दारू के धंधे को दुहने का तरीका ईमानदारी से दूर

संपादकीय
7 अप्रैल 2018


छत्तीसगढ़ में शराब कारोबार के लिए मार्च-अप्रैल का महीना काफी गहमागहमी का होता है। अब तो शराब की खरीद-बिक्री का काम सरकार खुद कर रही है, लेकिन कर्मचारी जुटाने से लेकर ट्रांसपोर्ट के ठेके तक, और दुकानें किराए पर लेने से लेकर दारू कंपनियों से रेट का सौदा करने तक बहुत सी हलचल आबकारी विभाग में होती है। इसके साथ-साथ शराबखानों का काम अब तक निजी हाथों में है, और इसे सरकार मानो एक फौलादी शिकंजे से जकड़कर रखती है। इन सारे नियम-कायदों को देखें तो लगता है कि क्या सचमुच किसी सरकार के पास इतना वक्त रहता है कि वे एक कारोबार के लिए निहायत गैरजरूरी नियम-कायदे बनाने में जान लगाएं, और फिर उसे लागू करने के नाम पर मनमानी करें? 
पिछले एक पखवाड़े से लोगों के फोन पर लगातार सरकारी एसएमएस आ रहे हैं कि शराब दुकानों से तमाम बिक्री का बिल काटा जाएगा। अब दुकान सरकारी है तो बिल काटना है तो काटें, न काटना है तो न काटें, दारू खरीदने वाले तो बिल मांगने से रहे, क्योंकि उसे कहीं जमा करके भुगतान तो लेना नहीं है। और शराब दुकानों पर भीड़ की जो नौबत दिखती है, उसमें दारू के दाम के बाद बचे पैसे ही मिल जाएं, तो ही बहुत है, बिल तो किसी को क्या मिलेगा, और कोई उस बिल का क्या करेगा। इस पूरे धंधे को देखें तो अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से सरकार ने इसे अपने फौलादी शिकंजे की गिरफ्त में रखा है, और मनचाहे लोगों को मनचाही छूट देना, और अनचाहे लोगों को अनचाही सजा देना इससे सरकार के लिए बड़ा आसान हो जाता है। छत्तीसगढ़ में सरकार को दारू के धंधे पर काबू करने की मानो लत सी लग गई है। शराबखाने केवल अंग्रेजी शराब पिला सकते हैं, और इस पर भी सरकार यह तय करती है कि कितनी महंगी शराब वहां पिलाई जाएगी, और किस दाम से कम की शराब वहां नहीं पिलाई जाएगी। जिस व्यक्ति की शराब खरीदने की जितनी क्षमता है, उसके भीतर वह गर यह सोचे कि वह शराबखाने में बैठकर एक-दो पैग खरीदकर पी सके, तो अगर वह महंगी दारू खरीद सकता है, तो ही पी सकता है, वरना उसे शराब दुकान की धक्का-मुक्की से बोतल ही खरीदनी होगी, और या तो घर जाकर बच्चों के सामने पीना होगा, या फिर किसी सार्वजनिक जगह के कोने में छुपकर दारू पीने का जुर्म करना होगा जिसके एवज में उसे जेल भी हो सकती है। 
पिछले एक बरस के सरकारीकरण का छत्तीसगढ़ का तजुर्बा यह है कि आबकारी विभाग जिस कंपनी के जिस ब्रांड को आसमान पर पहुंचाना चाहे, उसे पहुंचा सकता है, और जिस कंपनी को बंद करवाना चाहे, उसकी दारू दुकानों से हटवा सकता है। पैसे खर्च करके दारू खरीदने वाले लोगों को अपना ब्रांड छांटने का कोई हक नहीं है, और यह सरकार तय करती है कि किस दुकान में कौन सा ब्रांड रखा जाए, या किस ब्रांड को प्रदेश से बाहर किया जाए। यह पूरा कारोबार सरकार करती है, लेकिन दारू पीने को एक जुर्म की तरह मानकर चला जाता है, और पीने वाले का कोई हक ही नहीं है, भले ही उससे सरकार को हजारों करोड़ साल की कमाई होती है। दारू पीना बुरी बात है, लेकिन इस सरकारी कारोबार में सरकारी मनमानी और भी बुरी बात है। यह बात जाहिर है कि इतने अधिक जटिल नियम बनाना, और फिर उनको मनचाही जगहों पर थोपना किसी ईमानदार नीयत से नहीं होता है। कोई शोधकर्ता अगर एक बरस पहले के खुले बाजार के आंकड़े ले ले, और पिछले बरस के सरकारी हुए दारू-कारोबार के आंकड़े ले ले, तो बड़ी आसानी से यह साबित हो सकता है कि कौन सी कंपनी सरकार की पसंदीदा है जो कि करोड़पति से अरबपति बना दी गई है, और कौन सी कंपनियां धंधे से बाहर कर दी गई हैं। यह पूरा जाल ईमानदारी को अलग रखकर ही बुना जाता है, और लोकतंत्र में सरकार की नीयत और उसकी हरकत इन दोनों का पारदर्शी पैमानों पर साफ दिखना जरूरी है। आज इस प्रदेश में न तो दारू बनाने वालों में समानता के कोई अधिकार रह गए, और न ही दारू पीने वालों को उनकी पसंद का कोई हक रह गया। यह एक अलग बात है कि दारू पीने वालों की कोई साख नहीं होती है, और न ही उनकी कोई ऐसी एकजुटता होती है कि वे अपने हक के लिए लड़ सकें, लेकिन सरकार का इस धंधे को दुहने का तौर-तरीका ईमानदारी से कोसों दूर है। (Daily Chhattisgarh)

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