भ्रष्टाचार के आरोपों का जवाब शिवराज ने बनाए साधू-मंत्री!

संपादकीय
5 अप्रैल 2018


मध्यप्रदेश सरकार ने उन पांच साधुओं को मंत्री का दर्जा दिया है जो कि नर्मदा यात्रा में सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन की घोषणा कर चुके थे। और ये पेशेवर साधू अपने इस नए दर्जे-ओहदे को लेकर बहुत खुश भी हैं। दूसरी तरफ शिवराज सरकार के इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर हुई है कि जो प्रदेश सरकार करीब एक लाख करोड़ के कर्ज में डूबी हुई है, वह इस तरह की बर्बादी क्यों कर रही है? यह सवाल अपने आपमें तो सही है, लेकिन काफी नहीं है। सवाल तो यह है कि जिन लोगों ने संसार से संन्यास ले लिया है, और साधू बन गए हैं, वे सांसारिक महत्व और सहूलियत की तरफ फिर क्यों लौट रहे हैं, अगर सरकारी पैसों पर ही मौज करनी है, तो भगवा उतार दें, जटा मुंडा लें, और कमंडल छोड़कर सांसारिक इंसान की तरह बनकर उसके बाद सरकारी सहूलियतें लें। एक तरफ तो अपने आपको ईश्वर का एजेंट भी बताना है, और दूसरी तरफ सरकारी खर्च पर मजे भी करने हैं। शिवराज सिंह सरकार का यह फैसला अपने कथित भ्रष्टाचार के खिलाफ घोषित आंदोलन को खरीदने की एक फूहड़ कोशिश है, लेकिन जब भगवाधारी साधू बिकने को तैयार खड़े हों, तो फिर मध्यप्रदेश की दुनिया एक मंडी होकर रह गई है। 
शिवराज सरकार का यह फैसला धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ है क्योंकि यह किसी एक धर्म को सरकारी महत्व और सरकारी खर्च देने वाला है। यह फैसला संसदीय लोकतंत्र की नैतिकता के भी खिलाफ है क्योंकि जनता का पैसा ऐसे ही लोगों पर खर्च होना चाहिए जो कि जनता का कुछ भला कर सकते हैं। अपने आपको खुद ही संत कहने वाले ऐसे साधुओं पर वैसे भी शिवराज सिंह की सरकार अपने पूरे कार्यकाल में गरीब जनता का पैसा लुटाते आई है, और प्रदेश को भगवा कर चुकी है। सरकार अपनी धर्मनिरपेक्ष या सर्वधर्म-समभाव की छवि पूरी तरह खत्म कर चुकी है और बहुसंख्यक हिन्दू धर्म पर चुनावी दांव लगाकर सरकार चला रही है। लेकिन यह सिलसिला लोकतंत्र के इतिहास में अच्छी तरह दर्ज होता है। जब राजतंत्र था, या जब कहीं पर धर्मराज रहता है, तो भी वहां का इतिहास अच्छी तरह दर्ज होता है। इक्कीसवीं सदी के भारतीय लोकतंत्र में इतिहास लेखन सरकार या सत्तारूढ़ पार्टी से परे भी होता है, और उसमें मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का नाम ऐसे फैसलों के लिए अच्छी तरह दर्ज होगा। 
दरअसल धर्म और न्याय, इन दोनों का साथ-साथ चलना मुमकिन ही नहीं है। हमने, और दुनिया ने, यह अच्छी तरह देखा है कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराने के पूरे आंदोलन में यह हिंसक और अलोकतांत्रिक नारा लगाया गया था कि आस्था कानून के ऊपर है। और वही हुआ भी, आस्था के उन्माद ने, या हो सकता है कि आस्था की राजनीति की साजिश ने, बाबरी मस्जिद को गिरा दिया, और देश को एक हिंसा में झोंक दिया। लोकतंत्र में निर्वाचित सरकार को हिंसक धर्म को कानून के ऊपर नहीं बिठाना चाहिए, और धर्म से दूरी बनाकर रखना चाहिए। जब सरकार किसी एक धर्म को बढ़ावा देने में डूब जाती है, जब मुख्यमंत्री उमा भारती मुख्यमंत्री की मेज पर ही मंदिर बना लेती है, जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह आए दिन माथे पर चंदन पोते आरती करते दिखते हैं, और तमाम धार्मिक कार्यक्रम सरकारी खर्च पर होते हैं, तो प्रदेश में बराबरी का वातावरण खत्म हो जाता है, धार्मिक और सामाजिक समानता खत्म हो जाती है। बहुसंख्यक तबके के वोटों पर चुनाव तो जीता जा सकता है, लेकिन इतिहास में नाम अच्छे रंग से दर्ज नहीं हो सकता। 
हमारा ख्याल है कि जिन पांच साधू-संतों ने मंत्री स्तर का दर्जा मंजूर किया है, उन सबको नैतिक रूप से भ्रष्ट मानकर उनका धार्मिक बहिष्कार होना चाहिए, सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए। लोगों को खुलकर उनके खिलाफ बात करनी चाहिए, जगह-जगह उनसे सवाल पूछने चाहिए। ऐसे पाखंडी लोगों से यह भी पूछना चाहिए कि कल तक वे नर्मदा यात्रा के भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन करने वाले थे, और उसी भ्रष्ट सरकार से मंत्री का दर्जा पाकर अब उस आंदोलन को खत्म करने की घोषणा भी कर चुके हैं, यह किस दर्जे की बेईमानी है? एक तो ऐसा फैसला लेने वाली सरकार जनता के प्रति बेईमान, और ऐसे ओहदे मंजूर करने वाले भगवे लोग धर्म के प्रति बेईमान। ऐसी बेईमानी के खिलाफ चुप रहना जागरूक लोगों की बेईमानी भी होगी।
(Daily Chhattisgarh)

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