आपको पलटा सकती हैं। कुछ ऐसा ही इस लोकतंत्र में सरकार के साथ भी हो सकता है, या किसी पार्टी या नेता के साथ भी हो सकता है। ऐसे वक्त लोगों की पिछली लंबी साख उनके काम आती है, और दलित-आदिवासी तबकों के बीच मोदी सरकार के पिछले करीब चार बरस की साख काम नहीं आ पा रही है। देश में जिस तरह दलितों की जगह-जगह हत्या हुई, जिस तरह उन्हें पीटा गया, उनका खानपान छुड़वाया गया, उनका कारोबार बर्बाद किया गया, उन सब बातों का मिलजुल कर असर अब सामने आया है जब अनायास गैरभाजपाई पार्टियां और तरह-तरह के संगठन इस एक मुद्दे को लेकर इसके बैनरतले एकजुट हुए हैं। यह एकजुटता अगले आम चुनाव को लेकर कोई राजनीतिक गठबंधन नहीं है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने लोगों को जिस अंदाज में एक होने का मौका जुटा दिया है, वह किसी की भी कल्पना से परे का था। 
आज यहां पर इस चर्चा को करने का मकसद यही है कि लोगों को अतिआत्मविश्वास से बचना चाहिए, क्योंकि उनकी तमाम अच्छी या कामयाब कोशिशों के बावजूद कोई ऐसी नौबत उनकी कल्पना और काबू से परे की आकर खड़ी हो सकती है जो कि उनके लिए क्षमता से बाहर की फजीहत हो। जो लोग यह मानकर चलते हैं कि उन्होंने अपनी तरफ से तो अच्छी से अच्छी तैयार कर ली है, उनको यह याद रखना चाहिए कि कुदरत जब आसमानी बिजली किसी पर गिराती है, तो कोई तैयारी काम नहीं आती, और खुले में आते-जाते लोग खत्म हो जाते हैं। जिन राज्यों में चुनाव होने हैं, वहां पर राजनीतिक दलों को और उम्मीदवारों को कई बातें याद रखनी चाहिए, जिसमें ऐसी नौबत, ऐसी अकल्पनीय नौबत की बात तो एक बात है, इससे परे भी पुरानी कहानियों को याद रखना चाहिए कि किस तरह बुरे वक्त में जाल में फंसे हुए एक शेर को एक चूहे से मदद मिलती है, और उसकी जान बचती है। पुरानी कहानियों में समझ की बड़ी सरल मिसालें रहती हैं, और लोगों को बीच-बीच में अपने बच्चों से मांगकर ऐसी कहानियां जरूर पढऩी चाहिए। वक्त कई बार ऐसा बदलता है कि बहुत से लोगों को एकजुट होने का मौका जुट जाता है, और यह बात किसी को नहीं भूलनी चाहिए कि ऐसी एकजुटता उनके खिलाफ भी हो सकती है। (Daily Chhattisgarh)

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